पुराणों में जल संचय और जलसंरक्षण: Difference between revisions

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Authored by संस्कृति तिवारी, बी. ए. तृतीय वर्ष, मेंटर  प्रधान अनुसंधानकर्ता (PI)- डॉ. मीनू अग्रवाल, एसोसिएट प्रोफेसर, सदनलाल सांवलदास खन्ना महिला महाविद्यालय, संघटक महाविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज  
Authored by संस्कृति तिवारी, बी. ए. तृतीय वर्ष, मेंटर  प्रधान अनुसंधानकर्ता (PI)- डॉ. मीनू अग्रवाल, एसोसिएट प्रोफेसर, सदनलाल सांवलदास खन्ना महिला महाविद्यालय, संघटक महाविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज  


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Latest revision as of 11:18, 20 August 2024

जलके अभाव में सृष्टि की कल्पना ही नहीं की जा सकती हैं आज पानी की कमी न केवल भारत के लिए अपितु विकसित देशों के लिए भी गंभीर समस्या है। पोखरे तालाब पाटे जा चुके हैं, वर्षा का जल बेकार चला जाता है। हमारे पुराने ग्रन्थ जल की निरन्तर उपलब्धता के लिए सुझाव देते रहे। भारत के पुरातन पुराण साहित्य में संवाद और आख्यान के माध्यम से जल की महत्ता बताई गई है।पद्म, भविष्य और नारद पुराणों के आधार पर जल का महत्व पुराने जलाशयों का पुनरूद्धार,जलाशयों के निर्माण का महत्व,जलाशय को सदानीरा रखना, तडाग आदि के निर्माण का निर्धारित मान से सम्बन्धित पुराण के विवरणों को इस लेख में प्रस्तुत किया गया है।इन पुराणों के गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित हिंदी अनुवाद को आधार बनाया है कुछ उल्लेखों को संस्कृत पाठ के आधार पर सन्दर्भ देने का प्रयास किया गया है

Overview

·     भूमिका

·     वृष्टि और जल

·     जल का महत्व

·     पुराने जलाशयों का पुनरूद्धार

·     जलाशयों के निर्माण का महत्व

·     जलाशय को सदानीरा रखना

·     तडाग आदि के निर्माण का निर्धारित मान

·     टिप्पणी

·     सन्दर्भ ग्रन्थ


  भूमिका- जल के महत्व पर रहीमदास का प्रसिद्ध दोहा है-‘रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून’। जलके अभाव में सृष्टि की कल्पना ही नहीं की जा सकती हैं आज पानी की कमी न केवल भारत के लिए अपितु विकसित देशों के लिए भी गंभीर समस्या है। पोखरे तालाब पाटे जा चुके हैं, वर्षा का जल बेकार चला जाता है। हमारे पुराने ग्रन्थ जल की निरन्तर उपलब्धता के लिए सुझाव देते रहे। भारत के पुरातन पुराण साहित्य में संवाद और आख्यान के माध्यम से जल की महत्ता बताई गई है। निर्जन प्रदेश में भी राहगीरों को जल मिलता रहे इसके लिए वापी, कूप या तडागों के निर्माण पर जोर दिया जाता रहा है। पुराण साहित्य में जल की महत्ता, जल संचय के लिए तालाब, पोखरे आदि बनवाने के महत्व और उसे सदैव जल युक्त बनाए रखने का आहवान कथाओं या धार्मिक पाप पुण्य की भावना के माध्यम से किया गया है।


वृष्टि और जल-

विष्णुपुराण में बताया गया है कि ‘‘अन्न को उत्पन्न करने वाली वृष्टि ही सबको धारण करती है। उस वृष्टि की उत्पत्ति सूर्य से होती है।’’(1) पुनः कहा गया है कि ‘‘सूर्य आठ मास तक अपनी किरणो से छ रसों से युक्त जल को ग्रहण करके उसे चार महीनों में बरसा देतें हैं उससे अन्न की उत्पत्ति होती है।’’(2)‘‘जो जल मेघों द्वारा बरसाया जाता है वह प्राणियों के जीवन के लिए अमृत रूप होता है और औषधियों को पोषण करता है।’’(3)


जल का महत्व-

पद्म पुराण सृष्टि खण्ड के अध्याय 28 में जल का महत्व इसप्रकार कहा गया है- ‘जल से खेती होती है, जिससे मनुष्यों को प्रसन्नता होती है,जल के बिना प्राणों को धारण करना असम्भव है, पितरों को तर्पण, शौच, सुन्दर रूप तथा दुर्गन्ध का नाश - ये सब जल पर ही निर्भर है। संग्रह किए हुए बीजों का आधार जल ही है। कपडे धोना और बर्तनों को चमकीला बनाना जल के ही अधीन है। प्रत्येक कार्य में जल पवित्र माना गया है। अतः सारा बल लगा कर बावली, कूप तथा पोखरा बनवाना चाहिए।’’(4)

जलाशयों का पुनरूद्धार-

प्रायः पुराने जलस्रोत सूख जाते है या पुराने तालाबों को पाट कर बडे बडे भवन बना दिए जातें हैं जिससे जल संरक्षण के स्रोत तालाबों, पोखरों का नामों निशान नही रहता। जल संरक्षण की दिशा में पुराने सूख चुके या निष्क्रिय तालाबों को चिहिनत करके उन्हें पुनर्जीवित करने की जरूरत है। इस दिशा में नारद पुराण में एक आख्यान के माध्यम से शिक्षा मिलती है जिसका उपयोग आज के सन्दर्भ में उपयोगी हो सकता है। नारद पुराणोक्त आख्यान के अनुसार एक बार राजा वीरभद्र अपने मंत्रियों के साथ शिकार खेलने वन गए। दोपहर तक थक कर शिखर पर एक छोटी सी सूखी पोखर-सरसी दिखी जिसे एक हाथ खोदने पर ही जल मिल गया, जिसे पीकर उन्होने प्यास बुझाई। अपने मंत्री के सुझाव पर राजा ने उस पोखरे के आसपास बांध बनवा दिया जिससे पक्का जलाशय बनकर तैयार हो गया। उस पोखर के पुराने इतिहास को भी पुराणकार बताता है कि सैकतगिरि के इस शिखर पर लावक चिडिया ने अपनी चोंच से दो अंगुल भूमि खोदी थी, वराह ने अपने थुथुन से एक हाथ और गडढा बना दिया, तब से इस गडढे में पानी रहने लगा, उसके बाद काली नामक एक पक्षी ने उसे दो हाथ खोद कर गहरा कर दिया, तब उस गडढे में दो माह तक जल रहने लगा।और छोटे जीव व प्राणी दो महने तक उस गडढे में इकटठे जल को पीते रहे इसके तीन वर्ष बीतने पर एक हाथी ने उसे तीन हाथ और गहरा कर दिया अब उसमें तीन माह तक पानी रहने लगा। और तीन महीने तक जंगली पशुओं की प्यास बुझती रही। परन्तु बाद में वह गडढा सूख गया जिसे राजा वीरभद्रक ने देखा और एक हाथ और खोद कर उसके जल से उनके अनुचरों ने प्यास बुझाई।उसके पश्चात मंत्री बुद्धिसागर के सलाह पर उसको पचास धनुष लम्बा और उतना ही चौडा खुदवा दिया जिससे वह झील के रूप में परिणत हो गया। पुनः पत्थरों से चारों ओर बांध देने के कारण वह एक बडा सरोवर बन गया। और उसके किनारे वृक्ष भी लगवा दिए। इस कार्य से राजा वीरभद्रक और उनका मंत्री बुद्धिसागर को पुण्य प्राप्त हुआ।’’(5) कहने का तात्पर्य यह है कि जो जलस्रोत सूख चुके है उन्हें चिहिनत कर पुनः जलाशयों का पुनः उद्धार करना चाहिए जिससे जन रहित क्षेत्र में भी जल की उपलब्धता बनी रहे।

जलाशयों के निर्माण का महत्व-

प्रायः पुराने जलस्रोत सूख जाते है या पुराने तालाबों को पाट कर बडे बडे भवन बना दिए जातें हैं जिससे जल संरक्षण के स्रोत तालाबों, पोखरों का नामों निशान नही रहता। जल संरक्षण की दिशा में पुराने सूख चुके या निष्क्रिय तालाबों को चिहिनत करके उन्हें नारद पुराण में जल संग्रह के सन्दर्भ में जलाशयों के निर्माण के महत्व को धर्म के आलोक में बताया गया है कि ‘‘जो स्वयं या दूसरे के द्वारा तालाब बनवाता है उसके पुण्य की संख्या बताना असम्भव है। यदि एक राही भी उस पोखरे का जल पी ले तो उसके बनाने वाले व्यक्ति के सब पाप नष्ट हो जातें हैं। जो मनुष्य एक दिन भी भूमि पर जल का संग्रह एवं संरक्षण कर लेता है वह पाप मुक्त हो जाता हैं जो अपनी शक्ति भर तालाब खुदवाने में सहायता करता है वह भी पोखरे बनाने का पुण्यफल पा लेता है।’’(6) यह भी कहा गया है कि जो सरसों बराबर मिटटी भी तालाब से निकाल कर बाहर फंकता है वह पाप मुक्त होता है यह सनातन श्रुति है।(7) अर्थात् तालाब बनवाने, उसे जलयुक्त रखने, भूमि पर जल का संग्रह करने, पोखरे से मिटटी निकालते रहने का निर्देश नारद पुराण में हैं।

नारद पुराण के 13वें अध्याय में कहा गया है कि ‘कासार’ यानि कच्चे पोखरे, बनाने पर ‘तडाग’ यानि पक्के पोखरे बनाने की अपेक्षा आधा फल मिलता है, ‘वापी’ बनाने पर पदमयुक्त सरोवर बनाने के बराबर फल मिलता है, ‘कुल्या’ यानि नहर निकालने पर वापी की अपेक्षा सौगुना अधिक फल मिलता है। धनी व्यक्ति द्वारा तडाग का निर्माण और दरिद्र व्यक्ति द्वारा कुऑ बनवाना दोनो का फल बराबर है, वैसे ही जैसे एक धनी व्यक्ति एक नगर का दान करे और गरीब एक हाथ भूमि दे जो इन दोनो का दान समान फलदायी होता है।(8)

जलाशय को सदानीरा रखना-

पद्म पुराण के ही उत्तरखण्ड के अध्याय 153 में कहा गया है कि ‘‘जिसके पोखरे में गर्मी के समय तक पानी ठहरता है उसे कभी भी विषम संकट का सामना नही करना पडता। जिसके पोखरे में वर्षा ऋतुमें ही जल रहता है उसे अग्निहोत्र का फल मिलता है, जिसके तालाब में हेमन्त और शिशिर काल तक जल ठहरता है उसे गोदान का फल मिलता है, यदि बसन्त और ग्रीष्म ऋतु तक पानी रूकता है तो उसे अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है’’(9) पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड अध्याय 28में एक कथा के माध्यम से यह बताने की चेष्टा की गई है कि जलाशय अमूल्य है, जिसे धन से भी नही खरीदा जा सकता है। कहानी के अनुसार किसी धनी के पुत्र ने दस हजार सोने की मुहर व्यय करके जलाशय बनवाया था। कुछ समय बाद जब वह निर्धन हो गया तब किसी ने उस जलाशय को खरीदने के लिए दस हजार स्वर्ण मुद्राएं देने का प्रस्ताव रखा लेकिन जलाशय निर्माता ने यह कह कर उसकी बात ठुकरा दी कि इस मूल्य के बराबर पुण्य तो मुझे इस जलाशय से रोज प्राप्त हो रहा है।’’(10) इसी पुराण में यह भी कहा गया है कि नष्ट होते हुए जलाशय को खुदवाकर उसका पुनः उद्धार करना चाहिए।(11)


तडाग आदि के निर्माण का निर्धारित मान

भविष्य पुराण के अनुसार एक सहस्र हाथ वाला तडाग उत्तम माना गया है चार सौ हाथ का तडाग मध्यम बताया गया है और तीन सौ हाथ का तडाग कनिष्ठ बताया गया है। यह भी कहा गया है कि कलियुग में इसके आधे मान का और आधे के आधे मान के तडाग भी बनाए जा सकतें हैं (12) पुष्करिणी का मान दो सौ हाथ कहा गया है। तालाब के किनारे की भूमि दुगुनी होनी चाहिए और उसके मान के आधे भाग के बराबर गडढा खोदना चाहिए -‘ पुष्करिणीपक्षे द्वे शते मानमुत्तमम्’(13)। नलिनी को अस्सी हाथ के मान वाली कहा गया हैउसके निर्माण में जरूरत के अनुसार पांच हाथ कम कर सकतें हैं।(14)  गृहबावली चौसठ हाथ की बनानी चाहिए। उसे प्रारम्भ में चार हाथ कम कर सकतें है, उसके लिए गडढे का कोई मान नही बताया गया है (15)

Lokprayojan आज जब पानी के स्रोत सूख चुके है, जल संकट बढ गया है, भूसतह का जल स्तर कम हो गया है। तालाबों को पाटकर कंक्रीट के शहर बसाए जा रहें है। नदियों का जल प्रदूषित हो चुका ह।ै ऐसे में जल को सहेजने की जरूरत है। भारत के पास जल संरक्षण की परम्परागत विधियांे हैं उनका उपयोग किया जाना चाहिए। परम्परागत तकनीकों में प्राचीन ग्रन्थों में कूप, बावली, सरोवर, तालाब आदि बनवाने, उसे सदानीरा रखने के निर्देश है और उसे पाप पुण्य की भावना से जोडा गया है। वर्तमान समय में जल संरक्षण में भारतीय ज्ञान की परम्परा में निहित सन्देश और कार्य कलाप अत्यन्त प्रासंगिक है।


टिप्पणी-

‘सरसी’ का अर्थ छोटा ताल, छोटा सरोवर, तलैया, पुष्करिणी,बावली होता है।‘कासार’ का अर्थ छोटा तालाब, झील या ताल होता है,‘तडाग’ जलाशय या तालाब या कुंड को कहतें हैं, ‘वापी’ में जल तक पहुचने के लिए सीढियॉ बनी होती है वापी एक प्रकार का छोटा तालाब होता है, ‘कुल्या’ से तात्पर्य छोटी नहर या कृत्रिम नदी लिया जाता है।

इसी तरह चौबीस अंगुल का एक हाथ होता है। छियानबे अंगुल का एक धनुष होता है।  इस हिसाब से चार हाथ का एक धनुष होगा। पचास धनुष का मान 200 हाथ का  होगा।


सन्दर्भ ग्रन्थ -

श्रीश्रीविष्णुपुराण, गीताप्रेस गोरखपुर,

वृहन्नारदीय पुराण, पुर्वभाग, तारणीश झा द्वारा सम्पादित

नारदीय महापुराण, खेमराज श्रीकृष्णदास मुम्बई, पूर्वभाग, प्रथम पाद, अध्याय 12 एवं 13,

पद्म पुराण, गीताप्रेस गोरखपुर, हिंदी अनुवाद, सृष्टि खण्ड तथा उत्तर खण्ड

भविष्य महापुराण, द्वितीय खण्ड, हिन्दी साहित्य सम्मेलन,प्रयाग

सन्दर्भ

(1) विष्णुपुराण, द्वितीय अंश, अध्याय 9,22,

(2) विष्णुपुराण, द्वितीय अंश, अध्याय 9,8,

(3) विष्णुपुराण, द्वितीय अंश, अध्याय 9,18,

(4) संक्षिप्त पद्म पुराण, सृष्टिखण्ड, गीताप्रेस, गोरखपुर,

(5) वृहन्नारदीय पुराण, पूर्वभाग, 12,86-97

(6) वृहन्नारदीय पुराण, पूर्वभाग, 12,54-57

(7) वृहन्नारदीय पुराण, पूर्वभाग, 12,54-58

(8 )वृहन्नारदीय पुराण, पूर्वभाग, 13,13-17,

(9) संक्षिप्त पद्म पुराण, उत्तरखण्ड, अध्याय 153, पृष्ठ 554, गीताप्रेस, गोरखपुर,

(10) संक्षिप्त पद्म पुराण, सृष्टिखण्ड, गीताप्रेस, गोरखपुर,

(11) संक्षिप्त पद्म पुराण, सृष्टिखण्ड, गीताप्रेस, गोरखपुर,

(12)  भविष्यपुराण, मध्यमपर्व, प्रथमभाग, 10,26-29

(13) भविष्यपुराण, मध्यमपर्व, प्रथमभाग, 10,29,

(14) भविष्यपुराण, मध्यमपर्व, प्रथमभाग, 10,32,

(15) भविष्यपुराण, मध्यमपर्व, प्रथमभाग, 10,,34

Authored by संस्कृति तिवारी, बी. ए. तृतीय वर्ष, मेंटर प्रधान अनुसंधानकर्ता (PI)- डॉ. मीनू अग्रवाल, एसोसिएट प्रोफेसर, सदनलाल सांवलदास खन्ना महिला महाविद्यालय, संघटक महाविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज

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