रामायण में राजनीतिक चिंतन: Difference between revisions

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Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.  
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Latest revision as of 11:11, 1 October 2024

भूमिका-  रामायण में राजनीतिक वातावरण प्रधान है और राम कथा के माध्यम से देश की तत्कालीन राजनीति का बहुत कुछ ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है I रामायण इतिहास राजनीति और यथार्थवाद का उत्कृष्ट नमूना है I काव्य ग्रंथ होते हुए भी उनमें राजनीति के स्पष्ट दर्शन होते हैं I कवि वाल्मीकि ने युद्ध कांड में लिखा है जिन व्यक्तियों ने अर्थशास्त्र और दंड नीति का अध्ययन किया हो उन्होंने ही आर्थिक व राजनीतिक मामलों का विशेषज्ञ समझना चाहिए I  इसकी राजनीतिक विचार निम्न है -

राज्य संबंधी धारणा-  राज्य की उत्पत्ति के संबंध में रामायण मौन है और ना ही राज्य तथा राजा में कोई विशेष अंतर प्रकट करने की चेष्टा की गई है I दोनों ही के महत्व को स्वीकार किया गया है और अराजक अथवा राज्य हीन समाज के दोषों का वर्णन करके स्पष्ट रूप से यह संकेत दिया गया है कि समाज में शांति और सुव्यवस्था की स्थापना के लिए शासन शक्ति अथवा राजा का होना आवश्यक है I १ अराजक राज्य के देशों के क्रम में बतलाया गया है कि ऐसे राज्य में वर्षा नहीं होती खेती अच्छी तरह बोई नहीं जा सकती पुत्र पिता के वश में और पत्नी पति के वश में नहीं रहती धन-धान्य की समृद्धि नहीं होती लोग सभाओं का आयोजन नहीं करते ब्राह्मण यज्ञ नहीं कर पाते लोग सुरक्षित होकर रात्रि को घरों के दरवाजे खोलकर सो नहीं सकते और व्यापारी विक्रय का सामान लेकर कुशलता पूर्वक यात्राएं नहीं कर सकते I अराजक स्थिति में सर्वत्र मत्स्य न्याय हो जाता है I अराजक दशा का इस प्रकार विविध रूपों में चित्रण करके रामायण में यह विश्वास प्रकट किया गया है कि समाज की सुव्यवस्था सदाचार की स्थापना साहित्य की रक्षा और देश की सुख समृद्धि के लिए शासन की आवश्यकता और राजा का महत्व है I रामायण में स्पष्ट संकेत दिया गया है कि राजा ही शासन का दूसरा रूप अथवा पर्याय है I इस प्रकार का विचार तत्कालीन राजतंत्रात्मक शासन व्यवस्था में सर्वथा स्वाभाविक है I

रामायण में राज्य का स्वरूप-  रामायण में राज्य का स्वरूप भी अभिव्यक्त किया गया है I राज्य को सप्तांगी मानते हुए उसके सात अंग या तत्व इस प्रकार बताए गए हैं I राजा ,अमात्य ,जनपद ,कोष, पुर, दंड, सेना, एवं मित्र I अयोध्या कांड के सर्ग 35 में श्री राम ने कहा है कि तुम सेना ,कोष ,दुर्ग ,और जनपद ,के बारे में सदैव सावधान रहना क्योंकि राज्य का पालन अति दुष्कर है I किष्किंधा कांड के सर्ग 19 में हनुमान ने सुग्रीव के सामने इस प्रकार के विचार प्रकट किए हैं कि कोष ,सेना , मित्र आदि से समृद्ध व्यक्ति राज्य को प्राप्त करता है I रामायण में राज्यों के प्रकार अथवा विभिन्न राज्यों का उल्लेख है I शक्तिशाली निर्बल महान और लघु राज्यों का वर्णन मिलता है I कौशल जनपद जैसे शक्तिशाली तथा करद अथवा मांडलिक राज्यों के बीच अंतर दिखाया गया है I राजा दशरथ के आधिपत्य में 300 राज्य बतलाए गए हैंI  जो यद्यपि कुछ ना कुछ सत्ता रखते थे तथापि मांडलिक अथवा कराद राज्य थे I इस प्रकार का वर्णन है कि मांडलिक राज्यों के शासक पुत्रेष्ठि यज्ञ तथा श्री राम के राज्याभिषेक के अवसर पर सादर आमंत्रित किए गए थे और उन्हें सप्रेम विभिन्न प्रकार के उपहार देकर सम्मानित किया गया था I

रामायण से पता चलता है कि दशरथ एक महान सम्राट थे I जिसका चारों दिशाओं में प्रभुत्व था और बड़े-बड़े सामंत शासक अथवा राजा उनके सामने नतमस्तक थेI  तथापि यह विचार तर्कसंगत प्रतीत होता है कि दशरथ की प्रत्यक्ष सत्ता कौशल जनपद और पड़ोसी मांडलिक राज्यों तक ही सीमित रही होगी I इस प्रकार का उल्लेख है कि सीता हरण का समाचार पाकर भरत ने रावण से युद्ध करने के लिए सभी सामंतो राजाओं को एकत्रित किया था जिन्हें बाद में राम ने विदा किया I इससे पता लगता है कि एक बड़े उदार हृदय और शक्तिशाली राजा के नेतृत्व में छोटे शासन या राजा एकत्र होकर अन्य के प्रतिकार करने से मुख नहीं मोड़ते थे I उस समय आर्यों की राजनीति कतिपय अपवादों को छोड़कर निश्चित रूप से धर्म प्रधान थी अर्थात सत्य का पक्ष लेना राजधर्म था I दूसरी ओर यह भी पता चलता है कि अनार्य राजाओं से आर्य शासको का संघर्ष चलता रहता था और अनाड़ी प्राय ऐसे अवसर नहीं चुके थे I जब भी आर्य नरेशों की नींद हराम कर सकें महाभारत में जो युद्ध हुआ वह आर्यों का आर्यों से युद्ध था I अतः यह अनुमान लगाया जाता था कि संभवत उस समय आर्य अनार्य संघर्ष का कल लगभग समाप्त हो चुका था  I रामायण में बार-बार यह व्यक्त किया गया है कि राज्य का वास्तविक उद्देश्य धर्म पालन और सदाचार को प्रोत्साहन देना प्रजा के अर्थ और काम का संवर्धन करना अर्थात उसकी सुख समृद्धि को बढ़ाना तथा ज्ञान को संरक्षण प्रदान करना है I रामायण का संदेश है कि जिस राज्य में उन सब उद्देश्यों की पूर्ति होती होगी I वह राज्य है रामायण के अनुसार राजा दशरथ और राम ने इन उद्देश्य की पूर्ति के गंभीर प्रयास किया और विशेषत: राम राज्य में इस उद्देश्य की अधिकतम पूर्ति हुई I २

राजा संबंधी धारणा-  रामायण में राज्य को सप्तांगी मानते हुए राजा को राज्य रूपी शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग माना गया है I राजा के अभाव में राज्य की कल्पना उस समय दूर की बात थी I राजा की उत्पत्ति के संबंध में रामायण कोई प्रकाश नहीं डालता तथापि उसमें राजा को दैवी अथवा ईश्वर का अवतार माना गया है I रामायण के अनेक स्थानों पर संकेत है कि राम ईश्वर के अवतार हैं I ३ अतः यह कहा जा सकता है की रामायण श्री राम जैसे राजा के रूप में संदेश देती है कि शासन को दैवि गुण से संपन्न होना चाहिए I अर्थात उसे साधुता, नैतिकता ,शौर्य, दयालुता ,धीरज ,दृढ़ता ,सुशासन ,कला ,आदि गुण से विभूषित होना चाहिए I

रामायण में राजा का महत्व-  रामायण में राजा का महत्व सर्वोपरि माना गया है जो सत्य और धर्म का प्रवर्तक और शासन दंड का धारक होता है I राजा के अभाव में अराजकता का जो चित्र खींचा गया है वह शासन व्यवस्था की अनिवार्यता की ओर संकेत करता है I राजा को ईश्वरी इसलिए कहा गया है क्योंकि वह शिष्ट और अशिष्ट का विभाजन करता है I सत्य की रक्षा और असत्य का विनाश करता हैI  आदर्श राजा और राज्य का इस प्रकार चित्रण करके रामायण ने हमारे समक्ष लोक कल्याणकारी राज्य की वास्तविक धरणा स्पष्ट कर दी है I यदि आज के राजनीतिक शासन और राज्य अधिकारी रामायण के संदेश को ग्रहण करें और उसके बताए हुए आदर्श पर चलने का किंचित मात्र भी प्रयास करें तो साधारण जनता स्वयं को उतना अशांत और चिंताग्रस्त अनुभव नहीं करेगी जितना आज संभवत कर रही है I

राजा की नियुक्ति-  राजा की नियुक्ति के संबंध में रामायण में तीन प्रमुख सिद्धांत है I जेष्ठता का सिद्धांत, योग्यता का सिद्धांत ,एवं अनुमति का सिद्धांत I अर्थात राजा की नियुक्ति प्रजा अथवा उसके प्रतिनिधियों की अनुमति पर आधारित होI  राम ने राज्याभिषेक के प्रसंग में इन तीनों ही सिद्धांतों का स्पष्टीकरण होता है I ऐसा उल्लेख है कि राजा दशरथ ने अपने ज्येष्ठ पुत्र के राज्याभिषेक का प्रस्ताव सभा के समक्ष रखते हुए उसके अनुपम गुणों का बखान किया और सभासदों से कहा कि यदि यह विचार आपके अनुकूल सिद्ध हो तो आप इसकी अनुमति प्रदान कीजिए I इस पर सामंत, राजाओं ब्राह्मणों ,सेनाध्यक्षों ,आदि ने नागरिकों तथा प्रजा के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर सर्वसम्मत से निर्णय करते हुए राजा दशरथ से प्रार्थना की कि वह हर प्रकार से राजपद के योग्य श्री राम को युवराज पद पर आसीन करें I इतना ही नहीं राजा दशरथ ने इस बात के प्रति भी अपने को अस्वस्थ किया कि कहीं उनके कहने से ही राम को राजा बनाने की इच्छा प्रजा और अधिकारियों ने प्रकट की है अथवा अपनी आंतरिक इच्छा से प्रेरित होकर जब राजा दशरथ अस्वस्थ हो गए तभी राम के अभिषेक की तैयारी शुरू की गई I रामायण में इस प्रकार के प्रसंग हैं जिनसे राजा के कर्तव्यों पर अच्छा प्रकाश डालते हैंI  तदनुसार राजा का कर्तव्य है कि वह धर्म का पालन कर सत्य की रक्षा करें I चातुर्वर्ण्य के हित के लिए दुराचारिणी स्त्री का वध करने में भी घृणा न करें I हर प्रकार के अधर्म का नाश करें ,शत्रुओं के वध में और मित्रों के संग्रह में रुचि रखे I धर्म अर्थ काम का पालन करते हुए संसार में आत्मावन बने विनम्र रहेI  जितेंद्रिय रहे काम और क्रोध से उत्पन्न होने वाले व्यसनो का त्याग करें I धन-धान्य से परिपूर्ण पोषण और विविध प्रकार के आयुधागारों का स्वामी बनकर प्रजा का मनोरंजन करें विद्वानों संतो चरित्रवणों का आदर करें I अनुशासित जीवन बिताए ,व्यसनों और बुरी प्रवृत्तियों से दूर रहे आदि I

प्रशासन संबंधित दृष्टिकोण-  रामायणकालीन शासन का रूप राजतंत्र था I प्रशासन काफी विकसित था तथा प्रजा सुखी और समृद्धि आर्य और अनार्य दोनों की राजतंत्र समृद्धि में एक दूसरे से होड़ मारते थे I आर्य दशरथ का राज्य धन धान्य से परिपूर्ण था तो अनार्य रावण की लंका समृद्ध में देवलोक के लिए भी ईष्या की वस्तु थी I आर्य और अनार्य दोनों ही राजतंत्र में प्रशासन का अध्यक्ष स्वयं राजा होता था I जिसे परामर्श और राज्य कार्यों के संचालन में सहायता देने के लिए मंत्री सभासद आदि होते थे I अंतर यही था कि जहां दशरथ जैसे आर्य नरेश अपने मंत्रियों पुरोहितों आदि के सत्य परामर्श को मानते थे I और निरंकुश आचरण से बचे रहते थे I वहां अनार्य रावण जैसे राजा किसी के सत्य परामर्श की कोई परवाह नहीं करते थे I उनका आचरण निरंकुश था I आर्य राजतंत्र सीमितऔर संवैधानिक थे धर्म शास्त्रों से उन्हें निर्देश मिलता था और मंत्रिमंडल सभा समिति आदि द्वारा राजा की शक्तियों पर संवैधानिक अंकुश लगा हुआ था I धर्मशास्त्र के विरुद्ध कार्य करने वाला राजा का बहिष्कार भी हो सकता था और बाद भी इस प्रकार का उल्लेख है कि राजा सगर ने अपने ज्येष्ठ पुत्र असमंजस को राज्य से निष्कासित कर दिया था तो राजा बेन का वध किया गया था I रामायण से पता चलता है कि उस युग में दूत अ वध थे I उन्हें मारना राज धर्म की विरुद्ध समझा जाता था और इस परंपरा का पालन आर्य और अनार्य दोनों राजा करते थे I विभीषण ने हनुमान को नहीं मारने का रावण को सत्य परामर्श दिया था क्योंकि दूत को मारना राजा के लिए लज्जा जनक और राजधर्म की विरुद्ध बात मानी जाती थी I

रामायण से यह स्पष्ट है कि प्रशासन कार्य में मंत्रणा का विशेष महत्व व प्रचलन था I हनुमान की लंका में प्रवेश हो जाने पर रावण ने अपने मंत्रियों से परामर्श किया था उसने उत्तम, मध्य और अधम पुरुषों के सामने ही मंत्रणा और परामर्श की भी उत्तम, मध्य और अधम तीन श्रेणियां बताई थी I उसे मंत्रणा अथवा परामर्श को सर्वोत्तम माना गया था I जहां परामर्शदाता एकमत होकर सन्मार्ग दिखाएं पर चूँकि रावण एक प्रकार का अधिनायक था I अतः उसने अपने मंत्रियों और हितेशियों के सत्य परामर्श को ठुकरा कर सीता को हर उसे लौटने से इनकार किया और राम के साथ युद्ध किया I कवि वाल्मीकि ने आर्य नरेश दशरथ के आठ अमात्यों और उनके गुणों का वर्णन किया है I जिससे पता लगता है कि मंत्री गणों का कार्य सदैव राज्य के कल्याण में लगे रहना था उन्हीं व्यक्तियों को मंत्री पद के योग्य समझा जाता था जो तेजस्वी ,सावधान चित्, विनम्र, विक्रमशिल ,क्षमाशील ,यशस्वी ,और प्रफुल्लवदन हो I राजाओं के मंत्री प्रायः बड़े व्यवहार कुशल और न्याय पारायण होते थे I वे  कोष के संरक्षण और सैन्य बल के संग्रह में लगे रहते थे I प्रजा के साथ सामंजस्य बनाए रखने में वे सदैव आगे रहते थे I अनार्य नरेशों के मंत्री अधिकतर नितिहीन चापलूस दंभी और राजा की हां में हां मिलाने वाले होते थे I रावण के मंत्री बहुत कुछ इसी प्रकार के थे और जो विवेकी थे वह उपहास के पात्र बनते थे  I

महत्वपूर्ण निकाय-  सभा या परिषद महत्वपूर्ण निकाय थी I जिसे महत्वपूर्ण अवसरों पर नियंत्रण के लिए आमंत्रित किया जाता था तथा उसकी अनुपस्थिति में पुरोहित प्रधान बनता था I सभा में अमात्य चारों वर्णों के प्रतिनिधि आदि सदस्य होते थे I साथ ही और भी अनेक राज्य अधिकारी होते थे I प्रशासन अनेक विभागों में बांटा था I विभागाध्यक्ष तीर्थ कहलाता था उनकी संख्या लगभग 18 थी I कर विभाग के अधिकारी स्थानीय प्रशासन के अधिकारी भी संभवतः अवश्य रहे होंगे I राजा के दरबार में पुरोहित मंत्रियों, नैगमों ,ऋषियों ,आदि के साथ बैठता हुआ न्याय करता था I न्याय निष्पक्ष था और यह माना जाता था कि जिन लोगों को राजा न्याय पूर्वक दंड देता था वह पाप से मुक्त हो जाते थे I निष्पक्ष न्याय नहीं करने वाला राजा स्वयं पाप का भागी बनता था  I वह व्यवस्था भी प्रचलित थी  I

रामायण में कर व्यवस्था-  रामायण के लोक ने यह मत प्रकट किया है कि राजा को अपनी प्रजा से उपज का छठा भाग कर के रूप में लेना चाहिए I I सामंतो से प्राप्त उपहार भी राज्य की आय के स्रोत थे I अप्रत्यक्ष करारोपण उचित समझा जाता था I यह मान्यता थी कि आय को प्रजा के हितकारी कार्यों में व्यय किया जाना चाहिए I

रामायण में अंतर्राज्यीय संबंध-  रामायण से अंतर राज्य संबंधों का भी ज्ञान होता है यह पता चलता है कि एक बड़े राजा के अधीन अनेक राजा शासन एवं सामंत होते थे I जिन्हें विशेष अवसरों पर आमंत्रित किया जाता था I वह उपहार भेंट करते और आवश्यकता पड़ने पर सैन्य सहायता भी देते थे I रामायण के अनुसार राजा दशरथ इसी प्रकार के महान राजा थे जिनके अधीन सैकड़ो राजा सामंत थे I आर्य और अनार्य दोनों ही राजा दिग्विजय के इच्छुक थे I राजा दशरथ और राम ने दिग्विजय की इच्छा से ही अश्वमेध यज्ञ किया था I दूसरे राजाओं अथवा राज्यों या शासको से मैत्री संधि की जाती थी I रावण से युद्ध करने के लिए राम ने सुग्रीव से मित्रता की थी  I अंतर राज्य संबंधों में साम ,दाम ,दंड ,और भेद सभी राजनीतिक उपायों का आश्रय लिया जाता था I भेद जानने के लिए रावण के भाई विभीषण को छोड़ा गया था I श्री राम ने आवश्यकता अनुसार अनेक राजनीतिक उपायों का आश्रय लिया था  I

रामायण में दूत व्यवस्था-  रामायण में दूत व्यवस्था का प्रचलन था I एक नृप दूसरे नृप के यहां संधि संदेश गुप्तचरी आदि के लिए दूत भेजता था I आर्य श्री राम की ओर से अनार्य रावण की लंका में दूत के रूप में जाने वाले हनुमान का कार्य संदेश वाहक का भी था ,खोजी का भी था, और भेदों का भी था I शुक नामक राक्षस वानर बेस में राम के सैन्य बल और व्यूह रचना का भेद लेने के लिए आया था और पकड़े जाने पर उसने स्वयं को दूत बतलाकर छुटकारा पाया था  I ४

निष्कर्ष-  रामायण के सभी महत्वपूर्ण पात्र अपनी सभी परिस्थितियों में धर्म का अनुपालन करते हैं I ५ और उनके धर्म का आधार सत्य है I राजनीति धर्मवेष्टित है और मर्यादा का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति पापाचरण युक्त माने गए हैं  I राजा अथवा शासन को धर्म भीरू, वीर,  सत्य का रक्षक, दयालू ,पवित्र, और संपूर्ण नैतिक आदर्श से युक्त होने की कामना रामायण में हर जगह व्यक्त है I इन गुणों को राजावर्ग का आचरण माना गया है और इस तरह यह स्पष्ट किया गया है कि सत्य प्रधान होना चाहिए I धर्म केवल व्यक्तिक, सामाजिक व राजनीतिक जीवन का आधार माना है ,तथा यह मान्यता प्रस्तुत की गई है कि धर्म अर्थ और काम के पालन का अंतिम उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति है I धर्म के अंग के रूप में वर्ण और आश्रम धर्म के पालन पर बल दिया गया हैI  अयोध्या के आदर्श राज्य के वर्णन में कवि वाल्मीकि ने कहा है कि क्षत्रिय ब्राह्मण की आज्ञा अनुवर्ती और वैश्य क्षत्रिय का अनुसरण करते हैं और शूद्र तीनों की वर्गों की सेवा में रत हैं I रामायण से संकेत मिलता है कि उस काल में चातुर्वर्ण्य की व्यवस्था स्थापित हो चुकी थी और समाज से यह अपेक्षा की जाती थी कि चार वर्णों के लोग नित्य प्रति धर्म का पालन करते रहे I

संदर्भ ग्रंथ

१-राजा दशरथ के स्वर्गवास के उपरांत राज्य कर्मचारी और अन्य व्यक्ति राजपुरोहित वशिष्ठ से प्रार्थना करते हैं की इच्छवाकु वंश का अविलंब ही कोई राजा बनना चाहिए अन्यथा राजा के अभाव में राष्ट्र छिन्न भिन्न हो जाएगा I

२-आज जिस आदर्श राज्य की कल्पना की जाती है उसके मूल में यही बात है कि शासन यथार्थ रूप में ऐसा लोको पकारक हो जिसमें प्रजा निरंतर सुख और समृद्धि के मार्ग में बड़े सर्वत्र शांति और सुव्यवस्था हो तथा सदाचार और सज्जनता का मूलक हो I उस राज्य के सभी व्यक्ति शुभ लक्षणों से युक्त हो तथा शासको का और राज्य अधिकारियों का चरित्र ऐसा हो जो प्रजा के लिए अनुकरणीय बने I

३-अयोध्या कांड में सुमित्रा ने बालकांड में परशुराम ने और शबरी ने इसी तथ्य का समर्थन किया है I सुंदरकांड में हनुमान ने इन्हें तीनों लोकों का स्वामी बतलाया है I

४-प्राचीन भारतीय सामाजिक एवं राजनीतिक विचार व संस्थाएं -डा० जे पी नेमा

५-उदाहरणार्थ बालकांड अयोध्या कांड के विभिन्न सर्गो में दशरथ राम और हनुमान के मुख से कवि ने भारतीय एकता की अपनी स्पष्ट धारणा व्यक्त की है और कौशल के नैतिक अथवा धार्मिक राज्य तथा लंका के अनैतिक और विलासी राज्यों की तुलना में भी प्रस्तुत की है I

Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.

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