शुक्र नीति में राष्ट्र का प्रशासन: Difference between revisions
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१-प्रशासन का संगठन- शुक्र ने राज्य भृत्यों के महत्व को बताते हुए राजा को परामर्श दिया है कि वह राज्य की उन्नति के लिए अनेक ज्ञानवान एवं गुनी सहायकों की नियुक्ति करें I १ शुक्र ने राजा से वेतन प्राप्त करने वाले उसके सहायकों को राज्य भृत्य कहा है I इस ग्रंथ में निम्न सात प्रकार के भृत्यों का उल्लेख किया गया है I विभिन्न राजनीतिक विभागों के प्रकृति एवं दर्शक, विभिन्न प्रशासनिक विभागों के अध्यक्ष, तथा उसके सहायक, भू कर वसूलने वाले अधिकारी ,धर्म कलाओं एवं विधाओं के विशेषज्ञ, राजा और राजमहल के विभिन्न राज भृत्य ,स्थानीय अधिकारी, बिना विभागों में कार्य करने वाले हीन भृत्य अथवा सेवक I
शुक्र ने उपरोक्त सभी वर्गों के अधिकारियों सहायकों एवं सेवकों की नियुक्ति संबंधी योग्यता पर प्रकाश डाला है और उनका कार्य भी बताया है I शुक्र ने ग्राम एवं नगर के प्रशासन के संदर्भ में अग्र लिखित छः अधिकारियों की नियुक्ति का उल्लेख किया है -साहसाधिपति ,ग्राम, त्रेता ,भागहार, लेखक, शुल्क ,ग्राहक ,तथा प्रतिहारी I २ साहसाधिपति अपराधियों को दंडित करता है I ग्राम नेता चोर डाकू व अन्य अधिकारियों से प्रजाजन की रक्षा करता है I भागहार प्रजा से कर वसुलता है I शुल्क ग्राहक व्यापारियों से कर एवं शुल्क प्राप्त करता है I लेखक सभी स्थानीय आर्थिक लेखों को रखता है तथा प्रतिहारी राजा द्वारा बुलाए गए व्यक्ति को राजा तक ले जाने का कार्य करता है I ३ शुक्र नीति सार ने ग्रामीण व नगरों की नागरिक सुरक्षा के संदर्भ में कुछ अन्य राज कर्मचारियों का उल्लेख किया है I जैसे शालधिप नगर व ग्राम के रक्षा पुरुष
२-प्रशासन के विभिन्न विभाग एवं कार्यालय - शुक्र नीतिसार में प्रशासन के 20 विभागों का उल्लेख है I ४ इस ग्रंथ ने विभागों के अध्यक्ष पद को सामान्य रूप से कर्म सचिव कहा है किंतु इसके साथ ही अध्यक्ष पद के लिए अध्यक्ष पति अथवा अधिप संज्ञा का भी प्रयोग किया है I शुक्र ने प्रशासन को कार्यालय पद्धति में लिखित आदेश को अत्यधिक महत्व दिया है I उसका मत है कि अधिकारी अथवा सहायकों को बिना लिखित राजाज्ञा के कोई कार्य नहीं करना चाहिए I क्योंकि राजा की राजमुद्रा वह हस्ताक्षर युक्त लिखित आदेश ही वास्तविक राजा होता है I व्यक्ति राजा नहीं होता ,अलिखित आदेश देने वाला राजा तथा ऐसे आदेशों का पालन करने वाला अधिकारी दोनों ही चोर होते हैं I ५
यह उल्लेखनीय है कि शुक्र ने प्रशासन व्यवस्था में मुख्यतः दो प्रकार के लेखों को महत्वपूर्ण माना है I वृत्य लेख तथा आर्थिक लेख I वृत्य लेख के अनेक उपभेद होते हैं I जायपत्र ,आज्ञा पत्र, शासन पत्र, प्रसाद पत्र, भाग पत्र, आदि I शुक्र ने आय व व्यय से संबंधित विभिन्न आर्थिक लेखों का भी उल्लेख किया है I शुक्र ने प्रशासन के कुशल संचालन के लिए राजा के लिखित आदेशों का स्मृति पत्र के रूप में सुरक्षित रखने की प्रणाली स्वीकारी है I ताकि समय बीतने पर प्रशासन में भ्रम उत्पन्न नहीं हो I इसके साथ ही उन्होंने प्रशासन में दैनिक मासिक वार्षिक तथा बहुवर्षीय रिपोर्ट तैयार करने पर भी बल दिया है I उनका मत है कि राजा को प्रतिदिन सौ कोस दूर तक के प्रदेशों की सूचनाएँ प्राप्त होनी चाहिए I शुक्र ने राजकीय कार्यालय की सुरक्षा हेतु पहरेदारों व रक्षकों की व्यवस्था को स्वीकारा है I
राजकीय सेवा के प्रमुख नियम- शुक्र ने विभिन्न अधिकारियों की दूर से एवं सरलता से पहचान के लिए उसके गणवेश मुकुट वाहनों एवं वाद्य आदि की व्यवस्था स्वीकारी है I शुक्र के अनुसार विभिन्न भृत्यों को उसके पद के अनुरूप रत्नों स्वर्ण रजत पीतल तांबे लोहे आदि के टैग में भी प्रदान किए जाने चाहिए I अन्य आचार्य की तुलना में शुक्र का वेतन संबंधी विवरण इस अर्थ में श्रेष्ठ है कि उन्होंने भृत्यों के लिए वेतन की सुनिश्चित राशियाँ बताने के स्थान पर भृति के देने के सिद्धांतों का उल्लेख किया है I शुक्र ने भृति भुगतान के तीन सिद्धांत बताएं हैं I ६ कार्यमाना भृति काल माना ,भृति कार्यकाल ,मिति ,भृति शुक्र ने भृति की अधिकतम एवं न्यूनतम मात्राओं पर भी प्रकाश डाला है I इस दृष्टि से उन्होंने चार प्रकार की भितियाँ बताइ है -श्रेष्ठ भृति , मध्य भृति ,समाभृति, हिना भृति I
यह उल्लेखनीय है कि शुक्र ने राजा को परामर्श दिया है कि वह भृति का लोप नहीं करें अर्थात भृत्य के वेतन में कटौती नहीं करें और सदैव नियत समय पर वेतन दें I ८ उन्होंने अत्यल्प भृति को त्याज्य माना है क्योंकि इससे भृति असंतुष्ट रहते हैं और वह राजा के आलोचक तथा प्रजा धन का हरण करने वाले हो जाते हैं I शुक्र ने शुद्र तक के लिए हिना भृति के स्थान पर समा भृति को उचित भृति के रूप में स्वीकारा है I ९ और हीन भृति को अस्वीकरणीय बताया है I शुक्र का मत है की भृति के निर्धारण में भृति की कार्यक्षमता को आधार बनाया जाना चाहिए I कार्य क्षमता के अनुसार तीन प्रकार के भृति हो सकते हैं I मंद , तथा शीघ्र और उन्हें क्रमशः समा मध्य तथा श्रेष्ठ भृतियाँ दी जानी चाहिए I १० इसके साथ ही शुक्र का मत है कि जैसे-जैसे भृत्य की योग्यता में वृद्धि हो वैसे-वैसे ही उसके भित्ति में भी वृद्धि की जानी चाहिए क्योंकि इससे अंत में स्वयं राजा का ही लाभ होता है I ११
३-सेवा अवधि- शुक्र नीतिसार ने सामान्य स्थिति में एक भृति की सेवा अवधि 40 वर्ष स्वीकारी है I १२ किंतु इसके साथ ही बताया है की भृति की सदैव परीक्षा लेते रहना चाहिए और ऐसे भृति को पदमुक्त कर देना चाहिए जिसमें ऐसे अवगुण उत्पन्न हो गया हो जो उसके पद के दायित्व में बाधक हो I १३ अर्थात राज सेवा में उन व्यक्तियों को ही रहने दिया जाना चाहिए जो योग्य हो I शुक्र ने ऐसे भी अधिकारियों को पदमुक्त किया जाना उचित माना है जिनके विरुद्ध सौ प्रजाजन ने लिखकर शिकायत की हो I १४
४-पदोन्नति एवं पद अवनति- शुक्र के अनुसार जब कोई भृति अत्यंत सेवा भाव से अपनी दायित्व को पूरा करता है तो उसे अप्रधान सेवक को प्रधान सेवक बनाया जाना उचित है I इसके विपरीत यदि कोई प्रधान सेवक आलस्यादि के कारण अपने दायित्वों की उपेक्षा करता है तो उसे अप्रधान सेवक बना दिया जाना चाहिए I अन्यत्र शुक्र ने बताया है कि उच्च पद रिक्त होने पर सहायक पद पर कार्यरत योग्य भृति को उसे उच्च पद पर पदोन्नति किया जाना चाहिए I १५ पदोन्नति की व्यवस्था को स्वीकारते हुए शुक्र ने कहा है कि कोई नया कर्मचारी जैसे-जैसे अपने से श्रेष्ठ पद के लिए योग्य होता जाए वैसे-वैसे उसे निरंतर श्रेष्ठ पदों पर नियुक्त किया जाना चाहिए और अंत में प्रधान पद पर नियुक्त किया जाना चाहिए I १६
५-प्रशिक्षण की व्यवस्था- शुक्र का मत है कि राजा भृति संभवतः छात्रवृत्ति देकर व्यक्तियों का विभिन्न कलाओं एवं विधाओं का अध्ययन कराने का प्रबंध करें और उनके अध्ययन अर्थात प्रशिक्षण की समाप्ति पर उन्हें उचित कार्यों पर नियुक्त कर दें I
६-पेंशन की व्यवस्था- शुक्र के अनुसार राजकीय सेवा में 40 वर्ष पूरा करने वाले व्यक्तियों को सेवानिवृत्ति कर दिया जाना चाहिए और उन्हें पेंशन के रूप में आधा वेतन आजीवन दिया जाना चाहिए I यदि ऐसा भृति मर जाए तो उसके अवयस्क पुत्र अथवा अपाहिज पुत्र अथवा उसकी पत्नी एवं अविवाहित कन्या को आधा वेतन दिया जाना चाहिए I वस्तुतः इस विवरण से सेवानिवृत भृति के लिए पेंशन के साथ ही पारिवारिक पेंशन की भी व्यवस्था की गई है I शुक्र नीतिसार ने राजकीय कार्य के दौरान करने वाले व्यक्तियों के परिवार की रक्षा के लिए उदर क्षतिपूर्ति की व्यवस्था भी स्वीकारी है I शुक्र के अनुसार ऐसे भृति के पुत्र को अल्प वयस्क रहने तक उसे व्यक्ति को पूरा वेतन दिया जाना चाहिए अथवा उसके वयस्क होने पर उसे गुण के अनुसार वेतन देना चाहिए I १७
७-भविष्य निधि एवं बोनस की व्यवस्था- शुक्र ने सभी भृति के लिए बोनस अर्थात सामान्य व समान पारितोषिक की व्यवस्था भी स्वीकारी है I इस ग्रंथ के अनुसार भृत्य को प्रतिवर्ष उसके वेतन का आठवां भाग पारितोषिक के रूप में दिया जाना चाहिए I १८ शुक्र ने भृति की कार्य क्षमता में वृद्धि के लिए उत्प्रेरक के रूप में भी पारितोषिक की व्यवस्था की है I जब कोई वृद्धि अति विशिष्ट योग्यता के साथ किसी कार्य को पूरा करें तो उसे कार्य के अष्टमांश को पारितोषिक के रूप में उस व्यक्ति को दिया जाना चाहिए अर्थात उस कार्य को करने में जो वेतन बनता है उसका आठवां भाग पारितोषिक के रूप में दिया जाना चाहिए I
८-सामान्य विश्राम एवं अवकाश के नियम- शुक्र नीतिसार के विवरण से ज्ञात होता है कि नियमित भृत्यों को प्रतिदिन 12 घंटे राज्य कार्य करना होता है I शुक्र ने 24 घंटे के संदर्भ में बताया है कि निमित्त भृत्यों को प्रतिदिन अपना गृह कार्य आदि करने के लिए दिन में एक यम तथा रात्रि में तीन यम का अवकाश मिलना चाहिए I रोजनदारी पर कार्य करने वाले भृत्यों के लिए कहा गया है की नित्य भृत्यों का दिन में आधा यम का अवकाश मिलना चाहिए I शुक्र ने राज्य वृत्तियों के संदर्भ में सार्वजनिक अवकाश का उल्लेख किया है I शुक्र के अनुसार उत्सव आदि के दिन भृतों से कार्य नहीं करना चाहिए I यदि कार्य अति आवश्यक हो तो उत्सव के दिन भी कार्य कराया जा सकता है किंतु श्राद्ध के दिनों में कभी भी कार्य नहीं कराया जाना चाहिए I इसके अलावा भृति को प्रतिवर्ष 15 दिन का सवेतन अवकाश दिया जाना चाहिए I १९
शुक्र ने स्वास्थ्य अवकाश की व्यवस्था भी की है I जो भृति राजकीय सेवा के 5 वर्ष पूरा कर चुका हो उसे एक सप्ताह का सवेतन स्वास्थ्य अवकाश दिया जा सकता है I इससे अधिक अर्थात कई माह तक बीमार रहने वाले भृति को एक चौथाई वेतन काटकर शेष वेतन देना चाहिए I 1 वर्ष तक लगातार बीमार रहने वाले व्यक्ति को सामान्यतः तीन माह का वेतन ही दिया जाना चाहिएI किंतु उसकी बीमारी की स्थिति पर विचार करके वेतन की मात्रा को कम या अधिक किया जा सकता है I यदि भृति एक साल से भी अधिक बीमार रहे तो उसे 6 माह का वेतन दिया जाना चाहिए I इससे अधिक नहीं किंतु जब कोई योग्य भृति बीमार हो जाए जो उसकी बीमारी की अवधि की उपेक्षा करके उसे सदैव आधा वेतन अवश्य ही दिया जाना चाहिए I यह उल्लेखनीय है कि शुक्र ने स्वास्थ्य अवकाश के संदर्भ में प्रतिनिधि की व्यवस्था स्वीकारी हैI उनके अनुसार जब कोई भृति लगातार 1 वर्ष तक बीमार रहे तो उसके सेवा कार्य पर उसी के द्वारा भेजा गया प्रतिनिधि नियुक्त किया जाना चाहिए I २०
शुक्र ने यह बताया है की भृति को किस प्रकार का आचरण करना चाहिए I तथा पित्त दुर्गुणों व अकर्मों से बचना चाहिए I उनके इस विवरण को ही हम भृति की आचार संहिता कह सकते हैंI शुक्र का मत है कि भृत्य को स्वामी के प्रति तथा अपने सेवा कार्य के प्रति पूरी तरह से समर्पित होना चाहिए I भृति को नियत समय पर अपने कार्यालय पर हाजिर होकर अपने कार्य को करने चाहिए I उसे राजा के प्रति पूर्ण अनुरक्त एवं समर्पित होना चाहिए और राजा द्वारा बुलाए जाने पर पूर्ण मर्यादा के साथ राजा को अपने कार्य की जानकारी देनी चाहिए उसे शिष्टतापूर्वक राजा को सब कार्य की प्रेरणा देनी चाहिए और कभी भी मात्र चाटुकारिता नहीं करनी चाहिए I यदि भृति के क्षेत्राधिकार में अनुचित परिवर्तन हो तो उसे उचित अवसर पर राजा से निवेदन करना चाहिए सभी व्यक्तियों को एक दूसरे के प्रति सद्भाव रखना चाहिए और एक दूसरे के कर्मियों की उपेक्षा करके कार्य की पूर्णता एवं त्रुटिहीनता की ओर ध्यान देना चाहिए I भृति को कभी भी प्रजाजन से झूठे वादे नहीं करने चाहिए अपितु संभव होने पर उसके कार्य को शीघ्रता से कर देना चाहिए I उन्हें अनुचित कार्यों को त्याग देना चाहिए जैसे रिश्वत लेना ,जुआ खेलने ,क्रोध करना, कामुकता व दुशचरित्रता आदि I
निष्कर्ष- शुक्र द्वारा वर्णित भृत्यों की आचार संहिता का निष्कर्ष है कि राजकीय सेवा में केवल योग्य व्यक्तियों को ही रखा जाना चाहिए और उन्हें ही पदोन्नति किया जाना चाहिए तथा अयोग्य व्यक्तियों को पदवनत या पद मुक्त किया जाना चाहिए I शुक्र ने भृति की आचार संहिता को प्रस्तुत करने के साथ ही इस तथ्य पर भी बल दिया है कि स्वयं राजा का आचरण भी भृति के प्रति उचित एवं नियमानुसार होना चाहिए I उनका मत है कि स्वेच्छाचारी राजा की सेवा अत्यंत दुखदाई होती है अर्थात मात्र नीतिमान राजा की सेवा ही की जानी चाहिए I
संदर्भ ग्रंथ
१-शुक्र नीतिसार 2.5-7
२-शुक्र नीतिसार 2.121- 123
३-दृष्टतव्य शुक्र नीतिसार 2.171- 176
४-शुक्र नीतिसार ने प्रशासन के 20 विभागों का उल्लेख किया है
५-शुक्र नीतिसार 2.291- 294
६-शुक्र नीतिसार 2.394 -399
७-हिना भृति केवल स्वयं भृत के ही भरण पोषण में सहायक होती है
८- अवश्यपोष्यवर्गस्य भरण भृतकाद् भवेत
तथा भृतिस्तु संयोज्या तद्योग्य भृतकाय वै
९-शुक्र नीतिसार 2.403-404
१०-शुक्र नीतिसार 2.406-407
११-शुक्र 2.401-402
१२-शुक्र 2.413
१३-शुक्र 1.367-6 8,2.113
१४-शुक्र 1.375-379
१५-शुक्र 2.115
१६-शुक्र 2.116-117
१७- भृतिदानेन सन्तुष्ठा मानेन परिवर्द्धिता
सान्तिवता मृदुवाचा ये न व्यजन्त्वधिप हि ते
१८-शुक्र 2.415
१९-शुक्र 2.42
२०-शुक्र 2.409 -412
Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.
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