प्राचीन भारतीय ग्रंथों में राज्य की उत्पत्ति: Difference between revisions

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'''प्राचीन भारतीय ग्रंथों में राज्य की उत्पत्ति'''  
'''प्राचीन भारतीय ग्रंथों में राज्य की उत्पत्ति'''  


'''      भूमिका'''-प्राचीन भारतीय ग्रंथों में राज्य की उत्पत्ति से संबंधित विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है | राज्य की उत्पत्ति के वर्णन में कुछ समस्याएं उस समय भी थी ,कोई ऐतिहासिक प्रमाण न मिलने के कारण विचारों को बहुत कुछ अनुमानजन्य कल्पना के आधार पर चलना पड़ा I वर्तमान को देखकर उन्होंने भूतकाल की कल्पना की, इस कल्पनाओं को करते समय उनपर तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों का प्रभाव पड़ा और धार्मिक तथा नैतिक विश्वासों ने उनके रूप को संवारा  I प्राचीनता का अध्ययन करने के लिए आज मानव ने जिन सुविधाओं का आविष्कार किया है वह प्राचीन काल में नहीं थी I
'''भूमिका'''  


'''प्राचीन भारत की राजनीतिक व्यवस्था -''' प्राचीन भारत के राजनीतिक व्यवस्था के वास्तविक स्वरूप को भली- भांति समझने के लिए आवश्यक है कि हम ब्रह्म की मान्य अवधारणा पर विचार करें I ब्रह्मा का अर्थ है- यज्ञ अतः याज्ञिक क्रियाओं के संपादन का उत्तरदायित्व ब्राह्मण को जाता है ये वेदों पर ही आधारित है I वैदिक मंत्रो की व्याख्या करते हुए यह अपने यज्ञों को प्रतिपादित करते थे I अधिकांश ब्राह्मण ग्रंथ गद्य में लिखे हैं परंतु कहीं-कहीं पद्य भी मिलता है I   
प्राचीन भारतीय ग्रंथों में राज्य की उत्पत्ति से संबंधित विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है | राज्य की उत्पत्ति के वर्णन में कुछ समस्याएं उस समय भी थी ,कोई ऐतिहासिक प्रमाण न मिलने के कारण विचारों को बहुत कुछ अनुमानजन्य कल्पना के आधार पर चलना पड़ा I वर्तमान को देखकर उन्होंने भूतकाल की कल्पना की, इस कल्पनाओं को करते समय उनपर तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों का प्रभाव पड़ा और धार्मिक तथा नैतिक विश्वासों ने उनके रूप को संवारा  I प्राचीनता का अध्ययन करने के लिए आज मानव ने जिन सुविधाओं का आविष्कार किया है वह प्राचीन काल में नहीं थी I
 
'''प्राचीन भारत की राजनीतिक व्यवस्था'''
 
प्राचीन भारत के राजनीतिक व्यवस्था के वास्तविक स्वरूप को भली- भांति समझने के लिए आवश्यक है कि हम ब्रह्म की मान्य अवधारणा पर विचार करें I ब्रह्मा का अर्थ है- यज्ञ अतः याज्ञिक क्रियाओं के संपादन का उत्तरदायित्व ब्राह्मण को जाता है ये वेदों पर ही आधारित है I वैदिक मंत्रो की व्याख्या करते हुए यह अपने यज्ञों को प्रतिपादित करते थे I अधिकांश ब्राह्मण ग्रंथ गद्य में लिखे हैं परंतु कहीं-कहीं पद्य भी मिलता है I   


       '''वेदों में''' क्षत्र शब्द का प्रयोग शासन अथवा शासक के अर्थ में हुआ है I क्षत्रिय वे कहलाते हैं जिनका कर्तव्य आर्य समाज पर शासन तथा उसकी रक्षा करना था I कालांतर में वे ब्राह्मण जो शासक बनते थे कभी-कभी ब्रह्म क्षत्रीय कहलाते थे I प्राचीन भारतीय विचारको ने राज्य की आवश्यकता को महसूस किया राज्य एक अमूर्त संस्था है और इसमें सत्ता का प्रयोग राजा के माध्यम से किया जाता है, इसलिए  
       '''वेदों में''' क्षत्र शब्द का प्रयोग शासन अथवा शासक के अर्थ में हुआ है I क्षत्रिय वे कहलाते हैं जिनका कर्तव्य आर्य समाज पर शासन तथा उसकी रक्षा करना था I कालांतर में वे ब्राह्मण जो शासक बनते थे कभी-कभी ब्रह्म क्षत्रीय कहलाते थे I प्राचीन भारतीय विचारको ने राज्य की आवश्यकता को महसूस किया राज्य एक अमूर्त संस्था है और इसमें सत्ता का प्रयोग राजा के माध्यम से किया जाता है, इसलिए  


'''प्राचीन भारत में राज्य के महत्व-'''    प्राचीन भारत में राज्य के महत्व को विचारको ने स्वीकार किया I सोमदेव कहते हैं कि प्रजाजन अपना मूल राजा में पाते हैं I ऐसे वृक्ष के लिए जिनका मूल ही ना हो मानव बुद्धि और प्रयत्न क्या कर सकते हैं I ('''१)''' नीति वाक्यमृतम के लेखक सोमदेव ने अपने ग्रंथ के प्रथम सूत्र में ही राज्य को नमस्कार किया है क्योंकि राज्य ही धर्म और अर्थ का फल देने वाला वृक्ष है '''(२)''' I अतः स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय विचारको ने राज्य के महत्व को स्वीकार किया जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य की उत्पत्ति ही सत्ता की उत्पत्ति में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती है I प्राचीन भारत राज्य का आधार पूर्ण रूप से ब्रह्म क्षत्र संबंधों पर आधारित था, क्योंकि ब्राह्मणों ने अपने पास आध्यात्मिक सत्ता को रखा था और राजाओं के पास सांसारिक शक्ति थी अर्थात राजाओं की शक्ति ब्राह्मण अपने आध्यात्मिक राज्य द्वारा वैधता प्रदान करते थे I इसके उदाहरण प्राचीन काल में प्रचलित यज्ञों के माध्यम से और अधिक स्पष्ट होती है I
'''प्राचीन भारत में राज्य के महत्व'''
 
   प्राचीन भारत में राज्य के महत्व को विचारको ने स्वीकार किया I सोमदेव कहते हैं कि प्रजाजन अपना मूल राजा में पाते हैं I ऐसे वृक्ष के लिए जिनका मूल ही ना हो मानव बुद्धि और प्रयत्न क्या कर सकते हैं I ('''१)''' नीति वाक्यमृतम के लेखक सोमदेव ने अपने ग्रंथ के प्रथम सूत्र में ही राज्य को नमस्कार किया है क्योंकि राज्य ही धर्म और अर्थ का फल देने वाला वृक्ष है '''(२)''' I अतः स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय विचारको ने राज्य के महत्व को स्वीकार किया जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य की उत्पत्ति ही सत्ता की उत्पत्ति में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती है I प्राचीन भारत राज्य का आधार पूर्ण रूप से ब्रह्म क्षत्र संबंधों पर आधारित था, क्योंकि ब्राह्मणों ने अपने पास आध्यात्मिक सत्ता को रखा था और राजाओं के पास सांसारिक शक्ति थी अर्थात राजाओं की शक्ति ब्राह्मण अपने आध्यात्मिक राज्य द्वारा वैधता प्रदान करते थे I इसके उदाहरण प्राचीन काल में प्रचलित यज्ञों के माध्यम से और अधिक स्पष्ट होती है I
 
'''राजसूय यज्ञ''' के एक संस्कार में पुरोहित राजा की पीठ पर चुपचाप दंड प्रहार करता है I '''(३)''' कुछ लेखक इसे पुरोहितों की राज्य सत्ता की पराकाष्ठा मानते हैं I'''(४)''' दूसरों की मान्यता यह है कि इसके द्वारा राजा को कानून के अधीन लाया जाता है I '''(५)''' कुछ और अन्य विद्वानों की मान्यता यह है कि इस विधि से राजा की शुद्धि की जाती थी या उसे विशेषाधिकार( जैसे यह की राजा दंड से परे है) प्रदान किया जाता था I इस प्रकार के यज्ञों से यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में पुरोहितों की राज्य सत्ता का आधिपत्य राजाओं के ऊपर था I
 
'''मनु स्मृति मे राज्य की उत्पत्ति'''
 
मनु स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि क्षत्रिय के बिना ब्राह्मण की और ब्राह्मणों के बिना क्षत्रियों की समृद्धि असंभव है तथा एक होकर ये इस लोक और परलोक दोनों में समृद्धि का सकते हैं I'''(७)'''  इस विवरण से यह स्पष्ट होता है कि सत्ता को प्राप्त करने के लिए राजा ब्राह्मण और ब्राह्मणों द्वारा प्राप्त वैधानिकता पर आश्रित थे I इसी क्रम में राज्य की उत्पत्ति के समझौते सिद्धांत का हल्का सा आभास सबसे पहले दो ब्राह्मण ग्रंथों में मिलता है I इसमें असुरों पर विजय प्राप्त करने के लिए देवताओं के बीच राजा के चुनाव का जिक्र है I'''(८)'''
 
'''ऐतरेय ब्राह्मण में राज्य की उत्पत्ति'''
 
 ऐतरेय ब्राह्मण में इंद्र के राज्याभिषेक के संदर्भ में इस विचार को पल्लवित किया गया है I इसके अनुसार प्रजापति के नेतृत्व में देवताओं ने आपस में कहा कि हमारे बीच इंद्र कार्य संपादन के लिए स्वाधित, स्वस्थ ,शक्तिशाली ,सर्व रूपेण, पूर्ण, और सर्वोत्तम है , इसलिए उन्होंने इसे राजपथ पर प्रतिष्ठित करने और तदनुसार उसका अभिषेक करने का निश्चय किया I'''(९)''' इस अभिषेक से उनके विभिन्न प्रकार के संस्कार किए गए I'''(१०)''' यहां स्पष्ट यह है कि राज्य की प्राप्ति के लिए इस निर्वाचन में निर्वाचक और निर्वाचित के बीच एक प्रकार की सहमति होती है I '''(११)'''
 
'''राज्य की उत्पत्ति की समस्या'''


  '''राजसूय यज्ञ''' के एक संस्कार में पुरोहित राजा की पीठ पर चुपचाप दंड प्रहार करता है I '''(३)''' कुछ लेखक इसे पुरोहितों की राज्य सत्ता की पराकाष्ठा मानते हैं I'''(४)''' दूसरों की मान्यता यह है कि इसके द्वारा राजा को कानून के अधीन लाया जाता है I '''(५)''' कुछ और अन्य विद्वानों की मान्यता यह है कि इस विधि से राजा की शुद्धि की जाती थी या उसे विशेषाधिकार( जैसे यह की राजा दंड से परे है) प्रदान किया जाता था I इस प्रकार के यज्ञों से यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में पुरोहितों की राज्य सत्ता का आधिपत्य राजाओं के ऊपर था I  
राज्य की उत्पत्ति की समस्या प्राचीन भारत की एक विलक्षण समस्या है I इसके संबंध में हमें प्राचीन भारत के उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर होना पड़ता है महाभारत में लिखा है कि बहुत समय तक बिना राजा और न्यायाधीश के ही समाज शतपथ पर चला रहा परंतु बाद में किसी प्रकार अधः पतन प्रारंभ हो गया I लोग सदाचार से भ्रष्ट होकर स्वार्थ को और वासना के वश में हो गए और जिस स्वर्गीय व्यवस्था में वे रहते थे, वह नरक बन गई I '''मत्स्य न्याय''' का बोलबाला हुआ, बलवान निर्बलों को खाने लगे , देवता भी यह सब देखकर चिंतित हुए और उन्होंने इस दुर्दशा का अंत करने का निश्चय किया I लोग ब्रह्मा की शरण में आए ब्रह्मा जी इस निष्कर्ष पर पहुंचे की मनुष्य जाति की तभी रक्षा हो सकती है, जब एक आचार शास्त्र बनाया जाए और उसे राजा के द्वारा कार्यान्वित किया जाए I अतः उन्होंने एक विस्तृत विधान बनाया जनता ने भी उनके अनुशासन में रहना स्वीकार किया I '''(१२)''' इस विवरण से स्पष्ट है कि राज्य की उत्पत्ति देवी मानी जाती है और इस पतित जीवन का अंत करने की नीयत से उसकी आज्ञा मानने के लिए प्रजा सहमत थी I'''( १३)'''


'''मनु स्मृति मे राज्य की उत्पत्ति''' - मनु स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि क्षत्रिय के बिना ब्राह्मण की और ब्राह्मणों के बिना क्षत्रियों की समृद्धि असंभव है तथा एक होकर ये इस लोक और परलोक दोनों में समृद्धि का सकते हैं I'''(७)'''  इस विवरण से यह स्पष्ट होता है कि सत्ता को प्राप्त करने के लिए राजा ब्राह्मण और ब्राह्मणों द्वारा प्राप्त वैधानिकता पर आश्रित थे I इसी क्रम में राज्य की उत्पत्ति के समझौते सिद्धांत का हल्का सा आभास सबसे पहले दो ब्राह्मण ग्रंथों में मिलता है I इसमें असुरों पर विजय प्राप्त करने के लिए देवताओं के बीच राजा के चुनाव का जिक्र है I'''(८)'''
'''महाभारत के शांति पर्व में''' '''राज्य की उत्पत्ति'''  


'''  ऐतरेय ब्राह्मण में राज्य की उत्पत्ति-'''  ऐतरेय ब्राह्मण में इंद्र के राज्याभिषेक के संदर्भ में इस विचार को पल्लवित किया गया है I इसके अनुसार प्रजापति के नेतृत्व में देवताओं ने आपस में कहा कि हमारे बीच इंद्र कार्य संपादन के लिए स्वाधित, स्वस्थ ,शक्तिशाली ,सर्व रूपेण, पूर्ण, और सर्वोत्तम है , इसलिए उन्होंने इसे राजपथ पर प्रतिष्ठित करने और तदनुसार उसका अभिषेक करने का निश्चय किया I'''(९)''' इस अभिषेक से उनके विभिन्न प्रकार के संस्कार किए गए I'''(१०)''' यहां स्पष्ट यह है कि राज्य की प्राप्ति के लिए इस निर्वाचन में निर्वाचक और निर्वाचित के बीच एक प्रकार की सहमति होती है I '''(११)'''
    महाभारत के शांति पर्व में भी इस अराजक दशा का वर्णन इस प्रकार किया गया है I '''(१४)''' इसके शांति पर्व अध्याय 67 में राज्य की उत्पत्ति के संबंध में लिखा है कि, जैसे सूर्य और चंद्रमा के उदित न होने पर सब प्राणी घोर अंधकार में डूब जाते हैं और एक दूसरे को देख नहीं सकते I जैसे जल में मछली और आकाश में पंछी एक दूसरे की हत्या करते हुए स्वेच्छाचारी रूप से विचरण करते हैं उसी प्रकार राज्य और राजा के अभाव में प्रजा का विनाश हो जाता है और वह घोर अंधकार में डूब जाती है I'''( १५)'''  शांति पर्व के 67 वे अध्याय से यह मालूम होता है कि लोगों में एक इकरार या सहमति हुई थी I उसका पालन नहीं हो पाया जब लोग चिरकालीन अराजकता से ऊब गए तब उन्होंने आपस में एक सहमति की कि समाज संकटों को समाज से बाहर निकाल दिया जाए I'''(१६)''' सहमति के सिद्धांत के अनुसार यह बताया गया कि लोगों ने स्वयं इकरार के अनुसार वर्ताव करने की जिम्मेदारी स्वीकार की और मनु को यह आश्वासन दिया कि अपराधियों को दंड देने से राजा को कोई पाप नहीं लगेगा I अपितु यह अपराधियों के पाप का फल होगा शासन कार्य का खर्च चलाने के लिए जनता ने योग्य कर देने का भी मनु को आश्वासन दिया I '''(१७)''' मनु ने अराजक दशा के लिए यह भी लिखा है कि उस समय बलवान लोग दुर्बलों की इस प्रकार से हिंसा किया करते थे जैसा की जल में मछलियां अन्य निर्बल मछलियों की करती हैं I '''(१८)'''  


'''  राज्य की उत्पत्ति की समस्या'''- राज्य की उत्पत्ति की समस्या प्राचीन भारत की एक विलक्षण समस्या है I इसके संबंध में हमें प्राचीन भारत के उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर होना पड़ता है महाभारत में लिखा है कि बहुत समय तक बिना राजा और न्यायाधीश के ही समाज शतपथ पर चला रहा परंतु बाद में किसी प्रकार अधः पतन प्रारंभ हो गया I लोग सदाचार से भ्रष्ट होकर स्वार्थ को और वासना के वश में हो गए और जिस स्वर्गीय व्यवस्था में वे रहते थे, वह नरक बन गई I '''मत्स्य न्याय''' का बोलबाला हुआ, बलवान निर्बलों को खाने लगे , देवता भी यह सब देखकर चिंतित हुए और उन्होंने इस दुर्दशा का अंत करने का निश्चय किया I लोग ब्रह्मा की शरण में आए ब्रह्मा जी इस निष्कर्ष पर पहुंचे की मनुष्य जाति की तभी रक्षा हो सकती है, जब एक आचार शास्त्र बनाया जाए और उसे राजा के द्वारा कार्यान्वित किया जाए I अतः उन्होंने एक विस्तृत विधान बनाया जनता ने भी उनके अनुशासन में रहना स्वीकार किया I '''(१२)''' इस विवरण से स्पष्ट है कि राज्य की उत्पत्ति देवी मानी जाती है और इस पतित जीवन का अंत करने की नीयत से उसकी आज्ञा मानने के लिए प्रजा सहमत थी I'''( १३)'''  
'''कल्पतरु''' '''में''' '''राज्य की उत्पत्ति'''


  '''महाभारत के शांति पर्व में''' '''राज्य की उत्पत्ति''' -     महाभारत के शांति पर्व में भी इस अराजक दशा का वर्णन इस प्रकार किया गया है I '''(१४)''' इसके शांति पर्व अध्याय 67 में राज्य की उत्पत्ति के संबंध में लिखा है कि, जैसे सूर्य और चंद्रमा के उदित न होने पर सब प्राणी घोर अंधकार में डूब जाते हैं और एक दूसरे को देख नहीं सकते I जैसे जल में मछली और आकाश में पंछी एक दूसरे की हत्या करते हुए स्वेच्छाचारी रूप से विचरण करते हैं उसी प्रकार राज्य और राजा के अभाव में प्रजा का विनाश हो जाता है और वह घोर अंधकार में डूब जाती है I'''( १५)'''  शांति पर्व के 67 वे अध्याय से यह मालूम होता है कि लोगों में एक इकरार या सहमति हुई थी I उसका पालन नहीं हो पाया जब लोग चिरकालीन अराजकता से ऊब गए तब उन्होंने आपस में एक सहमति की कि समाज संकटों को समाज से बाहर निकाल दिया जाए I'''(१६)''' सहमति के सिद्धांत के अनुसार यह बताया गया कि लोगों ने स्वयं इकरार के अनुसार वर्ताव करने की जिम्मेदारी स्वीकार की और मनु को यह आश्वासन दिया कि अपराधियों को दंड देने से राजा को कोई पाप नहीं लगेगा I अपितु यह अपराधियों के पाप का फल होगा शासन कार्य का खर्च चलाने के लिए जनता ने योग्य कर देने का भी मनु को आश्वासन दिया I '''(१७)''' मनु ने अराजक दशा के लिए यह भी लिखा है कि उस समय बलवान लोग दुर्बलों की इस प्रकार से हिंसा किया करते थे जैसा की जल में मछलियां अन्य निर्बल मछलियों की करती हैं I '''(१८)'''  
  यही युक्ति कल्पतरु में भी पाई जाती है I'''(१९)''' अराजक दशा या मत्स्यपाप की दशा से उद्धिग्न होकर प्रजा ने राजा के साथ समय किया और राजा की नियुक्ति की - यह विचार प्राचीन समय में इतना अधिक प्रचलित था कि पाल वंश के प्रथम राजा गोपाल को भी इसी प्रक्रिया द्वारा प्रजा ने अपना राजा नियत किया I यह पाल वंशी राजा धर्मपाल के लखीमपुर से प्राप्त दान- पत्र में उल्लेखित है Iवहां लिखा है मत्यपाप- पाप को दूर करने के लिए प्रवृत्तियों ,प्राजजनों ने गोपाल को लक्ष्मी का हाथ पकड़ा या वह गोपाल क्षितीशो के सिरों पर चूड़ामणि के समान प्रतिष्ठित है I'''( २० )'''


'''कल्पतरु''' '''में''' '''राज्य की उत्पत्ति''' -   यही युक्ति कल्पतरु में भी पाई जाती है I'''(१९)''' अराजक दशा या मत्स्यपाप की दशा से उद्धिग्न होकर प्रजा ने राजा के साथ समय किया और राजा की नियुक्ति की - यह विचार प्राचीन समय में इतना अधिक प्रचलित था कि पाल वंश के प्रथम राजा गोपाल को भी इसी प्रक्रिया द्वारा प्रजा ने अपना राजा नियत किया I यह पाल वंशी राजा धर्मपाल के लखीमपुर से प्राप्त दान- पत्र में उल्लेखित है Iवहां लिखा है मत्यपाप- पाप को दूर करने के लिए प्रवृत्तियों ,प्राजजनों ने गोपाल को लक्ष्मी का हाथ पकड़ा या वह गोपाल क्षितीशो के सिरों पर चूड़ामणि के समान प्रतिष्ठित है I'''( २० )'''
'''निष्कर्ष'''  


'''  निष्कर्ष''' - अतः महाभारत आदि अन्य उक्त अवतारों पर विचार करने से जो निष्कर्ष हमारे सामने आता है वह निश्चित रूप से इस मत को स्पष्ट करता है कि आखिरकार व्यक्तियों को अपनी अराजकता स्थिति से बचाव के लिए ईश्वर के पास जाना पड़ता है और ईश्वर ने ही उसके लिए ऐसे सर्वमान्य राज्य की व्यवस्था की , जो समाज में कानूनी व्यवस्था को सही ढंग से लागू करें और सारा समाज उसकी आज्ञाओं को माने I यही कारण था कि लाखों लोगों पर राज्य करने का अधिकार राजा को प्राप्त हो गया I जो भी हो पूरे प्राचीन भारतीय समाज में हमारे सामने राज्य की उत्पत्ति का जो स्वरूप सामने आता है उसके मूल में हमें देवी अवधारणा का सबसे अधिक प्रमाण दिखाई देता है I संभवत: प्राचीन चिंतकों के सामने राज्य की उत्पत्ति का प्रश्न निश्चित रूप से एक समस्या ग्रस्त अवधारणा के रूप में सामने आया होगा I  
अतः महाभारत आदि अन्य उक्त अवतारों पर विचार करने से जो निष्कर्ष हमारे सामने आता है वह निश्चित रूप से इस मत को स्पष्ट करता है कि आखिरकार व्यक्तियों को अपनी अराजकता स्थिति से बचाव के लिए ईश्वर के पास जाना पड़ता है और ईश्वर ने ही उसके लिए ऐसे सर्वमान्य राज्य की व्यवस्था की , जो समाज में कानूनी व्यवस्था को सही ढंग से लागू करें और सारा समाज उसकी आज्ञाओं को माने I यही कारण था कि लाखों लोगों पर राज्य करने का अधिकार राजा को प्राप्त हो गया I जो भी हो पूरे प्राचीन भारतीय समाज में हमारे सामने राज्य की उत्पत्ति का जो स्वरूप सामने आता है उसके मूल में हमें देवी अवधारणा का सबसे अधिक प्रमाण दिखाई देता है I संभवत: प्राचीन चिंतकों के सामने राज्य की उत्पत्ति का प्रश्न निश्चित रूप से एक समस्या ग्रस्त अवधारणा के रूप में सामने आया होगा I  


'''                                             संदर्भ ग्रंथ'''
'''संदर्भ ग्रंथ'''


१- के वी आर आयंगर , सम आस्पेक्ट ऑफ इंडियन पालिटी , उद्धरित टिप्पणी -तीन ,पृष्ठ- 299
१- के वी आर आयंगर , सम आस्पेक्ट ऑफ इंडियन पालिटी , उद्धरित टिप्पणी -तीन ,पृष्ठ- 299

Latest revision as of 17:08, 11 July 2024

प्राचीन भारतीय ग्रंथों में राज्य की उत्पत्ति

भूमिका

प्राचीन भारतीय ग्रंथों में राज्य की उत्पत्ति से संबंधित विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है | राज्य की उत्पत्ति के वर्णन में कुछ समस्याएं उस समय भी थी ,कोई ऐतिहासिक प्रमाण न मिलने के कारण विचारों को बहुत कुछ अनुमानजन्य कल्पना के आधार पर चलना पड़ा I वर्तमान को देखकर उन्होंने भूतकाल की कल्पना की, इस कल्पनाओं को करते समय उनपर तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों का प्रभाव पड़ा और धार्मिक तथा नैतिक विश्वासों ने उनके रूप को संवारा  I प्राचीनता का अध्ययन करने के लिए आज मानव ने जिन सुविधाओं का आविष्कार किया है वह प्राचीन काल में नहीं थी I

प्राचीन भारत की राजनीतिक व्यवस्था

प्राचीन भारत के राजनीतिक व्यवस्था के वास्तविक स्वरूप को भली- भांति समझने के लिए आवश्यक है कि हम ब्रह्म की मान्य अवधारणा पर विचार करें I ब्रह्मा का अर्थ है- यज्ञ अतः याज्ञिक क्रियाओं के संपादन का उत्तरदायित्व ब्राह्मण को जाता है ये वेदों पर ही आधारित है I वैदिक मंत्रो की व्याख्या करते हुए यह अपने यज्ञों को प्रतिपादित करते थे I अधिकांश ब्राह्मण ग्रंथ गद्य में लिखे हैं परंतु कहीं-कहीं पद्य भी मिलता है I

       वेदों में क्षत्र शब्द का प्रयोग शासन अथवा शासक के अर्थ में हुआ है I क्षत्रिय वे कहलाते हैं जिनका कर्तव्य आर्य समाज पर शासन तथा उसकी रक्षा करना था I कालांतर में वे ब्राह्मण जो शासक बनते थे कभी-कभी ब्रह्म क्षत्रीय कहलाते थे I प्राचीन भारतीय विचारको ने राज्य की आवश्यकता को महसूस किया राज्य एक अमूर्त संस्था है और इसमें सत्ता का प्रयोग राजा के माध्यम से किया जाता है, इसलिए

प्राचीन भारत में राज्य के महत्व

   प्राचीन भारत में राज्य के महत्व को विचारको ने स्वीकार किया I सोमदेव कहते हैं कि प्रजाजन अपना मूल राजा में पाते हैं I ऐसे वृक्ष के लिए जिनका मूल ही ना हो मानव बुद्धि और प्रयत्न क्या कर सकते हैं I (१) नीति वाक्यमृतम के लेखक सोमदेव ने अपने ग्रंथ के प्रथम सूत्र में ही राज्य को नमस्कार किया है क्योंकि राज्य ही धर्म और अर्थ का फल देने वाला वृक्ष है (२) I अतः स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय विचारको ने राज्य के महत्व को स्वीकार किया जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य की उत्पत्ति ही सत्ता की उत्पत्ति में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती है I प्राचीन भारत राज्य का आधार पूर्ण रूप से ब्रह्म क्षत्र संबंधों पर आधारित था, क्योंकि ब्राह्मणों ने अपने पास आध्यात्मिक सत्ता को रखा था और राजाओं के पास सांसारिक शक्ति थी अर्थात राजाओं की शक्ति ब्राह्मण अपने आध्यात्मिक राज्य द्वारा वैधता प्रदान करते थे I इसके उदाहरण प्राचीन काल में प्रचलित यज्ञों के माध्यम से और अधिक स्पष्ट होती है I

राजसूय यज्ञ के एक संस्कार में पुरोहित राजा की पीठ पर चुपचाप दंड प्रहार करता है I (३) कुछ लेखक इसे पुरोहितों की राज्य सत्ता की पराकाष्ठा मानते हैं I(४) दूसरों की मान्यता यह है कि इसके द्वारा राजा को कानून के अधीन लाया जाता है I (५) कुछ और अन्य विद्वानों की मान्यता यह है कि इस विधि से राजा की शुद्धि की जाती थी या उसे विशेषाधिकार( जैसे यह की राजा दंड से परे है) प्रदान किया जाता था I इस प्रकार के यज्ञों से यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में पुरोहितों की राज्य सत्ता का आधिपत्य राजाओं के ऊपर था I

मनु स्मृति मे राज्य की उत्पत्ति

मनु स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि क्षत्रिय के बिना ब्राह्मण की और ब्राह्मणों के बिना क्षत्रियों की समृद्धि असंभव है तथा एक होकर ये इस लोक और परलोक दोनों में समृद्धि का सकते हैं I(७)  इस विवरण से यह स्पष्ट होता है कि सत्ता को प्राप्त करने के लिए राजा ब्राह्मण और ब्राह्मणों द्वारा प्राप्त वैधानिकता पर आश्रित थे I इसी क्रम में राज्य की उत्पत्ति के समझौते सिद्धांत का हल्का सा आभास सबसे पहले दो ब्राह्मण ग्रंथों में मिलता है I इसमें असुरों पर विजय प्राप्त करने के लिए देवताओं के बीच राजा के चुनाव का जिक्र है I(८)

ऐतरेय ब्राह्मण में राज्य की उत्पत्ति

 ऐतरेय ब्राह्मण में इंद्र के राज्याभिषेक के संदर्भ में इस विचार को पल्लवित किया गया है I इसके अनुसार प्रजापति के नेतृत्व में देवताओं ने आपस में कहा कि हमारे बीच इंद्र कार्य संपादन के लिए स्वाधित, स्वस्थ ,शक्तिशाली ,सर्व रूपेण, पूर्ण, और सर्वोत्तम है , इसलिए उन्होंने इसे राजपथ पर प्रतिष्ठित करने और तदनुसार उसका अभिषेक करने का निश्चय किया I(९) इस अभिषेक से उनके विभिन्न प्रकार के संस्कार किए गए I(१०) यहां स्पष्ट यह है कि राज्य की प्राप्ति के लिए इस निर्वाचन में निर्वाचक और निर्वाचित के बीच एक प्रकार की सहमति होती है I (११)

राज्य की उत्पत्ति की समस्या

राज्य की उत्पत्ति की समस्या प्राचीन भारत की एक विलक्षण समस्या है I इसके संबंध में हमें प्राचीन भारत के उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर होना पड़ता है महाभारत में लिखा है कि बहुत समय तक बिना राजा और न्यायाधीश के ही समाज शतपथ पर चला रहा परंतु बाद में किसी प्रकार अधः पतन प्रारंभ हो गया I लोग सदाचार से भ्रष्ट होकर स्वार्थ को और वासना के वश में हो गए और जिस स्वर्गीय व्यवस्था में वे रहते थे, वह नरक बन गई I मत्स्य न्याय का बोलबाला हुआ, बलवान निर्बलों को खाने लगे , देवता भी यह सब देखकर चिंतित हुए और उन्होंने इस दुर्दशा का अंत करने का निश्चय किया I लोग ब्रह्मा की शरण में आए ब्रह्मा जी इस निष्कर्ष पर पहुंचे की मनुष्य जाति की तभी रक्षा हो सकती है, जब एक आचार शास्त्र बनाया जाए और उसे राजा के द्वारा कार्यान्वित किया जाए I अतः उन्होंने एक विस्तृत विधान बनाया जनता ने भी उनके अनुशासन में रहना स्वीकार किया I (१२) इस विवरण से स्पष्ट है कि राज्य की उत्पत्ति देवी मानी जाती है और इस पतित जीवन का अंत करने की नीयत से उसकी आज्ञा मानने के लिए प्रजा सहमत थी I( १३)

महाभारत के शांति पर्व में राज्य की उत्पत्ति

    महाभारत के शांति पर्व में भी इस अराजक दशा का वर्णन इस प्रकार किया गया है I (१४) इसके शांति पर्व अध्याय 67 में राज्य की उत्पत्ति के संबंध में लिखा है कि, जैसे सूर्य और चंद्रमा के उदित न होने पर सब प्राणी घोर अंधकार में डूब जाते हैं और एक दूसरे को देख नहीं सकते I जैसे जल में मछली और आकाश में पंछी एक दूसरे की हत्या करते हुए स्वेच्छाचारी रूप से विचरण करते हैं उसी प्रकार राज्य और राजा के अभाव में प्रजा का विनाश हो जाता है और वह घोर अंधकार में डूब जाती है I( १५)  शांति पर्व के 67 वे अध्याय से यह मालूम होता है कि लोगों में एक इकरार या सहमति हुई थी I उसका पालन नहीं हो पाया जब लोग चिरकालीन अराजकता से ऊब गए तब उन्होंने आपस में एक सहमति की कि समाज संकटों को समाज से बाहर निकाल दिया जाए I(१६) सहमति के सिद्धांत के अनुसार यह बताया गया कि लोगों ने स्वयं इकरार के अनुसार वर्ताव करने की जिम्मेदारी स्वीकार की और मनु को यह आश्वासन दिया कि अपराधियों को दंड देने से राजा को कोई पाप नहीं लगेगा I अपितु यह अपराधियों के पाप का फल होगा शासन कार्य का खर्च चलाने के लिए जनता ने योग्य कर देने का भी मनु को आश्वासन दिया I (१७) मनु ने अराजक दशा के लिए यह भी लिखा है कि उस समय बलवान लोग दुर्बलों की इस प्रकार से हिंसा किया करते थे जैसा की जल में मछलियां अन्य निर्बल मछलियों की करती हैं I (१८)

कल्पतरु में राज्य की उत्पत्ति

  यही युक्ति कल्पतरु में भी पाई जाती है I(१९) अराजक दशा या मत्स्यपाप की दशा से उद्धिग्न होकर प्रजा ने राजा के साथ समय किया और राजा की नियुक्ति की - यह विचार प्राचीन समय में इतना अधिक प्रचलित था कि पाल वंश के प्रथम राजा गोपाल को भी इसी प्रक्रिया द्वारा प्रजा ने अपना राजा नियत किया I यह पाल वंशी राजा धर्मपाल के लखीमपुर से प्राप्त दान- पत्र में उल्लेखित है Iवहां लिखा है मत्यपाप- पाप को दूर करने के लिए प्रवृत्तियों ,प्राजजनों ने गोपाल को लक्ष्मी का हाथ पकड़ा या वह गोपाल क्षितीशो के सिरों पर चूड़ामणि के समान प्रतिष्ठित है I( २० )

निष्कर्ष

अतः महाभारत आदि अन्य उक्त अवतारों पर विचार करने से जो निष्कर्ष हमारे सामने आता है वह निश्चित रूप से इस मत को स्पष्ट करता है कि आखिरकार व्यक्तियों को अपनी अराजकता स्थिति से बचाव के लिए ईश्वर के पास जाना पड़ता है और ईश्वर ने ही उसके लिए ऐसे सर्वमान्य राज्य की व्यवस्था की , जो समाज में कानूनी व्यवस्था को सही ढंग से लागू करें और सारा समाज उसकी आज्ञाओं को माने I यही कारण था कि लाखों लोगों पर राज्य करने का अधिकार राजा को प्राप्त हो गया I जो भी हो पूरे प्राचीन भारतीय समाज में हमारे सामने राज्य की उत्पत्ति का जो स्वरूप सामने आता है उसके मूल में हमें देवी अवधारणा का सबसे अधिक प्रमाण दिखाई देता है I संभवत: प्राचीन चिंतकों के सामने राज्य की उत्पत्ति का प्रश्न निश्चित रूप से एक समस्या ग्रस्त अवधारणा के रूप में सामने आया होगा I

संदर्भ ग्रंथ

१- के वी आर आयंगर , सम आस्पेक्ट ऑफ इंडियन पालिटी , उद्धरित टिप्पणी -तीन ,पृष्ठ- 299

२-टिप्पणी –तीन, पृष्ठ -299 में उद्धारित

३- श ब्रा भाग- 4.4.7

४-बेवर, उवरडेन, राजसूय, पृष्ठ- 63, जोकी घोषाल के दि स्टेट ऑफ़ ब्राह्मणाज इन दि धर्मसूत्र, पृष्ठ संख्या -दो पाद टिप्पणी -37 में उद्धृत

५-के पी जायसवाल ,हिंदू पालिटी- पृष्ठ- 217

६-घोषाल, पूर्वोत्तर पुस्तक, पृष्ठ- 299

७-मनु, 9वा,  322

८- ऐतरेय ब्राह्मण 1.14.23 तेतरिय ब्राह्मण 1.5.9

९- ऐतरेय ब्राह्मण आठवां 12. 17

१०- नियतसतवं नख्याघ्र श्रृण सर्वमशेषतःI  यका राज्य समुत्पन्न आटौ कृतयुगे भवतःII

११-वही

१२-वही 19 -20 -21

१३-वही

१४-महाभारत, शांति पर्व -अध्याय -66

१५-महाभारत, शांति पर्व- अध्याय- 67

१६-उद्धारित टिप्पणी- एक -पृष्ठ - 22

१७-वही

१८-मनुस्मृति , 7/20

१९-मुक्तिकल्पतरु- पृष्ठ -105

२०-विमल चंद्र पांडे, प्राचीन भारत का राजनीतिक तथा संस्कृतिक इतिहास ,पृष्ठ- 5

Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.

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