मनुस्मृति में पर राष्ट्र संबंध
राष्ट्र संबंध
पर राष्ट्र नीति के निर्माण व संबंधों के संचालन की दृष्टि से मनुस्मृति में उपलब्ध निम्न तथ्य महत्वपूर्ण है Iराज्य मंडल का सिद्धांत षड्गुणनीति नीति के चार उपाय प्राचीन भारत में अनेक छोटे छोटा राज्य पाए जाते थे और उन राज्यों के आपसी सहयोग की सैद्धांतिक व्याख्या के लिए मनु आदि विभिन्न आचार्य ने राज्य के मंडल सिद्धांतों को स्वीकारा है १ I
राज्य मंडल सिद्धांत
मनु का मत है कि किसी एक राज्य मंडल में चारों प्रकृतियां ही आधार भूत महत्व की होती है I बिजिगीषु राज्य अरि राज्य मध्यम राज्य तथा उदासीन राज्य उनका यह भी मत है कि किसी राज्य मंडल में 12 प्रकृतियां होती हैं I मनु का मत है कि बिजिगीषु राज्य की आगे की सीमा से लगा हुआ राज्य बिजिगीषु राज्य से मित्रता नहीं शत्रु मानता है उसे ही मनु ने अरि राज्य कहा है I किंतु इसके आगे का राज्य बिजिगीषु राज्य से मित्रता मानता है उसे ही मनु ने बिजिगीषु राज्य के प्रसंग में मित्र राज्य कहा है I इस विवरण में यह भाव छुपा हुआ है कि अपनी सीमा पर स्थित पड़ोसी राज्य अपना शत्रु होता हैं और राजनीति में अपने अरि का अरि अर्थात अपने दुश्मन का दुश्मन अपना मित्र होता है I इस धारणा के अनुसार बिजिगीषु राज्य के मित्र राज्य से आगे का राज्य अरिमित्र राज्य होता है और उसके आगे क्रमशः मित्र मित्र राज्य तथा अरिमित्र राज्य होता है I इन राज्यों के अलावा दो अन्य राज्य हैं I
मध्य राज्य तथा उदासीन राज मध्यम राज्य बिजिगीषु राज्य एवं शत्रु राज्य की सीमा पर स्थित होता है मध्य राज्य इतना शक्तिशाली होता है कि वह बिजिगीषु राज्य अथवा अरिराज्य की एक दूसरे के विरोध हेतु मदद दे सकता है और इस प्रकार वह इन दोनों का अलग-अलग अरि राज्य की एक दूसरे के विरोध हेतु मदद दे सकता है और इस प्रकार वह अपने दोनों का अलग-अलग विरोध भी कर सकता है I बिजिगीषु राज्य अरि राज्य एवं मध्यम राज्य इन तीनों की सीमा से दूर स्थित उदासीन राज्य होता है I उदासीन राज्य इतना शक्तिशाली होता है कि जब इन तीनों राज्यों में मतभेद की स्थिति होती है तो वह इनमें से प्रत्येक का विरोध करने में समर्थ होता है किंतु जब इन तीनों राज्यों में संधि या सहयोग होता है तो वह इसका समर्थक होता है I
बिजिगीषु राज्य के पीछे की सीमा २ से लगा राज्य भी उसका शत्रु राज्य होता है जिसे पाष्णिग्राह राज्य कहा जाता है I अर्थात पीछे की ओर का अरि इसके पीछे की ओर आक्रांत राज्य होता है I अर्थात बिजिगीषु राज्य के पीछे की दिशा वाला मित्र राज्य इसके पीछे क्रमशः पार्ष्णिग्राहासार राज्य तथा अक्रन्दासार राज्य होते हैं उपरोक्त संपूर्ण 12 राज्यों को मिलाकर एक राज्य मंडल की रचना होती है I जिसके केंद्र में विजिगीषु राजा होता है बिजिगीषु राजा को सदैव अपनी व अपने मित्र पक्ष के राज्यों की कुल शक्ति व स्थिति की ओर अरि और अरि पक्ष के राज्यों की कुल शक्ति व स्थिति की परस्पर तुलना करते रहना चाहिए इसके साथ ही बि जिगीषु राजा को मध्यम व उदासीन राज्यों की शक्ति व स्थिति पर भी ध्यान देना चाहिए राज्य मंडल के इन विभिन्न राज्यों के शक्ति के नापने का सरल तरीका यह है कि इन राज्यों की मूल प्रकृतियों एवं द्रव्य प्रकृतियों पर विचार किया जाए I
मनु के अनुसार प्रत्येक राज्य में राजा नामक एक मूल प्रकृति होती है तथा अमात्य, राष्ट्र ,पुर, कोश ,एवं दंड नIमक पांच राज्य में राजा नामक एक मूल प्रकृति होती है ,तथा इस प्रकार प्रत्येक राज्य की शक्ति रचना में इन 6 प्रकृतियों का योगदान होता है क्योंकि प्रत्येक राज्य में कुल 6 प्रकृतियां होती हैं और एक राज्य मंडल में कुल 12 राज्य होते हैं I अतः मनु ने संपूर्ण राज्य मंडल में कुल 73 प्रकृतियाँ बतायी हैं I बिजिगीषु राजा को अपने एवं अन्य राज्यों से संबंधित इन 72 प्रकृतियों के शक्ति एवं स्थिति पर विचार करने के बाद ही अपनी पर राष्ट्रनीति का निर्माण करना चाहिए ३ I
षड्गुणनीति
विदेशी नीति का दूसरा सूत्र षडगुण है यह षड्गुण संधि, विग्रह ,यान ,आसान ,द्वैधीभाव, और संश्रय कहलाते हैं I यह समय अनुकूल 6 प्रकार की विदेशी नीति का सिद्धांत है I राज्य की विदेश नीति में स्थिरता नहीं होतीआवश्यकता और परिस्थितियों के अनुसार उनमें परिवर्तन होते रहते हैं I प्रत्येक राजा को राज्य मंडल की प्रकृति अपने हानि लाभ का विचार कर यथानुसार इन्हें अपनाना चाहिए ४ I
संधि-जब अपने वर्तमान सैनिक स्थिति के कारण विजय प्राप्त करने में तनिक भी शंका होती है और यह स्पष्ट लक्षण होता है कि निकट भविष्य में सैनिक स्थिति सुदृढ़ हो जाएगी I उस समय सन्धि करना उचित होता है ५ I
विग्रह-राजा को अपनी समस्त प्रकृतियों को हर प्रकार से संतुष्ट अपने अनुकूल और सेना के शक्तिशाली होने पर विग्रह नीति अपनाना श्रेयस्कर होता है ६ I
यान-शत्रु राज्य पर चढ़ाई करना यान कहलाता है I यान के लिए उचित समय वह होता है जब शत्रु दुर्बल और अपनी शक्ति सबल होती है I ऐसी अवस्था में चढ़ाई करना लाभदायक है ७ I
आसन-अपनी सैन्य शक्ति दुर्बल होने पर और शत्रु के समर्थ होने पर यह उचित होता है कि शत्रु को भडकने का अवसर न दें , उसे शांत करते हुए स्वयं भी चुपचाप बैठ जाना ऐसे समय पर नीति की अनुकूल होता है ८ I
द्वैधीभाव-शत्रु के बलवान होने पर अपनी सेना को दो भागों में बांट दो एक भाग शत्रु को रोकने के लिए तथा दूसरी अपनी सुरक्षा के लिए नियुक्त कर अपनी शक्ति वृद्धि के उपाय करें I
संश्रय-प्रत्येक अवस्था में शत्रु द्वारा पराजित होने की संभावना देखकर अंत में शक्तिशाली राजा की शरण जाकर अपनी रक्षा करें ९ I
मनु का निष्कर्ष है की नीतिज्ञ राजा को उपरोक्त नीतियों का पालन इस प्रकार करना चाहिए कि न केवल शत्रु उदासीन आदि राजा अपितु मित्र राजा भी स्वयं से अधिक शक्तिशाली नहीं होने पाए क्योंकि इनमें से किसी का भी अधिक शक्तिशाली होना स्वयं के लिए संकट का कारण बन सकता है ६ I
नीति के चार उपाय-प्राचीन आचार्य की तरह ही मनु ने भी पर राष्ट्र संबंधों के कुशल संचालन के लिए अग्र लिखित चार उपाय को स्वीकार है ७ साम ,दाम ,भेद ,एवं दंड १० I
साम- शाम का सामान्य अर्थ है विपक्षी के प्रति प्रेम प्रदर्शन प्रिय वाणि एवं विशेष आदर सत्कार का व्यवहार करके उसके विरोध भाव को सूचित करना I
दाम- दाम नीति का अर्थ है विपक्षी को वास्तु भूमि धन आदि का उपहार देकर संतुष्ट करना और अपने अनुकूल बनाना I
भेद-भेद नीति का अर्थ है प्रबल विपक्षी गुट में मतभेद उत्पन्न करना ताकि उसकी आंतरिक एकता नष्ट हो और वह निर्बल हो जाए भेद नीति को दो प्रकार से अपनाया जा सकता है I एक तरीका यह है कि शत्रु राजा तथा उसके मित्र राजाओं के बीच मतभेद उत्पन्न कर दिए जाएं भेद नीति को लागू करने का दूसरा तरीका यह है कि शत्रु राजा तथा उसके पारिवारिक जनों में भी मतभेद उत्पन्न करना लाभपूर्ण सिद्ध होता है I भेद नीति में चल एवं कपट पूर्ण नीति है और इसके द्वारा प्रबल शत्रु के शक्ति को क्षीण किया जाना संभव होता है I
दंड- दंड नीति का अर्थ है शत्रु राजा का बलपूर्वक दमन करना और उसे अपनी शर्तों को स्वीकार कराना ११ I
निष्कर्ष-मनु ने स्वयं के राज्य की वृद्धि के लिए भी उपरोक्त चारों उपायों को अपनाने पर बल दिया है I मनु का मत है कि प्रजा को पीड़ित करने वाले चरमपंथियों को वश में करने के लिए नीति के इन चारों उपायों को काम में लाना चाहिए विशेष कर दंड के उपाय को I
संदर्भ ग्रंथ
१- इस राज्य मंडल सिद्धांत की विशेषताएं निम्न है यह सिद्धांत विजिगीषु राज्य को केंद्र बनाकर कुल 12 राज्यों के मंडल की कल्पना को स्वीकार करता है I यह सिद्धांत भूगोल एवं राजनीति की घनिष्ठता को स्वीकारता है I इस सिद्धांत में राज्यों के बीच शक्ति संतुलन की धारणा को स्वीकारा गया है I
२-यहां पीछे की सीमा का अर्थ है बिजिगीषु राज्य से लगी वह दिशा जो अरि राज्य से ठीक उलटी दिशा है और जिस ओर निकट भविष्य में बिजिगीषु राजा बढ़ाने की कामना नहीं करता I
३-पांडे पी -हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र –वॉल्यूम- 1 पेज 5
४ आयंगर रंगास्वामी -एस्पेक्ट ऑफ़ सोशल एंड पॉलीटिकल सिस्टम ऑफ मनुस्मृति -लखनऊ -1949 पृष्ठ संख्या -54
५-जयसवाल के पी- द हिंदू पालिटी -कोलकाता -1934 -पृष्ठ 235 - 239
६-सेन ए के -स्टडी इन हिंदू पॉलीटिकल थॉट -कोलकाता -1922 पेज 129
७-एस वर्धचर्य- हिंदू ज्यूडिशल सिस्टम- लखनऊ -1948 पृष्ठ 41
८-भंडारकर -प्राचीन हिंदू राजनीति के कुछ पहलू –वाराणसी- 1974 पांचवा व्याख्यान- पृष्ठ संख्या- 61 - 80
९-घोषाल - हिस्ट्री ऑफ इंडियन पॉलीटिकल आईडियाज -1959- पेज 539
१०-वर्मा वी पी -स्टडी इन हिंदू पॉलीटिकल थॉट एंड इट्स मैटेफिजिकल फाउंडेशन –पेज- 135
११-शर्मा पद्मनाभ- मनुस्मृति में मंत्री परिषद- एक विवेचन- पृष्ठ 1 -9 लोकतंत्र समीक्षा वर्ष -14 अंक 1 + 2 जनवरी 2 जून 1983
Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.
Published by,