मनु के राजपद संबंधी विचार: Difference between revisions
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Latest revision as of 12:41, 16 July 2024
राजपद की प्रथम उत्पत्ति
मनुस्मृति में विश्व के प्रथम राजा अथवा राजपद की प्रथम उत्पत्ति के बारे में दैवी सिद्धांत को स्वीकारा गया है I इस संबंध में इस ग्रंथ का निम्न विवरण महत्वपूर्ण है I जब लोक में सर्वत्र अराजकता फैल गई और भय उत्पन्न होने के कारण भगदड़ मच गई तब सब की रक्षा के लिए प्रभु ने राजा का निर्माण किया I ईश्वर ने राजा का निर्माण इंद्र, वायु, एवं सूर्य ,अग्नि, वरुण ,चंद्र ,तथा कुबेर के अंश से किया I ईश्वर ने राजा के निर्माण से भी पहले दंड का निर्माण किया जो वास्तव में राजा है १ I धर्म और दंड के भय से ही सब प्राणी अपने भागों को प्राप्त करते हैं २ I
मनुस्मृति में प्राप्त विवरण के अनुसार राजा का निर्माण ईश्वर ने किया इंद्र , वायु एवं सूर्य , अग्नि, वरुण ,चंद्रमा एवं कुबेर का सारभूत नित्य अंश लेकर राजा की सृष्टि की गई I मनु के इस विवरण को शुक्र ज्यो का त्यों ग्रहण करते हैं I अतः राजा मनुष्य ही है I ऐसा मानकर बालक राजा का भी अपमान वर्जित है I वही राजा के रूप में पृथ्वी पर सबसे बड़ा देवता है I पृथ्वी छोटे-छोटे सभी प्राणियों को अनिवार्य एवं समान रूप से धारण करती है I राजा प्रजापालन समान रूप से करें I स्पष्ट है कि राजा तभी महान देवता है ,जब वह देवता सदृश्य कार्यों का निर्वाह करता है I राजा में दैवी तत्व उसकी शक्ति गौरव एवं सामान्य व्यक्ति से ऊंची स्थिति प्रदान करने के लिए है I महाभारत में मनुस्मृति का यह अंश थोड़े बहुत हेर फेर के साथ उद्धत है I
राजा के गुण
मनु का मत है कि दैविक गुण संपन्न राजा सभी जड़ चेतन को अपने वश में रखने में समर्थ होता है I ३ सूर्य के समान उसमें तेज होना चाहिए तभी कोई व्यक्ति उसके प्रति विद्रोह का साहस नहीं कर सकता I इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि अन्यायी राजा के विरुद्ध भी प्रजा को विद्रोह का अधिकार नहीं है I वस्तुतः मनु ने यह स्थिति आदर्श राजा को दी है I क्योंकि वाह्य एवं आंतरिक अराजकों से निपटने में एकमात्र वही सक्षम है I राजा धर्म सिद्धि के निमित्त अष्ट देवताओं के कार्य देश काल एवं स्थिति को ध्यान में रखकर करता है I तभी उसका जैविक रूप मान्य है I
मनु का मत है कि राजा अपने प्रभाव से अग्नि रूप है I वायु रूप है चंद्र, यम, एवं महेंद्र रूप है I इन देवताओं के निश्चित कार्यों का संपादन राजा प्रयोजन के अनुसार कार्य तथा शक्ति का विचार करके धर्म सिद्ध हेतु करता है ४ I तात्पर्य यह है कि राजा को आवश्यकता अनुसार विभिन्न शक्ति क्षमताओं का आश्रय लेना चाहिए I राजा दैवी रूप में विधि एवं व्यवस्था की रक्षा करता है I रक्षा के क्रम में उसे विभिन्न प्रकार के कार्यों को करना पड़ता है I
मनुस्मृति में दैवी गुण संपन्न राजा का व्यक्तित्व नहीं धर्म रूप में विधि राज्य का वास्तविक संप्रभु है I फलत: मनु राजा के देवत्व पर तो जोर देते हैं लेकिन दैवी अधिकार पर नहीं ५ I मनु का मत है कि अतीत तेजस्वी दंड जो असयंत आत्मा वालों के लिए दूर्वह है I धर्म में भ्रष्ट राजा को सबान्धव नष्ट कर डालता है I किसी निरंकुश सत्ता के प्रतिपादन में राजा में इस प्रकार के दंड नियंत्रण की व्यवस्था नहीं हो सकती I अतः मनु राजा को सर्वथा स्वतंत्र प्रकृति का विरोध करना चाहते हैं I वे राजा का विनय ही होना आवश्यक मानते हैं I विनय की शिक्षा उसे वृद्ध ब्राह्मण से प्राप्त होती है I विनयी राजा कभी नष्ट नहीं हो सकता ६ I दैवी राजतंत्र में राजा को विनय बनाने की शिक्षा देने से मनु की राजनीतिक व्यवस्था निरंकुश नहीं हो पाती I मनु वेन ,नहुष ,सुमुखि ,नेमि ,आदि की तरह अविनयी या सामाजिक दायित्व से विमुख राजा को नष्ट होने की बात स्वीकार करते हैं ७ I
मनु ने दैवी सिद्धांत की व्याख्या करते हुए मध्ययुगीन निबंधकार चंदेश्वर ने कहा है कि ईश्वर ने मात्र किसी एक विशेष राजा का निर्माण नहीं किया अपितु ईश्वर ने प्रजा की रक्षा हेतु तीनों कालों में पाए जाने वाले सभी राजाओं का सृजन या निर्माण किया है I अर्थात सभी कालों में राजा एवं राजपथ दोनों ही ईश्वर कृति होते हैं I यह उल्लेखनीय है कि राजा की दैवी उत्पत्ति का उल्लेख ऋग्वेद, यजुर्वेद ,अथर्ववेद, शतपथ ब्राह्मण, रामायण ,महाभारत आदि ग्रन्थो में भी विभिन्न रूपों में किया गया है I स्पष्ट है कि मनु ने प्राचीन भारतीय परंपरा के प्रकाश में राजा एवं राजपद की उत्पत्ति के दैवी सिद्धांत को स्वीकार है I
आवश्यक एवं व्यक्तिगत गुण
मनु का निर्देश है कि राजा को इंद्र, चंद्र, सूर्य ,अग्नि ,वायु एवं वरुण तथा पृथ्वी नामक देवों के व्रतों अर्थात प्रधान गुणों को धारण करने में समर्थ होना चाहिए I और इसके अनुरूपी आचरण करना चाहिए I राजा को आण्विक्षीकी ,त्रयी ,वार्ता ,तथा दंड नीति नामक विधाओं का ज्ञात होना चाहिए I उसे विद्या आयु एवं तप में अपने से श्रेष्ठ ब्राह्मण का नित्य आदर सत्कार करना चाहिए और उनके निर्देश व अनुशासन में कार्य करना चाहिए I
- राजा को इंद्रियजयी होना चाहिए I इंद्रियों के कूपथ पर ले जाने वाले व्यसनो से बचना चाहिए I मनु का मत है कि राजा को उनके कु प्रभाव से बचना चाहिए I अन्यथा वह विलासी एवं क्रुद्ध बन जाएगा और राजपथ के योग्य नहीं रहेगा I राजा को काम के व्यसनो ८ तथा क्रोध के व्यसनों से बचना चाहिए मनु का मत है कि काम व क्रोध से उत्पन्न व्यसनो का मूल आधार लोभ होता है I
- राजा को अहंकारी नहीं अपितु विनय शील होना चाहिए I जब राजा विनय शील होता है तो वह स्वभाव से ही वेद एवं धर्मग्यों द्वारा स्थापित मर्यादा का पालन करता है I और अनुशासित जीवन व्यतीत करता है I
- यद्यपि मनु ने धर्म नीति एवं धर्म युद्ध की श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया है किंतु इसके साथ ही उन्होंने राजा को देश व काल के अनुसार ऐसी नीति अपनाने की सलाह दी है जो उसे शत्रु पर विजय दिलाने में सहायक हो I मनु के अनुसार राजा का मुख्य कार्य दंड का प्रयोग करना है किंतु यह कार्य वह तभी कुशलता पूर्वक कर सकता है जब वह सत्यवादी हो, धर्म ,अर्थ और काम का ज्ञाता हो ९ I तथा उत्तम सहायकों की नियुक्ति में समर्थ हो I जब राजा शास्त्र अनुसार न्याय पूर्ण दंड से इसका संचालन करने का गुण रखता है तो धन ही न होने पर भी उसके यस में वृद्धि होती है , किंतु ऐसे गुण के अभाव में उसे शुद्ध व नीच बुद्धि राजा के यश में लगातार कमी होती है और उसका विनाश हो जाता है I
राजा के कार्य
मनु ने राजा के कार्यों में अंतर राज्य संबंधों का संचालन, न्याय संबंधी कार्य, ,प्रशासन व्यवस्था का संचालन व नियंत्रण, प्रजा जन की रक्षा करना ,प्रजा पालन एवं प्रजा कल्याण संबंधी कार्य ,समाज व्यवस्था की रक्षा का कार्य ,आर्थिक जीवन का नियमन ,और संचालन बताया है I
राजा की स्थिति
मनु ने राज्य के सातों अंगों में राजा को सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्वीकार है I वस्तुतः राज व्यवस्था में राजा की स्थिति केंद्रीय महत्व की है I राजा का सृजन या निर्माण स्वयं ईश्वर ने आठ प्रमुख देवों के अंशों से किया है I क्योंकि राज्य में एक साथ आठ देवों का निवास होता है I अथवा इनमें से प्रत्येक देव से अधिक महान व शक्तिशाली होता है I मनु ने प्रजाजन को सावधान किया है कि राजा में अग्नि का तेज होता है I अतः उनसे अप्रिय कर एवं अपमानजनक व्यवहार करने वाले व्यक्ति के कुल एवं संपदा का नाश हो जाता है , भले ही राजा उम्र में बालक हो तथा साधारण मनुष्य जैसा दीख पड़ता हो किंतु वास्तव में वह नरदेव होता है १० I प्रजाजन का कर्तव्य कि वे राजा द्वारा निर्धारित धर्म अर्थात कानून का उल्लंघन न करें ११ I
मनुस्मृति में उपलब्ध उपरोक्त विवरण से ऐसा प्रतीत होता है कि राजा को असीमित एवं अनियंत्रित शक्तियां प्राप्त हैं I जिनके आधार पर वह निरंकुश या स्वेच्छाचारी आचरण कर सकता है किंतु वास्तविकता इससे भिन्न है I मनु की राजव्यवस्था में अनेक ऐसे सैद्धांतिक व व्यवहारिक तथ्य हैं जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि मनु का राजा निरंकुश नहीं हो सकता I
मनु ने ऐसे धार्मिक एवं नैतिक विचार दर्शन को प्रस्तुत किया है जो राजा को स्वयं ही निरंकुशता व स्वेच्छाचरित से बचने की प्रेरणा देता है I इसके साथ ही मनु की राजव्यवस्था में ऐसे संस्थागत तत्व भी मौजूद हैं I जो व्यवहार में राजा की स्वेच्छाचारित को सीमित करने में सहायक दीख पड़ते हैं I राजा के दिनचर्या उसे कर्तव्य परायण बनने में मदद देती है तथा स्थानीय प्रशासन की व्यवस्था भी राजा के सत्ता को सीमित रखने में सहायक है I मनु ने ऐसे श्रेष्ठ पवित्र ज्ञानी एवं प्रभावशाली ब्राह्मण वर्ग एवं ऋषि वर्ग का उल्लेख किया है जो प्रजा में दुष्ट राजा की छवि को खंडित करता है, और असंतुष्ट लोक शक्ति का प्रतिनिधित्व भी करने में समर्थ था I इस दृष्टि से मनु ने ऋषियो द्वारा सुरक्षाचारी राजा बेन के वध का उल्लेख किया है I
निष्कर्ष
यह उल्लेखनीय है कि विद्वानों में इस तथ्य पर मतभेद है की मनुस्मृति ने प्रजा को निरंकुश व स्वेच्छाचारी राजा के प्रत्यक्ष विरोध का अधिकार दिया है अथवा नहीं I इस विषय में आनंद भास्कर सालेटोर का मत है कि मनु निसन्देह यह कहा है की प्रजा राजा को सिंहासन से उतार सकती है और उसका वध भी कर सकती है I यदि राजा अपनी मूर्खता से प्रजा को पीड़ित करता है I
संदर्भ ग्रंथ
१-मनुस्मृति -7.17
२-मनुस्मृति -7.15 एवं 22
३-महाभारत शांतिपर्व -68.41-47
४-मनुस्मृति- 7.6
५-मुखर्जी राधा कुमुद- चंद्रगुप्त एण्ड हिज टाइम --राज मंगल पब्लिकेशन- 1953 -पेज -19
६-मनुस्मृति -7.28
७-मनुस्मृति- 7.39
८-शिकार खेलना ,चौपड़ खेलना ,जुआ खेलना ,दिन में सोना ,काम .,तथा सुनना या दूसरों की निंदा करना, स्त्रियों का अत्यधिक संगत, विभिन्न मादक द्रव्यों का सेवन ,गाने बजाने व नाचने में स्वयं भाग लेना ,अथवा इन कार्यों को करना ,तथा निरुद्देश्य भ्रमण करना I
९-मनुस्मृति -7.110- 140
१०-मनुस्मृति -7.8
११-मनुस्मृति -7. 13 द्रस्टव्य प्रोफेसर सुरेंद्र कुमार वही पृष्ठ 292
Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.
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