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	<title>महाभारत में राजनीतिक चिंतन - Revision history</title>
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		<title>Sriram: Created page with &quot; &#039;&#039;&#039;भूमिका-&#039;&#039;&#039;     महाभारत में राजधर्म सुशासन का आधार है I व्यक्ति व समष्टि के मध्य समन्वय का संवेदनशील पक्ष है I राजधर्म कूपमण्डूकता नहीं है ,अनंत है I इसका एकमात्र उद्देश्य व्यक्ति का सर्व...&quot;</title>
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		<updated>2024-09-26T11:37:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Created page with &amp;quot; &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;भूमिका-&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;     महाभारत में राजधर्म सुशासन का आधार है I व्यक्ति व समष्टि के मध्य समन्वय का संवेदनशील पक्ष है I राजधर्म कूपमण्डूकता नहीं है ,अनंत है I इसका एकमात्र उद्देश्य व्यक्ति का सर्व...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;भूमिका-&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महाभारत में राजधर्म सुशासन का आधार है I व्यक्ति व समष्टि के मध्य समन्वय का संवेदनशील पक्ष है I राजधर्म कूपमण्डूकता नहीं है ,अनंत है I इसका एकमात्र उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास है I सभी राजनीतिक संस्थाएं इसके साधन है I राजधर्म में केवल अधिकार की ही मांग नहीं है I कर्तव्य का ठोस क्रियान्वयन है I राजधर्म जाति संप्रदाय पंथ क्षेत्र लिंग से ऊपर संपूर्ण मानवता का सिद्धांत है I  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;मंत्रिपरिषद-&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय राजनीति की अपनी एक विशेषता यह थी कि वह शांत एवं साधन में एक संतुलन बनाए थे I व्यावहारिक परिस्थितियां ही राज सत्ता के नियंत्रण की आधार समझी जाती थी I मंत्रिपरिषद ऐसी ही एक व्यवहारिक व्यवस्था थी जिससे राज सत्ता पर अंकुश रहता था I महाभारत के आचार्य का जन अधिकार में कुछ अधिक विश्वास था I इसमें उल्लेखित मंत्रिपरिषद का संगठन अधिक उदार था I इसके उत्तरदायित्व विविध थे  I अतः उसके अधिकारों और संपत्तियों की उपेक्षा राजा के लिए उतनी सहज नहीं थी I वैदिक युग की सभा और समिति जैसी संस्थाओं की सत्ता के संबंध में महाभारत में कोई महत्वपूर्ण निर्देश नहीं मिलते पर महाभारत के शांति पर्व में राजधर्म का प्रवचन करते हुए भीष्म का यह कथन है कि राजा में जिन गुणो का होना आवश्यक है वे सब किसी एक पुरुष में हो यह संभव नहीं है I अतः यह आवश्यक है कि राजा अपनी सहायता व परामर्श के लिए कतिपय अमात्यों को नियत करें I महाभारत के शांति पर्व के 85 . 7 -10 में भिष्म ने एक ऐसी सभा का वर्णन किया है I जिसके सदस्यों की संख्या सैतालिस होती थी I इसमें जनता के चारों वर्णों का प्रतिनिधित्व प्राप्त था I शूद्रो तक के लिए इसमें स्थान था जनता में वैश्य कर्म सबसे अधिक होता है I अतः उसके प्रतिनिधियों की संख्या सबसे अधिक रहती है I संभवतः यह एक ऐसी संस्था थी जो सब महत्वपूर्ण राजकीय विषयों पर विचार विमर्श किया करती थी I इसमें जो निर्णय किया जाए उन्हें राष्ट्र के सम्मुख पेश किया जाता था और इस प्रयोजन से उन्हें राष्ट्रीय के पास भेज दिया जाता था &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I  राजा का वर्णन करने के लिए जो लोग एकत्र होते थे उन्हें महाभारत में ब्राह्मण प्रमुख : वर्णाः वृद्धा तथा पौर जनपदाः कहा गया है I ब्राह्मण प्रमुखा वर्णाः  का क्या अभिप्राय है यह सर्वथा स्पष्ट है  I इससे उन 47 व्यक्तियों का वर्णन होता है जिनमें चार ब्राह्मण ,18 क्षत्रिय ,21 वैश्य, तीन शुद्ध ,और एक सूत्र इसके अंतर्गत थे I इनसे मिलकर एक ऐसी सभा का निर्माण होता था जिससे राजा सब राजकीय विषयों पर परामर्श किया करता था I &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजतंत्र राज्यों में सभा या जन संसद के संबंध में शांति पर्व के एक अन्य अध्याय से भी बड़े महत्वपूर्ण निर्देश मिलते हैं I युधिष्ठिर प्रश्न करता है कि संसद में जब विद्वान मूढ़ और प्रगल्प व्यक्ति मृदु और तीक्ष्ण भाषणों द्वारा अपना रोज़ प्रकट करें तो क्या करना चाहिए I &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;२&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; भिष्म ने इस प्रश्न के उत्तर में यह बात कही है जन संसद में जो कोई आक्रोश द्वारा दोषारोपण करता है राजा उसके सुकृत स्वयं प्राप्त करता है केवल उसके दुष्कृति ही उसके पास बचे रहते हैं ऐसे व्यक्तियों की गर्हित बातों की उसी ढंग से अपेक्षा की जाए जैसे रोग पीड़ित व्यक्ति के वचनों की कि जाती है I ऐसे व्यक्तियों के प्रति जनता में विद्वेष उत्पन्न हो जाता है और उसका भाषण निष्फल हो जाता है I उसके पाप सर्व विदित हो जाते हैं और वह लज्जित होकर मृत्यु के समान होकर रह जाता है  I स्वल्प बुद्धि वाले जो कुछ कहें उन सब को सहन कर लेना चाहिए I ऐसे व्यक्तियों की प्रशंसा और निंदा से किसी का क्या बनता बिगड़ता है जैसे जंगल में कौवा बकवास करता है I ऐसे ही संसद में अल्प बुद्धि के व्यक्ति के भाषण को समझना चाहिए I जिस मनुष्य के लिए कुछ भी अवाच्य नहीं है और कुछ भी अकार्य नहीं है उसके कथन की परवाह करने की क्या आवश्यकता है जो मनुष्य तो सामने गुणों का बखान करता है पर पीठ पीछे निंदा करता है वह कुत्ते के समान है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;३&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौटिल्य मनु तथा अन्य शास्त्रकारों की भांति महाभारत के आचार्य ने भी मंत्रिपरिषद की महत्ता पर बल दिया है I उल्लेखनीय है कि बिना मंत्री की सहायता के बलशाली राजा भी राज्य का संचालन नहीं कर सकता I एक स्थल पर कुल बाहु धन अमात्य तथा बुद्धि राजा की प्राकृतिक बल कहे गए हैं I मंत्रियों की मंत्रणा पर राज्य का उत्कर्ष निर्भर है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;४&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I मंत्रिपरिषद राज्य संगठन का अविच्छिन्न अंग था I शासन में उसके कार्यों की उपयोगिता ही उसके इस महत्व की उत्तरदाई है I मंत्रिपरिषद की यह महत्ता स्वयं राजा पर एक नियंत्रण थी I इस मंत्रिपरिषद के अंतर्गत साधारणतया आठ सदस्यों का एक मंत्रिमंडल भी होता है जिसे अंतरण समिति कहा जा सकता है I मंत्र की गोपनीयता के लिए राजा तीन पांच अथवा सभी ऑठों सदस्यों से मंत्रणा अथवा परामर्श करता था I मंत्रिपरिषद का एक प्रधानमंत्री भी होता था I जिसे प्रधान अथवा मुख्यमंत्री कहा जाता था &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;५&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I वह राजा तथा मंत्रिपरिषद के बीच की कड़ी था I मंत्रिपरिषद के संगठित स्वरूप का आधार था I इस पर राजकीय कार्यों का गुरु दायित्व राजा राज्य के प्रायः सभी विषयों पर मंत्रियों से परामर्श लेता था I अंतिम निर्णय तो राजा का ही होता था पर सहज ही वह इसकी समझ की अपेक्षा नहीं कर सकता था I पर शासन नीति प्रशासकीय तथा अर्थ संबंधी सभी कार्यों का भार था कहा गया है कि अमात्यों के साथ मंत्रणा करके ही शत्रु के साथ संधि करनी चाहिए आवश्यकता पड़ने पर मंत्री युद्ध स्थल पर भी जाते थे I शत्रुओं के भेदभाव उत्पन्न करने के कूटनीतिक कार्य भी उन्हें करना पड़ता था I &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आंतरिक शासन व्यवस्था में मंत्रियों के अधिकार विस्तृत थे I उल्लेखनीय है की अर्थव्यवस्था अमात्य पर ही निर्भर थी I कर संग्रह ग्रामादिक अधिकारियों का निरीक्षण न्याय संबंधी कार्य तथा यदा कदा गुप्तचर आदि के कार्य उन्हें करना पड़ता था I कभी राजा के अस्वस्थ अथवा अपदस्थ होने पर शासन का भार सचिवों पर छोड़ दिया जाता था  I स्पष्टतया मंत्रियों पर अनेक महत्वपूर्ण कार्यों का दायित्व था उनके इन अधिकारों को राजा को स्वीकार करना पड़ता था I यथा उल्लेख है कि कठिन समस्या आ पड़ने पर राजा मंत्री तथा मंत्रिपरिषद को बुलावे और तब अधिकांश लोग जिनकी पुष्टि करें I इस उपाय को व्यवहार में ले &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;६&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मंत्रिपरिषद का यह महत्व एवं उस पर कार्यों का दायित्व राज्य सत्ता पर एक अंकुश ही था I व्यवहार में राजा को मंत्रियों की नियुक्ति तथा पदच्यूत का अधिकार था I वह उसी के प्रति उत्तरदाई थे फिर भी राजा निजी रूप से कोई निर्णय ले सकता था पर सामान्यतः ऐसी परिस्थिति के लिए अवसर कम होते थे I शासन के दैवी अधिकार की अस्वीकृति धर्मशास्त्रीय विधियों केअनिवार्यता एवं मंत्रियों तथा ब्राह्मणों की निष्णात प्रजा में विश्वास के कारण राजा पर मंत्रियों के कार्य तथा परामर्श बंधन रूप में ही थे I राजा स्वयं भी धर्म मर्मज्ञ होता था I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;कर सिद्धांत-&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य ग्रन्थों की भांति महाभारत में भी कर सिद्धांत की विवेचना है I कदाचित इसमें मिमांसित कर सिद्धांत अधिक उदार नीति पर आधारित थी और यही नीति की उदारता राज्य की स्वेच्छाचारिता को सीमित करने का साधन थी I कोष की महत्ता महाभारत में अनेक स्थलों पर व्यक्त की गई है I अर्थ पर ही राज्य व्यवस्थित रहता है I &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;७&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; धन ही राजा का धर्म और धन संग्रह उसका दैनिक कृत्य माना जाता है I कोष पर राजा का ही अधिकार रहता है I कर संग्रह के द्वारा ही कोष को परिपूर्ण किया जा सकता है किंतु कर संग्रह अनियमित ढंग से नहीं अपितु शास्त्रानुमोदित नियमों के आधार पर होना चाहिए I ऐसा निर्देशित है राजकीय कारों के संबंध में भी अनेक बातें महाभारत से ज्ञात होती हैं राजा प्रजा से जो कर ग्रहण करता है उसे बली कहते हैं I वह बली खेती आदि की पैदावार का छठा भाग होती थी I इस बली का प्रयोजन प्रजाजन की रक्षा करना ही माना जाता था  I &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;८&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; कर संग्रह करते हुए प्रजा का दोहन मृदु रीति से किया जाए जैसे भ्रमर फूलों का करता है और जैसे बछड़ा गाय का करता है जो दूध पीता है पर स्तनों को नहीं काटता I कर निर्धारण करते हुए देश और काल को दृष्टि में रखा जाता था I खेती की पैदावार पर श्रेष्ठ भाग लेना जहां धर्मानुकूल माना जाता था I वहां व्यापारियों शिल्पियों आदि से कर लेते हुए यह ध्यान रखा जाता था कि उसको मुनाफा कितना हुआ है और उसके पारिवारिक खर्च क्या है I शांति पर्व में लिखा है कि व्यापारी पर कर लगाते हुए यह देखा जाए कि उनसे माल किसी कीमत पर खरीदा था ढुलाई पर उसका क्या खर्च हुआ किस कीमत पर उसका माल बिका और क्या कुछ खर्च पड़ा और उसके योग क्षेम की क्या दशा हैI  शिल्पियों पर कर लगाते हुए यह दृष्टि में रखा जाए कि माल का उत्पादन में क्या आता है कितना खर्च मजदूरी में देना पड़ता है और शिल्प की क्या दशा है I &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;९&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; निसंदेह करो को निर्धारित करते हुए यह ध्यान में रखा जाता था कि उत्पादकों पर अनुचित बोझ न पड़े I इसलिए शांति पर्व में भीष्म ने प्रतिपादित किया है कि यदि जनता का बहुत अधिक दोहन किया जाए तो उसकी काम करने की प्रेरणा नष्ट हो जाएगी I भिष्म  यह भी भलीभांति समझते थे कि कर्मचारी लोग कर वसूल करते हुए जनता पर अनुचित रूप से अत्याचार करते हैं और व्यर्थ कष्ट देते हैं I इसी कारण उन्होंने उपदेश किया था की रक्षा कार्य के लिए अधिकृत कर्मचारी अपनी दूसरों का धन लूटने वाले दूसरों को क्षति पहुंचाने वाले और शठ भी होते हैं अतः उनसे प्रजा की रक्षा की जाए &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१०&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कर का एक वैज्ञानिक सिद्धांत यह था कि वह मूल पर नहीं लाभ पर लगाया जाता था I यदि आपातकाल में राजा को कर वृद्धि करना हो तो उसे इसकी पूर्व सूचना प्रजा को देनी चाहिए I यदि आवश्यक हो तो वह राज्य में सर्वत्र अनुसंधान करें और प्रजा को उपस्थित विपत्ति से अवगत कारण कर ग्रहण के सिद्धांत सर्वथा तार्किक और व्यावहारिक थे तथापि व्यवहार में इन शास्त्रीय विघ्नों की उपेक्षा का अत्यधिक कर ग्रहण कर जनता को पीड़ित किया गया था किंतु यह सामान्य स्थिति नहीं थी I और परंपरागत विधि नियमों से अवगत जनता इसका प्रतिवाद भी करती थी I इस प्रकार धर्म पर आधारित राज सत्ता के नियंत्रण के लिए कर संचय के ये व्यावहारिक एवं तार्किक सिद्धांत पर्याप्त थे I इस सिद्धांत में जन शोषण के लिए राज्य को बहुत कम अवसर था I &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;जनमत-&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जनमत भी राजा की अत्याचारी प्रवृत्ति को नियंत्रित करने की एक युक्ति थी राजा के सिंहासन प्राप्त करने से लेकर निष्कासन तक पुष्ट एवं सफल जनमत का प्रभाव प्रतिभाषित होता है I महाभारत में अनेक राजाओं के पदच्यूत किए जाने का उल्लेख आया है I राजा विविंश के 15 पुत्र थे जिनमें सबसे बड़े का नाम खनीनेत्र था I अपने भाइयों को पीडित करके वह राज सिंहासन पर अरुण हो गया I इसका परिणाम यह हुआ की जनता ने उसे राज्यच्यूत कर दिया और उसके पुत्र सुवर्चा को राजगद्दी पर बिठाया I अपने पिता का उदाहरण उसके सामने था और वह यह भी देख चुका था कि जनता द्वारा उसे राज्यच्यूत कर दिया गया था I इस कारण उसने प्रजा के हित को सदा दृष्टि में रखा और राजधर्म में रहते हुए उसने राज्य का शासन किया I जब प्रजा ने देखा कि सुवर्चा  सत्यवादी क्षम व दम से युक्त और ब्राह्मण गुणों से युक्त है तो वह भी उसके प्रति अनुरक्त हो गई &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;११&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जनमत की महत्ता का एक अवसर यह भी था की प्रजा संरक्षण ही राजा के अस्तित्व का आधार था I संरक्षण के इस उत्तरदायित्व में प्रजा के आत्मरक्षा के अधिकार की स्वीकृति थी I आधुनिक काल के भी सभी राज्यवादी अथवा जनतंत्र वादी विचारक इस अधिकार की प्रधानता को स्वीकार करते हैं I महाभारत में स्पष्ट विधान है की प्रजा की रक्षा न करके धन लूटने वाला राजा राजा नहीं कलयुग है I प्रजा को चाहिए कि ऐसे राजा को बांधकर मार डाले जो राजा प्रजा की रक्षा की प्रतिज्ञा करके उसकी रक्षा नहीं करता वह पागल तथा रोगी कुत्ते की भांति वध्य है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१२&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I  राजा की नृशंसता की यह प्रबलतम प्रतिरोध की विधि थी तथापि यह सर्वदा सत्य नहीं थी I अतः राजा को निरंकुशता को रोकने की एक अन्य अपेक्षाकृत सरल विधि थी यह विधान था की दुष्ट कृतध्न तथा सबको भयभीत करने वाले राजा को त्याग दिया जाए I कदाचित उसे समय के लिए यह युक्तियां अत्यंत अव्यावहारिक भी न थी राज्य छोटे हो या बड़े भौगोलिक दृष्टि से प्रायः एक जैसे थे I अतः यदि एक राज्य की प्रजा दूसरे राज्य में चली जाए तो ना तो वहां के शासक को कोई आपत्ति हो सकती थी और ना प्रजा को ही कोई असुविधा I इस प्रकार जनमत तथा राज्य का विरोध करने का प्रजा का अधिकार राजसत्ता को परिसीमित करने के व्यावहारिक साधन थे I &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;निष्कर्ष-&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य शास्त्रों की भांति महाभारत में भी राजा और प्रजा का पारस्परिक संबंध पिता और पुत्र के समान कहा गया है I कुछ विद्वानों की सम्मति में राजा के पितरित्र स्वरूप की स्वीकृति में राज्य की निरंकुशता को संवर्धित किया है किंतु इस संबंध में जो मीमांसा महाभारत में की गई है उसे यह मत समर्थित नहीं प्रतीत होता उल्लेख है कि वही राजा श्रेष्ठ है जिसके राज्य में प्रजा पुत्र की भांति निर्भय रहती है I &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१३&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; कदाचित यह निर्भरता ही व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं सुरक्षा के अधिकारों की स्वीकृति है अधिकार की इस स्वीकृति में राज्य की निरंकुश्ता स्वतः सीमित हो गई है I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;संदर्भ ग्रंथ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१-महाभारत शांतिपर्व 85.12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२-महाभारत शांतिपर्व 114.1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३-महाभारत शांतिपर्व 114&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४-वही 84.845&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५-महाभारत विराट गीता 68.9 आरण्यक 57.19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६-वही 15.63-64&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७-महाभारत शांतिपर्व 8.12-13 उद्योग 70.19-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
८-वही 87.20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९-महाभारत शांतिपर्व 87. 13-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०-महाभारत शांतिपर्व 87.12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११-महाभारत अश्वमेधपर्व 4.7- 61&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२-प्रकृति शब्द का अर्थ जनता या प्रजाजन है यह कौटिल्य अर्थशास्त्र से भी सूचित होता है जहां प्रकृति जनता के कोप को सब कोपों में सर्वाधिक गरियान् कहा गया है&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३-महाभारत शांति पर्व 57.33&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Published by.&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sriram</name></author>
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