प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन के दार्शनिक आधार: Difference between revisions
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Latest revision as of 16:36, 26 September 2024
भूमिका-
प्राचीन भारत की शासन पद्धति तथा हिंदू राजशास्त्र का इतिहास वैदिक काल से आरंभ होकर मुगलकाल की स्थापना तक विस्तृत है I डा जायसवाल ने लिखा है हमें इस विषय का ज्ञान करने वाले साधन हिंदू साहित्य में विस्तृत रूप से मिलते हैं I वैदिक संस्कृत तथा प्राकृतिक ग्रन्थ और इस देश के शिलालेखों तथा सिक्कों में रक्षित लेखो से हमें इस विषय की बहुत सी बातें ज्ञात होती हैं I सौभाग्यवश इस समय हमें हिंदू राजनीति शास्त्र के कुछ मूल ग्रंथ भी उपलब्ध है यह थोड़े से ग्रंथ उस विशाल ग्रंथ भंडार के अवशेष मात्र हैं जिन्हें समय-समय पर हिंदू भारत के अनेक अनेक राजनीतिज्ञ और शासको ने प्रस्तुत किया था १ I समुद्र में प्रत्येक स्थान पर मणियाँ नहीं मिलती और प्रत्येक मणी मूल्यवान नहीं I ठीक इसी प्रकार प्राचीन भारतीय ग्रंथों में प्राचीन इतिहास निहित है प्राचीन भारतीय कलाकारों की कृतियां भी कम नहीं जिन से हमारे प्राचीन इतिहास का बोध हो सके I मूर्ति कला ,चित्रकला ,भवन निर्माण कला ,तथा अन्य लिखित कलाओं के उत्कृष्ट उदाहरण आज भी अपनी भग्नावस्था में हमारी प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति की स्मृति दिला रहे हैं २ I प्राचीन भारतीय इतिहास का क्रमबद्ध विवरण तैयार करने वाले इतिहासकारों की कठिनाइयां तब और भी अधिक बढ़ जाती हैं जब हम यह देखते हैं कि भारत में शिलालेख विद्या पुरातत्व विद्या और प्राचीन स्मारकों के अभिलेखों का अभाव है I विशेष रूप से अशोक तथा मौर्य साम्राज्य से पूर्व काल के विषय में अतः हमें भारत के प्राचीन राजनीतिक महत्व के दृष्टिकोण से अधिक गौरवपूर्ण युग के इतिहास की जानकारी के लिए पूरी तरह प्राचीन साहित्य पर निर्भर होना पड़ा है जिसमें से कुछ साहित्य तत्कालीन सामाजिक जीवन का चित्रण करता है और कुछ बीते युगों की परंपराओं का रक्षण करती है३ जिन स्रोतों पर हिंदू राजतंत्र एवं शासन पद्धति का सामाजिक और राजनीतिक चिंतन और संस्थाओं का ज्ञान आश्रित है ,वह निम्न है -
१-वेद एवं पुराण-
भारतीय धार्मिक साहित्य के प्राचीनतम ग्रंथ चार वेद हैं I ऋग्वेद, सामवेद ,यजुर्वेद, तथा अथर्ववेद I इन वेदों से राज्य की उत्पत्ति के सिद्धांतों शासन के तत्कालीन राजतंत्र स्वरूप राजाओं के अधिकार राजा और मंत्री तथा प्रजा के पारस्परिक संबंध शासन की नीति आदि का पता चलता हैI वास्तव में ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, और अथर्ववेद प्राचीन भारतीय जनजीवन की जानकारी के विश्वसनीय स्रोत है I जिनसे तत्कालीन राजनीति और पद्धति का समुचित ज्ञान होता है I
पुराण भी ऐतिहासिक सामग्री प्रदान करते हैं I यद्यपि पुराण 18 है तथापि इनमें से 13 पुराण ही ऐतिहासिक दृष्टि से उपयोगी हैं I विष्णु पुराण में मौर्य वंश के बारे में और, मत्स्य पुराण में आंध्र वंश के बारे में बहुत विश्वसनीय वर्णन है I वायु पुराण गुप्तों के शासन पद्धति पर प्रकाश डालता है I पुराणों के अंतिम भागों में प्रायः राजवंश का इतिहास है I इसमें शिशुनाग वंश ,नंद वंश ,मौर्य वंश ,कणववंश ,आंध्र वंश ,तथा गुप्त वंश का परिचय प्राप्त होता है I पुराणों में भौगोलिक वर्णन भी है I इसमें तत्कालीन नगरों नदियों एवं पर्वतों के प्राचीन नाम तथा उनकी स्थिति का ज्ञान होता है जो तत्कालीन इतिहास तथा लिखने में सहायक होता है I पुराणों में आख्यायिकाओं तथा अत्युक्तियों की भरमार है लेकिन वैदिक तथा बौद्ध साहित्य के प्रासंगिक लेखों में पुराणों को कथनों को सिद्ध करने में सहायता मिलती है डॉक्टर एन एन घोष के अनुसार पुराणों का प्राचीन भारत के धार्मिक साहित्य की अन्य प्रत्येक शाखा के मुकाबले वास्तविक इतिहास से कहीं अधिक संबंध है ४ I
२-महाकाव्य एवं स्मृतियां-
साहित्य के दो स्तंभ रामायण तथा महाभारत माने गए हैं I भारतीय इतिहास को प्रकाश में लाने का श्रेय बहुत कुछ इन महाकाव्य को दिया जा सकता है I रामायण में महाकवि वाल्मीकि ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम का चरित्र लिखकर तत्कालीन भारत को राजनीतिक सामाजिक तथा धार्मिक स्थिति को बोधगम्य बना दिया I रामायण के अध्ययन से ही हमें आर्यों यवनों और शकों के संघर्ष का वर्णन प्राप्त होता है I इस महाकाव्य में राज्यों की सीमाओं का उल्लेख है ५ महाभारत भी राजशास्त्र का महत्वपूर्ण ग्रंथ है I शांतिपर्व के राजधर्मपर्व अध्याय में राजा के कर्तव्य और शासन व्यवस्था के अनेक अंगों का विषद वर्णन है I इसमें राजशास्त्र के महत्व का वर्णन है ६ और राज्य तथा राजतंत्र की उत्पत्ति पर महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किए गए हैं I कई अध्यायों में राजा और मंत्रियों के कर्तव्य और उत्तरदायित्व का वर्णन है और राज्य तथा राजतंत्र की उत्पत्ति पर महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किए गए हैं कई अध्यायों में राजा और मंत्रियों के कर्तव्य और उत्तरदायित्व का वर्णन है I छःअध्यायों में कर व्यवस्था का विवेचन है परंतु राज कर्मचारियों के कर्तव्यों का विवरण अर्थशास्त्र के समान विशद् नहीं है I सौराष्ट्र शासन व्यवस्था का वर्णन संक्षेप में एक अध्याय में है परंतु पर राष्ट्र नीति और संधि विग्रह विषय को अधिक स्थान दिया गया है ७ I निसंदेह महाभारत का राजधर्म पूर्ववर्ती ग्रंथ कारों से अधिक सविस्तार और सांगोपांग है संभवत इसमें उनके कुछ सिद्धांत और कुछ श्लोक का भी समावेश हुआ है I शांतिपर्व के राजधर्म पर्व के अध्याय के अतिरिक्त भी महाभारत के कुछ अध्याय में राजतंत्र पर विचार किया गया है I सभापर्व के पाँचवें अध्याय में आदर्श राज्य व्यवस्था का सरल और सुंदर वर्णन है आदिपर्व के 142 में अध्याय में विशेष परिस्थितियों में राज्य कार्यभार में कूटनीति का भी समर्थन किया गया है I सभापर्व के 32 वें और वनपर्व के 25 वें अध्याय में आपद्धर्म का विवेचन है I
राजशास्त्र के निर्माता के सिद्धांतों और ग्रन्थों का परिचय हमें केवल महाभारत और कौटिल्य के अर्थशास्त्र से ही होता है I यद्यपि इन ग्रंथो के विषय रूप दृष्टिकोण और परंपराएं भिन्न है फिर भी इनमें उल्लेखित पूर्व सूचियों के ना मों में अंतर नहीं है I महाभारत में इस विषय का वृतांत प्राय दंतकथात्मक ही है इसमें कहा गया है कि प्रारंभ में ब्रह्मा जी ने उस समय फैली हुई अराजकता का अंत करके समाज व्यवस्था पुनः स्थापित करने के बाद एक लाख श्लोक में विशाल राजशास्त्र की रचना की इसे क्रमशः शिव विशालाक्ष इंद्र बृहस्पति तथा शुक्र ने संक्षिप्त किया I
ऐतिहासिक दृष्टि से स्मृतियों का भी विशेष महत्व है ८ I मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृतियों में सृष्टि रचना धर्म वर्ण और आश्रम राजा की उत्पत्ति राजा के सावयवी स्वरूप राज्य के कार्य क्षेत्र राजा के गुण राजा के कर्तव्य राजा की दिनचर्या युद्ध में राजा के कर्तव्य शासन पद्धति न्याय व्यवस्था कानून के स्रोत कर व्यवस्था पर राष्ट्र संबंध आदि विषयों का उल्लेख किया गया है I नारद स्मृति का संबंध मुख्यतः धार्मिक कानून से है I इसमें प्रशासनिक मामलों पर बहुत ही कम उल्लेख है I राजा और ब्राह्मण को आठ पवित्र वस्तुओं में स्थान दिया गया है और उन्हें निंदा एवं शारीरिक दंड से मुक्त रखा गया है बृहस्पति को भी छठी या सातवी शताब्दी में जन्मा माना जाता है उनके धर्मशास्त्र में न्यायिक प्रक्रिया का विस्तृत वर्णन है I
३-ब्राह्मण एवं उपनिषद्-
ब्राह्मण साहित्य में एतरेय पंचावेश शतपथ तैत्तरीय आदि विशेष रूप से महत्वपूर्ण है I ऐतरेय के कुछ प्राचीन नरेशों तथा उनके राज्याभिषेक के विषय में पता चलता है I शतपथ हमें भारत के तत्कालीन पश्चिमोत्तर देश गंधर्व कैकय आदि के बारे में तथा कुरू कौशल विदेश आदि प्राच्य राज्यों के विषय में ज्ञान प्राप्त करता है I
उपनिषदों के अध्ययन से पता चलता है कि उस समय के आर्यों ने सभ्यता धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में कितनी उन्नति कर ली थी I उपनिषदों की संख्या काफी है जिसमें वृहदारण्यक छांदोग्य श्वेताश्वतर केन कठ प्रश्न मुण्डक आदि उल्लेखनीय है I इनमें बिंबिसार के पूर्व की राजनीतिक दशा का ज्ञान होता है I राजा परीक्षित उनके पुत्र जयमेजय तथा कुछ परवर्ती राजाओं का उल्लेख उपनिषदों में मिलता है I वास्तव में ब्राह्मण साहित्य और उपनिषदों से राजा परीक्षित से लेकर बिंबिसार तक के इतिहास पर उपयोगी प्रकाश पड़ता है I
४-बौद्ध एवं जैन साहित्य-
बौद्ध साहित्य के तीन प्रमुख ग्रंथ जिन्हें त्रिपिटक कहते हैं ९ I इनमें महात्मा बुद्ध के उपदेशों को दृष्टांत देकर समझाया गया है I अतः इनमें तत्कालीन व्यक्तियों स्थान तथा राजनीतिक सामाजिक तथा धार्मिक स्थिति का ज्ञान प्राप्त होता है जिसे अपने समय के ऐतिहासिक घटना चक्र से घनिष्ठ संबंध थे I इसी प्रकार निकाय एवं जातक ग्रन्थों में काल्पनिकता के बावजूद तत्कालीन और पूर्ववर्ती समाज का चित्रण है I यह ग्रंथ इशा से 600 वर्ष पूर्व से लेकर चौथी शताब्दी के अंत तक के प्रचलित अंधविश्वासों रीति रिवाज और घटनाक्रमों पर उपयोगी प्रकाश डालते हैं I मिलिंद पन्छ जिसमें वैक्ट्रिया के शासन में मेनाण्डर और तत्कालीन बौद्ध विद्वान नामसेन का वार्तालाप है बुद्ध घोष की समन्तपासादिका और लंका के ऐतिहासिक ग्रंथ के दीपवंश तथा महावंश भी उल्लेखनीय है I अंतिम दो ग्रन्थों में मौर्यकाल और उसके इतिहास का पता चलता है बौद्धो के कुछ ग्रंथ जैसे दिव्यावहान ललित विस्तार महावस्तु मंजुश्री मूलकल्प आदि हैं I दिव्यावदान में दो अवदान अशोक और कुणाल से संबंध है मंजू श्री मूलकल्प प्राचीन राजवंशों का संक्षिप्त इतिहास है I इसके अतिरिक्त अन्य बौद्ध ग्रंथ भी महत्वपूर्ण है जिनमें नागार्जुन का माध्यमिका सूत्र एवं शतसहस्त्रिका वसुबन्धु का धर्मकोष तथा अश्वघोष का बुद्धि चरित्र उल्लेखनीय है I
जैन साहित्य प्रकृति और संस्कृति दो भाषाओं में रचित है I जैन साहित्य में ऐतिहासिक दृष्टि से आचार्य हेमचंद्र लिखित परिशिष्ट पर्वन बहुत महत्वपूर्ण है I इस ग्रंथ में महावीर के समय से मौर्य काल तक के इतिहास को काफी सामग्री मिलती है I भद्रबाहु चरित्र नामक दूसरे ग्रंथ में भद्रबाहु के जीवन के साथ ही चंद्रगुप्त मौर्य के विषय में बहुत कुछ प्रकाश डाला गया है I पुण्याश्रव काथाकोष और काल आचार्य कथानक भी ऐतिहासिक दृष्टि से उपयोगी है I आगराग सूत्र एवं उतराध्याय सूत्र में राजनीति और आचारशास्त्र के आपसी संबंधों का पर्याय है I जिनसेन के आदि पुरुष में तत्कालीन राजनीतिक विचारों और संस्थाओं का सुंदर वर्णन मिलता है राजा के कर्तव्यों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि उसको सदैव सन्मार्ग पर चलना चाहिए प्रजा की रक्षा करनी चाहिए और सेनाओ द्वारा सुदृढ़ स्थिति बनानी चाहिए I
५-कौटिलीय अर्थशास्त्र-
कौटिल्य अर्थशास्त्र के रचनाकार के बारे में मतभेद है श्याम शास्त्री गणपति शास्त्री और जायसवाल के मत से यह चंद्रगुप्त के प्रख्यात मंत्री कौटिल्य की कृति है परंतु विंटरल जाली किथ देवदत्त भंडारकर का मत है कि प्रस्तुत ग्रंथ बहुत बाद में ईस्वी सन की शुरू की कुछ शताब्दी में लिखा गया प्रोफेसर अलतेकर ने लिखा है कि अर्थशास्त्र के भाग 11 अध्याय 1 में भद्र कंबोज लि्छवी एवं मल्ल गणतंत्र का उल्लेख आया है I मौर्य काल के प्रारंभ में यह सब गणतंत्र अस्तित्व में थे I इसलिए अर्थशास्त्र को मौर्य युग का ग्रंथ मानना उचित होगा १० I
अर्थशास्त्र में राजा को वेद तत्व ज्ञान इत्यादि विषयों का अध्ययन करने को कहा है किंतु ग्रंथ का एकमेव विषय राजशास्त्र है I उसमें आचार एवं प्रायश्चित का विचार भी नहीं किया गया है ११ Iअर्थशास्त्र का उद्देश्य शासन कार्य में राजा को मार्ग निर्देशन करना था I शासन व्यवस्था के मूल सिद्धांतों का दार्शनिक विवेचन उसमें नहीं मिलता है I शासन की वास्तविक समस्याओं को सुलझाना ही इसका उद्देश्य था और युद्ध एवं शांति काल में शासन तंत्र का क्या स्वरूप और कार्य होना चाहिए I इसका व्योरेवार वर्णन अर्थशास्त्र में है I वह बाद के ग्रन्थों में शुक्र नीति के अतिरिक्त नहीं मिलता १२ I बेनी प्रसाद के शब्दों में एक प्रशासनीय संगठन की योजना के रूप में अर्थशास्त्र से श्रेष्ठ ग्रंथ भारतीय साहित्य में नहीं है वह अपने नियमों के विस्तार में पूर्ण है वर्णन में व्यापक है यह हिंदू प्रशासकीय सिद्धांत का एक वक्तव्य है और यह कोई भी वांछनीय चीज नहीं छोड़ता I
६-कमांदकीय एवं शुक्रनीतिसार-
इन दोनों ग्रथों के बारे में प्रोफेसर अलतेकर ने लिखा है की कामंदकीय नीतिसार जो संभवतः गुप्त काल में 500 ई के आसपास लिखा गया कौटिल्य के ग्रंथ का छन्दोबद्ध संक्षेपीकरण है इसके गुमनाम लेखक ने इसे अनुष्टुप छन्द में इसलिए बॉधा की विद्यार्थी इस प्रामाणिक ग्रंथ को कंठस्थ कर सकें परंतु इस ग्रंथ में शासन व्यवस्था का वर्णन नहीं किया गया I राजा और उसके परिवार के वर्णन से ही सारी जगह भर दी गई है I इससे पता चलता है कि इस समय नृपतंत्र कितना शक्तिशाली हो चुका था अर्थशास्त्र का गणतंत्र वाला अध्याय इसमें है ही नहीं १४ I
शुक्रनीति के काल के विषय में भी विद्वानों में मतभेद है तथापि इस ग्रंथ का समय अधिकांश 11वीं या 12वीं सदी से अर्वाचीन नहीं है I इस ग्रंथ के समय तक गणतंत्रों का नाम निशान तक मिट चुका था I अतः इसमें भी नृपतंत्र का ही वर्णन है राजा और उसके मंत्रियों तथा कर्मचारियों के कार्यों के अतिरिक्त इसमें पर राष्ट्र और राजनीति का वर्णन बड़े विस्तार से किया गया है I न्याय की व्यवस्था का भी इसमें पूरा विवरण है समाजशास्त्र और राजनीति के कुछ प्रश्नों पर भी विषद विचार किया गया है I शुक्र के मतानुसार शासन पद्धति का श्रेय समाज की सर्वांगीण उन्नति सुलभ कराना था ना कि केवल डाकुओं को दंड देना था I मदिरादी व्यसनों से लोगों को काबू में करना शुक्र नीतिसार से ऐसी अनेक बातें विदित हैं कि जो अत्य ग्रन्थों में नहीं दी होती हैं I दरबार में विभिन्न वर्ग के दरबारी कहां-कहां बैठते थे १५ इन बातों का वर्णन इस ग्रंथ में मिलता है I मंत्रिमंडल के हर एक मंत्री का कौन कार्य क्षेत्र था और उनके पद का नाम क्या था इसका वर्णन सबसे पहले इस ग्रंथ में मिलता है मंत्री लोग रोज किस प्रकार अपना दैनिक कार्य करते थे इसके कितने सहायक थे I राजा से उसका किस प्रकार का संबंध था इसका सुंदर चित्र शुक्र ने दिया है I १७
७-लौकिक साहित्य-
इनमें कालिदास तथा भास जैसे साहित्यकारों की रचनाएं आती हैं I गार्गी संहिता एक ज्योतिष ग्रंथ है I किंतु इसमें कुछ ऐतिहासिक तथ्यों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है I इसी प्रकार पाणनी की अष्टाध्याई और पतंजलि के व्याकरण महाभाष्य के नियमों में दिए गए उदाहरण इतिहास पर भी प्रकाश डालते हैं I
८-अन्य स्रोत-
इनमें कल्हण रचित राजतरंगिणी प्रमुख है I जिसमें प्राचीन काल से लेकर 12वीं शताब्दी तक की कश्मीर का इतिहास दिया गया है I बाण ने हर्ष चरित्र से हर्षवर्धन के प्रारंभिक जीवन और तत्कालीन राजनीतिक समाज और धर्म पर प्रकाश पड़ता है I पतंजलि के महाभाष्य और कालिदास के मालविका ग्निमित्र शुंगवंश के इतिहास पर प्रकाश डालते हैंI विशाखा दत्त के मुद्राराक्षस नाटक द्वारा नंदवंश और प्रारंभिक मौर्य काल पर प्रकाश पड़ता है I पद्यमगुप्त परमिल का नवसाहसक चरित्र परमार वंश के इतिहास पर प्रकाश पड़ता है I इसी प्रकार संध्याकर नंदी के राज चरित्र जयानक के पृथ्वीराज विजय आनंद भट्ट के बल्लचरित्र आदि ग्रंथ क्रमशः पाल चौहान तथा सेनवंश के इतिहास पर प्रकाश पड़ता है I हेमचंद्र का द्वयाश्रय काव्य तथा कुमार पाल चरित्र सोमेश्वर का चतुर्विशति प्रबंध चंद्र प्रभा सूरी का मंडली महाकाव्य राजनाथ का अत्युत राजाभ्युदयकाल आदि भी प्राचीन भारत के उपयोगी ग्रंथ है I जयचंद के हमीर काव्य बल्लाल के भोज प्रबंध तथा चंद्रवरदाई के पृथ्वीराज रासो भी अपने समय की महत्वपूर्ण सामग्री प्रस्तुत करते हैं I तारानाथ के तिब्बत के इतिहास से भी तत्कालीन घटना की झांकी मिलती है I
संदर्भ ग्रंथ
१-रामचंद्र वर्मा हिंदू राजतंत्र खंड एक पृष्ठ दो
२-रतीभानु सिंह नाहर प्राचीन भारत का राजनीतिक व सांस्कृतिक इतिहास पृष्ठ तीन
३- एम सी बंदोपाध्याय डेवलपमेंट आफ हिंदू पालिटी एंड पॉलीटिकल थिअरी पेज 10
४- एन एन घोष अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया पेज 7
५-किष्किंधा कांड में कहा गया है की यवनों का देश और शकों के नगर कौरवों के देश तथा हिमालय के बीच स्थित है इसी प्रकार भारत के अन्य विभागों के राजाओं के बारे में न्यूनाधिक वर्णन रामायण में मिलता है
६-अध्याय 63-64
७-अध्याय 20,86 ,99, 100 ,103, 110 ,113
८-अनंत सदाशिव अलतेकर प्राचीन भारतीय शासन पद्धति पृष्ठ 7
९- सुत्तपिटक धर्म पिटक विनय पिटक
१०-अलतेकर वही पृष्ठ 10
११-प्रथम विभाग में नृपतंत्र से संबद्ध विषयों का विचार है दूसरे विभाग में अनेक अधिकारियों का कर्तव्य क्षेत्र और अधिकारों का वर्णन किया गया है
१२-अलतेकर वही पृष्ठ सात -आठ
१३- बी ए सालेटर असिएंट पॉलीटिकल थॉट एंड इंस्टीट्यूशन पेज 50
१४-संभवत इस समय तक गणतंत्र का अस्तित्व ही मिट चुका था
१५-2.70.1
१६-1.283.3
१७-2.99.100
Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.
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