स्मृतियों में राजधर्म: Difference between revisions

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Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.  
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Latest revision as of 12:20, 1 October 2024

भूमिका-  स्मृतियों की भाष्यकारों ने राजनीति की विवेचना में राजधर्म का विश्लेषण मौलिक रूप से किया है I मेघा तिथि ने अर्थशास्त्र एवं स्मृति में विशिष्ट राजधर्म  की राजनीतिपरक व्याख्या को अधिक स्पष्ट कर उसे अलौकिक तत्वों से किंचित पृथक कर दिया है I मनुस्मृति १ में राजधर्म की व्याख्या करते हुए मेघा तिथि ने कहा है कि राजधर्म राजा के समस्त कर्तव्यों का लेखा है यह कर्तव्य दो प्रकार के हैं-

एक राजा के लौकिक कार्यों से संबंध है I जिसके अंतर्गत षड्गुणमंत्र की वैदेशिक नीति आती है I

दूसरे प्रकार का कर्तव्य राजा के अदृष्टार्थ अथवा आध्यात्मिक कार्यों से सम्बद्ध है I

भाष्कार का मत है कि राजधर्म के अंतर्गत वस्तुतः दृष्टांत कार्य ही आते हैं I राज धर्म राज कार्यों से ही विशेषतः सम्बद्ध है I अतः राजनीति का पर्याय हैI  २ कथाचित राज धर्म का वर्ण विशेष के धर्म से जुड़े होने के कारण उसके अलौकिक तत्वों को स्वीकार नहीं किया जा सकता इसलिए मेघा तिथि ने राज धर्म के दो साधन स्रोतों का संकेत किया है I मनुस्मृति में राज धर्म के अंतर्गत राजा के कर्तव्यों की विवेचना करते हुए कात्यायन के एक सूत्र के आधार पर मेघा तिथि कहते हैं कि राजधर्म के वैदिक तथा आर्वैदिक दो उद्भव स्रोत हैं I ३ इसमें कोई आश्चर्य नहीं की टिकाकार ने राज धर्म के अवैदिक आधार पर विशेष बल दिया है I परिस्थितियों के अनुरूप जब राज कुलों की क्षत्रिय उत्पत्ति संदिग्ध थी तब राजधर्म के विरुद्ध राजनीतिक स्वरूप को विशेष महत्व मिलना स्वाभाविक ही था I

राजसत्ता का स्वरूप-  भारतीय राजनीतिक परंपरा में राजसत्ता सिद्धांततः ही नहीं व्यवहारतः भी मर्यादित रही है I स्मृतियों ने कभी राजा की अनियंत्रित सत्ता का समर्थन नहीं किया I  इतना अवश्य है कि धर्म तथा राजनीतिक प्रश्नों के समन्वित विवेचन में यह उतना स्पष्ट नहीं हो पाया है I भाष्यकारों ने इस तथ्य को स्पष्ट किया और साथ ही उसके विवेचन के प्रसंग में राज शक्ति कुछ अधिक परिसीमित हो गई है I मनु के राजधर्म प्रकरण का 7.2 जिसमें राजा की दैवी उत्पत्ति तथा उसकी विदियामी सत्ता का उल्लेख है I  मेघा तिथि ने बड़ा तर्कात्मक विवेचन किया है I राजत्व के दैवी सिद्धांतों के आधार पर उसने राजत्व को जन आभार से उन्मुक्ति नहीं स्वीकार किया I दैवी उत्पत्ति का आशय है राजा का न्याय आचरण तथा आंतरिक व वाह्य शासन में निष्पक्षता का पालन मनु 7.80 ने निर्देशित किया है कि जनता के जीवन तथा मृत्यु के विषय में राजा का विशेषाधिकार उसकी दैवीय उत्पत्ति पर आधारित नहीं है I अपितु राज्य में उसकी सर्वोच्च सत्ता के कारण उसका यह अधिकार है I निष्पक्ष शासन का आधार ही उसकी प्रतिरोधक शक्ति का औचित्य है I राजसत्ता अनिवार्यतः है उसकी स्थिति पर तथा उसकी बल शक्ति उसके शासन कार्यों पर अवलंबित है I ४ कदाचित भाष्यकार ने राजस्व को दैवीय संबंधों से पृथक कर उसे सीमित ही नहीं किया प्रतियुक्त उसके स्वरूप को उपयोगितावादी आधार भी दिया I जन संरक्षण ही राज्य संस्था का हेतुभूत है I

अर्थशास्त्र में राजा के प्रशासनिक आदेशों को राज्य विधि बना दिया गया है मनु तथा याज्ञवलक्य की स्मृतियों में भी राजाज्ञा का उल्लेख हुआ है I मनु 7.13 ने कहा है कि राजा अपेक्षित कार्यों में जिस धर्म की व्यवस्था करता है I जिस विधि को बनता है उसे अनभिलाषित होते हुए भी उसका उल्लंघन नहीं करना चाहिए I मेघा तिथि का कहना है कि ऐसे विघ्नों का अभिप्राय उन कार्य व्यवस्थाओं से है जो धर्मशास्त्र तथा प्रथाओं के प्रतिकूल न हो राजा धर्म व्यवस्था के विपरीत राजाज्ञा उद्घोषित नहीं कर सकता I विज्ञानेश्वर ने याज्ञवलक्य स्मृति 2.186 की व्याख्या करते हुए कहा है कि धर्म व्यवस्था तथा राज्य शासन में कोई विरोध नहीं होना चाहिए  I विज्ञानेश्वर ने इसी संदर्भ की विवेचना करते हुए कहा है कि धर्म व्यवस्था तथा राज्य शासन में कोई विरोध नहीं होना चाहिए I विज्ञानेश्वर ने इसी संदर्भ की विवेचना करते हुए कहा है कि राज्य प्रणीत धर्म का अभिप्राय है पारस्परिक मतैक्य पर आधृत धर्म जनमत के विरुद्ध राजाज्ञा का कोई औचित्य नहीं I इस मूल पाठ पर व्याख्या करते हुए अपरार्क कहते हैं कि राजनीतिक धर्म का तात्पर्य उस धर्म से है जो व्यक्ति की क्षमता के अनुकूल है  I ५ इन भाष्यकारों ने राजाज्ञा के अभिप्राय को सीमित कर वस्तुतः राज सत्ता को मर्यादित कर दिया है I वहीं राजाज्ञा न्याय संगत हैं जो धर्म व्यवस्थाओं से साम्य रखती हैं अथवा जनमत एवं जनक्षमता के विपरीत नहीं है I निसंदेह उन्होंने राजा की निरंकुशता को प्रतिबंधित किया है I

कृत्यकल्पतरु के लेखक लक्ष्मीधर के राजनीतिक विचार मूलतः मनु तथा नारद की स्मृतियों पर आधारित है I यह राजा की दैवी उत्पत्ति और निष्कर्षतः प्रजा के द्वारा राजा की आज्ञा के अविरोध पालन के समर्थक हैं I दंड शक्ति सामाजिक तथा राजनीतिक व्यवस्था का आधार है  I लक्ष्मीधर ने स्मृतियों के आधार पर जनता की संरक्षण करना राजा का नैतिक तथा आध्यात्मिक आधार माना है I ६ स्पष्ट है कि वह राजा की निरंकुश सत्ता में विश्वास करते हैं I राजा पर नैतिक तथा आध्यात्मिक आधार है पर जनता का राजा पर ना कोई आधार है ना कोई प्रतिबंध जैन विद्वान हेमचंद्राचार्य की लघु अहन्नीति में राजनीति की उत्पत्ति का संबंध ऋषि तुल्य राजा ऋषभ से स्थापित किया गया है I ७ राजनीति के मानवीय आधार में राजा की मानवीय उत्पत्ति की अवधारणा अभिनिहित है I राजा की मानवी उत्पत्ति के विचार में राजनिरंकुशता को कम स्थान मिलता है I सामान्यतः इस काल के ग्रंथकार सीमित राज सत्ता के अनुमोदक थे I

राजा का उत्तरदायित्व-  स्मृतियों में राजा का प्रथम कर्तव्य जन संरक्षा कहा गया है I प्रजा की रक्षा करना राजा का दायित्व है I संरक्षण के इस दायित्व का रूप अपरिहार्य है I उसका स्वरूप अनुबंधात्मक तथा सामान्य दोनों है I मनु ने लिखा है कि सदाचारी अथवा आर्य नियमों के पालनकर्ता की संरक्षा करने से राजा स्वर्ग गामी होता है I मेघा तिथि ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा है कि निर्धन असहाय तथा व्युत्पन्न ब्राह्मणों की रक्षा करने से राजा अवृच स्वर्गगामी हो सकता है  I किंतु अन्य जन जो कर प्रदान करते हैं उनकी रक्षा न करने से राजा पातकी होता है I क्योंकि राजा के द्वारा उसकी संरक्षा कर दान के द्वारा क्रय की गई है I अतः राजा के द्वारा यह अनुबंधात्मक संरक्षण अनिवार्य है I जबकि विपन्न व्यक्तियों आदि की रक्षा करना उसका सामान्य दायित्व है I यह राजा का ऐच्छिक अथवा काम्य दायित्व है I राजा का नित्य दायित्व स्मृतियों के इस सिद्धांत पर आश्रित है जिसके अनुसार प्रजा राजा को जो कर देती हैI  वह इसकी संरक्षक सेवाओं का मूल्य है I यह कर राजा की भृति है एक अन्य दृष्टिकोण में मेघा तिथि ने दायित्व के इस विभेद को समाप्त कर दिया हैI  वह कहता है कि जो राजकर नहीं देते हैं उनके संरक्षा वह अपने विशिष्ट धर्म के कारण करने के लिए वाध्य हैं I स्वर्ग आदि की बातें वाग्जाल मात्र है राजा को इन व्यक्तियों की भी रक्षा करनी चाहिए क्योंकि यह भी राज्य के अंग हैं और कर के स्थान पर राजा के लिए प्रति माह एक दिन कार्य करने को आदेशित है I निष्कषतः संरक्षक करने का राजा का दायित्व अनिवार्य है I मनु ने कहा है कि जो राजा चोर आदि का शासन नहीं करता हुआ प्रजा से कर लेता है उसके राज्य में निवास करने वाले लोग क्रुद्ध हो जाते हैं तथा वह राजा स्वर्ग पाने के अधिकार से च्यूत हो जाता हैI मेघा तिथि के अनुसार यह कथन नितांत उचित है यदि राजा कर लेकर भी जो उसकी जीविका है I प्रजा का संरक्षण नहीं करता है तो वह दो दोषों का भागी है I वह आध्यात्मिक दंड तो बाद में प्राप्त करेगा परंतु जन के रोष से राज्य का सर्वनाश पहले हो जाएगा यह भयावह है I इसी अभिप्राय में धर्म शास्त्रों द्वारा राजा पर संरक्षण का दायित्व लादा गया है I अतः जनता के प्रति राजा के संरक्षण के उत्तरदायित्व की बाध्यता आध्यात्मिक नैतिक तथा राजनीतिक सभी दृष्टिकोण से है I

विज्ञानेश्वर ने याज्ञवल्क्य स्मृति के आधार पर जिसमें यह लिखा है कि संरक्षण क्षत्रिय का प्रमुख कर्म है यह कहा है कि संरक्षण राजा की वृद्धि एवं धर्म दोनों है इस स्मृति के एक दूसरे श्लोक 1.5359 के आधार पर अभियुक्त को दंडित करने से राजा को नैसर्गिक लाभ मिलता है I विज्ञानेश्वर ने भाष्य किया है कि स्वर्गिक लाभ का उल्लेख राजा के संरक्षण कर्तव्य को ऐच्छिक नहीं बना देता I वशिष्ठ ने कहा है कि जो राजा यह दायित्व नहीं पूरा करता वह दंड का भागी है I अपरार्क भी इस श्लोक के आधार पर रहते हैं कि राजा पर संरक्षण के दायित्व का स्वरूप अनिवार्य है I भाष्यकारों ने वस्तुतः संरक्षण में आध्यात्मकवाद से सूक्ष्मार्थो का स्पष्टीकरण कर राजा के कर्तव्य को विधानतः अनिवार्य बना दिया है I इस प्रकार जनता के प्रति राजा के कर्तव्यों की पूर्ति उसके राजत्व का आधार बन गया I

व्यक्ति के अधिकार-  भाष्यकारों ने संरक्षण के उत्तरदायित्व की बाध्यता में प्रजा के हित एवं अधिकारों को सर्वोच्च स्थान दिया I उन्होंने नागरिक अधिकारों की सीमा की अभिवृद्धि करके आत्मरक्षा की स्थिति को अधिक संरक्षित कर दिया I मनु ने विशेष अवसरों पर द्विजों को शास्त्र ग्रहण करने का आदेश दिया है क्योंकि धर्मपूर्वक अपराधी को मारने वाला मनुष्य पापी नहीं होता I मेघातिथि कहते हैं कि यदि इन दो श्लोक को अलग-अलग पढ़ा जाए तो यह अर्थ निकलेगा की विशेष अवसर पर ही द्विजशस्त्र ग्रहण कर सकते हैं किंतु यदि इनकी एक साथ व्याख्या की जाए तो यह अर्थ होगा कि द्विज सभी अवसरों पर सत्र ग्रहण कर सकते हैं और यही ठीक भी है क्योंकि कोई आताताई यह प्रतीक्षा नहीं करेगा कि दूसरा व्यक्ति शास्त्र उठाएं I मेघातिथि का दूसरा तर्क यह है कि पूरे देश की संरक्षण में प्रशासन असमर्थ हो सकता है ऐसी स्थिति में आत्मरक्षा का क्या साधन हो सकता है I मनु ने लिखा है कि जब किसी को धार्मिक कर्तव्यों का आधिपत हो अथवा राजा की मृत्यु से उपस्थित से अराजकता फैली हो तब द्विज शस्त्र उठा सकते हैं I मेघा तिथि कहते हैं कि विशिष्ट अवसरों पर यह प्रतिबंध न्याय नहीं है क्योंकि राज्य की सुव्यवस्थित स्थिति में भी राजा राज्य के हर एक कोने तक अपना हस्त प्रसारण नहीं कर सकता I अतः सभी अवसरों पर व्यक्ति का शास्त्र ग्रहण करना विधान प्रतिकूल नहीं हैI  मेघा तिथि ने यहां तक कहा है की आतातायी का हंता राजा द्वारा दंडित भी नहीं होता वह आतातायी को गुप्त रूप से अथवा सबके समक्ष मार सकता है I इस प्रकार मेघातिथि ने आत्मरक्षा के अधिकार को पूर्णत सुरक्षित कर दिया व्यक्ति अपने रक्षा की नहीं अपने कुल तथा संपत्ति की रक्षा के लिए भी शस्त्र धारण कर सकता है  I अतः व्यक्ति का आत्म संरक्षण का अधिकार अपने तक नहीं कुल संपत्ति तथा अन्यजन की रक्षा तक फैला हुआ है I व्यक्ति के राजनीतिक अधिकारों के संबंध में भाष्यकारों का विचार महाभारत के विधान से साम्य रखता है I विश्वरूप कहते हैं कि जब राजा कोई बहुत गंभीर अपराध करें तब उसका वध कर देना चाहिए अन्यथा सेना कोष आदि का विनाश और संभावित हो जाएगा क्योंकि इनका मूलाधार राजा ही होता है  I यह सब राजा के ही नियंत्रण में रहते हैं इसके बल पर वह किसी भी भाँति का कठिन कार्य कर सकता हैI  इस प्रकार भाष्यकारों ने राजा की सत्ता का परिसीमन कर व्यक्ति के अधिकारों की संरक्षा की है I

निष्कर्ष-  स्मृतियां राजनीतिक परक ग्रंथ नहीं है फिर भी मनु तथा याज्ञवल्क्य के स्मृतियों में राजनीतिक चिंतन को विशेष स्थान दिया गया है I उत्तर कालीन, नारद ,बृहस्पति, तथा कात्यायन स्मृतियों में हिंदू विधि एवं व्यवहार के सिद्धांतों की ही विशेष विवेचना है I राजनीतिक तत्वों की कम  है कामन्दकीय नीतिसार एक स्मृति ग्रंथ नहीं है I वह उस युग का अंतिम महत्वपूर्ण राज्यशास्त्र का ग्रंथ है जो प्रधानतः कौटिल्य के अर्थशास्त्र पर अविलंबित है I

संदर्भ ग्रंथ

१-मनुस्मृति 7.1

२-घोषाल पॉलीटिकल थ्योरी एडमिनिस्ट्रेटिव ऑर्गेनाइजेशन

३-घोषाल पॉलीटिकल आईडियाज पृष्ठ 415

४-घोषाल पॉलीटिकल आईडियाज पृष्ठ 418

५- घोषाल पूर्वोक्त पृष्ठ 414

६- कृत्यकल्पतरू राजधर्मकांड पृष्ठ 83-86

७-लघु अर्हन्नीति 1/8/17

Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.

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