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	<title>शुक्रनीति में संकटकालीन व्यवस्था - Revision history</title>
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		<title>Sriram at 08:42, 17 July 2024</title>
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		<updated>2024-07-17T08:42:11Z</updated>

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				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;Revision as of 14:12, 17 July 2024&lt;/td&gt;
				&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot; id=&quot;mw-diff-left-l86&quot;&gt;Line 86:&lt;/td&gt;
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&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br/&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br/&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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&lt;/table&gt;</summary>
		<author><name>Sriram</name></author>
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		<title>Sriram: Created page with &quot; &#039;&#039;&#039;आपात स्थिति के उपबंध&#039;&#039;&#039;      महर्षि शुक्र ने जहां एक ओर सामान स्थिति में शासन व्यवस्था का वर्णन किया है वहीं दूसरी ओर आपात स्थिति &#039;&#039;&#039;१&#039;&#039;&#039; में शासन संचालन किस प्रकार किया जाएगा? इसका विवेचन...&quot;</title>
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		<updated>2024-07-17T08:42:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Created page with &amp;quot; &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;आपात स्थिति के उपबंध&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;      महर्षि शुक्र ने जहां एक ओर सामान स्थिति में शासन व्यवस्था का वर्णन किया है वहीं दूसरी ओर आपात स्थिति &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; में शासन संचालन किस प्रकार किया जाएगा? इसका विवेचन...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;आपात स्थिति के उपबंध&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;    &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महर्षि शुक्र ने जहां एक ओर सामान स्थिति में शासन व्यवस्था का वर्णन किया है वहीं दूसरी ओर आपात स्थिति &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; में शासन संचालन किस प्रकार किया जाएगा? इसका विवेचन प्रस्तुत किया है I शुक्रनीति में वर्णित आपात स्थिति के उपबंधों के अध्ययन से ऐसा प्रतीत होता है कि आचार्य शुक्र संकटकालीन स्थिति के महत्व को पर्याप्त रूप में समझते थे एवं उसकी वास्तविक गंभीरता का शायद उन्होंने बहुत नजदीकी एवं सूक्ष्मता से अध्ययन किया I यद्यपि शुक्र नीति के किसी भी एक अध्याय में संकटकालीन अपबंधों का क्रमबद्ध वर्णन तो नहीं किया गया किंतु प्राप्त संकेतों के संकलन में उसकी क्रमबद्धता निहित है I &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;आपात स्थिति में राजा की शक्ति&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपात स्थिति में राजा की शक्ति में व्यापक रूप से परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं I शुक्रनीति कार्य में सामान्य स्थिति में प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता प्रदान की है लेकिन आपात स्थिति में उस स्वतंत्रता को प्रतिबंधित कर दिया है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;२&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I यहां यह भी स्मरणीय है कि महर्षि शुक्र ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि आपात स्थिति किन-किन परिस्थितियों में घोषित की जाएगी? शुक्रनीति के अध्ययन के आधार पर केवल इतना ही कहा जा सकता है कि संभवतः आपात स्थिति केवल बाह्य आक्रमण की स्थिति में ही घोषित की जा सकती है I राजा आपातकाल की स्थिति उत्पन्न होने पर अपने पंडित ,गुरु &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;३ ,&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; भाई ,बंधु ,भृत्य जाति के लोगों तथा सभासद आदि सभी को राज्यसभा में ससम्मान बुलाकर अपने उद्देश्य की प्राप्ति हेतु अति विनम्रता पूर्वक उनसे ऐसी स्थिति के निदान के उपाय के लिए सहयोग की मांग करें &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;४&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I इस प्रकार की आपात स्थिति की घोषणा से राज्य को प्रशासनिक एवं वित्तीय स्थिति पर व्यापक प्रभाव दृष्टिगोचर होता है I &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;आपात स्थिति मे  राजा एवं शासनाधिकारियों की स्थिति परिवर्तन&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपात स्थिति के उत्पन्न होने पर राजा एवं शासनाधिकारियों की स्थिति में क्या परिवर्तन होंगे? इसका तो शुक्र नीति में कहीं कोई स्पष्ट वर्णन नहीं किया है किंतु, उपलब्ध विवरण से ऐसा प्रतीत होता है कि आपात स्थिति में समस्त प्रशासनिक शक्तियां राजा के हाथ में केंद्रित हो जाएंगी I जहां सामान्य स्थिति में राजा के लिए यह आवश्यक बताया गया है कि अपने मंत्रियों से परामर्श लिए बिना कोई कार्य न करें &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;५&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I वहां आपात स्थिति में राजा के ऊपर बंधन दृष्टिगोचर नहीं होता I शुक्र नितिकार ने तो यहां तक बताया है कि आपात स्थिति में राजा को किसी पर विश्वास नहीं करना चाहिए  I अपनी सुरक्षा के लिए स्वयं शस्त्र धारण करने चाहिए &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;६&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
    महर्षि का विचार है कि राजा को चाहिए कि वह गुप्तचरो द्वारा मंत्रिपरिषद के सदस्यों , अधिकारियों, सभासदों, सैनिकों &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;७&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;, तथा अंत :पुर में निवास करने वाली स्त्रियों, बांधओ, और प्रजा, आदि की स्थिति एवं चित्तवृत्ति की जानकारी प्राप्त करता रहे &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;८&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I इतना ही नहीं आचार्य शुक्र ने गुप्तचर के ऊपर भी पूर्ण विश्वास करने का निषेध किया है I उनके अनुसार राजा को गुप्तचर की गतिविधियों पर भी वेश बदल बदलकर &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;९&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; निगाह रखनी चाहिए क्योंकि उनका विश्वास है कि ऐसा न करने पर वह भी मिथ्यभाषी हो जाते हैं &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१०&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I इसके साथ ही गुप्तचर को मंत्रिपरिषद की सदस्यों एवं अन्य अधिकारियों की रक्षा करने का भी महर्षि ने आग्रह किया है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;११&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;आपात स्थिति में राज्य को  अधिकार&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार्य ने आपात स्थिति में राज्य को इतने व्यापक अधिकार देने के साथ ही राज्य कर्मचारियों के लिए भी कुछ निर्देश दिए हैं I उन्होंने स्पष्ट किया है कि आपात स्थिति में राज्य कर्मचारियों का यह दायित्व है कि वह राज्य के दुख को अपना दुख समझते हुए अपने सर्वस्व &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१२&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; को अर्पण करके भी राज्य की रक्षा करने का प्रयत्न करें &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१३&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I इतना ही नहीं उन्हें प्राणों की बाजी लगाकर राज्य की रक्षा करने का प्रयत्न करें &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१४&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I इस भाँति स्पष्ट है कि आपात स्थिति में राजा के समस्त प्रशासनिक अधिकार राजा के हाथ में आ जाते हैं I यहां वस्तुतः यह केवल औपचारिक प्रधान मात्र नहीं रहता इसके अतिरिक्त कर्मचारियों का यह भी कर्तव्य है कि वह राजा को वास्तविकता से विपरीत न समझे तथा उन्हें घूस नहीं लेना चाहिए &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१५&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I शुक्रनीतिकार के अनुसार यदि राजा प्रबल दंड देने लगता है तो कर्मचारियों का यह दायित्व हो जाता है कि वह राजा को एकांत में समझाएं &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१६&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि महर्षि शुक्र ने आपात स्थिति में कर्मचारियों को कुछ विशेष दायित्व का निर्वाह करने वाला बना दिया है  I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;आपात काल मे प्रशासनिक स्थिति&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुक्रनीति की राज्य व्यवस्था में प्रशासनिक स्थिति जहां पर एक ओर आपात स्थिति का व्यापक प्रभाव दृष्टिगोचर होता है वहीं दूसरी ओर वित्तीय व्यवस्था पर भी राजा का व्यापक नियंत्रण उपलब्ध होता है I संकटकालीन स्थिति में राजा की वित्तीय शक्ति में इतनी अधिक वृद्धि हो जाती है कि यदि वह चाहे तो कर्मचारियों के वेतन में से आधे या दो तिहाई भाग की भी कटौती कर सकता है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१७  &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;I लेकिन इसके साथ आपात स्थिति की समाप्ति पर यह वेतन राजा को लौटाना होगा &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१८&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I इसके अतिरिक्त यद्यपि सामान्य परिस्थितियों में प्रजा से अधिक कर लगाकर धन वसूल करने का निषेध किया गया है किंतु जब राजा शत्रु के विनाश के लिए सेवा की रक्षा में लीन हो तो ऐसी आपात स्थिति में महर्षि शुक्र ने प्रजा पर किसी प्रकार का जुर्माना या चुंगी लगाकर धन एकत्रित करने को उचित माना है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;१९&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
    इसी भांति देवोत्तर संपत्ति पर कर लगाना समान स्थिति में निषिद्ध माना गया है किंतु संकट काल में वह देवोत्तर संपत्ति एवं तीर्थ स्थान पर भी कर लगाकर धन वसूल कर सकता है &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;२०&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I इसके साथ राजा ऐसी स्थिति में राज्य के दैनिक व्यक्तियों से सूद पर धन ले सकेगा I यदि कोई धनिक आपात स्थिति को गंभीरता को समझने के पक्ष एवं राजा की याचना पर भी ऋण में धन नहीं देता तो आचार्य शुक्र ने राजा को यह अधिकार दिया है कि वह ऐसे धनिकों का जबरन धन छीन ले I लेकिन राजा के उस अधिकार पर उन्होंने यह प्रतिबंध लगा दिया है कि राजा को संकटकाल समाप्त हो जाने पर धनिक का धन सूद सहित लौटा देना चाहिए &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;२१&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
    शुक्र नीति की राज्य व्यवस्था में राजा को वित्तीय अधिकारों में वृद्धि इस सीमा तक कर दी गई है कि राजा बंटवारे में प्राप्त धन के रूप में रखे धन दास के धन दूसरे के हाथ में रखा हुआ धन शिल्पो के हाथ में संस्कार हेतु दिया हुआ द्रव्य संतान के रहने पर अपना एवं दास आदि की नौ प्रकार की धरोहर &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;२२&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; के रूप में रखी द्रव्य एवं वस्तुओं को भी आपात स्थिति में राजा द्वारा आवश्यकता पड़ने पर जिन व्यक्तियों की है उन्हें नहीं लौटानी चाहिए &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;२३&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I इस भाँति स्पष्ट है कि आचार्य शुक्र राजा के पास विभिन्न लोगों की संपूर्ण धरोहर के रूप में रखी वस्तुओं को भी आपात स्थिति में लौटाने के पक्ष में नहीं थे I इससे ऐसा प्रतीत होता है कि संकट काल के दौरान राज्य के प्रत्येक नागरिक की व्यक्तिगत संपत्ति को राष्ट्र की संपत्ति समझ कर राजा द्वारा राज्य रक्षा के निमित्त प्रयोग में लाया जा सकता है I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
    उपर्युक्त स्थिति के अतिरिक्त शुक्र ने संकटकालीन स्थिति में राजा के दस्यु जीवन व्यतीत करने की क्षमता का निर्देश दिया है जिसके वर्णन से स्पष्ट है कि जब विरोधी राजा द्वारा अपने राज्य पर अधिकार कर लेने की भयावह स्थिति उत्पन्न हो जाए तब ऐसी स्थिति में राजा दस्यु प्रवृत्ति धारण करते हुए विवाह दान यज्ञादि के अष्टांग धन  छोड़कर प्रजा के संपूर्ण धन का हरण कर ले और दुर्जनों की संपूर्ण संपत्ति अपहरण कर ले &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;२४&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I आचार्य के अनुसार वित्तीय प्रभावों के अतिरिक्त आपात स्थिति में सामान्य विधि एवं न्याय प्रक्रिया आदि में भी पर्याप्त परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है I उन्होंने जिस भांति राजा को प्रजा की संपत्ति के अपहरण का आदेश दिया है उससे यह स्पष्ट है कि आपात स्थिति में प्रजा के सामान्य अधिकार भी समाप्त हो जाएंगे I इस विचार की पुष्टि इस बात से भी होती है कि ऐसी स्थिति में राजा को वस्तु की भांति क्रूर एवं दयाहीन आचरण करने में स्वतंत्रता होगी &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;२५&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; I इस भांति यह भी स्पष्ट है कि सामान्य स्थिति में विधि एवं न्याय की जो प्रक्रिया बताई गई है उसका पालन करना भी राजा के लिए आवश्यक नहीं होगा I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;निष्कर्ष&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;     &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपात स्थिति में राजा प्रशासनिक एवं वित्तीय क्षेत्र में निरंकुश राजा के रूप में कार्य करेगा जिसके अंतर्गत उसके लिए उचित अनुचित का ध्यान रखना आवश्यक नहीं है I ऐसा प्रतीत होता है कि संकट काल में हर संभव उपाय द्वारा न्याय अन्याय किसी भी माध्यम से उसे राज्य की रक्षा करनी चाहिए एवं आपात स्थिति से ग्रस्त राज्य की रक्षा के निमित्त आचार्य ने पर स्त्री गमन के अतिरिक्त प्रत्येक कार्य करने की खुली छूट दी है , तथा किसी भी प्रकार के 10 आचरण में कोई दोष नहीं माना है I इस भांति स्पष्ट है कि ऐसी विषम परिस्थिति में राजा सब बातों को छोड़कर राज्य की रक्षा को ही अपना एकमात्र उद्देश्य समझ कर हर संभव उपाय द्वारा सेवा को शक्तिशाली बनाते हुए राज्य की रक्षा करेगा I&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;संदर्भ ग्रंथ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१-महर्षि शुक्र ने आपात स्थिति किन परिस्थितियों में मानी है II इसका कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं कियागया है &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२-शुक्रनीति -5/80&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३-वही -5/49&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४-वही- 5/50&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५-वही- 2/2-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६-शुक्रनीति- 1/337&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७-शुक्रनीति- 1/335&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
८-वही- 1336 ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९-महर्षि ने ब्रह्मचारी ,तपस्वी ,सन्यासी ,तथा नीच, आदि का रूप धारण करने का उल्लेख किया है शुक्रनीति- 1/338&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०-शुक्रनीति -1/339&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११-वही -1/340&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२-सर्वस्व से अभिप्राय महर्षि ने स्त्री, पुत्र , प्राण , से लिया है &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३-शुक्रनीति- 2/271&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१४-वही- 5/56-57&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१५-वही- 2/272&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१६-शुक्रनीति- 2/273-274&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१७-वही -5/52&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१८-वही -4-2/11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१९-शुक्रनीति- 4-2/10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२०-वही -4-2/09&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२१-वही 4-2/11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२२-आचार्य ने इन धरोहरों का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं किया है &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२३-शुक्रनीति- 4/310-311&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२४-वही -1/384&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२५-शुक्रनीति -1/386&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Published by,&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sriram</name></author>
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