शुक्र नीति में राजा: Difference between revisions
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Latest revision as of 17:10, 16 July 2024
भूमिका
प्राचीन भारत में राजपद का विशेष महत्व था और अपनी उपयोगिता के कारण उसे आवश्यक माना गया था I राजतंत्रात्मक व्यवस्था वैदिक काल की प्रमुख शासन व्यवस्था थी और राजा का पद सबसे अधिक सम्मानित तथा सर्वोच्च माना जाता था I
राजा की नियुक्ति
शुक्रनीति में यद्यपि प्राचीन भारतीय ग्रंथों की१ भांति पैत्रिकता को राजा की नियुक्ति का आधार तो माना लेकिन स्पष्ट वर्णन के अभाव में इतना ही उल्लेख प्राप्त होता है कि राजा को युवराज के पद के निमित्त अपनी स्त्री से उत्पन्न साक्षात पुत्र २को ही चुनना चाहिए ३ I यदि अपने पुत्र की उपलब्धि किसी प्रकार संभव न हो सके तो आचार्य शुक्र के अनुसार राजा को क्रमशः अपना छोटा भाई ,चाचा, छोटे भाई ,बड़े भाई के पुत्र ,आदि में से जो भी उपलब्ध हो उसे युवराज पद पर प्रतिष्ठित करना चाहिए I यदि किन्हीं कारणों से ऐसा संभव न हो सके तो पुत्री के पुत्र ४अथवा दत्तक पुत्र को युवराज पद पर नियुक्त करना चाहिए ५ I उच्च कुल उत्पन्न किंतु नीति विरुद्ध राजा को हटाने ६ के पश्चात आचार्य शुक्र ने पुरोहित पर भी यह प्रतिबंध लगाया है कि वह राजपद पर राजगुरु से युक्त पैत्रिकता के आधार पर प्रकृति ७ आदि की अनुमति से राजा की नियुक्ति करें ८ I
नियुक्ति का आधार
इस भांति स्पष्ट है कि आचार्य शुक्र ने प्रत्येक स्थिति में राज पद पर राजा की नियुक्ति का आधार अनिवार्य रूप से पैतृकता स्वीकार किया है I राजपद की नियुक्ति में शुक्र नीतिकार ने पैतृकता की अनिवार्यता के साथ-साथ जेष्ठता का विस्तृत विवेचन किया है I भारतीय प्राचीन परंपरा के अनुसार पिता का पुनर्जन्म जेष्ठ पुत्र के रूप में होता है ९ I अतः राजा के पश्चात राजपद का अधिकारी उसके जेष्ठ पुत्र को माना गया है १० I यद्यपि आचार्य शुक्र ने उत्तराधिकार के संबंध में उक्त प्राचीन आध्यात्मिक पक्ष का पुष्टि तो नहीं किया लेकिन उन्होंने भौतिक आधारों पर जेष्ठता के सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए स्वीकार किया है कि चूँकि राज्य की वृद्धि हेतु संपूर्ण राजपूत्रों की अपेक्षा जेष्ठ ही उत्तम होता है ११ I अतः यदि राज्य कुल में एक से अधिक राज्य पाने के अधिकारी हो तो उनमें से जेष्ठ को ही उत्तराधिकारी नियुक्त करके अन्य राज पुत्रों को सहायक के रूप में नियुक्त करना चाहिए I किंतु जेष्ठ राजपूत को कोढ़ी, गूंगा, अंधा, एवं नपुंसक होने की स्थिति में पूर्वोक्त निश्चित क्रम के अनुसार ही उत्तराधिकारी का चयन किया जाएगा I
इस प्रकार स्पष्ट है कि महर्षि शुक्र ने अनेक राजपुत्रों के उत्तराधिकारी बनने की भयावह आशंका का समाधान प्रस्तुत करते हुए जेष्ठ पुत्र को ही उत्तराधिकारी बनाने का प्रावधान करते हुए केवल मात्र निर्धारित योग्यता की स्थिति में ही अन्य की व्यवस्था दी है I
उत्तराधिकारी की नियुक्ति का आधार
जहां एक और शुक्रनीति में उत्तराधिकारी की नियुक्ति के लिए पैत्रिक एवं जेष्ठ संबंधी योग्यताओं की अनिवार्यता पर बल दिया है वहीं दूसरी ओर उन्होंने उत्तराधिकारी होने का आधार केवल मात्र राज्य कुल में जन्म लेने मात्र को स्वीकार नहीं किया अपितु उसके लिए अन्य विशिष्ट चारित्रिक गुणों एवं योग्यताओं को भी अनिवार्य माना है १३ I महर्षि शुक्र राजपद की प्रतिष्ठा व गरिमा से भली भांति परिचित वे जानते थे कि इतिहास में वेणु १४ और नहुष १५ जैसे अनेक राजा दुराचरण के कारण पदच्युत किये जा चुके हैं १६ I जबकि साथ ही पृथु जैसे धर्मशील आचरण करने वाला राजा संसार में ख्याति एवं वृद्धि को प्राप्त हुए हैं १७ I इसलिए उन्होंने उत्तराधिकारी के लिए चारित्रिक गुणों का होना आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य बना दिया I इसी भांति शुक्रनीति कार ने प्रतिपादित किया है कि स्वधर्म में निरत शूर नितिज्ञ राजभक्त मदरहित पितृभक्त आज्ञापालक नियंत्रक शीलयुक्त प्रसन्नचित्त प्रजा रंजन त्यागी एवं सत्व गुण संपन्न १८ राजपुत्र ही राजपद पर अरुढ़ किया जा सकता है I
उत्तराधिकारी की योग्यता
आचार्य शुक्र ने उक्त चारित्रिक गुणों के साथ-साथ युवराज बनने के लिए राजपूत्रों में शैक्षिक योग्यताओं का होना भी इसलिए आवश्यक समझा है I क्योंकि राजवंश के अशिक्षित युवराज शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं I अतः महर्षि शुक्र ने राजपुत्रो की शिक्षा हेतु राजा को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह अमात्य आदि के द्वारा अपने पुत्रों को नीतिशास्त्र एवं धनुर्विद्या निपुण सदैव क्लेश सहन करने में सफल वाग्दंड की कठोरता का अनुभव करने वाला वीरता के साथ युद्ध करने में निरत आदि संपूर्ण विधाओं एवं कलाओं का जानने वाला शिक्षित एवं विनम्र बनावे I
अतः स्पष्ट है कि महर्षि शुक्र ने शैक्षिक योग्यताओं को भी पैत्रिकता ज्येष्ठता एवं चारित्रिक गुणों की भांति ही सामान्य महत्व दिया है I इसी भांति स्पष्ट है कि आचार्य शुक्र के अनुसार पैत्रिकता जेष्ठता चरित्र गुण एवं शैक्षणिक योग्यताओं से युक्त राजपुत्र ही राजपद का अधिकारी हो सकता है युवराज के चयन के पश्चात यदि राजा को अपने जीवन काल में संपूर्ण अधिकार युवराज में मद पैदा होने के कारण नहीं देना चाहिए केवल मात्र उसे प्रशासन से संबंध ही रखना चाहिए I लेकिन यदि उसे अपने जीवन का अंत निकट भविष्य में प्रतीत हो तो ऐसी स्थिति में युवराज को पूर्ण अधिकार प्रदान कर देना चाहिए I
एक अन्य स्थान पर आचार्य शुक्र ने राजा के अभाव की स्थिति में उत्तराधिकारी युवराज के चयन एवं राजपद पर स्थापना का कार्य पुरोहित द्वारा संपन्न करने का भी आग्रह किया है १९ I इस भांति स्पष्ट है कि शुक्राचार्य ने उत्तराधिकारी के चयन एवं अधिकार समर्पण को राजा के जीवन काल में एवं उसके बाद दोनों ही स्थिति में माना है यद्यपि राज्याभिषेक प्रक्रिया एवं उसके संवैधानिक महत्व के बारे में उक्त प्राचीन ग्रंथो की भांति आचार्य शुक्र ने राजपद पर प्रतिष्ठित होने के लिए राजा का राज्याभिषेक होना अनिवार्य नहीं माना है I
राजा के कर्तव्य एवं अधिकार
शुक्रनीति में राजा के कर्तव्य एवं अधिकारों का क्रमबद्ध अलग-अलग वर्णन नहीं मिलता है I लेकिन कहीं अधिकारों का उल्लेख मिलता भी है तो वह कर्तव्यों की भाषा में वर्णित है I संभवत ऐसा प्रतीत होता है कि आचार्य शुक्र का विचार राजा को अधिक अधिकारों से परिचित कराने की अपेक्षा कर्तव्यों से अधिक परिचित कराने का रहा है I उनका यह दृष्टिकोण उनके इस मत से प्रकट होता है कि अधिकार का मद अधिक मादक होता है २० I शुक्राचार्य के मातानुसार राजा का कर्म धर्म प्रजा परिपालन और दुष्ट निग्रह से है I
शुक्र नीति में राजा के आठ कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है I दुस्टो को दंड देना, दान देना, प्रजा का परिपालन करना, राजस्व ,आदि यज्ञ करना ,न्याय पूर्ण कोष की वृद्धि करना ,अन्य राज्यों से कर प्राप्त करना ,शत्रुओं का मान मर्दन करना, निरंतर राज्य की सीमाओं का विस्तार करना, २१ I महर्षि शुक्र ने कर्तव्यों का पालन के संबंध में कठोरता पूर्वक यहां तक कहा है कि जो राजा अपनी सेना नहीं बढ़ते हैं राजाओं को अपने अधीन करके करदाता नहीं बनाते हैं और प्रजाओं का भली भांति देख रेख नहीं करते हैं वे राजा तेल रहित दिए के समान तुच्छ होते हैं I
निष्कर्ष
शुक्र के अनुसार राजा को न्याय प्रदान करते हुए दुष्टों को दंड अवश्य देना चाहिए राजा को चाहिए कि वह अपनी आज्ञाओं को चौराहे पर लिखवा दे राजा को नीति के अनुसार प्रजा का पालन करते हुए पथिकों के निमित्त मार्गों की सदा रक्षा करनी चाहिए I चोरों पर दया नहीं करनी चाहिए इस हेतु शुक्राचार्य ने कौटिल्य की भांति राजा की दिनचर्या को विस्तृत रूप से विदित किया है Iआचार्य शुक्र ने कहा है कि जैसे पिता अपनी संतान को गुणवान बनाता है उसी प्रकार राजा को भी अपनी प्रजा को गुणवान बनाना चाहिए I माता की भांति राजा भी प्रजा के अपराधों को क्षमा करने वाला होना चाहिए २२I गुरु जिस प्रकार अपने शिष्य के लिए हित का उपदेश करने वाला और उत्तम शिक्षा देने वाला होता है उसी प्रकार राजा को भी प्रजा के लिए होना चाहिए I
संदर्भ ग्रंथ
१-रामायण- बालकांड -20,11-12 –महाभारत- आदिपर्व -85 ,20-22
मनुस्मृति- 7,202
२-यद्यपि और प्राचीन विचारों ने यह प्रतिपादित किया है कि राज महिषी बड़ी रानी से उत्पन्न जेष्ठ पुत्र को ही राज्य का उत्तराधिकारी बनाया जाए -रामायण अयोध्या कांड -3.39.40 -किंतु महर्षि शुक्र ने मातृत्व संबंधी कोई स्पष्ट मान्यता प्रतिपादित नहीं की
३-शुक्रनीति- 2/14
४-शुक्रनीति- 2.16
५-शुक्रनीति -2. 15
६-शुक्रनीति -2.274
७-महर्षि शुक्र प्रकृति शब्द का प्रयोग अमात्य आदि मंत्री परिषद के 10 सदस्यों के लिए किया है शुक्र
नीति -2.276
८-शुक्रनीति- 2.275
९-मनुस्मृति-4.184
१०-रामायण -अयोध्या कांड -3,39, 40,41- एवं कौटिल्य अर्थशास्त्र- पृष्ठ- 69
११-शुक्रनीति -1.342
१२-शुक्रनीति -1.344
१३-वही 1.18
१४-शुक्रनीति -1.69
१५-शुक्रनीति-1.68
१६-वही 1.6869 एवं दृष्टव्य- वेणु और नहुष का यह उदाहरण मनुस्मृति में भी उपलब्ध होता है
मनुस्मृति -7.41
१७-शुक्रनीति -1.69 एवं दृष्टव्य महर्षि मनु ने तो पृथ्वी की उन्नति का भी उदाहरण प्रस्तुत किया है
मनुस्मृति -7.41
१८-शुक्रनीति- 2.50
१९-शुक्रनीति -2.275 तुलनीय रामायण अयोध्या कांड 79.1
२०-शुक्रनीति -5.18
२१-शुक्रनीति- 1.123-124
२२-शुक्रनीति -1.78 एवं शुक्रनीति- ब्रह्म शंकर मिश्र- 4.7 -419 एवं -पृष्ठ संख्या -394
Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.
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