शुक्र नीति में राज्य के कार्य: Difference between revisions

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Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.   
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Latest revision as of 11:50, 1 October 2024

राज्य की परिभाषा-  शुक्र के अनुसार राज सात अंगों से बना सावयवी है I यह स्वामी ,अमात्य, मित्र, कोष ,राष्ट्र, दुर्ग, तथा बल के सहयोग से बना हैI  शुक्र ने राज्य के  इन विभिन्न निर्माणक तत्वों की मानव शरीर के विभिन्न अंगों से तुलना करते हुए कहा है ,राज्य के इन सात निर्माणक तत्वों में स्वामी शिर, अमात्य नेत्र, सुहृद कर्ण ,कोष मुख, बल मन ,दुर्ग भुजाएं, और  राष्ट्र पैर, है I उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि शुक्र ने राज्य को सात अंगों वाले सावयवों के रूप में परिभाषित किया है I उन्होंने राजा को शिर की उपमा देकर यह स्पष्ट किया है कि राज्य रूपी शरीर में सर्वोच्च स्थान राजा का होता है I और वह समस्त राज्य प्रशासन का नियंत्रण करता है  I अमात्य प्रशासन का नियंत्रण करते हैं I सुहृद सूचनाओं को राजा तक पहुंचाते हैं, कोष राज्य को भौतिक सामग्री दिलाता है ,वह राज्य के उत्साह को बनाए रखना है ,दुर्ग राज्य की रक्षा में सहायक होते हैं ,और राष्ट्र राज्य को आधार प्रदान करता है I

निर्माणक तत्व-  राज्य के सप्तांग सिद्धांत से यह स्पष्ट है कि शुक्र ने राज्य के अग्र लिखित सात निर्माणक तत्व स्वीकारे हैं I स्वामी ,अमात्य ,सुहृद, कोष ,राष्ट्र ,दुर्ग, तथा बल I शुक्र ने राष्ट्र नामक तत्व के अंतर्गत क्षेत्र तथा इसमें निवास करने वाली जनसंख्या को शामिल किया है I १ शुक्र ने अपने ग्रंथ में राजा एवं अमात्य को सरकार के समान माना है I शुक्र की स्वामी की अवधारणा में प्रभुसत्ता का तत्व भी मौजूद हैI  शुक्र के अनुसार राज्य का स्वामित्व प्राप्त होना अत्यंत श्रेष्ठ है I २ तथा राजा का काल का कारण है और अच्छाई एवं बुराई के चलन का कारण होता है I अपने दंड के भयावह प्रयोग के द्वारा उसे अपनी प्रजा को उसके धर्म में स्थित रखना चाहिए I यह उल्लेखनीय है कि शुक्र नीतिसार के इन प्रसंगों में प्रोफेसर वी के सरकार ने स्वामित्व तथा दंड शब्दों का अर्थ प्रभु सत्ता किया है I ३ अन्य आचार्य की तरह शुक्र ने राजा के चार ऐसे निर्माणक तत्व बताए हैं जिन्हें पश्चात विचारों ने नहीं स्वीकारा कोष, दुर्ग ,बल ,तथा सुहृद I

प्रकार-  शुक्र ने अपने युग के अनुसार राज्य के अनेक रूपों को स्वीकारा है I इस संबंध में प्रमुख बातें निम्नलिखित है -

१-वर्गीकरण का राजनीतिक आधार-  यह वर्गीकरण केवल राजतंत्रात्मक राज्यों से ही संबंधित है I यह शुक्र के युग में प्रचलित राजतंत्रात्मक साम्राज्यवादी शासन प्रणाली से संबंधित है I

२-वर्गीकरण का नैतिक आधार-  इस वर्गीकरण  का आधार इस नैतिक सिद्धांत को स्वीकारा गया है  कि राज्य की आय प्रजा को पीड़ा दिए बिना होनी चाहिए I

३-वर्गीकरण का आर्थिक आधार-  शुक्र ने राज्यों के वर्गीकरण का प्रमुख आधार राज्यों की वार्षिक आय या राजस्व की प्राप्ति को माना है I

४-शासको की पारस्परिक स्थिति-  शुक्र ने केवल सार्वभौम शासन के प्रसंग में ही प्रमुख सत्ता का उल्लेख किया है I इससे यह सहज निष्कर्ष निकलता है कि अन्य शासक उसके अधीन होते हैंI  अर्थात हुए सार्वभौम शासन को कर देते हैं और स्वयं में स्वतंत्र एवं प्रभुत्व संपन्न शासक नहीं होते हैं I

राज्य का कार्य क्षेत्र-  शुक्र के अनुसार राज्य का प्रमुख कार्य क्षेत्र अथवा उसके द्वारा किए जाने वाले प्रमुख कार्य निम्न है -

१-प्रजा की रक्षा करना-  आंतरिक शांति व व्यवस्था को बनाए रखने की दृष्टि से शुक्र ने राजा को निर्देश दिया है कि वह दुष्टों व आताताइयों से सज्जन पुरुषों की रक्षा करें I राजा को चाहिए कि वह अधर्म में डूबे हुए मित्र, पुत्र, गुरु, चोर ,आताताइयों की रक्षा ही नहीं करें अपितु उसे दंडित करें और अपने राज्य में नहीं रहने दे I राजा को चाहिए कि वह अपराधों के अंत के लिए राजाज्ञाएँ जारी करें और दुष्ट व शत्रु जनों को सदैव दंडित करें I ४ शुक्र नीति ने राजधानी प्रशासन तथा ग्राम प्रशासन के वर्णन में भी आंतरिक शांति व व्यवस्था बनाए रखने पर जोर दिया है और राज्य के विभिन्न मार्गो में डाकुओं एवं उपद्रवियों से सुरक्षित रखने की आवश्यकता को स्वीकार है I शुक्र ने राजा को ऐसी राजधानी बनाने का निर्देश दिया है जिसमें वह प्रजा  सहित सुरक्षित निवास करें I ५ राजा को ऐसे दुर्गा का निर्माण करना चाहिए जिसके दीवारों तथा परिखा सुरक्षा देने वाली हो और इस दुर्ग में युद्ध करने में कुशल योद्धा एवं आवश्यक युद्ध सामग्री भी रखनी चाहिए I ६ इस समस्त विवरण से यह स्पष्ट है कि शुक्र के अनुसार वह आक्रमण से प्रजाजन की रक्षा करना राज्य का एक प्रमुख कार्य है I

२-लोकहित संबंधी कार्य-  इनमें कुछ कार्य निम्नलिखित है -

१-राज्य द्वारा विभिन्न विद्याओं विज्ञानों एवं कलाओं के विकास का प्रबंध किया जाना चाहिए तथा अध्ययन समाप्त होने के बाद विद्यार्थियों को उनके योग्य कार्य पर लगाना चाहिए अर्थात उन्हें रोजगार दिया जाना चाहिए I

२-राज्य द्वारा प्रतिवर्ष विद्याओं व कलाओं में निपुण विद्वानों का सम्मान किया जाना चाहिए I इसी प्रकार तपस्वी, वेद एवं स्मृति तथा पुराणों के ज्ञाताओं मंत्र ,तंत्र विशेषज्ञों चिकित्सकों तथा अन्य विषयों के विशेषज्ञों का मासिक या वार्षिक वित्तीय द्वारा भरण पोषण किया जाना चाहिए I ७

३-ऐसे सभी उपाय किए जाने चाहिए जिनके द्वारा प्रजा में धर्म की रक्षा एवं वृद्धि हो I मदिरालयों को ग्राम से बाहर बनाया जाना चाहिए और दिन में किसी को भी मदिरापान की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए I ८

४-राज्य द्वारा कृषि एवं व्यापार की उन्नति में मदद की जानी चाहिए और संपूर्ण कर प्रणाली में इसकी रक्षा होनी चाहिए I

५-राज्य द्वारा कुआं तालाबों तथा बावडियों आदि का निर्माण कराया जाना चाहिए  I

६- देवालयों एवं बगीचों के निर्माण के लिए कर रहित भूमि दान की जानी चाहिए और कुटुम्बियों की स्थिति को देखकर घर बनाने के लिए भूमि दी जानी चाहिए I घर बनाने के लिए भूमि प्रदान करने की यह व्यवस्था ग्राम व नगर दोनों में की जानी चाहिए I ९

७-राज्य द्वारा नदियों पर पुल बनाएं जाने चाहिए और इन्हें पार करने के लिए नौकाओं का भी इंतजाम किया जाना चाहिए I

८-राज्य द्वारा सराय का निर्माण किया जाना चाहिए तथा दो ग्रामों के बीच एक सराय बनाई जानी चाहिए तथा उसकी उचित रखरखाव किया जाना चाहिए I

९-राज्य द्वारा आर्थिक दृष्टि से कमजोर प्रजाजन की रक्षा अर्थात पालन पोषण में मदद दी जानी चाहिए I १०

१०-राज्य द्वारा ग्रामों एवं वनों में विभिन्न प्रकार के वृक्ष लगवाने चाहिए I उनकी खाद की व्यवस्था की जानी चाहिए और उनकी उचित देखरेख की जानी चाहिए ताकि वह नष्ट होने से बचाए जा सके I शुक्र नीतिसार द्वारा बताया गया राज्य का यह कार्य सामान्य पर्यावरण का रक्षक है I

३-अर्थव्यवस्था संबंधी कार्य-  यह कार्य निम्नलिखित है-

१-राज्य द्वारा तराजू बांट धातुओं खाद्यान्न आदि में किसी प्रकार की हेरा फेरी या मिलावट को रोकने के लिए दंड की व्यवस्था की जानी चाहिए I नापतोल के उपकरणों को राजमुद्रा में अंकित होना चाहिए I

२-राज्य की आज्ञा प्राप्त किए बिना अग्रलिखित आर्थिक कार्यों को नहीं किया जाना चाहिए I अचल संपत्ति, बहुमूल्य धातुओं, रत्न, मादक द्रव्यों ,जहरीले द्रव्यों ,पशुधन आदि का क्रय एवं विक्रय, मद्य का बनाना, मद्यपान, जुआ खेलने, चिकित्सा कार्य,आदि के लिए भी राजाज्ञा प्राप्त की जानी चाहिए I

३-चुंगी, भाग, ब्याज ,मेहनताना ,आदि की वसूली में बल या छल द्वारा किसी को पीड़ा नहीं दी जानी चाहिए I ११

४-शुक्र के अनुसार सामान्य व आर्थिक हितों की रक्षा एवं समृद्धि के लिए राज्य को विभिन्न प्रकार की सड़कों का निर्माण करना चाहिए और इन मार्गों को दुष्ट एवं उपद्रवी तत्वों से सुरक्षित भी रखा जाना चाहिए I १२

५- शुक्र के अनुसार सेवा एवं राष्ट्र की रक्षा एवं समृद्धि के लिए कोष का आधारभूत महत्व है I किंतु राजा को कभी भी अन्याय पूर्ण घन का संग्रह नहीं करना चाहिए I राजा को कभी भी लोभवश प्रजा के विभिन्न वर्गों पर अधिक कर नहीं लगाने चाहिए और केवल न्याय संगत ढंग से ही करो की वसूली करनी चाहिए I यदि राजा आपातकाल का मुकाबला करने के लिए प्रजानन से अधिक धन वसूल करें तो आपत्ति काल की समाप्ति पर प्रजाजन को ब्याज सहित धन वापस किया जाना चाहिए I १३

४-समाज व्यवस्था संबंधी कार्य-  शुक्र के अनुसार राजा को शक्तिपूर्वक प्रजाजन से उसे स्वधर्म अर्थात वर्ण धर्म का पालन करना चाहिए I किंतु इसके साथ ही शुक्र ने बताया कि इस संसार में जन्म से कोई भी ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य या शुद्ध नहीं हैI  अपितु गुण तथा कार्य के आधार पर ही मनुष्य में ही उक्त भेद किया जा सकता है I ब्रह्मा ने कर्म के आधार पर चार मुख्य जातियां बने हैं और इन जातियों की आपसी मिलावट से असंख्य जातियां बनी है I मनुष्यों द्वारा विभिन्न कलाओं को अपने से भी इन कलाओं एवं विद्याओं के अनुसार अनेक जातियों की रचना हुई है I कुल व जाति का विचार केवल विवाह तथा भोजन में ही उचित हैI  श्रेष्ठता कुल अथवा जाति से प्राप्त नहीं होती अपितु अपने कर्म सील तथा गुण से ही मनुष्य पूजनीय होता है I राष्ट्र की रक्षा के लिए जरूरी है कि राजा देश जाति काल से संबंधित ऐसे सभी धर्म की प्रयत्न पूर्वक रक्षा करें जो मुनियों द्वारा बताए गए हैंI परंपरा अथवा नवीन मान्यताओं द्वारा स्वीकारे गए हैं I जब प्रजाजन अपने-अपने स्वधर्म का पालन करते हैं और राजा भी धर्म और नीति का पालन करता है तो उसे राजा को चिरस्थाई कीर्ति प्राप्त होती है I १४

शुक्र के अनुसार राज्य सामाजिक नैतिकता का संरक्षक है I राजा के गुणों का ही प्रजाजन अनुकरण करते हैं I वस्तुतः राजा ही प्रजाजन को धर्म तथा अनैतिकता की शिक्षा देता है और इस प्रकार चारों युगों का निर्माण होता है I प्रजाजन के नैतिक उत्थान के लिए राजा को प्रजाजन के पिता माता गुरु भाई तथा मित्र की तरह आचरण करना चाहिए और जरूरत होने पर कुबेर के समान धन देने वाला एवं यम के समान अपराधी को दंडित करने वाला होना चाहिए I यह उल्लेखनीय है कि शुक्र के अनुसार राज्य के बजट की व्यवस्था राशि का 16.66 प्रतिशत सत्र चिकित्सालय, मंदिर, विद्यालय, आदि जैसे सामाजिक सांस्कृतिक व राष्ट्र निर्माण के कार्यों पर खर्च किया जाना चाहिए I १५

५-न्याय संबंधी कार्य-  शुक्र ने कौटिल्य की तरह ही विभिन्न विधि स्रोतों के अलावा राजाज्ञा को भी विधि स्रोत माना है I उन्होंने राजा द्वारा घोषणा के योग्य विभिन्न प्रकार की विधियों का भी उल्लेख किया है I राजाज्ञा का उद्देश्य वेद स्मृति एवं सदाचार द्वारा मान्य विधि को देश काल एवं स्थिति के अनुसार अधिक स्पष्ट करना प्रतीत होता है I ताकि परंपरागत विधि संहिता अद्यतन हो सके I यह उल्लेखनीय है कि शुक्र ने पंडित नामक मंत्री का उल्लेख किया है जो विधि विशेषज्ञ है राज्य का एक अन्य कार्य प्रजा को न्याय दिलाना है I राज्य को न्याय कार्य हेतु नियमानुसार न्यायिक प्रक्रिया का पालन करना चाहिए और दुष्ट को दंडित करते हुए निर्दोष को जय पत्र देना चाहिए I शुक्र के अनुसार यह राजा का प्रमुख कर्तव्य है कि वह व्यवहारों का निर्णय भली प्रकार करें और इस संबंध में अपने आदेशों का पालन कराए राजा को अपने न्यायिक कार्य द्वारा दुष्ट का दमन करना चाहिए और जब राजा न्याय पूर्वक प्रजा की आकांक्षाओं की पूर्ति करता है तो वास्तव में यही प्रजापालन कहलाता है I किंतु जब राजा अपने न्याय कार्य जैसे और कार्यों की अपेक्षा करता है तो उसे नरक के घोर कष्ट सहन करने पड़ते हैं  I १६

६-प्रशासनिक व्यवस्था संबंधी कार्य-  शुक्र ने राज्य के दायित्व एवं कार्यों की पूर्ति के लिए प्रशासनिक व्यवस्था के कुशल संचालन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला है और उसके विभिन्न प्रशासनिक नियमों की व्यवस्था की है I १७ शुक्र ने राज्यवृतियों की आवश्यकता उनके विभिन्न वर्गों एवं नियुक्ति की प्रक्रिया पर विचार किया है I इसके अलावा राज्यवृत्तियों की प्रशिक्षण वेतन सेवा अवधि पदोन्नति अवकाश पेंशन क्षतिपूर्ति बोनस तथा आचार संहिता आदि का भी उल्लेख किया है I शुक्र का मत है कि राजा का उच्च अधिकारियों की मदद निम्न अधिकारियों का नियंत्रण रखना चाहिए तथा इस कार्य में गुप्तचर की भी मदद लेनी चाहिए I इसके साथ ही राजा को प्रतिवर्ष राज्य के विभिन्न भागों का दौरा करके प्रशासनिक व्यवस्था के बारे में प्रजाजन से संपर्क करना चाहिए और प्रजा विरोधी अधिकारियों को दंडित करना चाहिए I

७-पर राष्ट्र संबंधों का संचालन-  शुक्र का मत है कि सभी राजा अन्य राजाओं को अपने अधीन करने की कामना करते हैं और इसलिए उनके बीच स्थाई मित्रता का भाव नहीं  पाया जाता है I अपितु वे अवसर आने पर एक दूसरे के शत्रु सिद्ध होते हैं I १८ अतः राजा को अन्य राजाओं से संबंध रखने व अपने राजहित को ही महत्व देना चाहिए I शुक्र का मत है कि राजा को सदैव अपने हित की रक्षा एवं वृद्धि के लिए लगातार प्रयत्नशील रहना चाहिए I नीति उपाय युक्ति एवं पर्यटन अर्थात राजा द्वारा असंभव कार्यों को भी किया जा सकता है और साध्य की सिद्धि होती है I नीतिमान केवल इस उपाय को अपनाते हैं जो उनका संपूर्ण कल्याण करने वाला हो  I शुक्र नीति सार ने पर राष्ट्र संबंधों के संचालन के साधन के रूप में नीति के चारों उपाय एवं षड्गुणमंत्र पर विस्तार से विचार किया है I इसके साथ ही शुक्र ने यह भी बताया है कि राज्यों के मध्य संबंधों को तय करने में शक्ति के तत्व का अधिक महत्व है I  शुक्र के अनुसार राजा को ऐसे सभी उपाय करने चाहिए अर्थात अपनी विदेश नीति का संचालन इस प्रकार करना चाहिए कि उसके मित्र उदासीन एवं शत्रु राजा स्वयं उससे अधिक शक्तिशाली नहीं हो जाए I १९

यह उल्लेखनीय है कि शुक्र के विवरण में राजहित का अर्थ संपूर्ण राज्य एवं प्रजाजन के हित से ही हैI  शुक्र का आग्रह है कि जब अन्य उपाय असफल हो जाए तभी दंड एवं युद्ध के साधनों को अपनाया जाना चाहिए I इसके साथ ही शुक्र ने पराजित राज्य के प्रति व्यवहार के नियमों का भी उल्लेख किया है जो मूलतः उदार एवं मानवतावादी है I

निष्कर्ष-  प्राचीन भारतीय राज शास्त्रियों ने राज्य को एक जनहित संवर्धन संस्था के रूप में स्वीकारा है और उनका उद्देश्य राजा एवं प्रजाजन को चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति में मदद देना बताया है I आचार्य शुक्र ने इसी परंपरा का पालन करते हुए राज्य के विस्तृत कार्यों का उल्लेख किया है I राजा को ऐसे सभी कर्तव्यों एवं नीतियों का अनुकरण करना चाहिए जो प्रजा पालन में सहायक हो I २० प्रजापालन का भावार्थ है कि राजा द्वारा प्रजा के विभिन्न वर्गों की भौतिक रक्षा तथा उनके आर्थिक व नैतिक उत्थान के लिए विभिन्न कार्य किए जाने चाहिए I राज्य कृषि एवं वाणिज्य के उत्थान में सहायक है और यह शिक्षा संबंधी कार्यों व मद्यपान को मर्यादित करके नैतिक उत्थान में मदद देता है I यह समाज संगठन की रक्षा करता है और उसे स्थायित्व प्रदान करता है शुक्र का राज्य पर्यावरण की रक्षा के प्रति जागरुक है और उसकी बाजार नीति आम आदमी के हितों की रक्षक है I वह व्यक्ति के भौतिक हितों की रक्षा करके उसे नैतिक एवं आध्यात्मिक प्रगति के अवसर प्रदान करता है I इस दृष्टि से शुक्र का राज्य सही अर्थ में जनहित संवर्धन संस्था है I

संदर्भ ग्रंथ

१-शुक्र नीतिसार 4.3/1-2

२-शुक्र नीतिसार 4.3/2-3

३- बी के सरकार द शुक्र नीति पेज 150 और पेज 11 रेफरेंस लाइन 119 -20

४- लिखित्वा शासनं राजा धारयीत चतुष्पथे

सदा चोद्यतदण्डः स्यादसाधुषु च शत्रुषु

५- दृढ़सुरालय मठ पान्थशाला विराजिताम

कल्पयित्वा वसते तत्र सुगुप्तः सप्रजो नृपः

६-शुक्र नीतिसार 1.239-241

७-शुक्र नीतिसार 1.123 -126

८-शुक्र नीतिसार 4.4/ 45

९-शुक्र 5.87-88

१०-शुक्र 4.2/ 20

११-शुक्र 1.308- 309

१२-शुक्र नीतिसार 1.292-93

१३-दृष्टव्य 4.2/35/91/11/5/18/19/24/25 /110/125/128

१४-शुक्र 4.3 /5

१५-अलतेकर प्राचीन भारतीय शासन पद्धति पृष्ठ 212- 213

१६-शुक्र नीतिसार 4.5/8-2

१७-शुक्र 4.5 /8-10

१८-शुक्र 4.5 / 292 -293

१९-शुक्र 4.36

२०-शुक्र के प्रजा कल्याणकारी राज्य के लक्षण है वर्ण व्यवस्था वाला सामाजिक संगठन सामंतवादी आर्थिक संगठन तथा राजतंत्र पर आधारित राजनीतिक संगठन

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