वेदों में राजा: Difference between revisions

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Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.
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Latest revision as of 11:18, 1 October 2024

राजा केअधिकार और कर्तव्य-  राज्यों के क्षेत्र महत्त्व एवं रूप अर्थात शासन विधानो के स्वरूप के आधार पर राजाओं की विभिन्न पदवियां थी राजा साधारणतया वंश परंपरागत होता था और जेष्ठ पुत्र ही प्रायः उत्तराधिकारी माना जाता था I लेकिन विशों द्वारा राजा के वर्ण के उल्लेख से यह आभास होता है कि सिंहासन पर बैठने से पूर्व राजा को प्रजा की औपचारिक स्वीकृति लेनी पड़ती थी I राजा शासन व्यवस्था का सर्वे सर्वा और कर्मधारी होता था I ऋग्वेद में राजा शब्द का व्यापक प्रयोग मिलता है I यजुर्वेद के उल्लेख के अनुसार के राजा की स्थिति प्रजा पर निर्भरती थी  I अथर्ववेद से भी इसी बात की पुष्टि होती है कि राजा ही राष्ट्र का अधिकारी होता था और प्रजा का उसमें महत्वपूर्ण स्थान था I प्रजा की रक्षा करना राजा का सबसे बड़ा धर्म था I वहीं सुरक्षा का भार लेकर न केवल सैनिक संगठन अपितु धन संचय शांति स्थापना और शासन व्यवस्था करता था I ऋग्वेद में मित्र वरुण अग्नि आदि देवताओं ने अपने राजत्व के संबंध में जो कुछ कहा है उससे प्रतीत होता है कि राजा वैभवशाली होते थे और उनका शासन सर्वत्र  अप्रतिहत था I राज्य के निर्वाह के लिए राजा प्रजा से बली कर या उपहार लेते थे I राजा अपने अभिषेक के समय देश की रक्षा और अभ्युदय के लिए वचनबद्ध होता था और प्रतिज्ञा के विरुद्ध आचरण करने पर संभवत उसे पदच्युत् कर दिया जाता था I अथर्ववेद में राजा के बहिष्कृत अथवा पदच्यूत करने का उल्लेख आया है और तैत्तिरीय संहिता आदि में इस प्रकार के राजाओं द्वारा अपने लुप्त ऐश्वर्या की पुनर्प्राप्तिके प्रयासों का भी वर्णन किया गया है १ I

ऋग्वेद से राजा की महानता उसके दैवी अधिकार शक्ति शासन आदि की पुष्टि होती है I वैदिक कालीन राजा प्रजापालक और दीनबंधु थे तथा शासन के सर्वे सर्वा होने पर भी निरंकुश अधिकार संपन्न नहीं थे I राजा स्वयं धर्म का पालन करते थे और प्रजा को भी धर्म का पालन कराते थे I वह वैभवशाली थे और भव्य तथा ऐश्वर्य पूर्ण महल उनके निवास स्थान थे I कानून धर्म ग्रंथो और प्रथाओं पर आधारित थे I अतः राजा को विधि निर्माण के क्षेत्र में विशेष अधिकार प्राप्त नहीं थे I चूकी राज्यों के कार्यों का क्षेत्र बड़ा सीमित था I अतः राजा के कार्यपालिका संबंधी और प्रशासनिक अधिकार भी अधिक नहीं थे I वह सुयोग्य व्यक्तियों को मान और पद देते थे २  I

वैदिक काल में राजा ही न्याय करते थे और दंड देते थे I न्याय विधि के विषय में ऋग्वेद से बहुत कम पता चलता है तथा यह लगभग निश्चित है की चोरी हिंसा अथवा अन्य बड़े अपराधों पर शारीरिक दंड दिया जाता था I ऋग्वेद में एक दृष्टांत मिलता है जिसमें पिता ने अपने पुत्र को अपराधी होने के कारण दंड दिया था I ऋग्वेद में आने वाली मध्यमशी शब्द से विद्वानों ने यह अनुमान लगाया है कि बहुत से झगड़ों का निपटारा पंच नियत करके कर दिया जाता था I राजा दीवानी और फौजदारी दोनों प्रकार के मामलों पर फैसला करता था तथा फौजदारी के मुकदमों में एक विस्तृत विधान संहिता का उपयोग किया जाता था I राजा गुप्तचरो का भी अपने शासन के लिए उपयोग करता था राजा की आज्ञा सर्व मुख्य थी और अवज्ञा करने वालों के साथ बल प्रयोग किया जाता था  I ऋग्वेद से यह संकेत मिलता है कि लोगों में प्रशंसनीय राज भक्ति थी ३ I

ऋग्वेद में राजनय तथा सम्राट शब्दों का प्रयोग हुआ है I जिनका राज्य शासन में विशेष योगदान किया जा सकता है I राजन्य शब्दों का प्रयोग दो अर्थों में किया गया है जमीदार तथा राजा ऐसा प्रतीत होता है कि राजन्य निश्चित ही राजा की सहायक होते थे और स्वयं भी प्रजा के हित में संलग्न रहते थे I वह राजा की प्रभुता को स्वीकार करते थे और साथ ही कुछ विषयों में स्वतंत्र रूप से भी शासन करते थे  I सम्राट शब्द संभवत किसी चक्रवर्ती राजा के लिए प्रयुक्त हुआ है किंतु इस बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता I इस शब्द से सूचित होता है कि संभवत कोई-कोई राजा आसपास के राजाओं को जीतकर सम्राट की उपाधि धारण कर लेते थे ४ I

राजा के मंत्री एवं अधिकारी-  राजा को शासन में सहायता देने के लिए अधिकारी होते थे जिनमें से कुछ के नाम का पता ऋग्वेद से चलता है I सेना का प्रधान अधिकारी सेनानी कहलाता था I ग्राम के मुखिया को ग्रामणी कहा जाता था  I राजाओं को सहायता अथवा मंत्र देने के लिए मंत्री होते थेI  अधिकतर मंत्री पुरोहित वर्ग में ही थे  I राजा के सहायकों में पुरोहितों का स्थान सर्वोपरि था I वह सभी कार्यों में राजा को परामर्श देता था  I पुरोहित को राजा का मित्र पथ प्रदर्शक रण क्षेत्र का साथी और स्तुतिकर्ता माना जाता था I जहां एक  ओर वह धार्मिक कृतियों में राजा का प्रधान सहायक था वहीं दूसरी ओर युद्ध एवं राज्य शासन में भी राजा का प्रभावशाली रूप में हाथ बटाता था I पुरोहित राजा के साथ रण क्षेत्र में जाते थे और अपनी प्रार्थनाओं और मंत्रों द्वारा राजा की विजय का प्रयत्न करते थे I अपनी सेवा के लिए वे अनेक प्रकार से प्रस्तुत भी होते थे I पुरोहित का कार्यालय पुरोहिती और पुरोध कहा जाता था I इन अधिकारियों के अतिरिक्त दूतो और गुप्तचरों का भी उल्लेख है I पुरोहित और सेनानी के बाद ग्रामणी का स्थान प्रमुख था और ग्राम शासन का संपूर्ण भार इस पर था ग्रामणी के ही वर्ग से उपास्ति और इंप नामक पदाधिकारी भी होते थे I सारांश में यह कहा जाना चाहिए कि वैदिक कालीन राजा अपने विभिन्न पदाधिकारी की सहायता से शासन करता था I डॉक्टर राधा कुमुद मुखर्जी ने पुरोहित सेनानी और ग्रामणी को वैदिक राजा के मंत्री कहा है और अल्तेकर ने इन अधिकारियों के समूह को राजा के मंत्रिमंडल की संज्ञा दी है ५  

सभा समिति और संस्थाएं-  ऋग्वेद में सभा तथा समिति नामक दो संस्थाओं का उल्लेख है जो राजा पर नियंत्रण रखती थी सभा को नरिष्टा कहते थे I यह छटे हुए व्यक्तियों की एक स्थाई समिति थी जो संभवतः समिति की सत्ता के अंतर्गत काम करती थी I समिति संपूर्ण प्रजा की राष्ट्रीय संस्था थी जो राजा का चुनाव और राज्य के सभी महत्वपूर्ण मामलों पर विचार करती थी  I समिति की बैठकों में राजा भी सम्मिलित होता था  I सभा में उच्च कुल के व्यक्ति भी भाग लेते थे और समिति में जनसाधारण किंतु समिति में संपूर्ण जनता भाग लेती थी और सभा केवल गांव के लिए होती थी समिति संपूर्ण जाति के कार्यों के लिए जनता की बैठक थी और सभा समितियां को एकत्र होने का स्थान था जहां समिति बैठी होती थी I वेद ऋचाओं में सभ्य शब्द का भी उल्लेख है  I विद्वानों के अनुसार सभा एवं समिति के सदस्य को सभ्य कहा जाता था ६ I

प्रायः सभी लेखकों  का विचार है कि वैदिक कालीन राजा का वरण पदच्युति पुनर्वरण आदि समिति करती थी I राज्य की नीति को स्थिर करना उसी का कार्य था वह सामाजिक और अन्य सामुदायिक विषयों का विवेचन करती थी I सभा महासभा के रूप में कार्य करती थी उसके सदस्यों को कर निर्धारकों का दायित्व निभाना पड़ता था I सभा और समिति की अतिरिक्त दो और भी संस्थाएं थी विदथ तथा सेना विदथ नामक संस्था का मुख्य कार्य यज्ञ और उनसे संबंधित शुद्ध धार्मिक कृत्य करना था सेना का कार्य देश की रक्षा करना था I कुछ विद्वानों का मत है कि ऋग्वेद काल में विदथ अधिक महत्वपूर्ण थी एवं सभा तथा समिति ने संहिताओं के काल में प्रधानता प्राप्त की  I अथर्ववेद काल के अंतर्गत सभा और समिति के अधिकार बनें रहे लेकिन आगे चलकर उनका महत्व क्षीण हो गया ७ I

विचारकों का मत है की सभा और समिति एक ही संस्था थी दो अलग-अलग संस्थाएं नहीं पर बहुमत इन्हें दो संस्थाएं ही मानता है I हम चाहे इस विवाद में ना पड़े लेकिन यह स्वीकार करना होगा कि इन संस्थाओं का तत्कालीन राजनीति में बहुत अधिक महत्व था I समिति में स्वयं राजा का भाग लेना यह प्रमाणित करता है कि राज्य की गूढ़ समस्याओं पर विचार विमर्श इन्हीं संस्थानों में होता था और यह निश्चित ही राजा को निरंकुश होने से बचाती थी ८ I

स्थानीय स्वशासन-  वैदिक साहित्य के अध्ययन से पता चलता है कि शासन की इकाई ग्राम था I केंद्रीय शासन के अधिकार असीमित और निरंकुश नहीं थे I ग्राम में शासन व्यवस्था का भार मुख्यतः ग्रामणी पर होता थाI जिनकी नियुक्ति संभवत राजा स्वयं भी करता है था I शासन व्यवस्था में ग्रामणी का अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान था I जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि वैदिक कालीन शासन का रूप विकेंद्रीकृत था ९ I आपस्तंभ धर्मसूत्र से स्पष्ट होता है कि वैदिक काल में स्थानीय शासन की नियमित पद्धति विकसित हो चुकी थी और ग्राम तथा नगरों में विधिक अधिकारी होते थे I नगर अधिकारी का अधिकार क्षेत्र एक योजन 8 मिल अर्द्धव्यास तक और गांव में अधिकार का एक कोस दो मील तक उपलब्ध होता था  I शताब्दियों तक वैदिक भारत में अनेक स्वराज शासित राष्ट्रमंडल रहे और अनेक प्रकार की सभाओं समितियां तथा संसदों का वर्चस्व बना रहा १० I

निष्कर्ष-  वैदिक साहित्य में राजनीतिक विचारों और संस्थाओं के उल्लेख से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि वैदिक कालीन भारतीय राजनीतिक चिंतन पर्याप्त विकसित हो चुका था और प्रजातांत्रिक भावना से राजतंत्र प्रणाली भली भांति कायम हो चुकी थी I

संदर्भ ग्रंथ

१-आचार्य बलदेव उपाध्याय पुराण विमर्श की भूमिका

२-वाचस्पति गैरोला संस्कृत साहित्य का इतिहास पृष्ठ 229

३-डॉक्टर रामधन शर्मा शास्त्री वैदिक साहित्य ऋग्वेद पृष्ठ 5 -6

४-वही पृष्ठ 6-7

५- डॉ राधा कुमुद मुखर्जी एवं प्रोफेसर अलतेकर

६-डॉ विजेंद्र स्नातक वैदिक साहित्य पृष्ठ 25 -26

७-आचार्य विश्वेश्वर वैदिक साहित्य पृष्ठ 31

८-उपरोक्त पृष्ठ 32

९-रजनीकांत शास्त्री वैदिक साहित्य एक परिसिलन पृष्ठ 87

९-वही पृष्ठ 87

१०-उपरोक्त पृष्ठ 87

Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.

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