प्राचीन भारत में राजा: Difference between revisions

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३७-महाभारत शांति पर्व 1 2.13
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Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.  


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Latest revision as of 11:21, 12 July 2024

प्राचीन भारतीय राजतंत्र में राजा

  प्राचीन भारतीय राजतंत्र में राज्य के सात अंगों में राजा को सबसे महत्वपूर्ण और प्रधान माना गया था I जिस शासन तंत्र में राजा का अधिकार सर्वतंत्र स्वतंत्र था वह राजतंत्र कहलाए , अन्य शासन तंत्र में गणतंत्र कहा गया I इस प्रकार शासन तंत्र के दो रूप सामान्य तौर से रहे राजतंत्र और गणतंत्र I प्राचीन भारत के इतिहास में अधिकांश समय और स्थान में राजतंत्र की ही प्रधानता रही I अधिकतर प्राचीन राज्यशास्त्र कारों ने वाल्मीकि, व्यास, मुनि ,मनु, याज्ञवलक्य, कौटिल्य, कामन्दक ,शुक्र ,आदि ने अपने ग्रन्थो में राजतंत्र को प्रधानता दी है I कौटिल्य तो राजा को ही राज्य कहते हैंI १ गणतंत्र शासन सिद्धांतों में भी महाभारत, मनुस्मृति, कौटिल्य, अर्थशास्त्र ,कामन्दक नीतिशास्त्र, शुक्र नीतिसार, आदि के मंतव्यो के अनुसार शासन किया जाता था I इन्हीं आचार्यों की नीति का ही इन राज्यों में पालन होता था I

राजा का  उद्भव और नियुक्ति

   शासन के उद्भव के प्रकरण में शासन की उत्पत्ति के संबंध में विभिन्न सिद्धांतों का वर्णन किया गया है I उस प्रकरण में राजा के उद्भव और नियुक्ति के संबंध में भी बहुत कुछ कहा जा चुका है I

मत्स्य न्याय

के कारण राजा का उद्भव हुआ था I इस तथ्य का प्रतिपादन वैदिकोत्तर साहित्य में प्रायः मिलता है I इसमें दैवीय व सामाजिक दोनों ही सिद्धांतों का समन्वय हो जाता है I कौटिल्य का कथन है कि मत्स्य न्याय से अभिभूत तथा पीड़ित प्रजाओं ने  मनु को राजा बनाया I २ यही बात मनु ३, वाल्मीकि ४, व्यास, ५ और कामन्दक ६, ने कहीं I मत्स्य पुराण ७ ,मानसोल्लास ८, आदि ग्रन्थों में भी अपने-अपने ढंग से इसी तथ्य का प्रतिपादन है I इन कारणों से स्पष्ट है कि प्राचीन काल में उपद्रवो से त्रस्त और अभिभूत प्रजाजनों ने अपनी रक्षा के लिए राजा को निर्वाचित करके राजप द पर नियुक्त किया था I

राजा की दैवी उत्पत्ति के सिद्धांत

  अनेक आचार्यों ने राजा की दैवी उत्पत्ति के सिद्धांत को बहुत महत्व दिया I ऐतरेय ब्राह्मण की एक कथा के अनुसार ९ अपनी निरंतर पराजय और दुर्दशा को देखकर देवताओं ने इंद्र को राजा बनाया शुक्र ने लिखा है कि भयाक्रान्ता लोगों की रक्षा के लिए विधाता ने राजा की सृष्टि की थी I १० वैदिक साहित्य में राजा के विकास में चार श्रेणियों का उल्लेख पहले किया जा चुका है गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणांग्नि, और आमंत्रण I

वैदिकोत्तर काल

में जबकि राजा प्रबल शक्तिशाली हो गए तो उनमें विभिन्न देवताओं के अंशों की कल्पना की जाने लगी I संभवत सर्वप्रथम मनु ही थे जिन्होंने कहा कि विधाता ने इंद्र, मारुत, यम, सूर्य ,अग्नि, वरुण, चंद्र, कुबेर, के अंशों को लेकर राजा की सृष्टि की थी I११ अतः यह राजा अन्य जीवों से श्रेष्ठ है बालक होने पर भी राजा का अपमान नहीं करना चाहिए क्योंकि वह नर रूप में देवता है I १२ महाभारत १३, गौतम धर्म सूत्र १४ ,आपस्तम्ब धर्म सूत्र १५, शुक्रनीति १६, मत्स्यपुराण १७ आदि ग्रन्थों में यही तथ्य कहा गया है I अग्नि पुराण में इस देवसूची में विष्णु और पृथ्वी को और जोड़ दिया गया है राजा में सूर्य चंद्र वायु यम वरुण अग्नि कुबेर इंद्र पृथ्वी और विष्णु के अंश हैंI  वह इन देवताओं के कार्यों को करता है I १८ वायु पुराण में तो राजा में विष्णु के अंश की स्पष्ट घोषणा करता है I १९

अतः यह कहा जा सकता है कि राजा का निर्वाचन और नियुक्ति सामरिक आवश्यकताओं के कारण हुई थी I प्रजा ने स्वयं अपनी रक्षा के लिए राजा का निर्वाचन किया और उसको शासन करने तथा कर ग्रहण करने का अधिकार दिया I राजा में देवताओं का अंश निहित है वह नर के रूप में देवता ही है I वह पूर्ण रूप से स्वतंत्र ही है और केवल परमात्मा के प्रति ही उत्तरदाई है I राजा का मुख्य कार्य प्रजा की रक्षा करना है वह असहायों का रक्षक गृहहीनों का आश्रय पुत्र हीनों का पुत्र है I राजा की आज्ञा के बिना किसी आग्रह या संशय को नहीं मानना चाहिए उसका विरोध करना पाप है I

राजा के गुण

राज शासन के सर्वोच्च अधिकारी के रूप में राजा पर कोई नियंत्रण नहीं रखा गया था I किसी भी भौतिक नियंता के न रहने से धार्मिक और नैतिक मान्यताएं ही राजा को नियंत्रण में रख सकती थी I अतः समाज के विविध निर्माताओं ने राजा ने विशिष्ट गुणो  की कल्पना की राजा में पराक्रम ,नीति, विनय, मृदुलता, स्वाभिमान, दानशीलता ,जितेंन्द्रियता, सहनशीलता, गुणी जनों का आदर करना आदि गुणों का होना आवश्यक है I  कामंदक ने राजा के 19 गुण प्रतिपादित किए हैं२०I  कामन्दक का कहना है कि राजा में दानशीलता सत्यवादिता और पराक्रम प्रमुख गुण हैं I यह अन्य गुणों की प्राप्ति में सहायक है २१ अग्नि पुराण में भी राजा के इसी प्रकार के गुण कहे गए हैं I इस पुराण में राजा के 21 गुण बताए गए हैं २२I महाभारत के शांति पर्व के 70 वें अध्याय में राजा के 36 गुणो का कथन है I

संस्कृत कवि राजा के विशेष गुणों का कथन करते हैं I उच्चवंश नीति शालिनता , शत्रु को विजय करने की कामना ,साम पूर्वक पराक्रम, दानशीलता, आरिषडवर्ष पर विजय, बुद्धि ,दया, दान, प्रभावशालिता, धैर्य ,कांति ,कलाकुशलता ,सत्य ,शौर्य, सरलता, और विनय राजा के अनिवार्य गुण हैं I २३ राजा को धर्म प्रतिपालक और शत्रु विनाशक होना चाहिए I  कौटिल्य के अनुसार राजा के अनेक गुण होने चाहिए अभिगामिक गुण ,प्रजा गुण २४, उत्साह गुण २५,अमात्य सम्मत गुण २६ ,कौटिल्य के अनुसार राजा का राजतंत्र पर पूर्ण आधिपत्य होते हुए भी उसमें इस उत्थान गुण होना अत्यंत आवश्यक है I उत्थान का अर्थ है सभी चलते हुए कार्यों का निरीक्षण परीक्षण राजा में इस गुण का अभाव होना उसके प्रकृति वर्ग अर्थात आत्मत्यागी को प्रमादी बना देता है I २७

राजा के दोष

प्राचीन शास्त्रकारों ने राजा के गुणो को तो कहा ही है इसके साथ ही उसमें उत्पन्न होने वाले दुर्गुणों को भी बताया है I राजा को इनसे बचना चाहिए I कौटिल्य २८ और शुक्र २९ अरिषड्वर्ग को राजा का प्रथम शत्रु कहा है I मनु ने राजा के अनेक दुर्गुणों की चर्चा की है I ३० वाल्मीकि ने रामायण में राजा के 14 दोष बताए हैं I नास्तिकता , क्रोध, असावधानी ,सत्य बोलना ,समझदारों से न मिलाना ,आलस, इंद्रियों के वश में रहना, मंत्रियों से परामर्श ना लेना ,राजनीति न जानने वालों से परामर्श लेना, निर्णय के अनुसार व्यवहार न करना, गुप्त रिति का पालन न करना, शुभ कार्य न करना ,एक समय में सभी प्रकार के कार्य करना ,और प्रमाद ,इनसे राजा को बचाना चाहिए ३१ I महर्षि व्यास ने 6 दोषों को विपत्ति कहा है -दिन में सोना, आलस्य ,कायरता ,क्रोध, सौकुमार्य, और दीर्घसूत्री होना I 

राज पद का आविर्भाव

राजा के पद का आविर्भाव प्रजा की रक्षा करने के लिए हुआ था I प्रजा द्वारा राजा को कर दिया जाता है और राजा प्रजा की रक्षा करता है I राजा में इंद्र और वरुण देवताओं के अंश की विद्यमानता की कल्पना की गई है I इसके जो गुण हैं वही राजा के कर्तव्य हैं इंद्र विजय को प्राप्त करने वाला नायक है ३३ I अतः राजा को शत्रुओं पर विजय प्राप्त करनी चाहिए I वरुण के कार्य हैं -प्रजा का कल्याण करना, पापियों और अपराधियों को नियंत्रण में रखना , जनता को विपत्तियों से बचाना, दूर दृष्टि होना, पापियों को दंड देना, शत्रुओं को दूर भागना ,राज नियमों की रक्षा करना ,और आंतरिक शांति को बनाए रखना I ३४ प्राचीन शास्त्रों के अनुसार प्रजा का हित और सुख ही राजा का अपना हित और सुख है ३५ I राजा का शरीर भोग को भोगने के लिए नहीं अपितु प्रजा की रक्षा के लिए होता है I धर्म की रक्षा करने के लिए वह पृथ्वी पर कलेश उठाता है ३६I महाभारत में राजा के कर्तव्य कहे गए हैं- यज्ञ करना, दान देना, प्रजा की रक्षा करना ,धर्म का पालन करना, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना, और मित्रों का पालन करना ३७I

निष्कर्ष

पी . बी. काणे ने मनु, याज्ञवलक्य , नारद ,शुक्र, अत्री, विष्णुधर्मोत्तरपुराण ,आदि का अध्ययन करके राजा के लिए चार कर्तव्य प्रतिपादित किया I प्रजा की रक्षा और पालन करना ,वर्णाश्रम धर्म के नियमों का पालन करना ,दुष्टो को दंड देना ,न्याय करना I  संस्कृत कवियों ने राजा के कर्तव्यों का विस्तृत निर्देश किया है इस संबंध में मुरारी नामक कवि का कथन यह है कि - राजा वैदिक संस्कृति का रक्षक है I वह वेदत्रयी का संस्थापक हैI  वह यज्ञ आदि क्रियाओं को निर्वाध होने देता है I धर्म ,दान, दया, और वीरता उसमें निहित है I लोक रक्षा रूपी यज्ञ में दीक्षित होता है  I उसके राज्य में प्रजा प्रसन्न रहती है, राजा राजसूय यज्ञ और अश्वमेधयज्ञों को संपन्न करता है I  राजा को ब्राह्मण, ऋषियों , पुरोहितों ,आदि के प्रति विनीत व्यवहार करना चाहिए और उसके आदेशों का पालन करना चाहिए  I

संदर्भ ग्रंथ

१-राजा राज्य मिती प्रकृति संक्षेपण कौटिल्य अर्थशास्त्र 8/2/1

२-कौटिल्य अर्थशास्त्र 1/13

३-मनुस्मृति 7/14 और 20

४-रामायण अयोध्या कांड 67-31

५-महाभारत शांति पर्व 15-30

६- कामंदक नीतिसार 2.40

७-मत्स्यपुराण 225.9

८-मनसोल्लास 2.16.1295

९- ऐतरेयब्राह्मण 1.14

१०-शुक्रनीति सार 1.72

११-मनुस्मृति 7/4

१२-मनुस्मृति 7.8

१३-महाभारत शांति पर्व 68.40

१४-गौतम धर्मसूत्र 11.62

१५-आपस्तम्ब धर्मसूत्र 1.11.31.5

१६-शुक्रनीति सार 1.71- 72

१७-मत्स्य पुराण 226.1

१८-अग्नि पुराण 226.17 -20

१९- वायुपुराण 57.7

२०- कामन्दक ने राजा के 19 गुण प्रतिपादित किए हैं- दंड नीति का अध्ययन बुद्धि शीलता गंभीरता चतुर ता साहस ग्रहण करने की सामर्थ समता वाणी की चतुराई दृढ़ता आपत्ति के समय सहनशीलता प्रभविष्णुता पवित्रता दयालुता उदारता सत्य भाषण कृतज्ञता कुलीनता  दृढ़चरित्र और स्वयं पर नियंत्रण कामंदकीय नीतिसार1.21- 261

२१- कामंदकीय नीतिसार 1.21- 24

२२-अग्निपुराण 239.2-5

२३-मत्तविलास प्रहसन श्लोक 3

२४- कौटिल्यम् अर्थशास्त्रम् वाचस्पति गैरोला 6.1

२५-शौर्य अमर्ष क्षिप्रकारिता और दक्षता यह चार गुण राजा के उत्साह गुण हैं

२६-कौटिल्य अर्थशास्त्रम वाचस्पति गैरोला 6.1

२७-कौटिल्य अर्थशास्त्र भारतीय योगी पृष्ठ संख्या 6-7

२८-कौटिल्य अर्थशास्त्र 1.6

२९-शुक्रनीतिसार 1.143-146

३०-मनुस्मृति 7.45-52

३१-रामायण अयोध्या कांड 100.65.67

३२-महाभारत सभापर्व 5.125

३३- ऐतरेय ब्राह्मण 1.114 तैत्तिरीय ब्राह्मण 1.2

३४-ऋग्वेद 1.25 ,2.28 ,5.85

३५-अर्थशास्त्र 1.19

३६-मार्कंडेयपुराण

३७-महाभारत शांति पर्व 1 2.13

Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.

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