मनुस्मृति में न्याय एवं दंड व्यवस्था

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 न्याय व्यवस्था  

मनुस्मृति में राजा का एक प्रमुख कर्तव्य न्याय सभा में उपस्थित होकर न्याय कार्य करना बताया गया है I समाज में ऐसी अपराध प्रवृति के मनुष्य सदैव ही पाए जाते हैं I जो अन्यों के अधिकार का उल्लंघन अतिक्रमण अथवा हनन करते हैं I न्याय कार्य का उद्देश्य ऐसी अपराध प्रवृति के मनुष्यों से अन्यों की रक्षा करना है और पीड़ित मनुष्य की क्षतिपूर्ति हेतु अपराधी को दंडित करना है I मनु ने न्याय प्रक्रिया के लिए व्यवहार शब्द का प्रयोग किया है I इन शब्द की उत्पत्ति वि+ अब+ हार से हुई हैI  जिसका अर्थ है विभिन्न प्रकार के संदेह का अंत करना वस्तुतः व्यवहार के द्वारा किसी विवाद में निहित कानूनी संदेहो या मुद्दों का समाधान प्रस्तुत किया जाता है I इस प्रकार व्यवहार का सरल अर्थ है कानूनी विवाद या मुकदमे की न्यायिक प्रक्रिया १  I

न्यायालयों का संगठन

मनुस्मृति ने ग्राम से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक न्यायालयों की किसी एकीकृत श्रृंखला का उल्लेख नहीं किया है I इस ग्रंथ में स्पष्ट रूप से मात्र धर्म तथा सभा नामक न्यायालय का विवरण दिया है I जो वास्तव में केंद्रीय न्यायालय हैं I इसकी अध्यक्षता स्वयं राजा करता था और इस धर्म सभा में उसे धर्माध्यक्ष अथवा धर्मास्था था कहा जाता है २ I राजा की अनुपस्थिति में उसके द्वारा नियुक्त प्राड्विवाक न्याय करता हैI  जो विद्वान ब्राह्मण होता है I न्याय कार्य में मदद के लिए अन्य सदस्य भी होते थे जो धर्म सभा के सभासद कहलाते थे I

मनु का मत है कि इन सभासदों को वेदाज्ञ ब्राह्मण व सदाचारी होना चाहिए और उन्हें जाति, धर्म ,देश, धर्म ,श्रेणी ,धर्म, कुल धर्म ,आदि ज्ञात होना चाहिए I इसके अलावा वे देश व काल विदेशी व कल के अनुसार अपनी राय देने में भी सामर्थ होना चाहिए I ताकि राजा द्वारा न्याय कार्य उचित प्रकार से किया जा सके I इस प्रकार मनु ने अकेले एक न्यायाधीश द्वारा विवादों के निर्णय को उचित नहीं माना है  I अपितु सभासदों की राय से न्याय कार्य को किया जाना उचित माना है  I मनुस्मृति में उपलब्ध विवरण के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि उपरोक्त धर्म सभा के अलावा अन्य न्यायालय भी मौजूद थे  I यह न्यायालय अपने क्षेत्र की दृष्टि से स्थानीय स्तर के थे और अपनी प्रकृति से सामुदायिक थे I इस प्रकार के न्यायालय में गणन्यायालय जनपद न्यायालय जाति न्यायालय कुल न्यायालय आदि की गणना की जा सकती है I  

न्याय प्रक्रिया के चरण

मनु ने अन्य आचार्य की तरह ही संपूर्ण मुकदमे या व्यवहार के चार पद स्वीकार करते हैं

पूर्व पक्ष

यह वादी से संबंधित पक्ष हैI

प्रतिपक्ष

यह प्रतिवादी से संबंधित पक्ष है

     धर्म सभा में सबसे पहले वादी स्वेच्छा से उपस्थित होता है और प्रतिवादी के खिलाफ अन्याय का आरोप लगाते हुए न्याय की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करता है I धर्म सभा उसके प्रार्थना पत्र पर गौर करती है और इसके तथ्यात्मक होने पर इसे न्याय हेतु स्वीकार करती है I अन्यथा रद्द कर देती है स्वीकार करने पर वादी और प्रतिवादी दोनों को आमंत्रित करती है I वे दोनों अपने-अपने पक्ष प्रस्तुत करते हैं  I जिन्हें सुनकर धर्म सभा बनता है तो व्यवहार का तीसरा चरण अर्थात क्रियापाद प्रारंभ होता है  I अन्यथा मुकदमा इसी स्तर पर रद्द कर दिया जाता है  I

  क्रियापाद

क्रियापाद किसी मुकदमे की ऐसी पूर्व सुनवायी है I जिसके द्वारा मुकदमे में छिपे हुए कानूनी सत्य का पता लगाया जाता है I क्रियापाद के दौरान वादी तथा प्रतिवादी मुकदमे से संबंधित अपने-अपने प्रमाण प्रस्तुत करते हैं I यह उल्लेखनीय है कि मनु ने इन दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले समस्त प्रमाणों को दो मुख्य वर्गों में विभाजित किया है I

१-मानुष प्रमाण में मनु ने इसके तीन प्रकार बताएं हैं I लिखित भोग तथा साक्षी I इन तीनों प्रमाणों में लिखित का विशेष महत्व है किंतु यह जाली अथवा दबाव पूर्वक लिखा गया नहीं होता I इसका द्वितीय प्रकार भोग है भोग का सामान्य अर्थ है कब्जा I भोग को न्याय में रखकर किसी वस्तु के उपयोग एवं स्वामित्व को तय किया जा सकता है I मनु का मत है कि जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की वस्तु का लगातार 10 वर्ष तक भोग करता है तो उस वस्तु का वास्तविक स्वामी कोई आपत्ति नहीं करता है I तो वह वस्तु भोगकर्ता की हो जाती है ३ I मनु का मत है की धरोहर, रेहन रखी वस्तु ,बाल धन ,राजा के धन, क्षेत्रीय आदि के धन के बारे में भोग प्रमाण लागू नहीं होता ४ I मानुष प्रमाण का तीसरा प्रकार साक्षी है साक्षी उसे बनाया जा सकता है जिसने मुकदमे से संबंधित घटना को स्वयं देखा हो अथवा किसी प्रत्याशी से उसके बारे में सुना हो ५ I मनु ने साथियों की योग्यताओं एवं अयोग्यताओं पर विचार किया है और मात्र योग्य साथियों के साक्षी को ही महत्वपूर्ण माना है ६ I  सामान्य रूप से मनु का मत है कि किसी भी मुकदमे में वादी द्वारा अपने पक्ष में कम से कम तीन साक्षी प्रस्तुत किए जाने चाहिए I किंतु जब कोई कुकर्म एकांत में किया गया हो तो जो भी व्यक्ति उस घटना का जानकारी हो उसे ही साक्षी बना लेना पर्याप्त है I मनु का निर्देश है कि झूठ साक्षी देने वाले व्यक्ति को अवश्य ही दंडित किया जाना चाहिए ७ I

२-मनु के अनुसार जब किसी मुकदमे के निर्णय के लिए किसी भी प्रकार का मानुष प्रमाण प्राप्त नहीं होता तो दिव्य प्रमाण नामक साधन की मदद ली जानी चाहिए ८ I मनु ने अग्नि दिव्या प्रमाण तथा जल दिव्य प्रमाण को मान्यता दी है I याज्ञवल्क्य का मत है कि यह प्रमाण केवल प्रतिवादी पर ही लागू होते हैं वादी पर नहीं I अग्नि दिव्य प्रमाण के अनुसार प्रतिवादी को जलते अंगारों पर चलकर स्वयं को आरोप मुक्त सिद्ध करना पड़ता हैI  जल दिव्य प्रमाण के अनुसार प्रतिवादी को कुछ समय तक लगातार जल के अंदर डूब कर स्वयं को निर्दोष प्रमाणित करना होता है  I

३-निर्णय-क्रिया पाद का निर्णय मुकदमे के निर्णय के रूप में प्राप्त होता है I क्रियापाद के दौरान प्रस्तुत किए गए विभिन्न प्रमाणों के आधार पर सत्य एवं सत्य का पता लगाया जाता है I और तब कानून के अनुसार निर्णय दिया जाता है जो वादी और प्रतिवादी पर अनिवार्य रूप से लागू होता हैI  मनु के अनुसार निर्णय वेद स्मृति एवं सदाचार९ में निहित कानून पर आधारित होना चाहिए  II वस्तुतः इन कानून की व्याख्या देशकाल वह स्थिति के रूप में की जानी चाहिए ताकि संबंधित पक्षों को सही मायने में न्याय प्राप्त हो सके I मनु बताते हैं कि यदि किसी मामले में वेद स्मृति एवं सदाचार में निहित कानून स्पष्ट नहीं हो तो राजा एवं सभासदों को आत्म पुष्टि के अनुसार न्याय करना चाहिए अर्थात इन्हें न्यायाधीश के रूप में स्वविवेक के अनुसार निर्णय देना चाहिए I

     मनु ने निष्कर्ष एवं कानून संवत निर्णय देने पर बल दिया है न्याय की पूर्णता के लिए मनु ने मुकदमे के पुनर्चिन्तन की व्यवस्था को स्वीकारा है I जब राजा को यह मालूम हो जाए कि सत्य साक्षी के कारण अथवा मंत्री या प्राड -विवाक की भूल के कारण निर्णय दोषपूर्ण हुआ है तो स्वयं राजा को उस मुकदमे पर पुनर्चितन करना चाहिए और उक्त दोषी जनों को दंडित करना चाहिए १० I

दंड व्यवस्था

मनु ने दंड शब्द का प्रयोग विभिन्न अर्थों में किया है किंतु न्याय व्यवस्था के संदर्भ में दंड का अर्थ है न्यायालय द्वारा अपराधी को दी गई सजा इस दृश्य से मनुस्मृति की दंड व्यवस्थाएं की विशेषता निम्न है-

    1- दंड स्वयं में साक्ष्य नहीं है अपितु यह समाज में मौजूद अपराध प्रवृति का दमन एवं नियंत्रण करने का साधन है दंड की मदद से सामाजिक राजनीतिक जीवन में शांति व्यवस्था एवं सुरक्षा स्थापित होती है I अर्थात धर्म पूर्ण जीवन संभव होता है दंड व्यवस्था जब अपराधी को दंडित करती है तो उसमें निम्न भाव का उद्देश्य निहित होता है-

   2 - पीड़ित पक्ष को अपनी हानि के अनुसार अनुमान में मुआवजा प्राप्त हो अपराधी के अपराध का अंत हो उसे अपराध से मुक्त होने का अवसर मिले तथा वह भविष्य में अपराध न करें I समाज के सभी सदस्यों को अपराध नहीं करने की प्रेरणा प्राप्त हो  I

दंड के प्रकार  

मनु ने दंड के चार प्रकार बताएं वागदण्ड ११ ,धिग्दण्ड १२,अर्थ दंड १३,तथा शरीर दंड१४, मनु ने केवल अपराधी को ही दंड के योग्य माना है I  यह उल्लेखनीय की उन्होंने न केवल व्यक्ति तथा संपत्ति के प्रति किए गए अपराध को दंडनीय माना है I अपितु विभिन्न पशुओं के प्रति हिंसा तथा प्राकृतिक संपदा को नष्ट करने के  कुकृत्य को भी दण्डनीय अपराध बताया है I

निष्कर्ष

मनु के दंड संबंधी उपरोक्त विचारों का आधार उनकी यह धारणा है कि दंड में कठोरता के साथ ही दया का भाव भी रहना चाहिए I अपराध में निहित अपराधी के आशय तथा कुकृत्य की मात्रा के अनुसार ही उसे दंडित किया जाना चाहिए I इसके साथ ही अपराधी को दंडित करने से पूर्व निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए  I अपराध का काल स्थान एवं स्थिति तथा अपराधी का मानसिक स्तर आयु शारीरिक स्थिति सामाजिक स्तर अतीत, जाति, लिंग ,आदि यदि कोई व्यक्ति आदतन बार-बार अपराध करता है तो उसे अत्यधिक कठोर दंड दिया जाना उचित होता है I मनु ने एक ही प्रकार के अपराध के लिए पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को कम कठोर दंडनीय माना है I उन्होंने एक ही अपराध के लिए विभिन्न वर्ण के पुरुषों के लिए भी दंड के प्रकार एवं मात्रा में अंतर स्वीकार है १५ I

संदर्भित ग्रंथ

१-मनु ने कुल 18 विषय बताए हैं जिनके अंतर्गत सभी प्रकार के मुकदमे आते हैं जिन्हें आजकल हम दीवानी एवं फौजदारी मुकदमे कहते हैं

२-मनुस्मृति -8.23 एवं 57

३-मनुस्मृति- 9.147-148

४-मनुस्मृति 8.149

५-मनुस्मृति -8.74

६-मनुस्मृति -8.62-67

७-मनुस्मृति -8.123

८-मनुस्मृति -8.109-116

९-कानून की दृष्टि से सदाचार एक व्यापक शब्द है जिसमें जाति देश श्रेणी व कुल के कानून निहित होते हैं

१०-मनुस्मृति- 8.1 17 - 9.234

Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.

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