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	<title>कौटिल्य अर्थशास्त्र में कर संबंधी सिद्धांत - Revision history</title>
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	<updated>2026-10-16T05:34:09Z</updated>
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		<title>Sriram: Created page with &quot; &#039;&#039;&#039;भूमिका-&#039;&#039;&#039;  कर की प्राप्ति धर्म और शास्त्र पर आधारित होने के कारण राजा के लिए यह कदापि संभव नहीं था कि वह इस संबंध में स्वेच्छाचारी हो सके I कौटिल्य अर्थशास्त्र में विपत्ति के समय धन क...&quot;</title>
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		<updated>2024-09-18T11:41:27Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Created page with &amp;quot; &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;भूमिका-&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  कर की प्राप्ति धर्म और शास्त्र पर आधारित होने के कारण राजा के लिए यह कदापि संभव नहीं था कि वह इस संबंध में स्वेच्छाचारी हो सके I कौटिल्य अर्थशास्त्र में विपत्ति के समय धन क...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;भूमिका-&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  कर की प्राप्ति धर्म और शास्त्र पर आधारित होने के कारण राजा के लिए यह कदापि संभव नहीं था कि वह इस संबंध में स्वेच्छाचारी हो सके I कौटिल्य अर्थशास्त्र में विपत्ति के समय धन को संचित करने के लिए ऐसे उपायों का उल्लेख किया गया है जिससे जनता के अंधविश्वासों का उपभोग किया जा सके I जैसे अपने गुप्त चरो द्वारा देव मंदिरों की स्थापना कर वहां भेंट पूजा करवाना लोगों को किसी कुएं में दूर से सांप को दिखाना जिसके बहुत से सर हो और उद्यान में वृक्षों पर असमय फल फूलों का आना दिखाकर उनसे धन एकत्र करना &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I चंद्रगुप्त मौर्य के समय में इस ढंग से पूजा के निमित्त मूर्तियां बनाकर धन एकत्रित किया गया था I इसकी सूचना पतंजलि के महाभाष्य से मिलती है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;२&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I परंतु जहां तक राजकीय करों का प्रश्न है प्राचीन भारत के राजा मनमानी कर नहीं लगा सकते थे I क्योंकि कर के प्रकार और मंत्र शास्त्र नीति पर ही निर्भर माने जाते थे जिस जनपद में जो परंपरागत धर्म व्यवहार और शास्त्र नीति हो कर उसी के अनुसार ग्रहण किये जा सकते थे I कर संचय के सिद्धांतों का वर्गीकरण निम्न प्रकार किया जा सकता है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१-धीरे-धीरे कर लेना- राजा को प्रजा से शनै: शनैः कर लेना चाहिए &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;३&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I एक अन्य प्रसंग में भीष्म ने युधिष्ठिर को उपदेश दिया है कि जिस प्रकार मधुमक्खी या भंवर फूल से मधु का पान करती है वैसे ही प्रजा से कर लिया जाए  I गाय का दूध तो दूहा जाता है पर उसके थनों को नहीं काटा जाता &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;४&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I पहले थोड़ा-थोड़ा कर लिया जाए ताकि आर्थिक दृष्टि से जनता की समृद्धि हो सके आर्थिक समृद्धि का परिणाम यह होगा की जनता अधिक कर दे सकते में समर्थ हो जाएगी और तब क्रमशः उसके कर में वृद्धि भी की जा सकेगी &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;५&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I कर के भार को धीरे-धीरे और नैरन्तर्य के साथ बढ़ाया जाए पर मृदुलता के साथ राष्ट्र में जो धनी लोग हो पान भोजन और वस्त्र आदि द्वारा उनका सदा सम्मान किया जाए और कर लेते हुए उनसे कहा जाए की प्रजा के साथ मुझ पर अनुग्रह कीजिए राज्य में धनिकों का भी वही महत्व है जो बुद्धिमान वह शूरवीर लोगों का है I वह भी राज्य के रक्षको में ही हैं &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;६&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; जो राजा मूर्खता के वशीभूत होकर अपनी प्रजा का शोषण करता है वह राज्य से शीघ्र नष्ट होकर अपना और अपने बन्धुओं का विनाश करता है I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;२-प्रजा की रक्षा करना-&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  प्रजा की रक्षा करने के कारण ही राजा उससे कर ग्रहण करता है जो राजा प्रजा की रक्षा नहीं कर सकता उसको कर लेने का भी अधिकार नहीं है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;७&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I प्रजा की रक्षा न करके जो राजा प्रजा से करो के निमित्त धन को एकत्रित करता है वह नर्कगामी होता है और प्रजा के संपूर्ण पापों का वहन करने वाला होता है I प्रजा की रक्षा करने रूपी कर्तव्य से रहित राजा कर एकत्रित करने के अधिकार से भी वंचित रहता है I राजा को चाहिए कि वह प्रजा की रक्षा करें उसको पुष्ट और समृद्ध करें तभी कर ग्रहण करें &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;८&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I जैसे गौ को चारा आदि खिलाकर और सुपुष्ट करके ही उसे दूध लिया जाता है I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;३-लाभ पर कर-&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में लिखा है जिस प्रकार वृक्षों से फल तभी तोड़े जाते हैं जबकि वह पक जाते हैं I उसी प्रकार राज्य से कर भी तभी लिए जाने चाहिए जब वह पक जाए I यदि कच्चे फल तोड़ लिए जाएंगे तो उस वृक्ष के मूल को ही क्षति पहुंचेगी राज्य में भी इससे कोप उत्पन्न हो जाएगा I महाभारत के अनुसार हे राजा तुम माली के समान बनो कोयले बनाने वाले के समान नहीं I ऐसा होने पर ही तुम चिरकाल तक प्रजा का पालन करते हुए राज्य का उपभोग कर सकोगे I यही भाव शुक्र नीति में भी विद्यमान है I व्यापार और उद्योग पर कर की मात्रा क्रय विक्रय के मूल्य मार्ग की आपत्तियों आदि का विचार करके उसके लाभ पर निर्धारित की जानी चाहिए &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;९&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I  किसी भी वस्तु पर कर को एक ही बार लगाना चाहिए बार-बार नहीं मनु ने भी यह सिद्धांत प्रतिपादित किया था कि व्यवसाय संबंधी व्यय और मूलधन एकत्रित करने संबंधी व्यय कर मुक्त होना चाहिए  I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;४-कर की मात्रा का स्वल्प होना-&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  कर की मात्रा इस प्रकार निर्धारित होनी चाहिए कि कृषक व्यापारी पशुपालक आदि कर को अपने ऊपर भार ना समझे और यह अनुभव करें कि कर देना उनके अपने हित में है I कर निर्धारण करने का सिद्धांत यह है कि किसी भी व्यवसाय के लाभ पर ही कर लगाया जाए पूंजी पर नहीं I कर की मात्रा में यदि वृद्धि करने की आवश्यकता हो तो यह शनैः शनैः की जानी चाहिए &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१०&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I कर की दर में अचानक एकदम वृद्धि नहीं करनी चाहिए वृद्धि इस प्रकार हो कि कर दाता को अधिक बोझ प्रतीत ना हो I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;५-राष्ट्रीय विपत्ति मे कर-&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  राष्ट्रीय विपत्ति के अवसरों पर अतिरिक्त कर लगाने की आवश्यकता होती है I इसके लिए प्रजा को विश्वास में लेना चाहिए राष्ट्र की समृद्धि के लिए राष्ट्रीय योजनाओं में भी समुचित धन की आवश्यकता होती है I इसके लिए राजा अतिरिक्त कर लगा सकता है  I परंतु यह सब योजनाएं प्रजा का कल्याण करने वाली होनी चाहिए I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;कर मुक्त संस्थाएं-&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  कौटिल्य का मत है कि मानव जीवन के अति महत्वपूर्ण कार्यों को संपन्न करने के जो साधन हैं वह कर मुक्त हो जाने चाहिए I विशेष संस्कार व्रत यज्ञ दान उषायन आदि से संबंधित साधन इस वर्ग में आते हैं कौटिल्य का यह भी कथन है की नई भूमि नए तालाब नए सेतु बांध यह सभी कुछ समय तक कर मुक्त रहनी चाहिए &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;११&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I नए उद्योग धंधों पर उनके शैशव काल में कर नहीं लगाने चाहिए I उन पर कर तभी लगाए जाएं जबकि वह कर देने के समर्थ से युक्त हो जाएं  I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;अर्थार्जन एवं उसके उपाय-&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  कौटिल्य अर्थशास्त्र में समाज के आर्थिक जीवन पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है I आचार्य कौटिल्य ने व्यापार वाणिज्य एवं उद्योगों कृषि व्यवस्था आदि का व्यापक वर्णन किया है I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;व्यापार वाणिज्य एवं उद्योग-&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  कौटिल्य का मानना है कि देश जब तक आर्थिक दृष्टि से साधन संपन्न एवं समृद्ध नहीं होता तब तक राजनीतिक एकता अर्थहीन है I इसी दृष्टि से उन्होंने वार्ता &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१२&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; के अंतर्गत व्यापार वाणिज्य एवं उद्योगों को सम्मिलित कर उनके विकास और नियमन का वर्णन किया है I अर्थशास्त्र में ग्रामों के छोटे-छोटे सौदागरों से लेकर बड़े-बड़े व्यापारियों तक का उल्लेख आया है I उस काल में आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार का व्यापार उन्नत दशा में था आंतरिक व्यापार को तीन वर्गों में रखा जा सकता था I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१-फुटकर व्यापारी&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;-  फुटकर व्यापारी या तो एक स्थान पर बैठकर व्यापार करते थे या घूम घूम कर फेरी देकर वस्तुएं बेचते थे I वह थोक व्यापारियों अथवा राजकीय क्षेत्र से वस्तु में लाकर व्यापार करते थे I फुटकर व्यापारियों के लाभ की दर निश्चित रहती थी I फुटकर व्यापारियों को थोक व्यापारियों से उधार मिल जाता था I जिसका ब्याज सहित भुगतान  माल की बिक्री के बाद बाजार परिस्थितियों के अनुसार कर सकते थे I कुल मिलाकर राज्य में फुटकर व्यापारियों के लिए अनेक सहानुभूति पूर्ण नियम प्रचलित थे  I किंतु इन सहानुभूतियों का उन्हें अनुचित लाभ नहीं उठाने दिया जाता था &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१३&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;२-थोक व्यापारी-&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  थोक व्यापारी राजकीय क्षेत्र से या देश-विदेश से पण्य ग्रहण करके थोक में विक्रय करते थे I सामान्यतः अनेक थोक व्यापारी मिलकर एक संघ बना लेते थे जिस श्रेणी कहा जाता था I स्थल मार्गों के अतिरिक्त जलमार्गों से भी व्यापार का उल्लेख मिलता है I कौटिल्य ने लिखा है कि कंबल, चमड़े, हाथी दांत ,कस्तूरी ,अश्वादि ,का उत्तर क्षेत्र से तथा शंख ,हीरे ,मणि ,मुक्ता ,स्वर्ण आदि का दक्षिण क्षेत्र से प्रचुर मात्रा में व्यापार होता था &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१४&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;३-राजकीय व्यापार-&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  कौटिल्य के समय व्यापार संचालन में राज्य की महत्वपूर्ण भूमिका थी I राज्य की ओर से नियुक्त व्यापारिक क्षेत्र का सर्वोच्च अधिकारी पण्याध्यक्ष संपूर्ण व्यापार पर नियंत्रण रखता था I पण्याध्यक्ष ही राजकीय क्षेत्र से उत्पादित होने वाले पण्यों के विक्रय की व्यवस्था करता था I वह जमाखोरी और मुनाफाखोरी पर नियंत्रण रखकर प्राणियों को उचित मूल्य पर बिकवाने की व्यवस्था करता था I  लाभ की दर देसी वस्तुओं पर पांच प्रतिशत और विदेशी वस्तुओं पर 10% निर्धारित की गई थी &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१५&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I इस प्रकार व्यापार में राज्य का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप था I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौटिल्य ने कीमतों पर अंकुश रखने के लिए मुद्रा व्यवस्था पर प्रभावी नियंत्रण का प्रावधान किया है I आचार्य कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में राज्य वाणिज्यिक स्थिति का स्पष्ट चित्रण करते हुए बैंकिंग परिवहन विज्ञापन भंडारण बीमा संप्रेषण आदि सभी वाणिज्य संबंधी क्रियाओं का सविस्तार वर्णन किया है I उन्होंने बैंकिंग क्षेत्र में ऋण ब्याज उपनिधि साक्षियों आदि के संबंध में कठोर नियम प्रतिपादित किए हैंI  नियमों की अवहेलना करने पर कौटिल्य ने दंड का विधान किया है I उन्होंने व्यापार की उन्नति के लिए परिवहन साधनों व मार्गों के विकास पर पर्याप्त ध्यान दिया है I उन्होंने जल थल मार्गों के निर्माण और उसकी सुरक्षा की समुचित व्यवस्था की है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१६&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I उस काल में परिवहन के विकास और नियंत्रण का कार्य नावाध्यक्ष करता था I जिसकी सहायता के लिए पत्तनाध्यक्षों और नौकाध्यक्षों की नियुक्ति की जाती थी I कौटिल्य ने व्यापार अधिकारियों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के स्थल मार्गों का भी प्रावधान किया है  I मार्गो को रोकना जोतना खोदना घेरना दण्डनीय अपराध माना जाता था मार्ग पर सुरक्षा प्रदान करने के लिए वर्तनी लिया जाता था I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
      कौटिल्य ने विभिन्न प्रकार से प्राप्त अन्न आदि के भंडारण की व्यवस्था भी की है I उन्होंने भंडार गृहों की बनावट आदि का भी उल्लेख किया है I उनके अनुसार कोष्ठागाराध्यक्ष कृषि उपज के भंडारण की व्यवस्था करता था I कौटिल्य ने विभिन्न प्रकार के विक्रय योग्य पण्यों का संग्रह करने का निर्देश दिया है  I उन्होंने धान्य वर्ग के अनाज धान गेहूं ज्वार जौ कोदो आदि स्नेहवर्ग के घी तेल वास मज्जा आदि लवण वर्ग के सेंधा समुद्री जवा सज्जी तथा लोना क्षार  वर्ग के गुण शक्कर खाड राभ आदि &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१७&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I मधु वर्ग के शहद सूक्ति वर्ग का सिरका आदि को संग्रहित करने के संबंध में निर्देश दिया है कि पुरानी वस्तुओं का उपयोग करके नई वस्तुओं का भंडारण करते रहना चाहिए I भण्डारित पण्यों को सुरक्षित रखने के लिए कौटिल्य ने अनेक उपायों का वर्णन किया है I एक जगह कौटिल्य ने निर्यात व्यापार में भयभूतिकार का उल्लेख किया है I जिससे उस काल में पण्यों के बीमा करवाने की प्रथा का संकेत मिलता है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१८&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I संप्रेषण के लिए कौटिल्य ने संदेशवाहक व्यक्तियों और घुड़सवारों के प्रयोग का उल्लेख किया है I उसके अनुसार पालतू कबूतरों को भी संदेश भेजने के लिए उपयोग किया जाता था I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;निष्कर्ष-&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  कौटिल्य अर्थशास्त्र के अनुशीलन से तत्कालीन उद्योगों की वस्तु स्थिति का परिचय मिलता है I उस काल में राजकीय निजी तथा मिश्रित तीनों क्षेत्रों में उद्योग स्थापित थे I कौटिल्य ने वस्त्र धातु रत्न मदिरा चर्म बर्तन काष्ठ तथा आयुध आदि उद्योगों के कच्चे माल उत्पादन किस्म विक्रय आदि के संबंध में सविस्तार वर्णन किया है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१९&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I उन्होंने श्रमिक के प्रति उदारता प्रकट की है I कौटिल्य ने दुर्ग बॉध सड़क आदि बनाने के लिए रचनात्मक उद्योगों का भी उल्लेख किया है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;२०&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I उन्होंने व्यवसाय के अंतर्गत चिकित्सक दर्जा धोबी मिस्त्री आदि की सेवाओं को भी सम्मिलित किया है I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;संदर्भ ग्रंथ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१-कौटिल्य अर्थशास्त्र 5.2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२- मौर्यहिरण्यार्चिभिरच्याः प्रकल्पिताः जीविकार्थे चापण्ये (53 99 )सूत्र पर पतंजलि के भाष्य मे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३-मनुस्मृति 7.129&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४-महाभारत शांतिपर्व 88.4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५-महाभारत शांतिपर्व 88.8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६- अंगभेदतनमहद्राज्ये धनिनो नाम भारत -महाभारत शांतिपर्व 88.30&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७-मनुस्मृति 8.307&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
८-महाभारत शांतिपर्व 19.11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९-मनुस्मृति 7.127&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०-महाभारत शांतिपर्व 88.7-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११-अर्थशास्त्र 3.9.31-32&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२-कौटिल्य अर्थशास्त्र 3.12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३-पूर्ववत 2.16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१४-पूर्ववत 3.11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१५-पूर्ववत 3.12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१६-पूर्ववत 2.28&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१७-पूर्ववत 2.16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१८-पूर्ववत 2.34&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१९-पूर्ववत 2.3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२०-पूर्ववत 4.1 -2.4 -4.3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Published by,&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sriram</name></author>
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