प्राचीन भारत में नागरिक अधिकार एवं नागरिकता: Difference between revisions
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भूमिका-
प्राचीन भारतीय आचार्यों ने नागरिकों को प्रत्यक्ष व स्पष्ट रूप से कोई अधिकार नहीं सौंप थे I उन्होंने जहां राजा के कर्तव्यों का उल्लेख किया है I उसी से हम जनता के अधिकारों का थोड़ा अनुमान मात्र लगा सकते हैं I नागरिकों को प्राचीन भारत में जो अधिकार प्रदान किए गए थे उनमें से प्रमुख थे धार्मिक स्वतंत्रता, व्यवसाय करने की स्वतंत्रता ,संगठन बनाने की स्वतंत्रता ,शिक्षा प्राप्त करने की स्वतंत्रता, एवं व्यक्तिगत संपत्ति का अधिकार I
नागरिक अधिकार-
इन सभी अधिकारों एवं स्वतंत्रताओं का समाज व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा एवं सामाजिक व्यवस्था ने इन पर क्या प्रभाव डाला I इस बारे में कहा जाता है कि प्राचीन भारत के लोग व्यक्ति की अपेक्षा समाज को अधिक महत्व देते थे I समाज के लाभ के लिए बलिदान करने वाले व्यक्तियों को गौरव प्रदान किया जाता था I व्यक्तिगत लाभ एवं स्वास्थ्य के पीछे समाज का अहित करने वालों की निंदा की जाती थी १ I अतः यह स्वाभाविक है कि व्यक्ति को अधिकार एवं स्वतंत्रताएं प्रदान करते समय सामाजिक हित को प्रमुखता प्रदान की जाती थी I व्यक्ति को जो अधिकार प्रदान किए गए थे I उन पर समाज हित की दृष्टि से सीमाएं भी लगाई गई थी I उदाहरण के लिए हर व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता को ले सकते हैं I प्राचीन भारत में व्यक्ति को विश्वास की स्वतंत्रता प्रदान की गई थी I उसे यह अधिकार दिया गया था कि वह अपनी इच्छा से अनुकूल धर्म का अनुसरण करें I पर इस अधिकार का प्रयोग वह इस तरह नहीं कर सकता था I जिससे कि समाज के हितों को ठेस पहुंचे व्यक्ति ऐसे विश्वास नहीं अपना सकता था I जो सामाजिक परंपराओं एवं रीति-रिवाज के विपरीत हो और इस प्रकार समाज व्यवस्था के लिए खतरा बन जाए यही बात व्यक्ति के संगठन बनाने के अधिकार पर भी लागू होती हैI वैसे प्रत्येक व्यक्ति को यह स्वतंत्रता दी गई थी कि वह अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए विभिन्न प्रकार के संगठन बना सके किंतु इन संगठनों का रूप एवं लक्ष्य ऐसा नहीं हो सकता था I जिससे कि सामाजिक हितों को आघात पहुंच सके चोरों व डकैतों के संगठन को अनुमति नहीं दी जा सकती थी २ I व्यक्ति के अन्य अधिकारों पर भी इसी प्रकार के प्रतिबंध लगे हुए थे इन नागरिक अधिकारों को राज्य की मान्यता प्राप्त होती थी यदि गहराई से अध्ययन किया जाए तो इनका मूल स्रोत राज्य नहीं था I वरन समाज और उनकी परंपराएं थी जिन अधिकारों को समाज ने अपने व्यवहार में ढाल लिया हो वहीं अधिकतर व्यक्ति को प्राप्त हो जाते थे तथा राज्य भी उनकी रक्षा का दायित्व अपने ऊपर ले लेता था ३ I समाज विरोधी कार्य करने पर राज्य उस संघ को समाप्त कर सकता था I राज्य द्वारा इन संघों को उनके पारस्परिक संघर्ष निपटाने की शक्ति प्रदान की जाती थी I विभिन्न संघों के लोगों की व्यक्तिगत समस्याओं को समझना प्रत्येक के बस की बात नहीं थी I नागरिक अधिकारों के संबंध में एक बात यह है कि प्राचीन भारत में जहां कहीं भी संघ व्यवस्था स्थित थी वहां व्यक्ति को समान समझा जाता था I महाभारत में कहा गया है कि गण में कुल तथा जाति के विचार में समानता होती है I इसी समानता को आधार बनाकर हिंदू प्रजातंत्र में राज्य के कार्यों में भी समानता का व्यवहार किया गया I
राज्य और नागरिकता-
प्राचीन भारतीयों ने राज्य और प्रजा के बीच किसी प्रकार के विरोध का दर्शन नहीं किया और यही कारण है कि उन्होंने इन दोनों के अधिकारों तथा कर्तव्य की स्पष्ट रूप से सीमा निर्धारित करना आवश्यक नहीं समझा I राज्य का मुख्य लक्ष्य वही माना गया जो व्यक्ति के जीवन का प्रमुख लक्ष्य था लोक तथा परलोक में सुख संपन्नता की उपलब्धि करने के लिए राज्य द्वारा प्रयास किया जाता था I प्राचीन ग्रंथो में कहा गया है कि यदि राज्य अपने कर्तव्यों का पालन न करे तो क्या हो जाएगा और यदि जनता अपने कर्तव्यों से विमुख हो तो क्या परिणाम निकलेंगे उनमें यह नहीं बताया गया है कि राजा और प्रजा दोनों ही अपने कर्तव्यों का पालन न करें तो क्या करना चाहिए ४ I
प्राचीन भारतीय राज्यों में नागरिकता की मान्यता पर विचार करते समय यह प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या उस समय नागरिक एवं अनागरिक का भेद किया गया था I वैदिक काल की राजनीतिक जीवन का दर्शन प्रत्यक्ष रूप से कहीं नहीं हो पाता I केवल कुछ एक मंत्रों द्वारा हम अनुमान लगा सकते हैं ५ कि उस समय क्या व्यवस्था रही होगी वेदों में इस प्रकार का उल्लेख है कि प्राचीन काल में राजा के कार्यों पर समित जैसी संस्थाओं का नियंत्रण रखा जाता था I इन समितियां को चुनने का अधिकार कितने लोगों को प्राप्त था स्पष्ट नहीं है ६ I अनुमान है कि उस समय इस प्रकार के कुछ विशिष्ट लोगों का एक वर्ग बन गया होगा प्राचीन काल के गणराज्य में एक ऐसा वर्ग भी था I जिसे उच्च अधिकार प्रदान किए जाते थे I इस वर्ग के संबंध में कुछ अधिक जानकारी प्राप्त नहीं हो सकती थी कि इसे क्या अधिकार प्राप्त थे तथा साधारण जनता से उनका क्या संबंध था I
उसके बाद शासन में से यह समितियां विलुप्त हो गई तथा राज्य में समिति निर्वाचन नागरिक एवं अनागरिक के बीच भेद करने की समस्या ही ना रही I ईशा के लगभग 500 वर्ष पूर्व के इस युग में भारत के राजनीतिक पटल पर ग्राम जिला एवं नगर पंचायत आदि का पर्याप्त विकास हुआ I इन संस्थाओं की कार्यवाही में सामान्य जनता की बात मानी जाती थी I यह संस्थाएं निर्वाचन के आधार पर संगठित नहीं की जाती थी वरन इनमें अनुभव तथा उम्र के आधार पर सदस्यों को लिया जाता था I स्थानीय प्रशासन के विभिन्न निकायों का संगठन जिस रूप में किया जाता था उसे प्रजा के किसी भी वर्ग को विशेष अधिकार देने की आवश्यकता नहीं थी I अतः समाज का दो भागों में विभाजन नहीं किया जाता था ७ I
विदेशियों को नागरिकता-
प्राचीन भारत में विदेशियों को भी राज्य का नागरिक बना लिया जाता था I इसके लिए आवश्यक था कि वे लोग राज्य के प्रति भक्ति भाव रखे हैं तथा उनके हानि लाभ में ही अपना हानि लाभ देखें एक व्यक्ति का जन्म चाहे कहीं भी हुआ हो यदि वह राज्य के प्रति भक्ति भाव रखता था तो उसे नागरिकता प्रदान कर दी जाती थी I डॉक्टर जायसवाल ने लिखा है कि प्रजातंत्र में विदेशियों को भी नागरिकता के अधिकार प्रदान किए जाते थे ८ I
भारत के विभिन्न भागों में रहने वाले लोगों के बीच आधारभूत एकता थी I एक भाग में रहने वाला व्यक्ति दूसरे भाग में रहने वाले व्यक्तियों को परदेसी नहीं मानता था I अलतेकर के कथन अनुसार प्रांतीय विभिन्नताओं का विकास धीरे-धीरे हो रहा था पर वह इतनी प्रबल नहीं हो पाई थी कि देश के विभिन्न भागों में स्थापित स्वतंत्र राज्य पड़ोसी राज्य के निवासियों को परदेसी मानकर उन पर रोक-टोक लगते I ९
भारत में रहने वाले विदेशियों पर भी प्रवेश आदि के संबंध में कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया था I भारत के कुछ राज्यों में तो विदेशी शासक पद पर भी आसीन थे I पश्चिमी भारत के राष्ट्रकुल राजाओं ने मुसलमान को अपने राज्य में बसने की सुविधा दी थी I तथा राज्य के कानून का पालन करने के लिए मुसलमान अधिकारी ही नियुक्त करने का परामर्श दिया था I प्राचीन भारतीयों को विश्वास था कि उनकी संस्कृति सही है और इसलिए विदेशियों के प्रभाव से उनको खतरा उत्पन्न होने का अंदेशा नहीं था I यमन शक कुशाण एवं हूंण आदि जो लोग आक्रमणकारी के रूप में यहां आए सभी यहां के समाज में घूल मिल गए I इस स्थिति में यह स्वाभाविक था कि हिंदू कानून शास्त्र विदेशियों के लिए भी एक ही प्रकार की व्यवस्था करते थे १०I
नागरिकों की स्थिति- प्राचीन भारत में नागरिकों की स्थिति इस प्रकार की थी कि उनको ना तो अधिकार संपन्न कहा जा सकता था और ना अधिकार विहीन ही I प्राचीन भारत के लोगों के पास मत देने के अधिकार का तो प्रश्न ही नहीं उठाता था क्योंकि उस समय कानून की रचना जनता के प्रतिनिधियों द्वारा नहीं की जाती थी I वर्णन धर्म द्वारा उनका निश्चय किया जाता था जाति व्यवस्था के आधार पर प्राचीन भारतीय राज्य व्यवस्था को दोष देने का कई विचारकों ने विरोध किया उनका कहना है की जाति के आधार पर व्यवसाय का निर्धारण राज्य द्वारा नहीं समाज की परंपराओं एवं व्यवहार के आधार पर किया जाता है I वैसे प्रारंभ में जाति व्यवस्था के नियम इतने कठोर नहीं थे I प्रत्येक व्यक्ति अपना व्यवसाय चुनने के लिए स्वतंत्रत था I राज्य द्वारा व्यक्ति को व्यवसाय चुनने के लिए बाध्य नहीं किया जाता था I बाद में जाति के अनुसार वृद्धि का प्रश्न प्रमुख बन गया तथा स्मृति ग्रन्थ द्वारा इस बात पर जोर दिया जाने लगा कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी जाति के अनुसार ही व्यवसाय करें I इस प्रकार धर्म ग्रंथो एवं समाज के नियामकों द्वारा समाज में वह व्यवस्था की गई जिसे समानता के अवसरों को कम कर दिया I प्रत्येक व्यक्ति को उसकी इच्छा एवं योग्यता के अनुसार व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता को मर्यादित कर दिया गयाI इस प्रकार सामानता की स्थापना करने का दायित्व पूरी तरह से समाज पर ही था I राज्य पर नहीं समाज की प्रथाएं देवताओं एवं ऋषियों द्वारा बनाई जाती थी I राज्य द्वारा नहीं राज्य से तो यह कहा जाता था कि इसका पालन कराए राज्य द्वारा इस व्यवस्था को लागू कराया जाता था जिसे समाज की स्वीकृति प्राप
कानून के सामने सभी नागरिकों को समान नहीं समझा जाता था I ब्राह्मणों का समाज में अधिक आदर था I उनको श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता था यह मान्यता थी कि ब्राह्मण के कार्यों का निर्धारण ईश्वर द्वारा किया गया है I अतः उनमें किसी प्रकार का हस्तक्षेप करना अनुपयुक्त है जो लोग ऐसा करेंगे वह निश्चय ही नरक को जाएंगे I कानून भी ब्राह्मणों को कुछ विशेष स्तर प्रदान करता थाI एक ही अपराध के लिए ब्राह्मणों को कम दंड दिया जाता था I स्मृतियों में यह कहा गया है कि एक ही अपराध के बाद शुद्र और ब्राह्मण दोनों करते हैं तो ब्राह्मण को उसका पाप अधिक लगेगा और परलोक में अधिक दंड भुगतना पड़ेगा I इतने पर भी उनके लिए इस लोक में अधिक दंड का विधान नहीं किया गया था I यद्यपि भारतीय ग्रन्थों में ब्राह्मणों के गौरव को बढ़ा चढ़ा कर लिखा गया है तथापि वास्तव में उनका इतने विशेष अधिकार प्राप्त नहीं थे I व्यवहार में उन्हें शारीरिक दंड से मुक्त नहीं किया गया था अर्थशास्त्र में कहा गया है कि यदि ब्राह्मण राजद्रोह का अपराध करें तो उसका शिरोच्छेद ना किया जाए बल्कि उसे पानी में डुबोकर मार दिया जाए I इस प्रकार दंड का तरीका अलग था किंतु दंड का परिणाम एक जैसा ही था १२ I
जब कभी राज्य पर संकट आता था तो जनता से लड़ने की तथा लड कर अपने प्राण तक देने की आशा की जाती थी I बाद में जाति व्यवस्था के कठोर बनने पर रक्षा का कार्य क्षत्रियों को सौंप दिया गया I जो क्षत्रिय युद्ध भूमि से लौट आता था वह निंदनीय माना जाता था I अन्य जातियों को युद्ध के अतिरिक्त उद्योग धंधे एवं व्यवसाय आदि करने के लिए कहा गया था I अपने निवास स्थान के प्रति प्राचीन भारतीयों में बड़ा प्रेम था सभी लोग दुश्मन का मुकाबला करने के लिए शास्त्र संभाल लेते थे १३ I
निष्कर्ष-
राष्ट्रवाद का उस समय तक विकास नहीं हो पाया था I प्राचीन ग्रंथो में राजा के लिए ही प्राण न्योछावर करने को कहा है उस समय देश प्रेम अथवा राज्य प्रेम का प्रश्न ही नहीं उठाता था I क्योंकि विभिन्न छोटे-छोटे राज्यों के बीच धर्म संस्कृति तथा भाषा आदि का अधिक अंतर नहीं थाI राज्यों के बीच जो अंतर था वह मुख्य रूप से भौगोलिक था I वैसे उनके बीच अन्य सभी आधारों पर एकरूपता विद्यमान थी राज्यों के बीच जो संघर्ष हुआ करते थे I उनका आदर राजाओं का पारस्परिक संघर्ष एवं प्रतिस्पर्धा थे ना कि व्यक्तियों का राष्ट्रीय भाव परिणाम स्वरुप उस समय हर प्रकार की प्रगति संभव हो सके I प्राचीन भारत के लोग पूरे भारत को ही अपना देश समझते थे I भारत की संस्कृति धर्म एवं स्वतंत्रता पर किसी भी प्रकार का संकट उत्पन्न होने पर प्रत्येक क्षेत्र के निवासी उसे अपना संकट मानते थे I विदेशी आक्रमणकारियों का विरोध करने के लिए भारतीयों में जो एकता समय-समय पर प्रकट हुई उसके प्रभूत उदाहरण इतिहास में यत्र तत्र समुन्नत रूप में बिखरे हुए हैं I
संदर्भ ग्रंथ
१- बी ए सालेटर असिएंट इंडियन पॉलीटिकल थॉट एंड इंस्टीट्यूशन पेज 225
२-एम ए शरण दी भागवत गीता और हिंदू सोशियोलॉजी अध्याय प्रथम
३-डॉ कृष्ण कुमार प्राचीन भारत की प्रशासनिक एवं राजनीतिक संस्थाएं पृष्ठ 112 13
४-डॉ लक्ष्मी दत्त प्रमुख स्मृतियों का अध्ययन पृष्ठ 45
५-डॉ बी डी महाजन प्राचीन भारत का इतिहास पृष्ठ 211
६-उपरोक्त
७-वही पृष्ठ 210
८-डॉ केपी जायसवाल पृष्ठ 163
९-अनंत सदाशिव अलतेकर प्राचीन भारतीय शासन पद्धति पृष्ठ 10
१०-डॉ वी सी पांडे प्राचीन भारत का इतिहास पृष्ठ 106
११-डॉ राधा कुमुद मुखर्जी हिंदू सभ्यता पृष्ठ 155 -56
१२-डॉक्टर रतीभान सिंह नाहर प्राचीन भारत पृष्ठ 140
१३-डॉ उपेंद्र शरण एवं महेश कुमार प्राचीन भारत प्रथम खंड पृष्ठ 307
Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.
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