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	<title>मनु के राज्य संबंधी विचार - Revision history</title>
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		<title>Sriram at 07:20, 16 July 2024</title>
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		<updated>2024-07-16T07:20:07Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;/p&gt;
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				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;Revision as of 12:50, 16 July 2024&lt;/td&gt;
				&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot; id=&quot;mw-diff-left-l110&quot;&gt;Line 110:&lt;/td&gt;
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&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.  &lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.  &lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br/&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br/&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;−&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #ffe49c; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;Published by,&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;Published by,&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;[[Category:Social Sciences]]&lt;/ins&gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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		<author><name>Sriram</name></author>
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		<title>Sriram: Created page with &quot; &#039;&#039;&#039;भूमिका&#039;&#039;&#039;     महाभारत में राज्य की उत्पत्ति के संबंध में जो आख्यायिका  आती है उसके बीज मनुस्मृति में निहित है  I विद्वानों ने इसकी व्याख्या उक्त संदर्भ में ही प्रस्तुत की  I जायसवाल ,अल...&quot;</title>
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		<updated>2024-07-16T07:20:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Created page with &amp;quot; &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;भूमिका&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;     महाभारत में राज्य की उत्पत्ति के संबंध में जो आख्यायिका  आती है उसके बीज मनुस्मृति में निहित है  I विद्वानों ने इसकी व्याख्या उक्त संदर्भ में ही प्रस्तुत की  I जायसवाल ,अल...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;भूमिका&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महाभारत में राज्य की उत्पत्ति के संबंध में जो आख्यायिका  आती है उसके बीज मनुस्मृति में निहित है  I विद्वानों ने इसकी व्याख्या उक्त संदर्भ में ही प्रस्तुत की  I जायसवाल ,अल्तेकर, घोषाल ,जैसे विद्वान उदारवाद एवं आदर्शवाद का सम्मिश्रण कर देते हैं I बी पी वर्मा, पी एन बैनर्जी ,ए के सेन, जैसे विचारक इसी परंपरा का पालन करते हैं I &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;राज्य की उत्पत्ति&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;     &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनु ने राज्य की उत्पत्ति का कोई प्रत्यक्ष एवं स्पष्ट विवरण प्रस्तुत नहीं किया है I अपितु उन्होंने राजा की उत्पत्ति का जो विवरण प्रस्तुत किया है उसे ही विद्वानों ने राज्य की उत्पत्ति के बारे में मनु का दृष्टिकोण माना है  I मनु के अनुसार जब लोक राजा रहित प्रदेश में सर्वत्र अराजकता फैल गई और भय फैलने के कारण भगदड़ मच गई तब सबकी रक्षा के लिए प्रभु ने राजा को बनाया &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  I ईश्वर ने राजा का निर्माण इंद्र ,वायु ,यम, सूर्य ,अग्नि ,वरुण ,चंद्र ,तथा कुबेर के अंगों से किया I &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;राज्य की प्रकृति&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यद्यपि मनुस्मृति ने राज्य को अपनी उत्पत्ति से दैवी संस्था माना है I  किंतु इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि प्रभु ने राज्य के निर्माण से पहले ही दंड का निर्माण कर दिया था &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;२&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I यह दंड ही वास्तव में राज्य होता है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;३&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I इस विवरण से यह स्पष्ट है कि मनु ने राज्य को एक दैवी संस्था माना है किंतु इसे अपनी प्रकृति से स्वयं में सर्वोच्च एवं साध्य नहीं माना है I वस्तुतः राज्य देवी दंड अर्थात विधान &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;४&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; के अधीन है और वह इस दैवी दंड को लागू करने का साधन है I जब दंड को लागू किया जाता है तो मनु के अनुसार इस दंड के भय से ही सब लोग मर्यादा मुक्त भोगों को भोगने में असमर्थ होते हैं &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;५&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I किंतु इस दंड के अभाव में सर्वत्र हिंसक व्यवस्था फैल जाती है I  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि राज्य की प्रकृति के बारे में तीन तथ्य सामने आते हैं - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नंबर &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;एक&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; राज्य अपनी प्रकृति से दैविक विधान के अधीन दैवी संस्था है I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नंबर &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;दो&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  राज्य अपनी प्रकृति से ऐसी संस्था है जो विधान को लागू करके सार्वजनिक हित की वृद्धि में सहायक होती है  I किंतु जब यह संस्था विधान की उपेक्षा करती है तो अव्यवस्था को जन्म देती है  I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नंबर &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;तीन&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  राज्य स्वयं में साध्य नहीं है, अपितु दैवी विधान को लागू करने का साधन है I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;मनुस्मृति में सप्तांग सिद्धांत&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;    &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईसा के 16वीं शताब्दी में सरस्वती विलास नामक ग्रंथ के रचनाकार ने गौतम सूत्र को उद्धृत्त कर सप्तांग सिद्धांत के प्रतिपादक का सर्वप्रथम श्रेय गौतम को दिया I  परंतु यह मत भ्रामक है गौतम धर्म सूत्र ,भारतीय परंपरा में एक परवर्ती संकलन है I  अतः सप्तांग का मूल इसमें नहीं ढूंढा जा सकता I मनु ने सप्तांग राज्य के सात अंग बताएं  I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;स्वामी&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनुस्मृति मेंसप्तांग का पहला सिद्धांत स्वामी है I मनुस्मृति में राजा के दैवी स्वरूप की मान्यता है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;६&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I राज्य के व्यवस्थित रूप से संचालन हेतु राजा की आवश्यकता एवं महत्व है I जो राजा सत्यवादी है, देखभाल कर काम करने वाला है ,बुद्धिमान, धर्म ,अर्थ, काम, का ज्ञान रखना रखता है, वही दण्डधारण का अधिकारी है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; ७&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I राजा युग है, सतयुग, त्रेता, द्वापर ,एवं कलयुग राजाओं के कर्मों का वृतांत है I राजा के लिए युद्ध से भागना प्रजापालन तथा विद्वानों का सत्कार बहुत श्रेष्ठ है I प्रजा पालन राजा का धर्म है I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;अमात्य&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सप्तांग का दूसरा अंग अमात्य है इस की संख्या के संदर्भ में मनु मत व्यक्त करते हैं कि राज्य का संचालन जितने भी अमात्यो द्वारा संभव हो राजा उनकी नियुक्ति कर सकता है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;८&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I  मनुस्मृति में मंत्रियों की मौल शास्त्रविद शूर लब्धलक्ष कुलोदम एवं सुपरीक्षित माना गया है I मनुस्मृति में अमात्य परिषद की नियुक्ति का आधार वर्ग या जाति न होकर योग्यता है I &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;पुर&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सप्तांग का तीसरा अंग पुर है दुर्ग या पुर किले का द्योतक है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;९&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I पुर या दुर्ग की रचना का तात्पर्य है जंगल पहाड़ राज्य की सीमावर्ती क्षेत्र एवं सैनिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण ठिकानों पर नजर रखना I मनु ने पुर या दुर्ग की महत्ता प्रदर्शित करते हुए उसे राष्ट्र से पूर्व रखा है I  6प्रकार के दुर्गों का उल्लेख मनु करते हैं वह है धनु, मही, अब्दुर्ग ,तार्क्ष ,नृदर्ग ,तथा गिरी , दुर्ग ,मनु का स्पष्ट मत है कि पशु पंछी तथा राजा का दुर्ग द्वारा शत्रुओं से सुरक्षा संभव है I दुर्ग से युद्ध का संचालन सफलतापूर्वक हो सकता है I  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;राष्ट्र&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सप्तांग का चौथा अंग राष्ट्र है राष्ट्र शब्द ऋग्वेद से प्राप्त होता है I ऋग्वेद में कहा गया है कि ममाद्धिता राष्ट्र क्षत्रियस्य I परवर्ती ग्रन्थों में राष्ट्र का उल्लेख मिलता है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१०&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I मनु ने राष्ट्र का उल्लेख जनसंख्या एवं विभाग दोनों के अर्थ में किया है I मनु का मत है कि राजा ऐसे राष्ट्र में निवास करें जो जंगल , धान्य अधिक धर्मात्माओं से युक्त, आकुलता रहित , फल , लता, फूल, इत्यादि से परिपूर्ण रमणीय नमृनिवासियों से युक्त अधियों व्याधियों उपद्रव रहित तथा प्रचुर जीविका साधन की सरलता से युक्त होI  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;कोष&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनुस्मृति अन्य स्रोतों में समान रूप से पांचवें अंग के रूप में आया है कोष राज्य को संचित रखने का सबसे बड़ा माध्यम है I उसके अभाव में सेना रखना और उसका राज्य के प्रति निष्ठा का पात्र बने रहना संभव नहीं  I राष्ट्र पर बाह्य आक्रमण जैसी विपत्तियों का सामना निष्ठावान सेना के माध्यम से की जा सकती है  I अतः राष्ट्र के वाह्य एवं आंतरिक विपत्तियों में कोष की भूमिका स्पष्ट है I  कोष व उसके शासन पर राजा को व्यक्तिगत ध्यान देना चाहिए  I इसके लिए राजा को चाहिए कि वे विभिन्न पवित्र साधनों का उपयोग कर उसमें सतत वृद्धि का प्रयास करें I राज्य की समस्त प्रवृत्तियां कोष पर निर्भर है I राष्ट्र की कोष नीति संवेदनशील है I &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;दंड&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सप्तांग का 6ठा अंग दंड है दंड का अर्थ है I सेना या सैनिक संगठन कोष इसका स्पष्टतया आधार है I मनुस्मृति में राजा सेवा का प्रमुख है I सेना संबंधित समस्त उत्तरदायित्व राजा पर है  I फलत: सेना पर उसका पूर्ण नियंत्रण है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१२&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I राजा सामाजिक दायित्व के विपरीत सेवा का प्रयोग नहीं कर सकता है I  इस प्रकार सेवा की नियुक्ति में सामाजिक व्यवस्था का महत्व &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१३&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; है I मनु ने राष्ट्र एवं समाज की सुरक्षा एवं विकास के माध्यम में छह प्रकार के बल की स्वीकृति दी है I परंतु छह बल कौन-कौन से हैं इसका कहीं उल्लेख नहीं किया I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;मित्र&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सप्तांग राज्य का अंतिम अंग मित्र है I  मनु ने मित्र बनाने की आवश्यकता पर बहुत बल दिया क्योंकि राजा सेवा एवं भूमि पाकर  इतना समृद्धशाली नहीं होता जितना अटल मित्र पाकर I भले ही मित्र कम धन वाला हो क्योंकि वह धनवान हो जाएगा I एक दुर्बल मित्र श्लाधनीय है यदि वह गुणवान एवं कृतज्ञ हो उसकी प्रजा संतुष्ट हो एवं अपने हाथ में लिए कार्य को अंत तक करने में दृढ़ प्रतिज्ञ हो I मनु ने स्पष्ट कहा है की भूमि ,सेना एवं मित्र के नीति एवं प्रत्ययों के तीन फल हैं  I राज्य के सात अंगों में मित्र को स्थान देकर मनु ने भारतीय राज्य का व्यापक स्वरूप प्रस्तुत किया है I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;राजा के प्रमुख कार्य&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनुस्मृति के अनुसार राजा के प्रमुख कार्य निम्न है -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
   नंबर &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;एक&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; मनु ने राज्य की उत्पत्ति का एकमात्र कारण बताया है अराजकता से उत्पन्न भय एवं अन्याय को समाप्त करना  I अतः राज्य का मूल उद्देश्य एवं कर्तव्य प्रजा की रक्षा करना है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१४&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  I प्रजा रक्षण तभी संभव है जब राज्य आंतरिक क्षेत्र में शांति व व्यवस्था बनाए रखें और बाहरी आक्रमण से भी प्रजा की रक्षा करें I अतः मनु ने इन दोनों कार्यों को राज्य के कार्य क्षेत्र में पर्याप्त स्थान दिया है I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
   नंबर &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;दो&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; राज्य रक्षण के कार्य को पूर्णता कभी प्राप्त होती है I जब राज्य प्रजापालन एवं प्रजा रंजन के कार्य को भी करता है I मनुस्मृति ने प्रजापालन को राज्य का प्रमुख कार्य माना है I &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
   नंबर &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;तीन&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; मनु के अनुसार संसार में निष्पत लोग बहुत ही कम लोग होते हैं I व्यक्ति काम ,क्रोध ,लोभ, आदि के आवेग में बहकर एक दूसरे के अधिकारों को छीनते हैं और समाज में अपराध के रूप में अन्याय का जन्म होता है I मनु के अनुसार राज्य की दंड शक्ति ही दुष्टों को भयभीत रखती है और सभी व्यक्तियों को अपने-अपने अधिकारों को भोगने की सामर्थ देती है I और वह अपने कर्तव्य का भी पालन करते हैं &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१५&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I मनुस्मृति में सभी अपराधों को 18 वर्गों में विभाजित किया गया है और राजा को निर्देश दिया गया है कि वह स्वयं कार्य को करें I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
  नंबर &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;चार&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; मनु ने अपने राज्य के हितों की रक्षा एवं वृद्धि की दृढ़ता से विदेश नीति के विवेकपूर्ण संचालन पर बल दिया है I राजा को मंडल सिद्धांत के आधार पर अन्य राज्यों को क्रमशः शत्रु मित्र तटस्थ एवं उदासीन राज्यों के रूप में वर्गीकृत करना चाहिए  I और तब इन विभिन्न राज्यों के साथ अंतर राज्य संबंधों का संचालन करना I चाहिए मनु ने यह भी बताया है कि एक विजई राज्य को पराजित राज्य के साथ किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए I &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
  नंबर &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;पाच&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; मनुस्मृति  ने वर्ण एवं आश्रम को धर्मों को समाज संगठन व व्यवस्था के आधार माना है I और राज्य का दायित्व है कि वह सभी व्यक्तियों से उनसे संबंधित वर्ण आश्रम धर्म का पालन कराए I जो व्यक्ति इस संदर्भ का पालन नहीं करता है उसे राज्य दंडित करने का अधिकार रखता है  I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
  नंबर &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;छ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; राज्य के अनेक कार्य हैं और इसकी पूर्ति के लिए मनुस्मृति ने एक सुसंगठित व सक्षम प्रशासनिक व्यवस्था का उल्लेख किया है I राज्य के प्रशासन के संचालन नियंत्रण के लिए राजा द्वारा 7-8 योग्य मंत्रियों की नियुक्ति की जाती है I  जिसके अधीन प्रशासन के विभिन्न विभाग होते हैं  I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
  नंबर &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;सात&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; राज्य को अपने समस्त कार्यों को करने के लिए धन की आवश्यकता होती है और इस दृष्टि से उन्होंने राज्य को प्रजा के विभिन्न वर्गों पर कर लगाने का अधिकार दिया है किंतु उनके निर्देश है कि कर धर्म अनुसार ही लगे व वसूले जाने चाहिए I अर्थात कर मात्र लाभ पर लगाए जाने चाहिए &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१६&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I तथा कम मात्रा में व क्रमशः लगाए जाने चाहिए &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१७&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I कर प्रणाली का उद्देश्य प्रजा की रक्षा करना है I राज्य का एक प्रमुख कार्य है राज कोष की रक्षा एवं वृद्धि करना तथा प्रजा हितों व राज्यहित में इसका व्यय करना I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;संदर्भ ग्रंथ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१-मनुस्मृति -7.3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२-मनुस्मृति -7.14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३-मनुस्मृति -7.17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४-मनुस्मृति के संदर्भ में दंड का अर्थ विधान माना जाता है I दृष्टव्य महर्षि दयानंद वैदिक मनुस्मृति- पृष्ठ- 194-195 तथा प्रोफेसर सुरेंद्र कुमार -विशुद्ध मनु -पृष्ठ -294&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५- सर्वो दण्डजितों लोके दुर्लभो हि शुचिर्नर :&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दण्डस्य हि भयात्सर्व जगद भोगाच कल्पते &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६-मनुस्मृति -7.4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७-मनुस्मृति- 7.26&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
८-मनुस्मृति- 7.60-61&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९-अलतेकर -ए एस स्टेट एंड गवर्नमेंट इन असिएंट इंडिया- बनारस- 1949- पेज 44&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०-ऋग्वेद- 4.42.1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११-मनुस्मृति -7.69 एवं कुल्लूक भट्ट की व्याख्या&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२-शॉ. प .-12.43&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३-मनु ने सेना बल या दंड को राज्य के स्वतंत्र अंग के रूप में प्रस्तुत किया है I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१४-मनुस्मृति -7.110 -111&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१५-मनुस्मृति -7.15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१६-मनुस्मृति -7.128&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१७-मनुस्मृति -7.127&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Published by,&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sriram</name></author>
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