कामन्दकीय नीतिसार में राजनीतिक विचार: Difference between revisions

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Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.  
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Latest revision as of 17:12, 18 September 2024

दूत- कौटिल्य ने दूत को राजा का मुख कहा है I कामन्दक उसको विशेष चर मान का प्रकाशचर कहता हैI  दूत में सामान्य गुणों के साथ विशेष योग्यताएं भी आवश्यक है I उसको प्रगल्भ , वाक्पटु, शास्त्र ,और शास्त्रों का ज्ञाता और कार्य पारायण होना चाहिए I १ उसके अंदर अमात्य के सभी योग्यताओं का होना आवश्यक हैI  कौटिल्य के समान कामंदक ने भी दूतों के तीन भेद किए हैं- निसृष्टार्थ, मितार्थ ,और शासन वॉहक, परंतु कौटिल्य के समान उसने उनके अधिकार क्षेत्र की सीमाएं स्पष्ट नहीं किI  संभवत यह कौटिल्य के निसृष्टार्थ परिमितार्थ और शासनहर के तुल्य रही होगी I दूत का प्रथम कर्तव्य अपने स्वामी के संदेशों को पर राज्यों में ले जाना है I वह वहां अपने राजा के प्रताप को स्थापित करता है I वह पर राज्यों की स्थिति से और बल अबल से अपने राजा को परिचित रखता हैI  इसके अतिरिक्त वह पर राज्यों के कर्मचारियों को अपनी ओर मिलने का प्रयास भी करता हैI  वह पर राज्यों द्वारा भेजे गए गुप्तचारों को भी जानने का प्रयास करता है I दौत्य कार्य के लिए  कामंदक ने विशेष सावधानियों का कथन किया है बिना अनुमति के वह पर राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता I वह अपने राजा की दुर्बलता को प्रकट नहीं होने देता और दूसरों के मनोभावों को जान लेता है I वह लोभ और काम से दूर रहता है I और समय को भाप कर तुरंत ही अपने देश में आ जाता हैI अन्य राजशास्त्रियों के समान कामंदक ने दूत की आवश्यकता के सिद्धांत को स्वीकार करता हैI  

चर- भारतीय राजशास्त्रियों ने आंतरिक तथा अन्य देशों की घटनाओं को गुप्त रूप से जानने के लिए चरों की नियुक्ति का उपदेश दिया है I चर रूपी चक्षुओं  द्वारा राजा दूर और समीप की सभी घटनाओं को जान लेता है I २ कामंदक ने चर की विशेष योग्यताओं का निर्धारण किया है I उसको तार्किक, मनोवैज्ञानिक, स्मरणशील, पराक्रमी मृदुभाषी ,परिश्रमी, क्लेशसह ,व्यवहार कुशल ,और प्रति उत्पन्नमति होना चाहिए I ३ कामंदक ने कौटिल्य के समान और उससे मिलते-जुलते अनेक नाम तथा भेद चरों के लिखे हैं I तीक्षण, प्रवृ, जिक ,सत्री ,विषद ,धूर्त, लिंगिन् ,पण्यशिल्पजीवी, आदि I इसके साथ ही उसने इसका वर्गीकरण भी किया है I यह वर्गीकरण कार्यों के अनुसार हैI  चरों का कर्तव्य है कि वे सभी समाचारों को लेते हुए सभी दिशाओं में विचरण करें I वे पक्षपात तथा पर पक्ष की स्थिति का बोध अपने स्वामी को कराए I  ४ ये चर अनेक रूप धारण करके घूमते हैं तथा गोपनीय विषयों का पता लगाकर अपने स्वामी के पास समाचार भेजते रहते हैं I इस प्रकार चार चक्षु राजा सोते हुए भी जागता रहता है  I

कोष-  राज्य के सात अंगों में कोष का बहुत महत्व है I राज्य के सभी कार्य सेतुबंध ,वाणिज्य ,व्यापार, प्रजा ,और मित्रों का संग्रह ,और त्रिवर्ग कोष द्वारा ही सिद्ध होता है I ५ राजा को सर्वप्रथम कोष का  चिंतन करना चाहिए I  परंतु कोष का अपार्जन धर्म के अनुसार होना चाहिए I इस संबंध में निम्न तथ्य ज्ञातव्य हैं-

आय के साधन-  कामंदक ने राजकीय आय  के विभिन्न साधनों का वर्णन किया है I इस संबंध में उसने कौटिल्य का अनुसरण करके अन्य भी अनेक साधन बताए हैं  I इनमें मुख्य हैं कृषिकर, वाणिज्य, पथकर ,दुर्गकर ,सेतुकर ,कुंजरबन्धनकर, हाथियों के पकड़ने और बेचने पर कर ,खनिकर, आकर, और शून्य निवेशकर ,परती भूमि को बसाने से होने वाली आमदनी I

कोष संचय हेतु कामंदक का कथन है कि कोष का संचय जन कल्याण के लिए होता है I इसके साधु वृत्ति से एकत्रित करना चाहिए I असाधु वृत्ति से नहीं I इसके लिए निम्न हेतु कामंदक ने स्वीकार किए हैं प्रजा पोषण ,व्यापार, विकास ,प्रजापरित्राण, उपकार ,दुष्ट ,शोषण,I

व्यय के मार्ग- कोष का संचय राज्य के विविध कार्यों के लिए किया जाता है I धर्म की स्थापना, आर्थिक समृद्धि के उपाय ,राज कर्मचारियों के वेतन ,आपातकाल को दूर करना ,आदि कार्यों के लिए कोष के व्यय को कामंदक ने समुचित कहा है  I ६

कोष के व्यसन-  कामंदक ने कोष के व्यसनों को परिभाषित किया है I इसमें राजकोषक क्षीण होता है I यह व्यसन इस प्रकार हैं- अधिक व्यय ,परीक्षित कोष का विखरा होना ,कोष का भक्षण किया जाना , कर एकत्रित न होना ,I और स्वामी से दूर होना राजकोष को इन व्यसनों से दूर होना चाहिए I राजा को चाहिए कि कोषागार की नित्य परीक्षा करें और अधिक व्यय न करें  I ७

न्याय पद्धति-  कामंदक ने समुचित दंड व्यवस्था का प्रतिपादन किया था I दंड के योग्य व्यक्ति को दंडित करके राजा प्रजा की रक्षा करता है I तीक्ष्ण दंड देने से प्रजा विरक्त हो जाती है  I विरक्त प्रजा निश्चय ही शत्रुओं से मिल सकती है I  अतः यथा विधि दंड का विधान करने वाला त्रिवर्ग को प्राप्त करता है I परंतु राजा को यह ध्यान रखना चाहिए कि दंड के भय से ही प्रजा नियमों का पालन करती है I

राष्ट्र-  कामंदक ने राष्ट्र के तीन तत्व प्रतिपादित किए हैं I भूमि निवासी और शासन व्यवस्था भूमि को उर्वर प्रचुर शक्तियों को उत्पन्न करने वाली ,जल की सुविधा से संपन्न ,राजमार्गों से विभूषित, विविध व्यापारों से समृद्ध खनिजों और वन्योपज से युक्त होना चाहिए I राष्ट्र के निवासी देश प्रेम ,शत्रु द्वेषी, क्लेशसह ,धार्मिक और धनी हो I यहां उत्तम कोटि के कृषक व्यापारी और शिल्पी हो ,आजीविका के लिए वह स्वावलंबी हों I शासन को भी सुव्यवस्थित होना चाहिए I

राष्ट्र के व्यसन-  कामंदक ने राष्ट्र के व्यसनों की गणना की है I यह वस्तुतः आपत्तियां है और इस प्रकार हैं -अतिवृत्ति ,अनावृति ,चूहों की अधिकता ,शलभ तोतों का आधिक्य , असम्यक कर ,असम्यक, दंड ,शत्रु ,राजा, चोर, राजबल की क्रूरता, व्याधियों का प्रकोप, पशुओं की महामारी आदि I  ८ राजा को चाहिए की प्रजा की इनसे रक्षा करें I

दुर्ग-  राज्य के सात अंगों में रक्षा की दृष्टि से दुर्ग महत्वपूर्ण है राष्ट्र भूमि के दो महत्वपूर्ण मुख्य भाग हैं पुर और जनपद पुरों का निवेश दुर्गों के अंदर किया जाता है राजा की राजधानी का निर्माण भी दुर्गा के रूप में होता है कामंदक का कथन है कि दुर्ग को विशाल सीमा वाला गहरी खाई और ऊंचे प्रकार से परिवेष्टिव गोपुर से युक्त वर्तन नदी गहनवन के समीप धन-धान्य और जल से समृद्ध तथा आयुधों एवं यंत्रों से संपन्न होना चाहिए वहां वीर योद्धा नीति निपुण मंत्री और शास्त्रों के ज्ञाता आचार्य रहे कामंदक ने पांच प्रकार के दुर्ग कहे हैं जल दुर्ग पर्वत दुर्ग वृक्ष दुर्ग ऊसर भूमि दुर्ग और मरुभूमि दुर्ग ९ यह दुर्ग व्यसनों से रहित होने चाहिए दुर्ग के व्यसन है यंत्रों, परिखा ,और प्रकार का छिन्न होना शास्त्रों का अभाव, वस्त्र ,ईंधन ,अन्न का क्षीण होना , राजा का कर्तव्य है कि दुर्ग को व्यसनों से बचाए I

शक्ति-  राज्य के संचालन के लिए कौटिल्य का अनुकरण करते हुए कामंदक ने तीन शक्तियों को कहा है -प्रभु शक्ति, मंत्र शक्ति ,और उत्साह शक्ति I इन शक्तियों से संपन्न राजा विजय को प्राप्त करता है I १०

सेना-  राजा का बल उसकी सेना है I यह राजा और राज्य की रक्षा करती है I सेना के संबंध में मुख्य तत्व निम्न है I कौटिल्य के समान कामंदक ने भी छः प्रकार की सेना कही है –मौलबल, भूत बल, श्रेणी बल, सुहृदबल ,द्विषद्बल, और आटविकबल I इनमें उत्तर की अपेक्षा पूर्व बल अधिक महत्व रखता है I ११ कामंदक के अनुसार सेना के चार प्रमुख अंग हैं I पदाति, अश्व ,गज, और रथ I वे षडंग बल का भी उल्लेख करते हैं I पदाति ,अश्व ,रथ, मंत्र, और कोष I उन्होंने नौसेना का भी उल्लेख नहीं किया है I सेना के संचालन के लिए अनेक छोटे-बड़े पदाधिकारी होते हैं I जिनमें निम्न मुख्य हैं –सेनापति, बलमुख्य, सेनांगपती, कुमार ,नायक ,I कामंदक ने सेना के व्यसनों का विस्तार से वर्णन किया है I उसने व्यसनों के शमन के हेतु उपाय भी कहे हैं  I इसका सेवन करने से सेना व्यसनों से मुक्त हो जाती है I

षाड्गुण्य-  भारतीय राज्यशास्त्र में षाड्गुण्य का बहुत महत्व है I कामंदक ने इसका विस्तार से वर्णन किया है I और इसके अनेक भेद भी कहे हैं I संधि, विग्रह, यान ,आसन, संश्रय ,द्वैधीभाव I यह छ गुण है किस समय किस गुण का आश्रय लेना चाहिए उन परिस्थितियों का कामंदक नीतिसार में निर्देश है I इन 6 गुणों का संक्षिप्त परिचय कामंदक के अनुसार निम्न है-

१-संधि-  बली शत्रु से आक्रांत होकर निरुपाय राजा को संधि का आश्रय लेना चाहिए I संधि के 16 भेद होते हैं I १२ कपाल, उपहार, संगत ,संतान ,उपन्यास ,प्रतिकार ,संयोग, पुरुषान्तर ,अदृष्टनर आदिष्ट, आत्मभिष ,उपग्रह ,परिक्रम ,अच्छिन्न ,परिदूषण ,और स्कन्धोपनेय I

२-विग्रह-  परस्पर उपकार में संलग्न होना विग्रह है I यह व्यवस्था में भी होना चाहिए युद्ध करने की मूर्खता किसी को भी नहीं करनी चाहिए I जब अपना प्रकृति मंडल अनुरक्त और संपन्न हो और शत्रु का विपरीत हो तभी विग्रह का आश्रय लेना उचित है I १३ कामंदक ने विग्रह गुण  की परिभाषा ,लक्षण,  कारण, वैर ,भेद ,विग्रह, विषय, फल, मान्य ,विग्रह, दुसाध्याय, शत्रु, इन सब का विस्तृत निरूपण किया है I

३-यान-  राजाओं की विजय शालाएँ यान  हैं I एक राजा द्वारा दूसरे राजा पर चढ़ाई करना यान है I कामंदक ने यान के पांच प्रकार कहे हैं- विग्रह, यान ,संध्यानयान ,सम्भूययान, प्रसह्ययानसंभाव्य, और उपेक्षायान I

४-आसन-  अपनी सामर्थ्य को नष्ट न करके उचित अवसर की प्रतीक्षा में चुपचाप बैठे रहना आसान है I कामंदक ने आसन के पांच भेद किए हैं-विग्रह, आसान, संध्या, आसन, सम्भूयासन प्रसंगासन ,और अपेक्षासन I

५- द्वैधीभाव-  कामंदक का कथन है कि शत्रु के प्रति वाणी द्वारा आत्म समर्पण करके भी काकवृत्ति को धारण करना और किसी का विश्वास नहीं करना द्वैधीभाव है I यह दो प्रकार का है -स्वतंत्र और परतंत्र I

६-आश्रय-  बलवान शत्रु से आक्रांत होने पर कुलीन चरित्रवान सत्यशील बलवान और श्रेष्ठ राजा का आश्रय लेना आश्रय गुण है I मनु और कौटिल्य इसको संश्रय कहते हैं I आश्रयदाता राजा के प्रति प्रीति  प्रदर्शित करनी चाहिए तथा उसके मन के अनुकूल आचरण करना चाहिए I

उपाय-  भारतीय राजशास्त्र में चार उपायों साम, दान , भेद ,और दंड का बहुत महत्व है I कामंदक ने भी उपायों के सम्यक प्रयोग पर बहुत बल दिया है I प्राचीन आचार्य ने उपाय के चार भेद कहे हैं I परंतु कामंदक सात उपायों का वर्णन करते हैं I साम ,दान, भेद, दंड ,माया ,उपेक्षा ,और इंद्रजाल I इसका संक्षिप्त परिचय निम्न है-

१- साम-  शत्रु अथवा बिगड़े मित्र को आश्वासन देना समझ बूझाकर अपने अनुकूल कर लेना साम हैI  इसके पांच भेद हैं- परस्परोपकार,  परस्पर गुण ,कर्म, प्रशंसा ,परस्पर संबंध का कथन, भविष्य के कार्यक्रम का कथन और मधुर वाणी में समझाना I

२-दान-  शत्रु अथवा बिगड़े मित्र को आश्वासन देना भूमि तथा धन-धान्य आदि देकर अपने अनुकूल करना दान है I कामंदक ने इसके भी पांच भेद किए हैं -देय वस्तु को यथा योग्य लौटा देना ,ली गई वस्तु को उसी को दे देने का समर्थन करना ,अपनी ओर से भूमि और धन को देने का कार्य करना ,शत्रु राजा द्वारा स्वयं ली गई वस्तु का अनुमोदन करना ,लूट में प्राप्त धन में से कुछ छोड़ देना और कुछ को ग्रहण करना I

३-भेद-  अपने शत्रु तथा मित्र राजाओं में फूट डालना भेद उपाय है I कामंदक ने इसको तीन प्रकार का कहा है I शत्रु के स्नेही जनों में परस्पर फूट उत्पन्न करने का प्रयास करना I शत्रु में संघर्ष उत्पन्न करना अर्थात शत्रु के मंत्री सेनापति, मित्र, आदि को दृष्टता के व्यवहार के लिए उकसाना ,सन्तर्जन तथा शत्रु और उसके सहायकों में भय उत्पन्न करना I

४-दंड-  शत्रु को दंडित करने के साधनों को अपनाना दंड है I कामंदक ने दंड के तीन भेद कहे हैं -शत्रु का वध करना, शत्रु के धन का हरण कर लेना ,शत्रु को शारीरिक कष्ट देना ,दंड का प्रयोग दो प्रकार से हो सकता है Iप्रकाश दंड और अप्रकाश दंड I

५-माया-  उपयुक्त अवसरों पर शत्रु के नाश के हेतु अपने रूप को छुपा कर माया का आश्रय लेना माया उपाय है I माया के अनेक प्रकार है I जैसे इच्छा अनुसार रूप धारण करना, असमय जल की वर्षा करना ,अंधकार में लीन हो जाना आदि I १५

६- उपेक्षा-  उपकार किए जाने पर भी विशेष परिस्थितियों के कारण जानबूझकर मौन रहना उपेक्षा हैI  इसके तीन भेद हैं  I अन्याय में उपेक्षा करना ,व्यसन में उपेक्षा करना, युद्ध में प्रवृत्त हुए का निवारण न करना I

७-इंद्रजाल-  इंद्रजाल उपाय का प्रयोग शत्रुओं को भयभीत करने के लिए किया जाता है I मेघ वर्षा, अंधकार, अग्नि ,पर्वत ,और अन्य भयानक अद्भुत वस्तुओं का दर्शन कराना ,इंद्रजाल कहलाता है I १६

युद्ध-  कामंदक ने युद्ध को अनिवार्य परिस्थितियों का परिणाम माना है I सभी उपायों के असफल हो जाने पर युद्ध का सहारा लेना चाहिए I युद्ध के संबंध में कामंदक के मंतव्य का संक्षेप निम्न है -युद्ध तीन प्रकार के होते हैं I प्रकाश युद्ध, कूट युद्ध ,और तुष्टिक युद्ध I देश काल और परिस्थितियों के अपने अनुकूल होने पर तथा शत्रु के विपरीत होने पर प्रकाश युद्ध करना चाहिए I विपरीत परिस्थितियों में कूट युद्ध या तूष्णी युद्ध का सहारा लिया जाता है  I प्रकाश युद्ध में नैतिक नियमों का पालन किया जाता है I परंतु रात्रि में सोते हुए सैनिकों का वध करना या असावधान शत्रु का वध करना कूट युद्ध है I १७ कामंदक ने इसको विहित माना है I कूट युद्ध द्वारा शत्रु को निश्चय ही मार डालना चाहिए  I छल ,कपट, द्वारा भय उत्पन्न करना , दुर्गों को ढ़हा देना ,लूटमार, आग लगाना और असावधान शत्रु पर एकाएक आक्रमण करना I यह सभी कूट युद्ध के अंतर्गत है I गुप्त रूप से विष या औषधि का प्रयोग करना गुप्त पुरुषों द्वारा भेद लेना और शत्रु का वध करता तूष्णीक युद्ध है I अपनी सुविधा और शत्रु की विपत्ति का  समय देखकर युद्ध के हेतु आक्रमण करने का निर्देश कामंदक ने किया है I शत्रु के राज्य में विजय की कामना से प्रवेश करना चाहिए I कामंदक ने युद्धाभियान के तीन प्रकार के मार्ग कहे हैं –सम, विषम ,और निम्न I सम भूमि में अश्व सेना का और विषम भूमि में गज सेना का अधिक महत्व हैI  युद्ध काल में अपना पक्ष प्रबल होना चाहिए I यह सात प्रकार का है- स्वपक्ष, मित्रपक्ष ,संबद्धपक्ष, कार्य द्वारा प्राप्त पक्ष, नव उत्पन्न पक्ष, समान आश्रित का पक्ष और उपचारों द्वारा गृहितपक्ष I १८ युद्ध जन्य परिस्थितियों में कामंदक ने तीन प्रकार के कोप कहे हैं I आभ्यंतर वाह्य और देव I इनमें आभ्यंतर कोप सबसे अधिक भयावह है सीमारक्षकों का कोप वाह्य है I अग्नि ,जल ,व्याधि, दुभिक्ष ,महामारी ये सब दैव प्रकोप है I राजा को तुरंत ही उनके संबंध के उपाय करने चाहिए I युद्ध में सैनिकों की दृष्टि अवरुद्ध करने के लिए कामंदक ने शत्रु पक्ष सात क्षत्रों का उल्लेख किया है I कुहरा, अंधकार गोधूति ,मेघ,पर्वत ,वन ,और नदी I सेनापति को इनसे सावधान रहना चाहिए I कामंदक ने युद्ध काल में सैनिकों के व्यवहार के विशेष निर्देश किए हैं I सैनिक शिविरों में धूत और मद्यपान का निषेध होना चाहिए I

निष्कर्ष-  आयुधों के संबंध में कामंदक ने बहुत कम कहा है I वे विशेष रूप से धनुष बाण ,खड्ग और नलिकास्त्र का प्रयोग बताते हैं I सैनिकों को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष वाद्यों का प्रयोग भी बताया गया है I इनमें दुन्दभी और तुरही मुख्य हैं I १९ व्यूह रचना भारतीय युद्ध पद्धति की विशेष शैली रखी रही थी I कामंदक ने अनेक प्रकार के व्यूहों का वर्णन किया है  I २० धनु, सूची ,दंड, शकट, और मकरध्वज I कामंदक ने राजतंत्र का वैदिक स्वरूप गुप्त काल की राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में पुनः स्थापित किया I अशोक के राजतंत्र के प्रतिवाद में उन्होंने वैदिक राजतंत्र की व्याख्या की I कामन्दक का राजा धर्म का प्रधान नहीं I धर्म के अनुसार कार्य करने वाला कार्यपालिका का प्रधान हैI  उसे धर्म विधि सामाजिक संगठन परंपरा आदि में परिवर्तन करने का अधिकार स्पष्ट नहीं है कि कामंदक ने नियंत्रित राजतंत्र की रूपरेखा अपने नीतिसार में प्रस्तुत की  I

संदर्भ ग्रंथ

१- कामंदक नीतिसार 12.2

२-वही 12.24

३-वही 12.25

४-वही 12.47

५-वही 13.32

६-वही 4.64

७-वही 5.66

८-वही 13.63- 64

९-वही 4.59

१०-वही 15.32

११-वही 18.4

१२-वही 9.2.4

१३-वही 10.27

१४-वही 17.6.7

१५-वही 17.53

१६-वही 18.64.66

१७-वही 18.54

१८-वही 15.28

१९-वही 16.24.19

२०-वही 19.40

Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.

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