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	<title>प्राचीन भारत में राजनीतिशास्त्र का विकास - Revision history</title>
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	<updated>2026-10-16T06:27:48Z</updated>
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		<title>Sriram: Created page with &quot; &#039;&#039;&#039;भूमिका&#039;&#039;&#039;   कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र के प्रारंभ में लिखा है पृथ्वी के लाभ और पालन के प्रयोजन से जो अर्थशास्त्र पहले के आचार्य ने लिखे हैं प्रायः उन सब का संग्रह करके इस अर्थशास्त्...&quot;</title>
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		<updated>2024-07-12T05:43:22Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Created page with &amp;quot; &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;भूमिका&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;   कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र के प्रारंभ में लिखा है पृथ्वी के लाभ और पालन के प्रयोजन से जो अर्थशास्त्र पहले के आचार्य ने लिखे हैं प्रायः उन सब का संग्रह करके इस अर्थशास्त्...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;भूमिका&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र के प्रारंभ में लिखा है पृथ्वी के लाभ और पालन के प्रयोजन से जो अर्थशास्त्र पहले के आचार्य ने लिखे हैं प्रायः उन सब का संग्रह करके इस अर्थशास्त्र की रचना की गई है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I इस कथन से स्पष्ट होता है कि कौटिल्य से पहले भी बहुत से आचार्य ने अर्थशास्त्र की रचना की थी I यही कारण है कि जो अर्थशास्त्र में स्थान स्थान पर पूर्ववर्ती आचार्यों के मत उद्धृत किए गए हैं &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;२&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I इन आचार्यों के अतिरिक्त कौटिल्य अर्थशास्त्र में पांच संप्रदायों के मत भी उद्धारित किए गए है I  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
     प्राचीन ग्रीस के समान प्राचीन भारत में भी विचार संप्रदायों की सत्ता थी I यह इससे सूचित होता है मनु, बृहस्पति आदि अनेक विचारको ने प्लेटों के समान अपने विचार संप्रदायों को स्थापित किया था I जिनमें गुरु शिष्य परंपरा द्वारा विशिष्ट प्रकार के विचारों का विकास होता रहता था I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;कौटिल्य अर्थशास्त्र में  संप्रदाय&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौटिल्य अर्थशास्त्र ने निम्न संप्रदायों का न केवल उल्लेख किया है अपितु उनके मत भी उद्धारित किए हैं I मानव: &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;३,&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; बाहस्पत्या:&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;४,&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; औशनसः &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;५ ,&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;पाराशर &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;६,&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; और आम्भीयाः&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;७,&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; इसके अतिरिक्त आचार्याः &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;८&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; ,अपरे &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;९&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; ,और एके &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१०&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; ,इन शब्दों से भी कौटिल्य ने अपने से पूर्ववर्ती मतों को उद्धृत किया है I निसंदेह  प्राचीन भारत में बहुत से ऐसे आचार्य और विचार संप्रदाय विद्यमान थे जो विभिन्न प्रकार के मतों व विचारों का प्रतिपादन किया करते थे I दर्शनशास्त्र के इन संप्रदायों में 6 आस्तिक दर्शन तो सर्वाधिक है पर कौटिल्य ने लोकायत नाम से ऐसे दार्शनिक संप्रदायों का भी निर्देश किया है जो नास्तिक थे I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;बौद्ध साहित्य में संप्रदाय&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
   बौद्ध साहित्य में 62 दार्शनिक संप्रदायों का उल्लेख है जो बुद्ध के प्रादुर्भाव से पूर्व भारत में विद्यमान थे &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;११&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I जहां मानव संप्रदाय के अर्थशास्त्र की सत्ता की सूचना कौटिल्य अर्थशास्त्र से प्राप्त होती है I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;मनुस्मृति में संप्रदाय&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनुस्मृति के रूप में इस संप्रदाय का धर्मशास्त्र तो वर्तमान समय में उपलब्ध नहीं होता है I मनु द्वारा स्थापित संप्रदाय के धर्म, अर्थ ,काम ,मोक्ष आदि के संबंध में अपने कतिपय विशिष्ट विचार थे I इसी प्रकार राजनीति शास्त्र के संबंध में भी उसके विचार अन्य संप्रदायों से भिन्न है I &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;चावार्क संप्रदाय&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
  चावार्क संप्रदाय का परावर्तन प्रभाव संभवतः आचार्य बृहस्पति ही था I जिसकी सम्मति में तीनों वेदों के कर्ता ,भाण्ड, धूर्त और निशाचर थे &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१२&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I अतः इस बात में क्या आश्चर्य है कि कौटिल्य अर्थशास्त्र में उद्धृत इस संप्रदाय के मत त्रयी को दुनियादार लोगों का रोजी कमाने का ढकोसला कहा गया है I  बहस्पतय अर्थशास्त्र नाम का एक छोटा सा ग्रंथ वर्तमान समय में उपलब्ध भी हुआ है I जिसके सिद्धांतों पर नास्तिकता की छाप पूरी तरह से विद्यमान है और संप्रदाय के प्रवर्तक सम्भवतः शुक्राचार्य थे , जिनकी संप्रदाय परंपरा में शुक्रनीतिसार का निर्माण हुआ था I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;महाभारत के शांति पर्व में&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;संप्रदाय&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
   महाभारत के शांति पर्व में भी अनेक पूर्ववर्ती राजशास्त्र प्रणेताओं के नाम उल्लेखित हैं I विशालाक्ष, इन्द्र ,बृहस्पति ,अनु ,भारद्वाज, गौरशिरा, मातरिश्वा,  कश्यप, वैश्रवण, उत्थय ,रामदेव, शम्बर, कलाकवृक्षीय, वसुहोम, और कामन्दक I इन आचार्य के गन्थ्रो का परिणाम कितना था I इस संबंध में भी कुछ महत्वपूर्ण निर्देश महाभारत में पाए जाते हैं I उनके अनुसार विशालाक्ष्य के नीति शास्त्र में दस हजार,  इंद्र के नीति शास्त्र में पाँच हजार ,और बृहस्पति के अर्थशास्त्र में तीन हजार  अध्याय थे &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१३&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I इसके अतिरिक्त भी कतिपय राजशास्त्र प्रणेता आचार्यों के नाम महाभारत में पाए जाते हैं I कीर्तिमान, कर्दम ,अनंग ,अतिबल, वैण्य,  पुरोधा, काव्य, योगाचार्य, नामक आचार्यों के नाम राजनीति शास्त्र विषयक ग्रन्थों के क्रमिक विकास को प्रदर्शित करते हुए महाभारत के शांति पर्व में दिए गए हैं &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१४&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I पर इनके संबंध में कोई अन्य परिचय हमें प्राप्त नहीं होता I &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
   महाभारत में कतिपय प्राचीन नीतिशास्त्रों से श्लोक भी उद्धत किए गए हैं  I यह ग्रंथ मनु, उशना, मारुत, और प्राचेतस नामक आचार्यों द्वारा विचरित थे I भार्गव प्रणीत रामचरित आख्यान से भी दो श्लोक शांति पर्व में उद्धृत किए गए थे &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१५&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I इसी प्रकार सहस  अध्यायों वाले एक विशाल नीति ग्रंथ का भी महाभारत में उल्लेख है ,जिसकी वहां संपूर्ण विषय सूची भी दे दी गई है I इस विषय सूची का अनुशीलन करने से ज्ञात होता है कि इस ग्रंथ में राजनीति शास्त्र से संबंध रखने वाले प्रायः सभी विषयों का समावेश हो गया था I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
   महाभारत के शांति पर्व में कतिपय ऐसे संवाद भी संग्रहीत हैं जो कि पुराने ग्रन्थों से संकलित किए गए थे और जिनमें राजनीतिशास्त्र से संबद्ध विषयों पर भी विचार विमर्श किया गया है I यह संवाद अत्यंत उपयोगी है और उनके अनुशीलन से प्राचीन आचार्य के मंतव्यों का कुछ परिचय प्राप्त किया जा सकता है I कामंदक नीतिसार में भी दो आचार्य नए हैं उनके नाम मय और पुलोमा है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१६&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;चंदेश्वर द्वारा प्रणीत  राजनीति रत्नाकर&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;में&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;संप्रदाय&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 चंदेश्वर द्वारा प्रणीत  राजनीति रत्नाकर में अनेक आचार्य और ग्रन्थों के मत प्रमाण रूप में प्रस्तुत किए गए हैं उनके नाम हैं -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;व्यास&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; -निर्मित अर्थ प्रदीप इस नाम का कोई ग्रंथ वर्तमान समय में उपलब्ध नहीं है I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;अर्थशास्त्र&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;- इस ग्रंथ से कामंदकीय नीतिसार  अभिप्रेत है जो इस समय उपलब्ध है I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
  &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;कात्यायन&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;- इस आचार्य के नीति विषयक अनेक श्लोक दिए गए हैं I यद्यपि इसका कोई ग्रंथ अब नहीं मिलता I &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;कुल्लूकभट्ट&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; -इसका भी कोई ग्रंथ वर्तमान में उपलब्ध नहीं है  I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;नारद&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; इसके जो भी श्लोक राजनीति रत्नाकर में दिए गए हैं उनमें से बहुत से ऐसे हैं जो नारद स्मृति में कहीं नहीं पाए जाते I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;मनु-&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; उद्धृत श्लोक प्रायःमनुस्मृति में विद्यमान है I &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;शुक्रनीति&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;- शुक्र नीतिसार नाम से जो ग्रंथ इस समय प्राप्त है उसमें यह श्लोक नहीं मिलते I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री मित्र मित्र विरचित- वीरमित्रोदय राजनीति में भी अनेक प्राचीन आचार्यों के नाम दिए गए हैं परंतु इस राजनीति में जो उद्धरण प्राचीन ग्रंथो में दिए गए हैं उन्हें प्रायः पुराणों और मीमांसा ग्रन्थों से लिया गया है &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;सोमदेव सूरी के  नीति वाक्यामृतम में&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;संप्रदाय&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मध्यकाल में सोमदेव सूरी ने नीति वाक्यामृतम नाम का एक राजनीतिक विषय ग्रंथ लिखा था इसी ने  यशस्तिलक चम्पू नाम से एक महाकाव्य की रचना की थी I जिसमें राजनीति शास्त्र के अनेक तत्वों का समावेश है I इन दोनों ग्रन्थों के अनुशीलन से ज्ञात होता है कि सोमदेव सूरी कौटिल्य अर्थशास्त्र और कामंदक नीति सार से तो परिचित थे ही पर इनके अतिरिक्त गुरु, शिष्य ,विशालाक्ष्य ,परीक्षित ,पाराशर, ,भीम ,भीष्म ,और भारद्वाज आदि  I प्राचीन राजशाही प्रणेताओं के ग्रन्थ से भी उनका परिचय था I संभवतः गुरु का अभिप्राय बृहस्पति से है I बृहस्पति, शुक्र, विशालाक्ष ,पाराशर, के नाम कौटिल्य अर्थशास्त्र में भी आए हैं I पर सोमदेव सूरि की सूची में परीक्षित ,भीम, और भीष्म के नाम आए हैं  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
   भीष्म के राजशास्त्र का अभिप्राय संभवत महाभारत के शांति पर्व में उद्धृत भीष्म द्वारा उपदिष्ट संदर्भों से है I नीति वाक्यामृतम में जिन पुरातन नीति ग्रन्थों के उद्वरण दिए गए हैं उनकी संख्या पचास से ऊपर है  I इनमें से बहुसंख्यक ग्रंथ ऐसे हैं जो वर्तमान समय में उपलब्ध नहीं है I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
   मनु और शुक्र के जो उदाहरण नीति वाक्यमृतम ने दिए हैं वर्तमान समय में उपलब्ध मनुस्मृति और शुक्र नीति में वह नहीं मिलते I ऐसा प्रतीत होता है कि मानव और औशनस संप्रदायों के अन्य भी अनेक ग्रंथ प्राचीन समय में विद्यमान थे जो अब विलुप्त हो चुके हैं I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
   वार्हस्पत्य संप्रदाय के राजशास्त्र के अनेक श्लोक सोमदेव सूरी ने दिए हैं जिनको पढ़ने से स्पष्ट रूप से ज्ञात होता है कि जिस वार्हस्पत्य के उदाहरण नीति वाक्य में दिए हैं उनके सिद्धांतों में और कौटिल्य अर्थशास्त्र में उद्रत वार्हस्पत्य संप्रदाय के विचारों व मंतव्य में बहुत समता है I जिस प्रकार कौटिल्य को ज्ञात बृहस्पति वेदों को ढकोसला समझता था वैसे ही सोमदेव सूरी द्वारा उद्रत बृहस्पति भी वेदों को बुद्धि और पौरुष से ही लोगों द्वारा पेट भरने के निमित्त बनाया हुआ साधन मात्र मानता है I कौटिल्य अर्थशास्त्र में वार्हस्पत्य संप्रदाय के उदाहरण गद्य में हैं पर नीति वाक्यमृतम में उनके उदाहरण श्लोक के रूप में है I इससे सूचित होता है कि प्राचीन समय में बार्हस्पत्य संप्रदाय के कम से कम दो ग्रंथ अवश्य विद्यमान थे I एक संप्रदाय में अनेक ग्रन्थों का विकास सर्वथा स्वाभाविक था I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
   घोषाल लिखते हैं कि हिंदुओं के राजनीतिक विचार भूतल के थे आदर्श राजनीति के क्षेत्र में उसकी उड़ान यदा कदा ही हो जाती थी I हिंदू राजनीतिक विचारक वस्तुतः दार्शनिक ना थे  I जब यह संभाव्य था कि वह सुखदतम आदर्श समाज के निर्माण के सपनों में निरत होते &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१७&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; Iअतः परिस्थितियों के मांग में वास्तविकता के प्रति प्रणति वर्णाश्रम की व्यवस्था में राज्य तथा समाज का संतुलन एवं धर्म के विशद अभिप्राय में राजनीति का दार्शनिक चिंतन कुछ अपेक्षित सा हो गया I यदि धर्म का दर्शन उतना व्यापक ना होता मानव जीवन और समाज के तत्वों में सु व्यवस्था का ही विज्ञान अभिप्रेत ना होता और राजनीति में दर्शन को कुछ अधिक अवकाश मिल जाता तो राजनीति के उन प्रश्नों का भी चिंतन हो जाता जिनका राजनीति के आधुनिक दृष्टिकोण से अभाव खटकता है  I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;निष्कर्ष&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
  राजसत्ता के प्रतिबद्ध प्रजा निष्ठ एवं राजवध आदि  कुछ ऐसे प्रश्न थे जिन पर वैधानिक दृष्टिकोण से चिंतन किया जा सकता था पर ऐसा नहीं हुआ कदाचित परिस्थितियों की विशिष्टता ने इसकी आवश्यकता को कम कर दिया I इन पर चिंतन नैतिक दृष्टिकोण से हुआ संभवत यह नैतिक दृष्टिकोण भी राज्य की उन समस्याओं के प्रतिकार के लिए विविध सफलताओं के प्रवचन में समर्थ रहा &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१८&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I इस प्रकार प्राचीन भारत की राजनीति संबंधी जो भी अवशिष्ट सामग्री उपलब्ध है उसे यह पता चलता है कि यहां राजनीति का ज्ञान सूक्ष्म एवं गहन था राजनीति के विविध तत्वों पर जो राज्य समाज और व्यक्ति तीनों के विकास तथा उत्कर्ष के लिए पर्याप्त थे विमर्श हुआ I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;संदर्भ ग्रंथ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१-कौटिल्य अर्थशास्त्र -1.11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२-कौटिल्य ने अपने पूर्ववर्ती अर्थशास्त्रविदों आचार्यों से दाय ग्रहण करके अपने ग्रंथ का पणयन किया &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३-कौटिल्य अर्थशास्त्र- 1.1- 1.11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४-कौटिल्य अर्थशास्त्र- 1.1 -1.11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५-वही &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६-वही &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७-कौटिल्य अर्थशास्त्र - 1.16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
८-कौटिल्य अर्थशास्त्र -1.3 -2.9-3:5.4 -3.5 -3.7 -3.14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९-कौटिल्य अर्थशास्त्र- 3.17 -3.14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०-कौटिल्य अर्थशास्त्र- 3.14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११-इनमें सत्वतवाद, एकच्चस्सनिक, अन्तानिक, अनरविक्खेपिक ,अधिच्चस ,मुपन्निक, उद्धम, आधतनिक, उच्चेदवाद ,और दित्यघम्मनिब्बानवाद ,मुख्य थे &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२-तर्क संग्रह चावार्क मत &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३-महाभारत शांतिपर्व- 58/ 90-92&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१४-महाभारत शांतिपर्व -56.24.25&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१५- महाभारत शांतिपर्व - 56.40.42&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१६- कामंदक नीतिसार -1.2 21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh. &lt;br /&gt;
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Published by,&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sriram</name></author>
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