कौटिल्य अर्थशास्त्र में सेना: Difference between revisions

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Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.  
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Latest revision as of 17:37, 18 September 2024

सेना के संगठन और भेद-  देश की सुरक्षा के लिए व्यवस्थित सेना का होना अनिवार्य है I प्राचीन भारत में सुन्यवस्थित सैन्य संगठन के विस्तृत प्रमाण उपलब्ध होते हैं I इतिहास के आदिकाल से ही युद्धों की घटनाएं होती रही हैं I ऋग्वेद में आर्य और आर्येत्तर सेनाओं तथा आर्य सेनाओं के स्वयं के मध्य युद्धों के वर्णन हैं  I उत्तरवर्ती काल में आर्य तथा आर्येत्तर सेनाओं के मध्य युद्ध तो नहीं रहे परंतु आर्य सेनाओं में परस्पर युद्ध होते रहे I यह प्रायः राजाओं की अध्यक्षता में लड़े जाते थे राज्य की आय का लगभग आधा भाग सेना पर व्यय हो जाता था  I

सैन्य बल के प्रकार- आचार्य कौटिल्य ने सैन्य संगठन को दो भागों में विभाजित किया है I सांग्रामिक सेना १ सहायक सेना २ I अतः कौटिल्य का सैन्य संगठन अष्टांग बल से संपन्न दृष्टिगोचर होता है I कौटिल्य अर्थशास्त्र में 10 के गुणात्मक आधार पर सेना के संगठन की व्यवस्था की गई है I इसके अनुसार दस सेनांगों  के अधिकारी को पदिक दस पदिकों  अर्थात सौ सेनागों के अधिकारी को सेनापति और दस सेनापतियों अर्थात एक हजार सेनांगो के अधिकारी को नायक कहा गया है ३ I सेनांगों में रथ हाथी घोड़े और पैदल सेना के भी सभी अंग सम्मिलित होते हैं कौटिल्य ने दूसरे स्थान पर एक रथ और एक हाथी के साथ पांच पांच घुड़सवार और प्रत्येक घुड़सवार के साथ तीन पैदल सैनिक नियुक्त करने का उल्लेख किया है ४ I आचार्य कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में संपूर्ण सैन्य बल को युद्धक्षता राष्ट्रभक्ति और विश्वसनीयता के आधार पर छः वर्गों में विभक्त किया है ५ I

१- मौलबल-  कौटिल्य ने मौलबल को स्थल सेना का महत्वपूर्ण अंग माना है I इस सेना में स्थाई प्रवृत्ति के नियमित  युद्ध अभ्यास करने वाले क्षत्रिय स्वामित्व सैनिक रहते थे I यह सेना राजधानी की सुरक्षा के अतिरिक्त महत्वपूर्ण स्थितियों में युद्ध के लिए भेजी जाती थी I

२- भृतक बल-  युद्ध के प्रारंभ होने के समय या युद्ध के दौरान वेतन के आधार पर राजा जिस सेना को अपनी सेवा में लेता है उस सेना को भृतक बल के नाम से संबोधित किया जाता है I सेना के महत्व की दृष्टि से राज्य की सेना में भृत सेना को अद्वितीय स्थान देते हुए कौटिल्य ने कहा है की नित्य समीप रहने और युद्ध के योग्य होने के कारण श्रेणी बल की अपेक्षा भृतक बल श्रेष्ठ है I

३-श्रेणी बल-  श्रेणी  मनुष्यों के उस संघ को कहते हैं जिसमें विभिन्न जातियों के परंतु एक ही व्यवसाय के आश्रित जीविका कमाने वाले लोग होते हैं इस संघ के सदस्यों के अधीन आत्मरक्षा के लिए जो सेना रहती है उसी को श्रेणी बल कहा जाता है I महत्व की दृष्टि से कौटिल्य ने तीसरा स्थान दिया है I श्रेणी बल की उपयोगिता को बतलाते हुए कौटिल्य ने कहा है कि अपने देश के होने तथा राजा तथा श्रेणी दोनों का एक ही स्वार्थ होने के कारण श्रेणी बल श्रेष्ठ है I आवश्यकता पड़ने पर राजा इस श्रेणी बल का भी उपयोग करता है I

४-मित्र बल-  यह सेना मित्र सेना की सेवा से निर्मित होती है जिसे युद्ध के समय आवश्यकता पड़ने पर बुलाया जाता है I

५-अमित्र बल-  यह सेना शत्रु से जीती गई अथवा अन्य किसी प्रकार से वश में की गई शत्रु सेना द्वारा निर्मित होती थी I

६- अटवी बल-  यह सेना वन सेना होती है जो जंगली जातियों के लोगों को एकत्रित कर निर्मित की जाती है I

इसके अतिरिक्त  ओत्साहिक नामक एक सातवीं सेना का भी उल्लेख कौटिल्य किया है I उन्होंने नेतृत्वहीन भिन्न-भिन्न देश में रहने वाली राजा की स्वीकृति या बिना स्वीकृति के ही दूसरे देशों में लूटपाट करने वाली सेना को औत्साहिक  बल कहा है I यह भेद्य ६और अभेद्य ७ दो प्रकार की होती है उक्त सभी वर्गों की सेना में रथ गज अश्व और पैदल शामिल होते हैं I

सेना के प्रमुख अंग-  महाभारत में सेना के आठ अंग कह गए हैं रथ ,गज, अश्व ,पदाति ,नौसेना, श्रमिक ,विशिष्ट, और गुप्तचर ८ I इन्हें पहले चार अंग रथ, गज, अश्व ,और पदाति का युद्ध में सक्रिय महत्व था I नौसेना का प्रयोग उन प्रदेशों में ही हो सकता था जो समुद्र तटवर्ती हो या बड़ी नदियों के निकट स्थित हो सेवा के अन्य अंग अनुसांगी ही थे I उनके अंतर्गत भारवाहक रसद का प्रबंध करने वाले मार्ग तथा पुल बनाने वाले व्यापारी चिकित्सक आदि होते थे I गुप्त चरों का उपयोग शत्रु पक्ष के भेद जानने के लिए किया जाता था I सेना के संगठन की इकाई पत्ती होती थी ९  I

शुक्र के समय सेना में बंदूक और तोप का प्रयोग होने लगा था I उनके अनुसार सेना की एक इकाई में 300 पदाति सैनिक80 आश्वारोही एक रथ दो तोपें 10 ऊंट दो बैलगाड़ी दो हाथी 16 बैल छः लिपि और तीन मंत्री होने चाहिए १० I कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में संग्रामिक बल और सहायक बल के विभिन्न अंगों का विस्तृत वर्णन किया है जो निम्न है -

पैदल सेना -  यह सेना संग्रामिक बल का प्रमुख अंग है I युद्ध क्षेत्र में पैदल ही चलकर रण कौशल दिखाने वाली इस सेना को वेदों में पृतना या पृत कहा गया है बाद में यह पदाति नाम से पुकारी जाने लगी ११ I पैदल सेना को प्रत्येक काल में महत्वपूर्ण माना जाने लगा है I आचार्य कौटिल्य ने कहा है कि पैदल सेना सभी प्रकार के सम  विषम स्थान पर और ग्रीष्म वर्षा शरद आदि सभी ऋतुओं में युद्ध के लिए सदैव तत्पर रहती है १२ I इसलिए पैदल सैनिक की संख्या सर्वाधिक होती है जो चल और हल मुख शास्त्रों से सुसज्जित रहते हैं पैदल सेना के लिए सैनिकों की भर्ती और उनके प्रशिक्षण आदि की व्यवस्था जिस विभाग द्वारा की जाती थी I उसके सर्वोच्च अधिकारी को पत्याध्यक्ष कहते थे १३ I कौटिल्य ने सेना पर उप व्यसनो की भी चर्चा की है I

रथ सेना- लंबी सैनिक  यात्राओं में पैदल सेना की सीमाओं के कारण रथ सेना का विकास हुआ I ऋग्वेद काल में प्रमुखता पैदल और रथ सेना का ही प्रयोग होता था I रथ सेना के युद्ध के लिए निम्नुक्त लक्षणों वाली भूमि को उपयुक्त समझना चाहिए  I समतल दलदल से रहित नितांत ठोस साफ सूथरी और चिकनी घनी बेलों से घिरी हुई खाइयो कंधकों तथा दर्रो दरारें आदि से रहित १४ I

कौटिल्य ने कहा है कि रातों के लिए अपेक्षित अश्वों की न्यूनता की स्थिति में रथों में  अश्वों के स्थान पर बैलों को तथा गजों की न्यूनता में गधों व ऊंट द्वारा खींची जा सकने वाले वाहनों की व्यवस्था करके उनसे काम चलाना चाहिए I कौटिल्य ने 18 प्रकार के रण युद्ध की चर्चा की है उनमें उनके अनुसार 1 से 15 तक गजों के 16 प्रकार के युद्ध में एक उन्मध्यावधान शत्रु सेना को मसल कुचल कर फिर इकट्ठा हो जाना को छोड़कर शेष 15 तथा 16 स्वभूमि अभियान अनुकूल भूमि पर व्यवस्थित होकर शत्रु पर आक्रमण करना 17 अभियान अपयान शत्रु सेना पर आक्रमण कर उसे पराजित करके भाग जाना 18 स्थिति युद्ध सुरक्षित शत्रु सेना के चारों ओर घेरा डालकर उसे युद्ध करना रथ युद्ध होते हैं १५ रथी और सारथी दोनों ही आक्रमणात्मक एवं प्रतिरक्षात्मक शास्त्रार्थों का प्रयोग करते थे I कौटिल्य ने रथ सेना के प्रमुख अधिकारी को रथाध्यक्ष कहा है  I

अश्वारोही सेना-  सेना को गतिशील बनाने में अश्वारोही सेना की विशेष भूमिका रही है I कौटिल्य ने अश्वारोही को सुदृढ़ बनाने पर अधिक बल दिया है I उसकी साम्राज्य विस्तार की भावना में दूरस्थ प्रदेशों की वि जित करने में अश्वारोही  ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है I अश्वारोही के लिए अति उत्तम एवं सर्वथा उपयुक्त भूमि होती है आगे बढ़ाने की अपेक्षा पीछे लौटने में अधिक सुविधाजनक कीचड़ दलदल कंकर कंकरीली मिट्टी व जल से भरे गड्ढो से सर्वथा रहित अर्थात साफ सुतरी १६ I कौटिल्य के अनुसार भूमि निवास तथा वन की सफाई का कार्य पशुओं से लेनी चाहिए I

कौटिल्य ने अश्व युद्धों के 13 प्रकार बताए हैं I कौटिल्य ने अश्वों के प्रशिक्षण देखरेख चिकित्सा भोजन क्रय विक्रय आदि की समुचित व्यवस्था के लिए अलग से विभाग स्थापित किया है I इसके प्रमुख अधिकारी को उन्होंने अश्वाध्यक्ष कहा है १७ I

गज सेना -  प्राचीन काल में गज सेना का बड़ा ही प्रतिष्ठित स्थान रहा है I युद्ध में राजा की विजय मुख्यतः हस्तिसेना पर निर्भर रहती थी I विशालकाय हाथी शत्रु की व्यूह रचना दुर्ग तथा छावनियों का विनाश कर देते थे I वाणने एक स्थान पर हाथियों को फौलादी दीवार बताया है और दूसरे स्थान पर चलता फिरता दुर्ग १८ I कौटिल्य ने कहा है कि गजों के लिए सर्वथा उपयुक्त भूमि है हाथियों के चढ़ सकने योग्य पर्वतों वाली ऊंची नीची गजों को खुजलाने योग्य वृक्षों वाली काटने योग्य लताओं वाली तथा गड्ढों दरारों से सर्वथा रहित गजरोही सैनिकों के लिए धूल कीचड़ पानी नरसल मूंजब नरसल मूंज की जड़ से युक्त गोखरू तथा बहुत बड़े घने वृक्षों से रहित धरती अति उत्तम होती है I कौटिल्य ने 16 प्रकार के गज युद्ध बताए हैं हाथी पर सवार सैनिक तोमर धनुष बाण गदा कृपाण आदि शास्त्रार्थों का प्रयोग करते थे I आचार्य कौटिल्य ने हाथियों के प्रशिक्षण भोजन चिकित्सा अधिकारी का विस्तार से वर्णन किया है गज अध्यक्ष गाजशाला विभाग का सर्वोच्च अधिकारी होता था १९ I

नाविक बल-  प्राचीन समय में नौसेना का संगठन किया गया था I वैदिक साहित्य में विशालकाय नावों का वर्णन है I महाभारतकार ने सेना के अंगों में नौसेना का भी उल्लेख किया है I भारतवर्ष में जिन राज्यों की सीमाएं समुद्र तट तक विस्तृत थी वह नौसेना का संगठन अवश्य करते थे I रघु की दिग्विजय यात्रा में बंग जनपद के राजाओं ने युद्ध में नौकाओं का उपयोग किया था I अभियानों से सेनाएँ नौकाओं द्वारा ही नदियों को पार करती थी I आचार्य कौटिल्य ने नाविक बल का पृथक विभाग बना दिया था I जिसका प्रधान अधिकारी नावाध्यक्ष होता था चतुरंग सेना सैनिक सामग्री तथा गुप्तचर आदि को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने तथा मार्ग की नदियों को पार करने का कार्य नाविक बल करता था २० I इस प्रकार नाविक बल विविध सैनिक कार्यों में सहायता करता था

निष्कर्ष-  कौटिल्य ने सैन्य शक्ति संपन्न राजा के महत्व को दर्शाते हुए कहा है कि ऐसे राजा के मित्र तो मित्र बने ही रहते हैं उसके शत्रु भी मित्र बन जाते हैं I सेना के महत्व को राजनीति के सभी ग्रंथकारों ने स्वीकार किया है I प्राचीन ग्रंथो में इसे प्रमुख स्थान प्राप्त है आचार्य कौटिल्य का कहना है कि कोष सैन्य शक्ति के अधीन रहता है I इसलिए सैन्य शक्ति राज्य व्यवस्था और राज्य की आर्थिक दशा सुधारने के लिए महत्वपूर्ण है I इस संदर्भ में शुक्र नीति में कहा गया है कि जिस राजा के पास नीति और सैन्य बल होता है उसे सब ओर से समृद्धि प्राप्त होती है I


                                              संदर्भ ग्रंथ

१-संग्रामिक सेना में महाकाव्यकाल और पुराण काल की चतुरंगिणी सेना के समान पदाति सेना अश्व सेना रथ सेना गजसेना को सम्मिलित किया गया है

२-सहायक बल के रूप में यह चतुरंगिणी बल की सहायता नाविक बल विशिष्ट बल चरबल और देशिक बल का भी उल्लेख आचार्य कौटिल्य ने किया है

३-भारतीय सैन्य विज्ञान कुलश्रेष्ठ व शर्मा पृष्ठ 271 एवं कौटिल्य अर्थशास्त्र डॉ रघुनाथ सिंह 10.6.45

४-कौटिल्य अर्थशास्त्र डॉ रघुनाथ सिंह 10.5.9.10

५- ऐतेन पत्यध्यक्षो व्याख्यातः समौलभृतश्रोणिमि त्रामित्राटवीवलाना सारफल्गुतां विद्यात -कौटिल्य अर्थशास्त्र 2.33.6

६- भेद्य सेना को शत्रु प्रलोभन देकर फोड़ लेता है

७-अभेद्य सेना अधिक विश्वसनीय होती है

८-महाभारत 12.59.49

९-युद्ध भूमि में सेना को लगाने की विधि

१०-शुक्र नीति सार 4.7.2 22- 23

११-कौटिल्य अर्थशास्त्र 10.4

१२-कौटिल्य का युद्ध दर्शन डा० लल्लन सिंह पृष्ठ 146

१३-पूर्ववत 10.4

१४-कौटिल्य अर्थशास्त्र 10.4.3

१५-कौटिल्य अर्थशास्त्र 10.5.26

१६-कौटिल्य अर्थशास्त्र 10.4.7

१७-कौटिल्य अर्थशास्त्र 2.30

१८-कौटिल्य अर्थशास्त्र 10.4.5

१९-कौटिल्य का युद्ध दर्शन डा लल्लन जी सिंह पृष्ठ 138 139

२०-कौटिल्य अर्थशास्त्र 2.28

Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.

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