शुक्रनीति में मंत्रिपरिषद की कार्यप्रणाली: Difference between revisions
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Latest revision as of 17:31, 16 July 2024
प्राचीन हिंदू धर्म ग्रंथो में मंत्रिपरिषद की कार्यप्रणाली
प्राचीन हिंदू धर्म ग्रंथो में मंत्रिपरिषद की कार्यप्रणाली का कोई स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता है I इसी परंपरा के अनुरूप शुक्र नीति में भी व्यवस्थित कार्यप्रणाली का वर्णन तो उपलब्ध नहीं है I किंतु मंत्रियों के अधिकार एवं कर्तव्यों के वर्णन के साथ-साथ यह व्यवस्था दी गई है कि परिषद का प्रत्येक सदस्य निश्चित विभाग का अध्यक्ष होगा I जिसके पास अपने विभाग से संबंधित मुद्रा होगी I जिसका प्रयोग आवश्यकतानुसार लेखों पर किया जाएगा I शुक्रनीतिकार ने राजा को निर्देश दिया है कि वह पूर्वोत्त मंत्री परिषद के सदस्यों के लिए विहित किए कार्यों को मौखिक एवं लेखों द्वारा जान ले १ ,और समय-समय पर इनका एक दूसरे के पदों पर कभी सुमंत्र को अमात्य के पद पर और कभी अमात्य को सुमंत्र के पद पर बदली करके नियुक्त करें तथा राज्य के मंत्रिपरिषद के अधिकारियों को कभी भी अधिकार से अधिक शक्ति का प्रदर्शन न करने दे २ I इस प्रकार मंत्रिपरिषद के दसों सदस्यों को परस्पर संबल वाला बनाए रखना I
शुक्रनीति में मंत्रिपरिषद की नियुक्ति
आचार्य शुक्र ने प्रतिपादित किया है कि राजा को किसी एक विभाग पर तीन व्यक्तियों को नियुक्त कर ३ उनमें से सबसे अधिक बुद्धिमान को अध्यक्ष तथा अन्य दो को सामान्य सदस्य की भांति नियुक्त करने चाहिए ४ I इस प्रकार उसके कार्य निपुणता का 3, 5, 7, 10 , वर्षो में भली भांति परीक्षण करके तदनुसार परिवर्तन करें ५ I आचार्य शुक्र का मत है कि सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति अधिकार रूपी मद पीकर प्रमोद हो जाता है I अतः एक व्यक्ति को किसी विशेष पद पर अधिक दिन नहीं रखना चाहिए और अधिकार पर सामर्थ रखते हुए उसे अन्य नियोजित अधिकार पर प्रतिष्ठित करना चाहिए तथा ६ जिन-जिन कार्यों के लिए अमात्य युवराज आदि नियुक्त किए गए हैं ७ उन्हें चाहिए कि वह अनुक्रम से अपने-अपने कार्यों का विवरण दैनिक मासिक वार्षिक बहुवार्षिक रूप में अच्छी तरह से लिखकर राजा के समक्ष प्रस्तुत करें ८ I शुक्र नीति में विभागीय पद्धति द्वारा मंत्री परिषद के कार्य संचालन की प्रक्रिया के साथ-साथ स्थानांतरण पद्धति की व्यवस्था का सांगोपांग वर्णन किया गया है ९ I
मंत्रिपरिषद की कार्यप्रणाली
शुक्रनीति में वर्णित मंत्रिपरिषद की कार्यप्रणाली से ज्ञात होता है कि प्रत्येक विभाग से संबंधित समस्या पर सर्वप्रथम विचार उस विभाग के अधीनस्थ कर्मचारियों द्वारा किया जाएगा इसके उपरांत अध्यक्ष विचार विमर्श का निर्णय लेगा I संपूर्ण प्रक्रिया के पश्चात उक्त निर्णय को मंत्रिपरिषद के समस्त सदस्यों के पास भेजा जाएगा १० I मंत्रिपरिषद का प्रत्येक सदस्य महर्षि शुक्र के अनुसार उक्त निर्णय पर स्वतंत्रता पूर्वक विचार व्यक्त कर सकेगा तथा इसके मत सप्रमाण लेखनबद्ध किए जाएंगे I इस प्रकार बहुमत वाला पक्ष का निर्णय मनाने एवं तदनुसार कार्य करने के लिए राजा बाधित करेगा ११ I
इस भांति स्पष्ट है कि आधुनिक मंत्रिपरिषद के निर्णय की भांति ही शुक्रनीति के मंत्रिपरिषद के निर्णय बहुमत पर आधारित होंगे तथा राजा तो इन्हें केवल मात्र क्रियान्वित करने वाली शक्ति के रूप में कार्य करेगा १२ I शुक्रनीति में निर्णय लेने की लिखित और मौखिक दो प्रक्रिया अपनाई गई है I लेकिन वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है की मौखिक प्रक्रिया मंत्रिपरिषद की बैठक में विचार व्यक्त करने के लिए अपनाई गई होगी I लिखित प्रक्रिया का वर्णन काफी विस्तार से मिलता है I मौखिक प्रक्रिया का वर्णन उपलब्ध नहीं होता I प्रत्येक विभाग और समस्या से संबंधित विभिन्न राजकीय लेख दृष्टिगोचर होते हैं १३ I जिन्हें सामान्यतः वित्त संबंधी और आय व्यय संबंधी दो भागों में विभाजित किया गया है I लेखों में वेदों को स्पष्ट करते हुए आचार्य शुक्र ने लिखा है कि जिस पर राजा की आज्ञा लिखित रूप से मोहर युक्त होती है तथा जिस पर केवल मात्र राजा के हस्ताक्षर होते हैं I वह क्रमशः उत्तम तथा साधारण उत्तम होते हैं I इसी प्रकार मंत्रियों द्वारा लिखित आज्ञा मध्यम १४ तथा पुरवासियों द्वारा लिखित आज्ञा कनिष्ठ मानी गई है I उक्त प्रकार के सभी लेख महर्षि शुक्र ने कार्य सिद्धि में समर्थ माने हैं उनका विश्वास है कि मंत्रिपरिषद के सभी सदस्य अपने निर्णय को क्रियान्वित करने में समर्थवान हो सकेंगे I
उक्त संपूर्ण पत्रों की लेखन विधि का निरूपण शुक्रनीति में विस्तार के साथ किया गया है I उक्त विधि से लिखे गए लेख पत्र पर विचार के उपरांत मंत्री पंडित दूत आदि के द्वारा अपनी-अपनी सहमति दी जाएगी १५ I अमात्य तथा सुमंत द्वारा क्रमशः यह लेख ठीक लिखा है तथा मैं इस लेख पर भली प्रकार विचार कर लिया है ऐसा लिखे जाने के उपरांत यह लेख पत्र सत्य एवं यथार्थ है I प्रधान के द्वारा तथा प्रतिनिधि एवं युवराज क्रमशः यह अंगीकार करने योग्य हैं एवं इसे अंगीकार करना चाहिए लिखेंगे पुरोहित को यह लेख मुझे भी अभिमत है लिखकर अपनी सहमति व्यक्त करनी चाहिए १६ I
महर्षि शुक्र का विश्वास है कि लेख पत्र के अंत में मंत्रिपरिषद के समस्त सदस्यों को टिप्पणी हस्ताक्षर और मोहर लगनी चाहिए I महर्षि शुक्र इस तथ्य से परिचित हो कि राजा युवराज इत्यादि काफी व्यस्त होते हैं और उन्हें भली प्रकार लेख पत्र को देखने का समय नहीं होता I अतः उन्हें मंत्रियों का दायित्व विश्वास के आधार पर यथार्थ रूप में निश्चित किया है I इस प्रकार इन सभी के हस्ताक्षर के उपरांत युवराज एवं राजा तो केवल अंतिम रूप से औपचारिक हस्ताक्षर करता मात्र होंगे १७ I
इस भॉति स्पष्ट है कि महर्षि शुक्र ने विस्मरण को मानव स्वभाव का अनिवार्य अंग मानते हुए लेखक को ही प्रत्येक विषय का सच्चा निर्णायक स्वीकार किया है १८ I क्योंकि बिना लेख के राज्य कार्य का संपादन करने वाला राजा एवं लेख पत्र के अभाव में राजाज्ञा का पालन करने वाला भृत दोनों ही चोर समझे जाते हैं १९ I अतः राजा की मुद्रा से निकला हुआ लेख ही वास्तविक राजा होता है उसका शरीर नहीं २० I
निष्कर्ष
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि शुक्र नीति में किसी भी समस्या के विचार का आधार तो विभागीय है ही लेकिन उसके बाद उस प्रश्न पर निर्धारित क्रमानुसार मंत्रिपरिषद के संपूर्ण सदस्यों द्वारा भी विचार किया जाता है I मंत्रिपरिषद के संपूर्ण सदस्यों एवं युवराज के विचार के उपरांत ही राजा द्वारा अंतिम रूप से निर्णय दिया जाता है I महर्षि शुक्र के उक्त मत से युवराज व राजा अन्य विषयों के कारण अत्यधिक व्यस्त रहते हैं I अतः उनके द्वारा अपने मंत्रियों पर विश्वास करके ही बिना देखे केवल मंत्रियों के हस्ताक्षर के आधार पर ही निर्णय लेकर अपने हस्ताक्षर करने से प्रतीत होता है कि संभवत महर्षि शुक्र का विश्वास मंत्रिपरिषद को वास्तविक शासक के रूप में स्वीकार करने का रहा है I इससे यह आभाषित होता है कि शुक्र नीति का राजा वास्तविक प्रधान ना होकर औपचारिक प्रधान ही है I सारांश रूप में कहा जा सकता है कि मंत्रिपरिषद को सभी प्रकार के विषयों में परामर्श देने नीति एवं नियम निर्धारित निर्धारण में प्रकाश डालने तथा न्याय व्यवस्था में भाग लेने आदि के संभवत सभी वास्तविक अधिकार प्राप्त हैं I
संदर्भ ग्रंथ
१-शुक्रनीति- 2/108
२-शुक्रनीति- 2/109
३-शुक्रनीति -2/110
४-शुक्रनीति -2/111
५-शुक्रनीति -2/112
६-शुक्रनीति -2/113
७-शुक्रनीति- 2/295
८-वही- 2/296
९-दृष्टव्य के पी जायसवाल -पेज -306
१०-शुक्रनीति- 2/96,99,101,103
११-शुक्रनीति -1/366
१२-शुक्रनीति -2/370 ,371 ,372
१३-वही -2/294,320
१४-वही -2/294
१५-वही -2/366
१६-वही -2/367-368
१७-वही -2/371
१८-शुक्रनीति -2/291
१९-वही -2/292
२०-वही -2/293
Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.
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