कल्पसूत्र काल में राजसत्ता एवं कानून: Difference between revisions
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Latest revision as of 16:58, 18 September 2024
राजसत्ता- राजा राज्य का केंद्र बिंदु और समाज का अधिष्ठाता था I जनता की संरक्षा तथा गुरु दायित्व उसी के कंधों पर प्रमुखत: समाश्रित था I प्रशासन का प्रधान अधिकारी राजा सिद्धांत: का सामाजिक हित में आत्म त्याग की मूर्ति समझा जाता था I इस परित्याग में राज सत्ता का उत्कृष्ट स्वरूप अभीचिंतित है I राजपद प्रायः अनुवांशिक हो चुके थे I राजद की सामाजिक प्रतिष्ठा के परिणाम स्वरुप ही राजा इंद्रासन पर आसीन समझा जाता था १ पर कदाचित सत्ता का कोई दैवी आधार नहीं था I जैसा कि घोषाल का कथन है २ I धर्म सूत्रकार स्वयं कहते हैं कि राजा तथा बहुश्रुत ब्राह्मण पर चारों वर्णों तथा प्राणीमात्र की संरक्षा एवं अस्तित्व आश्रित है I उन्ही पर धर्म के उद्देश्यों की प्राप्ति भी निर्भर है I अतः राजा का अपमान नहीं करना चाहिए I गृहस्थ को राजा अथवा भगवान किसी को अपशब्द नहीं कहना चाहिए I क्योंकि दंड के द्वारा राजा अथवा भगवान जन संरक्षण और जनहित का प्रबंध करता है I वास्तव में वह धर्म अथवा समाज की क्रियात्मक तथा नैतिक व्यवस्था का मूल आधार समझा जाता था I स्वाभाविक है कि कर्तव्य की इस गुरुता एवं महत्व में राजा का गौरव तथा सम्मान अत्यधिक बढ़ जाए I उसे मधुपर्क के संपादन का अधिकार था I अब्राह्मण कर्मचारी ३ अभिवादन के समय राजा का नाम उच्चारण नहीं कर सकता था I राजा ब्राह्मण को छोड़कर सबका स्वामी समझा जाता था I वह प्रजा को संरक्षण देता था I कर्तव्य की इस पूर्ति में उसके अधिकार वृहद हो गए वह शासन न्याय तथा सेना का भी प्रधान था I शासन संचालन के निमित्त उसे कर लगाने का अधिकार था आय का षष्ठांश राजकर विधि- विहित था I किंतु आवश्यकता पड़ने पर राजा अन्य कर भी लगा सकता था I राज्य के प्रमुख अधिकारियों की नियुक्ति राजा ही करता था और यह अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारियों की नियुक्ति करते थे I विधि निर्माण का राजा का अधिकार न था किंतु उसके अध्यादेश विधि स्वरूप ही थे I वह प्रधान न्यायाधीश था I उसे निर्देश था कि वह उचित तथा निष्पक्ष न्याय करें ४ I वह सेवा का प्रधान था और युद्ध क्षेत्र में वही सेवा का नेतृत्व करता था I
राजसत्ता का विकास- राज्य शासन के सभी अंगों का आवश्यकता के अनुरूप विकास हो चुका था I इन अंगों की क्रियात्मकता का स्रोत था I राजा राज्य के इन विपुल कार्यों का संपादन वह एकाकी रूप से नहीं कर सकता था I गौतम का कथन है कि राजा की सहायता के लिए उसके पास उच्चतम गुणों वाले सहायक अवश्य होने चाहिए I राजा उच्चतम अधिकारियों की नियुक्ति करता था ५ I इस युग में राजकीय अधिकारियों में केवल पुरोहित मंत्री और अमात्य ही नहीं थे वरन प्राडविवाक ,सभ्य अथवा सभासद, दाण्डिक तथा बन्धनिक भी सम्मिलित थे I गौतम और अन्य कई सूत्रकारों ने पुरोहित, मंत्री एवं अधिकारियों की विशिष्ट योग्यता का उल्लेख किया है I आकर कार्य, सीमा शुल्क ,तरणी शुल्क, आर्थिक व्यवसाय तथा अन्य कार्यों के लिए विश्वसनीय और कार्य विशेष में प्रदत्त व्यक्तियों की नियुक्ति का निर्देश है ६ I मंत्रियों तथा अधिकारियों की नियुक्ति में उनकी चारित्रिक उच्चता एवं विशिष्ट योग्यता पर अत्यधिक बल दिया गया है I स्वयं राजा की योग्यता शिक्षा एवं चरित्र विशेषताओं का विवरण सविस्तार उल्लेखित है I अधिकारियों तथा उनके कार्यों के उल्लेख से प्रतीत होता है कि अब तक शासन सत्ता का व्यवस्थित विकास हो चुका था I शासन के प्रमुख विभागों का कार्य संचालन राजा के द्वारा नियुक्त अधिकारियों के द्वारा होता था I यह अधिकारी आवश्यकता अनुसार अपने अधीनस्थ कर्मचारियों की नियुक्ति कर लेते हैं I कार्य विभाजन में भी अंतिम उत्तरदायित्व राजा पर ही था I राजा के कार्यों में मंत्रीगण सहायता करते थे I उनकी सहायता का स्वरूप क्या था यह धर्म सूत्रों में उल्लेखित नहीं है I शासन कार्य अथवा राज्य की नीति पर यह राजा को सम्मति देते थे किंतु संभवतः उनकी सम्मति राजा के लिए बाध्य रूपी ना थी I प्रशासन में राजा ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ था मंत्रियों की अपेक्षा वह बुद्धि वैभव में उच्चतम समझा जाता था I उसे विधि तथा शासन विद्या में व्युत्पन्न कहा गया है ७ इस कारण राज सत्ता में ही राज्यशक्ति केंद्रीय भूत थी I
राजसत्ता के कर्तव्य- कदाचित् वर्धमान समाज की आवश्यकता ने राजसत्ता की अभिवृद्धि में योग दिया समाज मात्र चार वर्णों का समुदाय नहीं था I धार्मिक विश्लेषण आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विविध व्यवसायों के प्रादुर्भाव एवं अंतरजातीय विवाह के परिणाम स्वरुप समाज विभिन्न जातियों तथा उपजातियां का संयोजित समूह बन गया था I धर्म सूत्रकारों का विधान है कि जो व्यक्ति अपने निर्धारित कर्तव्यों से च्यूत हो उसे दंड दें ८ I अतः प्रश्न उठता है कि क्या राजा नितांत सामाजिक तथ्यों का नियंत्रण भी करता है था विकास प्रायः समाज में उसके तथ्यों के पूर्ण प्रतिस्थापन एवं अनुमोदित सामाजिक संतुलन विभिन्न जातियों उपजातियां एवं विविध व्यवसायों के प्रति दुर्भाव से व्यवहार में अवश्य कुछ परिवर्तन हुआ होगा I धर्मशास्त्रकारों का यह प्रयत्न था कि परंपरागत रूप से स्वीकृत चार वर्णों तथा विभिन्न व्यवसाईयों में संगठित वर्ग अथवा जातियों के कर्तव्यों और अधिकारों में सामंजस्य बना रहे I कदाचित कुछ इसी लक्ष्य से धर्म विज्ञों का विधान है कि शास्त्रों के नियमों के अनुसार राजा को वर्णन एवं आश्रमों की रक्षा करना चाहिए और जब वर्ण अपने कर्तव्यों से चित्त होने लगे तो उन्हें ऐसा करने से रोकना चाहिए ९ I विभिन्न वर्णों तथा जातियों के कर्तव्य और समाज की आवश्यकता की पूर्ति में राजा के द्वारा नियंत्रण का स्वरूप एकांगी नहीं रह गया I वशिष्ठ का कहना है कि राजा को देश जातियों के उप विभाग तथा कुलों की विधियों को ध्यान में रखते हुए चारों वर्णों को उनके विशिष्ट कर्तव्यों के पालन में नियोजित करना चाहिए और यदि कोई पथ भ्रष्ट हो तो उसे दंडित करना चाहिए १० I तात्पर्य है की प्रमुख वर्णों के शास्त्रों लिखित धर्म की व्याख्या उसे विभिन्न जातियों एवं उपजातियां की प्रथम परंपरा एवं विधि विघ्नों में सामंजस्य स्थापित करते हुए करना था I निसंदेह नव उत्पन्न सामाजिक समस्याओं के समाधान में राजा का उत्तरदायित्व पर्याप्त भारी हो गया था I उसका दायित्व उस समय और भी बढ़ा जब बौद्ध सिद्धांतों ने सामाजिक परिवर्तन के लिए चुनौती दी किंतु उनका भी मानव वृत्ति तथा सामाजिक विज्ञान पर अवलंबित ब्राह्मण सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन कर सकना सहज न था I राजनीति के क्षेत्र में इस सिद्धांत ने क्षत्रिय वर्ग को प्रधानता दे राजपक्ष को ही पुष्ट किया अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए बौद्ध विचारको को राजमुखापेक्षी होना पड़ा जिसने अंततः राजशक्ति को व लिष्ठ ही किया I इस प्रकार प्रस्तुत युग में राजनीतिक कर्तव्य तथा अधिकार सामाजिक व्यवस्था के उत्तरदायित्व एवं परोक्षतः अन्य धर्म दर्शन ११ के सिद्धांतों से अद्भुत विविध सामाजिक शक्तियों के सैद्धांतिक संघर्ष के प्रतिफल स्वरूप राज सत्ता अधिक केंद्रीय भूत एवं सशक्त हो गई I
राज सत्ता पर प्रतिबंध- परिस्थितियों ने राजसत्ता को अवश्य अभिवृद्धि किया किंतु कदाचित राज सत्ता निरंकुश ना थी I राजा सबका स्वामी सर्वोच्च अधिकारी था पर विधानतया वह संप्रभु न था I वह विधि निर्माण का स्रोत न था I देश की सामान्य विधि के स्रोत वेद स्मृति और वेद ज्ञान में निष्णात व्यक्ति माने जाते थे १२ I न्याय शासन के संबंध में भी कहा गया है कि वह वेद धर्म शास्त्रों वेदांगो पुराने प्रादेशिक आचार विचार वर्णो तथा कालों के आधार पर होगा विधि के इन व्यापक स्रोतों ने राजा के लिए निरंकुश शासन की संभावना को सीमित कर दिया I वर्णाश्रम धर्म के निर्धारण एवं प्रजा तथा परंपराओं की मान्यताओं में शासनाधिकार स्वत: सीमित हो गया १३ I बौधायन कहते हैं की प्रजा अपनी उपज का षष्ठांश राजा को उसकी रक्षा के रूप में देती है I इस वेतन सिद्धांत के कारण राजा प्रजा की संरक्षण के लिए अनुबंध रूप से बाध्य है I इस राजनीतिक सिद्धांत की अभिव्यक्ति आगे चलकर अर्थशास्त्र तथा महाभारत आदि ग्रन्थां में होती है सिद्धांत रूप से राजा की शक्ति को प्रतिबंधित करने का प्रयास किया गया और व्यवहार में भी विधि स्रोत वर्णन कर्तव्यों की व्यवस्था समाज के विभिन्न वर्णों में समुदायों की सीमित स्वायत्तता आदि की मान्यता ऐसी व्यावहारिक विधियां थी जिनके कारण राज निरंकुशता की संभावना संकुचित हो जाती थी I यह कहना सर्वथा युक्ति युक्त ना होगा कि इन प्रतिबंधों का अतिक्रमण करने वाले कोई निरंकुश राजा ना रहे होंगे राजा धर्मवीर होते थे और प्रायः धर्म शास्त्रों की मर्यादा का पालन करते थे I यह स्पष्ट है कि इन प्रतिबंधों की उपेक्षा से कुछ संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती रही होगी क्योंकि समाज तथा राज्य संगठन के निर्माणक तत्व में रूढ़ हो गए थे I धर्म गुरु पुरोहित का भी राजा पर नैतिक नियंत्रण था I
राज्य में कानून- सीमित राज्य विधि तथा सामान्य विधि का विकास विश्लेषण तथा प्रतिष्ठान इस युग का प्रथम ठोस प्रयास था I विधि के क्षेत्र में इसका विशिष्ट योगदान है I वैदिक युगीन सर्वव्यापी धर्म सामाजिक तथा राजनीतिक विधियों के रूप में क्रमशः विकसित तथा विशिष्ट हुआ I ऋगवैदिक काल में वरुण धर्मपति थे I वह धर्म अथवा विश्व की नैतिक व्यवस्था के स्वामी माने जाते थे I ब्राह्मण युग में राजा धर्म का संरक्षक बन गया १४ और शतपथ ब्राह्मण में उसे धर्म पति कहा गया है I राज्य तथा समाज की विधि व्यवस्था का संरक्षक तथा उसके पालन करवाने का उत्तरदाई राजा ही समझा जाता था I बृहद उपनिशद में धर्म को सत्य तत्व का समानार्थी कहा गया और उसकी सर्वोच्चता प्रतिपादित की गई I राज्य तथा समाज की परिधि में उसकी प्रधानता के समक्ष राज्य एवं सामान्य जन की स्थिति गौड हो गई I धर्म सूत्रकारों ने प्रथम इस धर्म को वर्ण तथा आश्रम धर्म के रूप में मीमांशित किया क्रमशः सामाजिक आवश्यकता एवं परिवर्तित परिस्थिति में समायोजन के निमित्त धर्म के सूक्ष्म विश्लेषण की प्रक्रिया में सामान्य विधि अथवा व्यक्तिगत विधि का विकास किया गया I इस विशद् धर्म की व्यवस्था संरक्षण एवं उसके क्रियान्वयन का दायित्व राजा पर था I धर्म के इस विधि स्वरूप की मीमांसा तथा व्यवस्थापन ही नहीं धर्म सूत्रकारों ने उसके स्रोत की भी विवेचना की है I विधि के इन स्रोतों की परस्पर उत्तरोत्तर महत्ता प्रतिपादित करते हुए वशिष्ठ लिखते हैं कि धर्म की जानकारी प्रथमत: श्रुति और तब स्मृति से करनी चाहिए I इनमें किसी व्यवस्था के अभाव में शिष्ठो की धर्म व्यवहृतियाँ मान्य है वशिष्ठ ही अन्यत्र मनु के एक विधान के आधार पर कहते हैं कि वेद विज्ञान के अभाव में प्रदेश जाति एवं कुल के धर्म आदेशात्मक हैं I आपस्तम्ब के अनुसार इन धर्म अथवा आचारों की अभिमान्यता का आधार वेद तथा धर्म नियमों में परंपरागत विद्वानों की सम्मति है १५ I अतः विधि निर्माता ने सामाजिक आवश्यकता से उत्पन्न विविध समुदायों के परंपरागत आचारों को शास्त्र विहित कहकर उन्हें अधिकृत बना दिया वास्तव में धर्म का मूल व्यापक था I
विष्णु धर्मसूत्र में जो अन्य धर्मसूत्रों की तुलना में पश्चातकालीन है I धर्म के चार स्रोत कहे गए हैं यथा वेद उसकी प्रशाखाएं मनु तथा पुराण इन्हीं धर्म ग्रंथ में इन स्रोतों की क्रमिक महत्व भी कही गई है १६ I कदाचित वेद के आधार पर ही धर्म व्याख्या नई उठने वाली परिस्थितियों से सामंजस्य नहीं कर सकती थी I अतः वेद की प्रमाणिकता को स्वीकार करते हुए भी धर्म विज्ञानों ने धर्म के विकास की गति को अबाधता के लिए प्रथा परंपरा एवं आचारों को उनके तार्किक आधार में धर्म परिवर्तन का सहायक कारण समझा आर्यावर्त में निवास करने वाले आर्य शिष्टों के शील अचार तथा किसी धर्म विवाद का निर्णय सामान्य विधि का माप समझे जाते थे I समाज के वरिष्ठ व्यक्तियों की सम्मति ही नहीं जान रुचि तथा जन भावनाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले लोकाचार भी विधि के औचित्य की कसौटी थे I वेद तथा स्मृति तथ्यों पर आधारित विधियां ही सामाजिक अचार के व्यवहार के लिए शाश्वत मापदंड नहीं थी I आपस्तम्ब में विधि संबंधी रूढ़िवादिता का खंडन अत्यंत तर्क पूर्ण ढंग से किया है I उनका कथन है कि धर्म और अधर्म कहीं जाकर यह नहीं कहते कि यह सद्गुण और यह पातक है I वस्तुतः यदि किसी कार्य की आर्य प्रशंसा करें तो वह धर्म है अन्यथा अधर्म १७ विधि की व्याख्या एवं विकास में केवल आर्यजन ही अधिकारी नहीं थे I किसी धर्म व्यवस्था के अभाव में नारी तथा शुद्र का ज्ञान की वांछनीय था I जहां धर्मशास्त्रों के निर्देश समाप्त हो जाते थे वहां सामान्य जन विधि के विकास के साधन थे विद्वानों की समिति की भी धर्म के विकास में विशिष्ट योग था I गौतम का कथन है कि यदि किसी विषय में कोई विधि नियम अज्ञात है तो दस निष्णात विद्वानों की परिषद के द्वारा स्वीकृत विधान का अनुगमन करना चाहिए I यदि उस विषय पर परिषद की भी कोई व्यवस्था न हो तो एक व्युत्पन्न ब्राह्मण क्षत्रिय का निर्णय मान्य है क्योंकि ऐसा व्यक्ति निष्पक्ष तथा सभी व्यक्तियों के लिए सौहार्द पूर्ण होगा बौधायन तथा वशिष्ठ ने भी दस धर्म परिगत व्यक्तियों की परिषद का उल्लेख किया है किंतु उन्होंने इसकी विद्वता पर विशेष बल दिया है १८ I बौधायन कहते हैं कि चार तीन अथवा एक ही निष्कलंकित व्यक्ति किसी धर्म विवाद का निर्णय कर सकता है पर सहस्त्रों मूर्ख नहीं I इस प्रकार प्राचीन भारत में सामान्य विधि का विकास हुआ धर्म सूत्रकारों ने स्वयं सामाजिक विधि की सूक्ष्मतम व्यवस्था की किंतु विधि के विकास के अन्य साधनों को समुचित अवसर देकर एक संगठित समाज के हित एवं आवश्यकता की पूर्ति की समयानुकूल पूर्ण व्यवस्था की थी I
निष्कर्ष- सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धर्मशास्त्रकारों ने सामाजिक विधि के विकास एवं उसके विधान की व्यवस्था ही नहीं की I प्रत्येक श्रुति स्मृति के लिखित धर्म नियम अथवा प्रथम परंपराओं के जो युग परिवर्तन के कारण अनावश्यक हो गए थे I प्रतिकार की तार्किक स्वीकृति भी दे दी है I उनके मतानुसार उन प्राचीन कु प्रथाओं का कोई धर्म विविध आधार नहीं है जो प्रस्तुत समाज की नैतिक भावनाओं के प्रतिकूल है प्राचीन काल में महापुरुषों द्वारा किए गए धर्म व्यक्ति क्रम तथा साहस का अनुसरण प् प्रवर्ति युग के व्यक्तियों के लिए न्याय नहीं क्योंकि उनका मनोबल अपेक्षाकृत दुर्बल होता है १९ I इन श्रद्धा भावात्मक कथनों के अतिरिक्त विष्णु का तर्क सम्मत है कि अतीत में प्रचलित उसे धर्म नियम का पालन भी अनुचित है जो समाज के लिए अस्पृहरणीय है २० I तात्पर्य यह है की विधि शास्त्री किसी धर्मशास्त्र के आदेश को चिरंतन नहीं मानते कदाचित उनकी इसी तार्किक प्रवृत्ति के परिणाम स्वरुप भारतीय विधि में सूक्ष्मतम व्यवस्थाओं का विकास संभव हो सका I
संदर्भ ग्रंथ
१-बौद्ध धर्मसूत्र 19.48
२-घोषाल हिस्ट्री आफ पॉलीटिकल आईडियाज पृष्ठ 50
३-गौतम धर्मसूत्र 5.30-31
४-गौतम धर्मसूत्र 11.25-42
५-आप धर्मसूत्र 2.10.26.4-7
६-विष्णु धर्मसूत्र 3.16.2
७-आप धर्मसूत्र 2.10.14.1
८-गौतम धर्मसूत्र 11.28
९-गौतम धर्मसूत्र 11.9-19
१०-बौद्ध धर्मसूत्र 19.7.8
११-बौद्ध धर्म के अतिरिक्त उपनिषदिक दर्शन विविध नीरीश्वरवादी तथा सर्वेश्वरवादी सांख्य और चावार्क जिनका राजत्व में विश्वास था आदि संप्रदाय
१२-गौतम धर्मसूत्र 19.9. 19
१३-राजा वर्णों के कर्तव्य पालन की उचित परिस्थितियों की व्यवस्था कर सकता था किंतु वर्ण के धर्म के प्रतिकूल किसी कार्य को करवाने के लिए विधानतः वह सक्षम न था सिद्धांत रूप से राजा की स्थिति जन सेवक की थी
१४- ऐ ब्राह्मण 8.12.13
१५-आप धर्मसूत्र 1.1.2
१६-स्मृतिचंद्रिका संस्कारकांड चार में उदृत
१७-आप धर्मसूत्र 1.7.20.6
१८-बौद्ध धर्मसूत्र 1.1.1.11
१९-गौतम धर्मसूत्र 1.3
२०-विष्णु धर्मसूत्र 7.84 -85 -89
Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.
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