शुक्रनीति में स्थानीय प्रशासन
स्थानीय प्रशासन
शुक्रनीति में अन्य प्राचीन हिंदू ग्रंथो की भांति जहां अनेक स्थानीय इकाइयों १ एवं संस्थाओं का उल्लेख उपलब्ध होता है वहां संस्थाओं के संगठन एवं शक्तियों के संबंध में अधिक जानकारी का अभाव है I इन इकाइयों में से ग्राम शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम ऋग्वेद में हुआ है २ I जबकि प्राचीन भारत के जीवन में नगरों का स्थान अपेक्षाकृत नगण्ड था वैदिक मंत्रों में ग्रामों की समृद्धि की प्रार्थना बहुत की गई है पर नगरों या पुरो का शायद ही कभी नाम लिया गया हो ३ I किंतु शुक्रनीति में ग्राम के साथ नगर एवं पूर्व का उल्लेख भी उपलब्ध होता है ४ I
शुक्रनीति में स्थानीय प्रशासन
प्राचीन भारत ५ में ग्राम आकार एवं स्थिति की दृष्टि से कई प्रकार के होते थे I जिनमें कुछ छोटे और कुछ बड़े भी हुआ करते थे ६ I इसी प्रकार शुक्रनीति में भी ग्रामों को मुख्य रूप से तीन प्रकार का माना गया है I जिनमें प्रथम स्थिति उन ग्रामों की पाई जाती है जो आकार में छोटे होते हैं I इन श्रेणी के गांव को कुंभ के नाम से पुकारा गया है I द्वितीय स्थिति में वे ग्राम आते हैं जो कुंभ से बड़े होते हैं किंतु ग्राम से बड़े नहीं होते थे I वस्तुतः ऐसे ग्रामों को पाल्ले नाम से पुकारा गया है I ग्राम की तृतीय स्थिति पाल्ले से बड़ी किंतु नगर से छोटी मानी गई है जिन्हें वस्तुतः ग्राम नाम से ही संबोधित किया गया है ७ I
शुक्रनीति में स्थानीय प्रशासन के कार्य
इस भांति स्पष्ट है कि शुक्र नीति कर ने कुंभ पाल्ले ग्राम आदि तीन भेद उनके आकार ८ के आधार पर ही किए गए थे I जिस भांति महर्षि ने ग्राम एवं उनके संबंधित छोटी संस्थाओं का वर्णन प्रस्तुत किया गया है I उसी प्रकार नगर का भी उल्लेख मिलता है ९ I यहां यह भी उल्लेखनीय है कि चूँकि नगर या पुर के वर्णन का सामान्य अभाव ही रहा है I अतः इसके संबंध में विद्वानों ने विभिन्न मत व्यक्त किए हैं I कुछ एक विद्वानों ने पूर्व राजधानी के संदर्भ में ही प्रयुक्त किया है और कुछ अन्य ने इसे नगरों के संदर्भ में भी प्रयुक्त किया है १० I शुक्रनीति में जहां राजधानी के निर्माण का ब्योरेवार वर्णन प्रस्तुत किया गया है वहीं अन्य नगरों के निर्माण व्यवस्था का भी विस्तृत वर्णन मिलता है ११ I इतना ही नहीं उन्होंने सार्वजनिक निवासियों की व्यवस्था का भी सांगोपांग वर्णन प्रस्तुत किया है १२ I
शुक्रनीति में जिस प्रकार नगर एवं ग्रामों के आंतरिक संगठन को सुव्यवस्थित एवं सुंदर बनाने का प्रयास किया गया है I इसी भांति उनमें सरकारी सार्वजनिक निवासो की भी व्यवस्था यात्रियों के सुविधापूर्वक ठहरने के उद्देश्य से की गई है I शुक्र नीति ने इस प्रकार के सार्वजनिक निवास को दो ग्रामों के लिए बनाने का निर्देश दिया है १३ I उनके अनुसार इन सार्वजनिक निवासियों के सुव्यवस्था एवं रक्षा प्रबंध ग्राम के जमींदार या मुखिया द्वारा किया जाएगा I लेकिन यह राज्य की ओर से नियुक्त किए जाएंगे जिन्हें ग्रामप १४ नाम से संबोधित किया गया है I
शुक्रनीति में ग्रामप का कर्तव्य बताया गया है कि वह ठहरने के उद्देश्य से आए यात्रियों से यह पूछे कि तुम कहां से आए हो? और क्यों आए हो? कहां जा रहे हो? क्या तुम्हारा कोई साथी है या तुम अकेले हो? क्या कोई शस्त्र या सवारी तुम्हारे पास है या तुम अकेले हो? तुम्हारी कौन सी जाती है? तुम किस वंश के हो? तथा तुम्हारा क्या नाम है ,और अधिकांश तुम कहां रहते हो? इस प्रकार उपरोक्त संपूर्ण तथ्यों को सही-सही जानकारी करके उक्त संपूर्ण बातों को लिख लेना चाहिए I इसके अतिरिक्त शुक्रनीतिकार में ग्रामप का यह भी दायित्व निश्चित किया है कि वह यदि यात्रियों के पास कोई हथियार आदि पाए तो उन्हें अपने पास रख ले I लेकिन महर्षि का विश्वास है कि इस प्रकार से रखे गए हथियारों को यात्रियों के जाते समय उन्हें वापस कर देना चाहिए I इस प्रकार आचार्य ने ग्रामप को यह निर्देश दिया है कि वह विश्रामगृह में ठहरने वाले यात्रियों की गणना करें तथा रात्रि के समय विश्रामगृह के मुख्य द्वार को बंद करके पहरेदारों से उसकी रक्षा कराए १५ I केवल रात्रि के समय में ही नहीं अपितु प्रातः काल में भी यात्रियों की गणना करने का निर्देश किया है I इसके पश्चात शुक्रनीति में मुख्य द्वार खोलकर यात्रियों को जाने की स्वतंत्रता दी गई है इस भाँति स्पष्ट है कि आचार्य ने विश्रामगृह की संपूर्ण आंतरिक प्रशासन की व्यवस्था का दायित्व ग्रामप नामक अधिकारी को सौपI है I
उपरोक्त संपूर्ण विवेचन से ऐसा प्रतीत होता है कि शुक्रनीति की राज्य व्यवस्था में यात्रियों को व्यापक रूप से सुविधा का ध्यान रखे जाने की व्यवस्था की गई है I केवल इतना ही नहीं महर्षि शुक्र ने यात्रियों की एवं उनके सामान की पूर्ण सुरक्षा किए जाने की व्यवस्था भी की है १६ I इन तथ्यों से यह भी स्पष्ट है कि शुक्रनीतिकार राज्य द्वारा सामान्य जनता की सुविधा एवं भलाई की दिशा में कार्य करने के पक्ष में थे I
शुक्रनीति में स्थानीय प्रशासन के संदर्भ में प्राप्त संकेतों से ऐसा आभासित होता है कि ग्राम नगर एवं अन्य इकाइयों की स्थानीय शासन व्यवस्था राज्य कर्मचारी एवं पूर्व संस्था द्वारा संचालित करने की व्यवस्था की गई है I राज्य कर्मचारियों द्वारा संचालित शासन व्यवस्था का वर्णन शुक्रनीति में किया गया है I यद्यपि नगर शासन व्यवस्था के संबंध में कोई अलग से वर्णन उपलब्ध नहीं है किंतु ग्राम व्यवस्था के साथ-साथ कुछ संकेत अवश्य उपलब्ध होते हैं I
राज कर्मचारियों की नियुक्ति
स्थानीय प्रशासन को चलाने के लिए जिन 6 राज कर्मचारियों की नियुक्ति की है वह शुक्राचार्य के अनुसार सदसाधिपति ,ग्रामप ,भागहार ,लेखक, शुल्काहार, और प्रतिहार ,आदि होंगे I इन राज्य कर्मचारियों की नियुक्ति राजा द्वारा की जाएगी I इसके वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है कि यह कर्मचारी ग्राम एवं नगर दोनों में ही नियुक्त किए जाएंगे I केवल इतना ही नहीं शुक्रनीतिकार ने तो इनके लक्षण के साथ कार्यों का भी विवेचन प्रस्तुत किया है I उनके अनुसार अपराध करने वाले जनता को दंड देने का कार्य सहसाधिपति करेगा I जबकि चोट डाकू तथा राज्य के उच्छल अधिकारीयों से जनता की रक्षा करने वाला ग्रामप होगा I भागहार राज्य की मालगुजारी वसूल करके राजकोष में जमा करने का कार्य करेगा I इसी प्रकार शुल्काहार व्यापारी तथा जनता से शुल्क ग्रहण करेगा तथा लेखन पद पर वही व्यक्ति नियुक्त किया जाना चाहिए जो गणना करने में चतुर, देश की भाषा का ज्ञान रखने वाला ,कुशल संदेश रहित और अर्थ समझने में सक्षम , स्वच्छ एवं स्पष्ट लिखने वाला ,संभवत इस प्रकार लेखक संपूर्ण ग्राम तथा नगर के आय व्यय से संबंधित लेखों को अंकित करने वाला होगा , अस्त्र-शस्त्र चलाने में निपुण दृढ़ अंग वाला तथा अलस्य रहित एवं योग्यता अनुसार व्यक्ति को बुलाने की रीति जानने वाला होगा I
राज्य अधिकारियों के कार्य
इस प्रकार से युक्त राज्य अधिकारियों के लिए निर्दिष्ट किए गए कार्यों से ऐसा प्रतीत होता है कि नगर और ग्राम आदि में सुरक्षा व्यवस्था दंड देना मालगुजारी वसूल करना तथा राज्य द्वारा आरोपित कर ग्रहण करना तथा हाईवे लेखक की नियुक्ति तथा पुलिस व्यवस्था आदि करना राजा का दायित्व निश्चित किया है I मालगुजारी प्राप्त करके राजकोष में जमा करने के वर्णन तथा राजकरो के विषय में ऐसे निर्देशन से ऐसा प्रतीत होता है कि राजा द्वारा लगाए जाने वाले विभिन्न करों को राजकोष में जमा नहीं किया जाएगा I उन्हें संभवत सार्वजनिक स्थानीय विकास के कार्यों पर ही व्यय किया जाएगा I इसलिए महर्षि ने आय व्यय लेखन के लिए लेखक की नियुक्ति की व्यवस्था की है I इस विवरण से ऐसा प्रतीत होता है कि उक्त कार्यों का संपादन जो राजा द्वारा नियुक्त अधिकारियों द्वारा कराया जाएगा I किंतु इनके अतिरिक्त अन्य स्थानीय कार्यों और संभवतः पौर नामक संस्थाओं से ही कराने का महर्षि शुक्र का विचार रहा होगा I इस मत की पुष्टि इस तथ्य से भी होती है कि चूँकि उक्त छह राज्य कर्मचारियों में सड़क नालियों एवं मकान आदि के निर्माण सफाई तथा वृक्षारोपण इत्यादि कार्यों की व्यवस्था करना किसी भी अधिकारी का कार्य नहीं बताया है I
अतः इसे स्पष्ट है कि आचार्य का विचार इन सभी कार्यों का जिनका की शुक्रनीति में व्यापक रूप से वर्णन किया गया है I पौर नामक संस्था द्वारा ही संपादित करने का रहा होगा I उक्त विवेचन से ऐसा भी प्रकट होता है कि महर्षि शुक्र ने अपने स्थानीय प्रशासन की व्यवस्था वर्तमान समय की व्यवस्था की भांति ठीक करने के पक्ष में रहे हैं जिनके अंतर्गत तहसीलदार की भांति राजस्व वसूल करने वाला भागहार एवं शुल्काहार होगा पुलिस इंस्पेक्टर की भांति ग्रामप चोर डाकू आदि से रक्षा करने का कार्य करेगा तथा प्रतिहार पुलिस सिपाही की भांति करने वाला होगा और सह साधिपति मजिस्ट्रेट की भांति दंड देने का कार्य करेगा
निष्कर्ष
उपर्युक्त संपूर्ण विवेचन से स्पष्ट है कि स्थानीय प्रशासन दो अंगों में विभाजित है प्रथम भाग में वह कार्य आते हैं जिनका कि संपादन राजा अपने कर्मचारियों के माध्यम से करेगा I द्वितीय श्रेणी में वह कार्य आते हैं जिनका संपादन पौर नामक स्थानीय संस्था द्वारा किया जाए I इस कार्य विभाजन से स्पष्ट है कि शुक्रनीति की शासन व्यवस्था केंद्रीकरण एवं विकेंद्रीकरण दोनों ही सिद्धांतों के समन्वय पर आधारित थी I इससे यह भी स्पष्ट है कि शुक्रनीतिकार केंद्रीकरण एवं विकेंद्रीकरण के गुण एवं दोष से परिचित थे I अतः उन्होंने दोनों की बुराइयों को दूर रखते हुए केवल गुणों को ग्रहण करने का प्रयत्न किया है I
संदर्भ ग्रंथ
१-पूर्व ,ग्राम, पल्लि ,कुंभ, आदि
२-पांडुरंग वामन काणे -पूर्वोक्त -पृष्ठ -649
३-अनंत सदाशिव अलतेकर -प्राचीन भारतीय शासन पद्धति -पृष्ठ -168
४-शुक्रनीति- 1/375- 376
५-अनंत सदाशिव अलतेकर- प्राचीन भारतीय शासन पद्धति -पृष्ठ -168
६-ग्राम सभाएं विभिन्न समितियां बनाकर शासन करती थी
७-शुक्रनीति -1/193
८-वही- 1/193 -196
९-वही -2/123
१०-के पी जायसवाल- 126 -127
११-क्योंकि प्राचीन भारत में ग्राम का अर्थ ग्राम ही नहीं था I संभवत वह नगर का भी द्योतक था I इसलिए शुक्रनीति के अध्ययन से स्पष्ट है कि नगर और ग्राम की निर्माण व्यवस्था का अलग-अलग वर्णन नहीं किया गया है I पांडुरंग वामनकाणे- पूर्वोक्त- पृष्ठ -649
१२-शुक्रनीति- 1/257
१३-वही -1/269
१४- इसके कर्तव्यों से ऐसा प्रतीत होता है कि यह कोई अन्य ग्रामप नामक अधिकारी होगा यह राज्य द्वारा नियुक्त छह अधिकारियों में से नहीं है
१५-शुक्रनीति- 1.273
१६-वही -1.314
Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.
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