धर्मशास्त्र में वर्णित राज्य व्यवस्था
भूमिका- धर्मशास्त्र ऐसा साहित्य है जिसमें धर्म समाज आदि के विषय में व्यापक विवेचन मिलता है I धर्मशास्त्र में स्मृतियों का प्रमुख स्थान है I इसमें मनुस्मृति याज्ञवलक्य स्मृति और नारद स्मृति मुख्य है I मनुस्मृति की रचना ईसा से दो शताब्दी पूर्व तथा दो शताब्दी बाद के मध्य काल में हुई १ I अन्य स्मृतियों का रचनाकाल इसके बाद का है I प्रायः सभी स्मृति ग्रन्थ में राजधर्म का समावेश है I नारद स्मृति में राज्य के उद्गम के दैवी सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया है I उसमें कहा गया कि राजा सर्वशक्तिमान है I वही रक्षक है राजा जो कुछ करता है वह ठीक या सम्यक ही रहता है I जिस प्रकार दुर्बल पति को भी उसकी पत्नी की ओर से सम्मान मिलता है उसी प्रकार गुणहीन शासक को भी प्रजा द्वारा सम्मान मिलना चाहिए २ I
राज्य के सिद्धांत- मनु और याज्ञवल्क्य दोनों ने राज्य को सप्तांग माना है ३ I मनु ने सौराष्ट्र और परराष्ट्र मित्रराष्ट्र और शत्रुराष्ट्र मंडलराष्ट्र का उल्लेख किया है ४ I मनु जिस आर्यावर्त का चित्रण करते हैं वह अनेक जनपदों में बटाँ हुआ था और राजनीतिक दृष्टि से एक नहीं था राज्य की संज्ञा राष्ट्र थी I राष्ट्र के अंतर्गत कई देश या जनपद होते थे ५ I राजा के सहायक अधीन सरदार सामंत कहलाते थे ६ I राष्ट्र में शासन व्यवस्था महाभारत में वर्णन दशम पद्धति के अनुसार एक ग्राम 10 ग्राम 100 ग्राम और एक सहस्त्र ग्रामों के पृथक पृथक समूह में संगठित किया जाता था I विष्णु स्मृति में एक सहस्त्र ग्रामों को पृथक पृथक समूह में एक सहस्त्र ग्रामों के स्थान पर समस्त देश का उल्लेख है I
राजा- राजा को राष्ट्र में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था I मनु और याज्ञवल्क्य ने कहा है कि राजा को पिता तुल्य होकर प्रजा का पालन करना चाहिए I राजा सचिवों की सहायता से शासन करता था ७ I मनुस्मृति में पुरोहित का विशेष उल्लेख नहीं किया गया है जबकि याज्ञवल्क्य स्मृति में कहा गया है कि राजा ऐसे व्यक्ति को पुरोहित बनाएं जो ज्योतिष शास्त्र को जानने वाला सब शास्त्रों से समृद्ध अर्थशास्त्र में कुशल और शांति आदि अथवागिरस में निपुण हो I इस काल में राज्य कर्मचारी युक्त कहलाते थे और उच्च विभाग का अधिकारी महापात्र कहे जाते थे ८ I कार्यपालिका के विभिन्न अंगों के साथ-साथ मनु ने विधायिका की भी व्यवस्था की है प्रजा अपनी संघीय संस्थाओं के द्वारा अपने लिए स्वयं नियम बनाने में स्वतंत्रत थी I कुल जाति श्रेणी और जनपद इसी प्रकार की संस्थाएं थी I राजा अपनी स्वीकृति देकर संस्थाओं के नियमों का पालन करता था ९ I मनु के अनुसार धर्म या कानून के स्रोत वेद या श्रुति धर्मशास्त्र चा स्मृति सील तथा आचार अर्थात धर्म परायण व्यक्तियों के रीति रिवाज से नारद ने राजा को पवित्र मानकर निंदा और शारीरिक दंड से मुक्त रखा है I बृहस्पति के धर्मशास्त्र में न्यायिक प्रक्रिया का विस्तृत वर्णन मिलता है I पराशर स्मृति और अत्रि स्मृति में मानव समाज के धार्मिक व सामाजिक जीवन पर प्रकाश डाला गया है I
धर्मशास्त्र की प्रमुख स्मृतियों में वर्णित शासन व्यवस्थाएं मौलिक रूप से काफी कुछ मिलती-जुलती हैंI विभिन्न स्मृतियों में समय और आवश्यकता के अनुसार इन व्यवस्थाओं में किंचित परिवर्तन दिखाई देता है I
अन्य प्राचीन साहित्य में राज्य व्यवस्था- उपरोक्त साहित्य के अतिरिक्त अर्थशास्त्र नीतिशास्त्र पाणिनी की अष्टाध्याई आदि में प्राचीन भारतीय राज्य व्यवस्था का व्यापक वर्णन है I कौटिल्य का अर्थशास्त्र तथा पुराण साहित्य अत्यंत व्यापक है I इसका रचना काल ईसा के बाद पांचवी तथा दसवीं शताब्दी का माना जाता है पुराणों की संख्या 18 है पुराणों में राजनीतिक विचारों का उल्लेख मिलता है I Iवायु पुराण ,अग्नि पुराण ,मार्कंडेय पुराण ,विष्णु पुराण ,तथा मत्स्य पुराण में राजधर्म का वर्णन अपेक्षाकृत अधिक आया है I वाह्य पुराण में सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था की उत्पत्ति का उल्लेख है I अग्नि पुराण के अनुसार राज्य एक नैतिक संघ है जिसमें राजा अथवा शासन जन कल्याण का सर्वोच्च साधन है १० I अग्नि पुराण में राजा के गुण कर्तव्यों और अभिषेक का विस्तार से वर्णन किया गया है I इसके अतिरिक्त कर तथा न्याय संबंधी सिद्धांत भी उल्लेखित हैं I मार्कंडेय पुराण में शासन का कर्तव्य प्रजा को संतुष्ट रखने बताया गया है I उप पुराणों में राजनीति का वर्णन आता है जिनकी सामग्री मुख्यतः पुराणों पर ही आधारित है I
राज्यशास्त्र प्रणेताओं में ११ कामंदक का स्थान महत्वपूर्ण है I कामन्दकीय नीतिसार काव्य रूप में राजधर्म पर लिखा गया प्रथम ग्रंथ है १२ I यद्यपि नीतिसार की गणना नीति पर लिखे गए ग्रन्थों में होती है I किंतु अलतेकर के मतानुसार व्यवहारतः यह कौटिल्य के अर्थशास्त्र का सारांश मात्र है १३ I कामंदक ने राज्य में राजा का स्थान सबसे ऊंचा माना है I कामंदक ने युवराज पद के लिए जेष्टता के सिद्धांत को मान्यता दी है I साथ ही यह भी कहा है की बुरी वृत्ति वाले राजपुत्र का त्याग नहीं करना चाहिए I उसे दुष्ट हाथी की तरह सुख बंधन में रहना चाहिए अन्यथा वह शत्रु का आश्रय लेकर राजा को मारेगा १५ I कामंदक के अनुसार राजा का उद्देश्य प्रजा को धर्म अर्थ और काम की प्राप्ति में सहायता देकर सब प्रकार हित करना हैI कामंदकीय नीतिसार में सभा अथवा परिषद का उल्लेख नहीं है किंतु मंत्रणा के लिए दुर्ग का उल्लेख आया है I कामंदक ने कहा है कि राजा को विचार करते हुए मंत्र को सदा गुप्त रखना चाहिए इसके गुप्त रहने से रक्षा होती है १६ I कामंदक के अनुसार राजा का पुरोहित त्रयी विद्या और दंड नीति में कुशल होना चाहिए I कामंदक ने राज्य कर्मचारियों की योग्यताओं कोष की स्थिति आदि के विषय में विस्तार से लिखा है I कामंदक का मत है कि दंड नीति के आश्रित ही जगत की स्थिति है दंड के समय प्रयोग की नीति को दंड नीति कहते हैं १७ I दंड नीति के नियमों एवं सिद्धांतों का सम्यक प्रयोग प्रजा के कल्याण के लिए नितांत आवश्यक है I
भर्तृहरि के नीतिशतक में राजनीतिक सिद्धांतों का कोई महत्वपूर्ण उल्लेख नहीं है I जबकि इसी श्रेणी के अन्य ग्रन्थों यथा सोमेश्वर के अभिलाषितार्थ चिंतामणि भोज के युक्तिकल्पतरु लक्ष्मीधर के राजनीति कल्पतरु देवण भट्ट के राजनीतिक कांड चंदेश्वर के राजनीतिक प्रकाश में राज्य व्यवस्था से संबंधित वर्णन मिलता है I इसके अतिरिक्त विशाखदत्त के मुद्राराक्षस कालिदास के रघुवंश बाणभट्ट की कादंबरी और हर्षचरित्र शूद्रक के मृच्छकटिक सुबन्धु के वासवदत्ता विष्णु शर्मा के पंचतंत्र सोमदेव के कथारित सागर दंडी के दसकुमार चरित्र में भी कहीं-कहीं राजनीतिक विचारों को संस्थाओं का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उल्लेख है रघुवंश में रघु वंश के सत्रह राजाओं के चरित्र और राजधर्म का चित्रण किया गया है I कालिदास के अनुसार धर्म ही राजनीति और काम को निर्धारित करता है राज्य धर्म में निहित सामाजिक व्यवस्था की देखरेख का साधन है १८ I इसी प्रकार अन्य ग्रन्थों में भी स्थान स्थान पर राजधर्म का वर्णन आया है I
निष्कर्ष- साहित्य के अतिरिक्त प्राचीन भारतीय शासन पद्धति के अध्ययन के लिए शिलालेख ताम्र पत्र तथा मुद्रा पर अंकित अभिलेख भी महत्वपूर्ण स्रोत हैं I शिलालेख मौर्य सम्राट अशोक के शासनकाल से मिलता है I प्राचीन शिलालेखों का अभाव है फिर भी जो शिलालेख मिलते हैं उनमें तत्कालीन भारत की राजनीतिक सामाजिक व धार्मिक स्थिति की जानकारी मिलती है I ताम्र पत्रों पर प्राप्त अंकित लेखों के विषय में अलतेकर का मत है कि यह लेख राज कवियों या शासकीय अधिकारियों द्वारा लिखे जाते थे I इसलिए राजा के संबंध में अतिशयोक्ति दृष्टिगोचर होती है I प्राचीन भारतीय राजव्यवस्था के अध्ययन में मुद्रा शास्त्र भी उपयोगी है I मुद्राओं पर अंकित जो अभिलेख मिले हैं उनमें राज्यों की जानकारी मिलती है I शिवि मालवा अर्जुनायन कुणिदे यौधेय आदि गणतंत्र का अस्तित्व मुद्रा लेखों से स्पष्ट होता है १९ I
संदर्भ ग्रंथ
१-मनु और याज्ञवल्क्य के पी जायसवाल पृष्ठ 21
२-नारद स्मृति प्रकीर्णक 20 ,22 ,26, 52
३-मनुस्मृति 9.294 याज्ञवल्क्य स्मृति राजधर्म प्रकरण
४-मनुस्मृति 7.3268 -154
५-मनुस्मृति 9.251- 7.34
६-मनुस्मृति 9.27
७-मनुस्मृति 7.31-36
८-याज्ञवल्क्य स्मृति 8.34 -9.259
९-मनुस्मृति 8.41-46
१०-प्राचीन भारत में राजनीतिक विचार एवं संस्थाएं परमात्मा शरण पृष्ठ 15
११-बौद्ध धर्मसूत्र 1.10.1
१२-ए हिस्ट्री ऑफ इंडियन पॉलीटिकल आईडियाज यू एन घोषाल पृष्ठ 370
१३-स्टेट एंड गवर्नमेंट इन असिएंट इंडिया ए एस अलतेकर पृष्ठ 370
१४ - कामंदकीय नीतिसार 1.1
१५-पूर्ववत 7.6.7
१६- कामंदकीय नीतिसार में राजनीतिक विचार एवं संस्थाएं वीरेंद्र कुमार सिंह पृष्ठ 75
१७-उपरोक्त
१८- अप्यर्थकामो तस्यास्तां एव मनीषिण -रघुवंश ।
१९-प्राचीन भारत शासन पद्धति ए एस अलतेकर पृष्ठ 19-20
Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.
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