विश्व बंधुत्व का भारतीय स्वरूप

From enIKSwiki
Revision as of 11:39, 18 September 2024 by Sriram (talk | contribs)
(diff) ← Older revision | Latest revision (diff) | Newer revision → (diff)
Jump to navigation Jump to search

सर्वे भवन्तु सुखिनः,

सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु,

मा कश्चित दुःखभाग्भवेत्।


दुनिया में सब सुखी व निरोगी रहें; सब भद्र देखें व कोई भी दुखी न हो। दुनिया के सभी लोगों को एक-दूसरे की भलाई के बारे में सदैव सोचना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को भाईचारे की भावना अपनानी चाहिए। हमारी भारतीय संस्कृति इसी विश्व बंधुत्व का संदेश देती है। विश्व बंधुत्व का सही अर्थ है, सबको भाई समझने का भाव समस्त संसार के विकास के लिए विश्व बंधुत्व जरूरी है।

आज मनुष्य विनाश के कगार पर खड़ा है। अपने स्वार्थों ने मनुष्य  को स्वयं पतित किया है। स्वार्थ की पूर्ति के लिए भयानक अस्त्रों-शस्त्रों के निर्माण की होड़ लगाए जा रहा है। मनुष्य विनाश के लिए अणुबम व परमाणु बम आदि बनाकर अपनी अपार शक्ति का परिचय दे रहा है। इससे अशांति एवं भयानक वातावरण निर्माण हो रहा है। इसलिए विश्व बंधुत्व वर्तमान युग की माँग है।  विश्व बंधुत्व की शिक्षा देकर ही भारतीय  ज्ञान परम्परा से प्रस्फुटित भाव के बोध का चिंतन अत्यंत महत्वपूर्ण है। विश्व में शांति की स्थापना हेतु विश्व बंधुत्व की अत्यंत आवश्यक है। चारों ओर अशांति एवं वैमनस्य का वातावरण दिखाई दे रहा है। सर्वत्र आराजकता का ही साम्राज्य दिखाई दे रहा  है। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र की सीमा पर अनैतिकता  का परिचय देते हुए आक्रमण करने के लिए तत्पर है भारत पर आक्रमण करने के लिए हो कई देश तैयार हैं। वे सिर्फ अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह मानवीय मूल्यों का उल्लंघन है जिससे विश्व में अशांति फैलेगी। इसे रोकने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को विश्व बंधुत्व को अपनाना पड़ेगा। विश्व में शांति बनाए रखने के लिए इसकी बहुत जरूरत है।

विश्व बंधुत्व एक ऐसा मानवीय गुण है, जिसे अपनाने से सबका भला होगा। संस्कृत सुभाषित में कहा भी गया है:

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ।।

वसुधैव कुटुम्ब का भाव  अधिक अनिवार्य बन जाता है।  भारतीय दृष्टिकोण के परिप्रेक्ष्य में संतों द्वारा स्थापित वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना विश्वशांति में विविध प्रकार से प्रासंगिक एवं सहायक बन सकती है। सम्पूर्ण विश्व एक ‘विश्वग्राम’ में परिवर्तित हो चुका है आधुनिककाल में मनुष्य ने अपने जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए विज्ञान एवं तकनीकी की सहायता से अनेक सुख सुविधा से परिपूर्ण असंख्य वस्तुओं का निर्माण किया। इन वस्तुओं के क्रय-विक्रय हेतु फिर उसे बाजार की आवश्यकता महसूस होने लगी। उसने अपनी व्यापारिक सीमितता को तोड़कर विश्व के अन्य देशों के बाजार पर आधिकार जमाकर वैश्विकरण का नारा बुलंद किया। इस प्रकार सारा विश्व बाजार में परिवर्तित हो गया।

ऐसी बदलती व्यवस्था में आज मनुष्य दिन-ब-दिन अधिक व्यावहारिक बनता चला जा रहा है। एक मनुष्य दूसरे मनुष्य की ओर प्रेम, स्नेह, आदर और सहिष्णुता से देखने के बजाय उपयोगितावादी दृष्टिकोण से देख रहा है। त्याग, उदारता, सहभाव, परोपकार, प्रेम आदि मानवी जीवन मूल्यों को नष्ट कर वह पूरी तरह से अर्थ केन्द्रित मानसिकता का शिकार बनता जा रहा है। इस परिवर्तन के कारण वह दिन-ब-दिन मूल्यहीन और संवेदनाविहीन बनता जा रहा है। ऐसी स्थिति में विश्वबंधुत्व एवं वसुधैव कुटुम्बकम् जैसी संकल्पनाओं को पुनर्जीवित कर , विश्वबंधुत्व का अर्थ समझना बेहतर होगा। विश्वबंधुत्व का अर्थ है सारे विश्व के मानवों में बंधुत्व का भाव या सबको भाई समझने का भाव। भारतीय  चिंतन में यह भाव आध्यात्म में शिवत्व का प्रतीक माना जाता है। विश्वबंधुत्व शब्द से ही मिलता-जुलता शब्द वसुधैव कुटुम्बकम है। जिसमे समूचे संसार को ही एक परिवार के रूप में देखा गया है। मराठी संत ज्ञानेश्वर के शब्दों में कहें तो 'हे विश्व ची माझे घर' अर्थात यह आखिल ब्रह्मांड ही हमारा परिवार है। विश्व शब्द 'संसार की समस्त गोचर वस्तुओं का सूचक है। विश्व यानी केवल मनुष्य जाती के रहने का स्थान नहीं है बल्कि इसमें पशु-पक्षी, पेड़-पौधे आदि सभी इकाईयां सम्मिलित है। अतः समस्त जीव-जगत के साथ बंधुत्व यानी भावात्मक एकता स्थापित करना, ओछी संकीर्णता को छोड़कर मनुष्य को मनुष्य की तरह देखकर उसके साथ सदवर्तन करना ही विश्वबंधुत्व या वसुधैव कुटुम्बकम की स्थापना उद्देश्य रहा है। यह वैचारिक तथा व्यावहारिक दोनों प्रकार का भाव है। हमारे विद्वान् ऋषि मुनियों, संत महात्माओं ने अपने अनुभूतिजन्य आध्यात्मिक ज्ञान के आधार पर वसुधैव कुटुम्बकम की घोषणा की। उनका यह अत्यंत दूरदर्शी और व्यापक वैश्विक भाव है।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन उपनिषदों पर अपना मंतव्य प्रकट करते हुए लिखते हैं कि उपनिषदों के विचारकों के सम्मुख जो आदर्श था वह मनुष्य के ज्ञान की पूर्णता और सत्य के साक्षात्कार का आदर्श था जिसमे रहस्यवाद की दिव्य दर्शन की धार्मिक कल्पना और दार्शनिक सत्य की अनवरत खोज दोनों को शांति मिलती है। डॉ. एन. पी. के पिल्लै के मतानुसार भारतीय वेद, उपनिषद्, पुराण, गीता  ‘समन्वयात्मक धर्म’ को प्रश्रय देते हैं। रामायण और महाभारत तथा रामचरितमानस जैसे विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ भारतीय संस्कृति एवं धर्म के सर्वांगीण विकास के दिग्दर्शक विश्वकोष है। जाति-पाति रहित एकेश्वरवाद पर अधिष्ठित विश्वबंधुत्व एवं प्रेम पर अवस्थित एक मानव धर्म पर यहाँ बल दिया गया है। डॉ. धर्मपाल  के अनुसार एकात्मभाव, दया, करुणा, सदभाव, सदाचरण आदि गुण विश्वबंधुत्व के अनिवार्य तत्व हैं।

भारत का संत साहित्य विश्वबंधुत्व का महान आदर्श उपस्थित करता है। संतों के विचारानुसार मानवी जीवनमूल्यों पर ही विश्वशाति की आधारशिला टिकी हुई है।  संतों ने इन मूल्यों की वैश्विक प्रतिष्ठापना के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन विश्व के प्रति समर्पित कर दिया था। मानवी जीवन मूल्यों की उपादेयता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

विश्वबंधुत्व की भावना से विश्व में समरसता उत्पन्न हो सकती है। संकीर्णता का विनाश हो सकता है और इस तरह विश्वशांति स्थापना में विश्बंधुत्व महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। युद्ध और संघर्ष करने का परिणाम विनाश कर लेना ही है। समरसता और विश्वबंधुत्व में ही मानव का हित है; यह विचार ही हमें दुनिया के आखरी मनुष्य तक पहुँचाने होंगे तभी विश्व में शांति प्रस्थापित हो पायेगी। वैश्विक दृष्टि से समरसता  भी एक जीवंत तत्व है।

'परहित सरिस धर्म नहिं भाई

परपीड़ा सम नहिं अधमाई'

विश्वबंधुत्व सम्पूर्ण विश्व में समानता स्थापित करने का प्रयास है। प्रायः इसमें विविधता, जातीय विभिन्नता, साम्प्रदायिकता, धार्मिक भेद, वांशिक भेद आदि तत्व अवरोध बनते हैं। विश्व के समस्त महापुरुषों ने आध्यात्म एवं नैतिक मूल्यों के बलबूते पर ही स्थापित की जा सकती है।कारण  कि मनुष्य अनैतिक आचरण, भ्रष्टाचार, झूठ-फरेब तथा मानहानि के जाल में फंसता जा रहा है। इस आधार पर कह सकतें है कि तकनीकी शिक्षा ने करोड़ों डॉक्टर, इंजिनियर तथा वैज्ञानिक तो निर्माण किए परंतु आधुनिक वैश्विक शिक्षा ने  मानव को मानव बनाने में असमर्थता व्यक्त की है ,तब इस प्रकार के मूल्य भाव बेमानी है ।ऐसे में आवश्यक है कि विश्व के कल्याणार्थ हेतु भारतीय चिंतन में प्रतिपादित समस्त पृथ्वी हमारी माता के भाव से ही वसुधैव कुटुम्ब का अंकुरण ऋषि परम्परा द्वारा स्थापित व संचालित किया गया है , जिसके अन्तर्भाव में मानवीय मूल्यों का संप्रेषित आदर्श ही है ।

भारतीय मूल्यों की विशेषताएँ तथा अवधारणाएँ:-

·      मूल्यों के आधारभूत सिद्धांत है जो सर्वमान्य होते हैं। जैसे- संतोष परम सुख

·      भारतीय  चिंतन में ऋषि व मुनि के त्याग भाव ही मूल्य चेतना एवं भावना को प्रदर्शित करने का साधन है।

·      मानवीय  समाज का अभिलक्षण ही ,मानव व्यवहार का आधार होता है।

·      सभी के कल्याण  का संकल्पित मूल्य ही मानवीय समाज की स्थापना में  जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है।

·      सामाजिक एकता के रूप में काम करते हैं।

·      सामूहिक अन्तक्रिया में स्थायित्व व समान व्यवहारों के प्रतिमानों के रूप में उपस्थित होते हैं।

सामान्यतः कुटुम्ब  की अवधारणा में दो भाव अन्तर्लिप्त है । वह है , व्यक्तिगत तथा सामाजिक  हैं। हमारा जीवन वातावरण तथा वंशानुगत दोनों से प्रभावित होता हैं। वातावरण मूल्यों पर गहरा प्रभाव डालता है।  मानव व्यवहार के आधार तथा नियंत्रक होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के उद्देश्य, दृष्टिकोण, आचार-विचार तथा आवश्यकताएँ भिन्न होती हैं, उसी प्रकार व्यक्तियों के मूल्यों में भी भिन्नता पाई जाती है और ऐसे ही राष्ट्रो के मूल्यों में भी अन्तर दिखाई देता है फिर भी सामान्य तौर पर  भारत में पाए जाने वाले प्रमुख मूल्यों  को लगभग अवरोही क्रम में पाते हैं - व्यक्तिगत, समानता, स्वतंत्रता, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, प्रजातांत्रिक, स्वतंत्रता, भ्रातृत्व, धर्म निरपेक्षता, सत्य और अहिंसा, विश्व बन्धुत्व  आदि।

प्राचीन तथा वर्तमान भारतीय समाज में विश्व के कल्याण का भाव प्रधान है ।जो भारत के परम्परागत और आधुनिक दोनों प्रकार के मूल्यों के प्रसार के मध्य देखने मिलता है। भारतीय संस्कृति का चार मूल्यों- अर्थ, काम, धर्म तथा मोक्ष पर ही अधिक जोर रहा है । भारतीय संस्कृति का उद्देश्य आध्यात्मिक स्तर पर पहुँचकर मोक्ष प्राप्त करना है ।

आज भारतीय सामाजिक सरंचना में कुछ  परिवर्तन आने का कारण भारतीयों के प्राचीन मूल्यों के प्रति उदासीनता बढ़ने लगी तथा नए मूल्यों के प्रति लगाव विकसित होने लगा। देश के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए प्राचीन सांस्कृतिक परम्परा  आवश्यक है। जो परम्परागत तथा नए मूल्यों को समन्वित करके ही वर्तमान भारतीय संस्कृति और समाज को जीवित रखा जा सकेगा।

ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में विशिष्ट सुक्त है जिनकी संज्ञा है सांमनस्य सूक्त। इनमें विशेष रूप से विश्व कल्याण की भावना परिव्याप्त है। इस विषय के प्रसिद्ध मन्त्र इस प्रकार हैं-

सं गच्छध्व सं वदध्वं सं वो मनासि जानताम्।

देवा मागं यथा पूर्वे सं जानाना उपासते।।

इस मन्त्र का तात्पर्य बडा गम्भीर है।  मनुष्यों, जैसे सनातन से विद्यमान दिव्य शक्तियों से सम्पन्न सूर्य चन्द्रादि देव परस्पर अविरोध भाव से, प्रेम से अपने कार्यों को करते हैं. ऐसे ही तुम भी समष्टि भावना से प्रेरित होकर एक साथ कार्यों में प्रवृत्त होकर, ऐकमत्य और परस्पर सद्भाव से रहो। ऋग्वेद का अन्तिम मन्त्र इसी भावना को अग्रसर करता है-

समानी व आकृतिः समाना हृदयानि वः।

समानमस्तु वो मनो यथा व सुसहासति ।।"

आंगिरस संवनन ऋषि प्रस्तुत मन्त्र में मनुष्यों को ध्यान कर कहते हैं कि मानवों की चित्तवृत्ति हृदय तथा मन सब समान हो तभी विश्व के प्राणी परस्पर में सौहार्द से निवास कर सकते हैं। अतः ऋषि केवल अपने वैयक्तिक मंगल के लिए भगवान से प्रार्थना नहीं करता, अपितु वह मानव हित का प्रार्थी है। ऋग्वेद में वर्णित नदी सुक्त से प्रतीत होता है कि वैदिक आर्यों के अनुसार नदियाँ निर्जीव केवल जलमयी वस्तुएं नहीं थे बल्कि कल्याण के सजीव देवता थे ।अतः उनसे प्रार्थना सुनने तथा कामना पूरा करने का आग्रह किया गया है। देश की एकता तथा अखण्डता की इससे बढ़कर कल्पना नहीं की जा सकती। “विश्वबन्धुत्व की भावना” वेद तक सीमित न रहकर लौकिक संस्कृत में भी पूर्णरुपेण परिलक्षित होती है। लौकिक संस्कृत वाङ्मय में रामायण जैसे आदि महाकाव्य में 'विश्वबन्धुत्व की भावना सर्वत्र विद्यमान है। महाकाव्यों का आरम्भ ही विश्वबन्धुत्य की भावना से किया गया है। महर्षि वाल्मीकि स्नान के लिए तमसा नदी पर जाते हैं तो मार्ग में एक शिकारी द्वारा हुड क्रौंच में से एक क्रौंच पक्षी को मरा हुआ देखते हैं। जैसे ही विलाप करते हुए क्रौंची को देखते हैं तो सहसा उनके मुख से करुणामयी वाणी में प्रस्तुत श्लोक निकला-

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वती समाः ।

यत्क्रथिमिथुनादेकमवधी काममोहितम।।

जिससे प्रतीत होता है कि महाकाव्य के प्रारम्भ में ही विश्वबन्धुत्व की भावना मानव मात्र के साथ-साथ प्राणी जगत के साथ भी कूट-कूट कर भरी है।

पूजा के अवसर पर धार्मिक कृत्यों के विधान प्रंसग में भी राष्ट्रीय भावना की पर्याप्त अभिव्यक्ति होती है। संकल्प के अवसर पर प्रत्येक उपासक अपने सामने अखण्ड भारत का भौगोलिक चित्र प्रस्तुत करता है। यह अपने स्नान या दान के संकल्पवाक्य में देश, काल, कर्ता तथा कर्म इन चारों वस्तुओं का एक साथ योग देकर अपने आपको बृहत्तर भारत का एक प्राणी बतला कर गर्व का अनुभव करता है। यथा आयामस्तु कुमारीतो गंगायाः प्रयहावधिः स्नान के समय जिस क्षण स्नानार्थी भारत की सप्त सिन्धुओं से अपने जल में समावेश के लिये इस मन्त्र में प्रार्थना करता है उस समय उसके मानस पटल पर भारतवर्ष के अखण्ड रूप का चित्र प्रस्तुत हो जाता है-

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वति।

नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधि कुरु।।

भारतीयों का जीवन विश्वबन्धुत्व का व्यवहारिक पक्ष प्रस्तुत करता है। प्रत्येक गृहस्थ बलि वैश्वदेव के अनुष्ठान के उपरान्त ही स्वयं भोजन करता है। इसी प्रकार श्रादध के अवसर पर ऋषियों, मानवों तथा स्वीय पूर्वजों की ही जल द्वारा तृप्ति नहीं की जाती, प्रत्युत नाग, सर्प आदि क्षुद्र जीयों को भी जलांजलि देकर तृप्ति पहुँचाने का सार्वभौम नियम है। यह तर्पण प्रतिदिन विहित अनुष्ठान है. इससे प्रत्येक मानय अपने को संसार के समस्त प्राणियों के साथ सम्पर्क स्थापित कर विश्वबन्धुत्व की साकार उपासना करते हैं। इसके साथ ही यह देखा जाता है कि प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठान की समाप्ति पर साधक पुरुष अपना आर्दश इस श्लोक के द्वारा प्रकट करते हैं। यथा-

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग भवेत् ।।

कोई भी दुखी ना हो एतदर्थ भगवान से अन्तर्राष्ट्रीय सद्‌भावना की प्रार्थना की गई है। भारतीय संस्कृति के उज्जवल पक्षों में शरणागत की रक्षा उल्लेखनीय तत्व है। श्येनकपोतोपाख्यान (वन पर्व) में महाराज उशीनर की शरणागत रक्षा का विश्व प्रसिद्ध उपाख्यान है। इससे विश्वबन्धुत्व की भावना हर जगह  पर प्रतीत होता है।  विश्वबन्धुत्व की भावना का एक गम्भीर दार्शनिक पक्ष भी है। यह समग्र विश्य परमैश्वर्य-मण्डित सत्य ज्ञान अनन्त पर ब्रह्म का ही तो विवर्त है। जगत् के जीव पर ब्रह्म के ही अंशभूत होने पर भर तद्रूप ही है। जगत् के भीतर एक ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर में रमा हुआ है तथा अपनी अलौकिक घटना- माया के कारण सर्वत्र व्याप्त है। विश्व का प्रत्येक अणु उसी की अमल शक्तिमत्ता का विजय घोष करता है। विश्व के समस्त प्राणी उसी परमपिता की सन्तान हैं। ऐसी दशा में उनमें पारस्परिक बन्धुत्व की भावना को पुनः पुष्टि करती हैं। विश्व बंधुत्व  व वसुधैव कुटुम्ब भारतीय संस्कृति की आधारशिला है। अन्त में निष्पक्ष  रूप से कहा जा सकता है कि भारतीय ज्ञान परम्परा व संस्कृत वाङ्मय तथा भारतीय समाज में   विश्वबन्धुत्व के साथ ही वसुधैव कुटुम्ब का अपूर्व सन्देश सदैव रहा है। भारतीय ज्ञान परम्परा के चिंतन से निकलने वाली “विश्व बंधुत्व की भावना” एक ऐसी गंगा के रूप में है, जिसका लाभ सम्पूर्ण भारत ही नहीं विश्व के लिए है ‌। आधुनिक काल में भारत के द्वारा इस मानव मात्र के कल्याण के भाव को पूर्णरूपेण आत्मसात् कर रखा है।

सन्दर्भ:-

  1. काव्यादर्श
  2. बृहदारण्यकोपनिषद
  3. मुण्डकोपनिषद
  4. हितोपदेश
  5. यजुर्वेदे
  6. ऋग्वेद
  7. रामायण
  8. मत्स्य पुराण
  9. www.ijcrt.org 2023 IJCRT | Volume 11, Issue 4 April 2023 | ISSN: 2320-2882 IJCRT.ORG ISSN: 2320-2882 INTERNATIONAL JOURNAL OF CREATIVE RESEARCH THOUGHTS (IJCRT) An International Open Access, Peer-reviewed, Refereed Journal मानवीय मुल्य एंव भारतीय समाजः एक विश्लेषणात्मक अध्ययन अनुराज,
  10. International Journal of Sanskrit Research 2016; 2(6): 129-130 International Journal of Sanskrit Research अनन्ता : ISSN: 2394-7519 IJSR 2016: 2(6): 129-130 ©2016 IJSR www.anantaajournal.com Received: 27-09-2016 Accepted: 28-10-2016 Pooja Saini Department of Sanskrit, lindu Girls College, Sonepat, Haryana, India Correspondence Pooja Saini Department of Sanskrit, Hindu Girls College, Sonepat, Haryana, India Pooja Saini वैदिक वाङ्मय मे विश्वबन्धुत्व

Authored by Prof. Tej Pratap Singh,

Published by Dept. Political Sciences, BHU Varanasi, U.P.