प्राचीन भारत में राजनीतिक चिंतन की विशेषताएं

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भूमिका- 

प्राचीन भारत को राजनीति से शून्य समझने वाले पश्चात जगत के भ्रांत विचारको को कौटिल्य अर्थशास्त्र, मनुस्मृति ,याज्ञवलक्य स्मृति ,अवदान शतक ,आचारंगसूत्र ,विशाल वैदिक साहित्य ,आदि का अध्ययन करके यह समझ लेना चाहिए की प्राचीन भारतीय राजनीति स्वस्थ एवं लोकोपकारक थी जिसमें प्रजातंत्रात्मक भावना सामान्यतः सदैव बनी रही है I

प्राचीन भारत में राजनीतिक चिंतन का विकास- 

प्राचीन भारत में प्रचलित विभिन्न प्रकार की शासन प्रणालियों का परिचय अनेक शोध ग्रंथ में मिलता है १ I इससे स्पष्ट है कि प्राचीन भारत में अनेक शासन प्रणालियां प्रचलित थी २ I प्राचीन भारतीय शासन प्रणालियों के विभिन्न रूपों का वर्णन प्रोफेसर जायसवाल द्वारा समीचीनी ढंग से किया गया है I जायसवाल ने निम्न शासन प्रणालियों बताई हैं- भोज्य, शासन प्रणाली ,स्वराज शासन प्रणाली ,वैराज्य शासन प्रणाली, राष्ट्रीय शासन प्रणाली ,द्धै राज्य शासन प्रणाली ,अराजक राज्य I

इन समस्त शासन प्रणालियों में शासन का राजतिलक किया जाना परम आवश्यक समझा जाता था ३ I राज्य के अस्तित्व को कानूनी आधार केवल तभी प्राप्त होता था जब उसका अभिषेक हो जाए I राज पद के लिए मुकुट धारण करना जरूरी था और मुकुट धारण करने के लिए राजतिलक किया जाना परम आवश्यकता था I राजा बिना राजतिलक किये ही राज्य पद संभाल लेता था उसे हमेशा घृणा और उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता था I

प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन की विशेषताएं-

प्राचीन भारत के साम्राज्यों को एक शक्तिशाली सम्राट का प्रभाव क्षेत्र माना जा सकता है I वह स्वयं इस चक्र या मंडल पर अपना प्रभाव रखता था और इसलिए इसे चक्रवर्ती की संख्या प्रदान की जाती थी ४ I सम्राट की सर्वोच्चता उसके साम्राज्य के अन्य भागों की अपेक्षा उसकी स्वयं की राजधानी में अधिक वास्तविक थी I सम्राट को चक्रवर्ती इसलिए कहा जाता था क्योंकि वह चक्र का स्वामी होता था यह घेरा उसके प्रभाव का क्षेत्र था जिसे कौटिल्य ने मंडल कहा है  I प्राचीन भारत की सजनीतिक चिंतन की प्रमुख विशेषताएं उस समय के भारत की सामाजिक परिस्थितियों आर्थिक प्रगतियों राजनीतिक उथल-पुथल एवं बौद्धिक विकास के स्तर से प्रभावित थे I

१-आध्यात्मिक दृष्टिकोण- 

भारत को एक आध्यात्मिक देश कहा जाता है I यहां के लोगों ने आत्मा और परमात्मा जैसे आदि भौतिक तत्वों पर जिस गहराई से विचार किया है I इसका उदाहरण विश्व के किसी भी देश में प्राप्त नहीं होता I यही कारण है कि भारत को संसार का गुरु कहा जाता है I वैदिक एवं परवर्ती साहित्य में यह उल्लेख आता है कि राक्षसों या असुरों का नाश करने के लिए राजा की स्थापना की गई ५ Iअतः राजा को इसलिए स्थापित किया गया ताकि वह इन असुरों से तपस्वियों एवं साधु जनों की रक्षा कर सके I अतः राज्य का स्वरूप राजा के कार्य प्रजा से उसका संबंध राजा की शक्तियां राज्य का संगठन जैसे सभी प्रश्नों पर विचार करते समय आध्यात्मिक दृष्टिकोण की प्रधानता रहती है  I

२-धर्म और राजनीति का पारस्परिक संबंध- 

धर्म और राजनीति का पारस्परिक संबंध समय पर बदलता रहा है किंतु वह कभी टूटा नहीं है I राजनीति और धर्म के पारस्परिक घनिष्ठ आभास इसी तथ्य से हो जाता है कि जिन ग्रन्थों को प्राचीन भारतीय राजनीति का मुख्य ग्रंथ माना जाता है वे धार्मिक दृष्टि से पर्याप्त महत्वपूर्ण है I प्राचीन भारत में राज्य की उपयोगिता का मापदंड वहां के लोगों की धार्मिक रुचि को माना जाता था ६ I धर्म की स्थापना का इतना महत्वपूर्ण कार्य था कि उसे संपन्न करने के लिए स्वयं भगवान भी समय-समय पर अवतरित होते रहे हैं I राजा को धर्म का प्रवर्तक माना जाता था I राजा द्वारा पुरोहितों का आदर किया जाता था  I किसी भी बड़े कार्य में हाथ डालने से पहले राजा पुरोहित की आज्ञा प्राप्त करना उपयोगी मानता था ७ I राजगुरु की राय प्रभावशाली होती थी क्योंकि यह समझा जाता था कि राजगुरु उस प्रश्न का धर्म की दृष्टि से विचार करेंगे धर्म की राय वही होगी जो कि उनके द्वारा उचित व्याख्या एवं विचार विमर्श प्रकट की जाए I राजा के प्रति प्रजा की स्वामी भक्ति का आधार मुख्य रूप से धार्मिक था क्योंकि धर्म की व्याख्या करने वाला पुरोहित ही होता था I अतः उसकी शक्तियां अपरिमित थी I राज दरबार में उसके आते ही राजा अपने सिंहासन से उठ खड़ा होता था तथा समस्त अधिकारियों द्वारा उसे अद्वितीय सम्मान प्रदान किया जाता था I

३-दंड नीति का पालन- 

प्राचीन भारत में दंड नीति को प्रमुख विधाओं में से एक गिना जाता था I राजनीति तो दंड नीति के साथ प्रारंभ होती है उसी के आधार पर कायम रहती है तथा वही उसकी सार्थकता का प्रमुख मापदंड होता है I अप्राप्त वस्तुओं को प्राप्त करने में प्राप्त वस्तुओं की रक्षा करने में तथा सुरक्षित वस्तुओं की अभिवृद्धि करने में दंड व्यवस्था का योगदान उल्लेखनीय होता है I हिंदू राजनीति के प्रणेताओं ने इन तथ्य को भली प्रकार जान लिया था I उनके वर्ण नुसार संसार की व्यवस्था मूल रूप से दंड नीति के व्यवहार पर ही अवलंबित है I दंड नीति के द्वारा देश की सुख समृद्धि को उचित स्थान एवं पात्रों में वितरित किया जाता था ८  I प्राचीन भारत में दंड नीति का अध्ययन राजा के लिए परम आवश्यक माना जाता था I यह धारणा व्याप्त थी कि राजा का प्रभाव तथा महत्व दंड नीति के सफल संचालन पर ही निर्भर करता है I प्राचीन भारतीय साहित्य में दंड को धर्म कहा गया है क्योंकि यह प्रत्येक व्यक्ति को उसकी मर्यादा में बनाए रखता है ९ Iजब दंड नीति का उचित रूप से व्यवहार किया जाता है तो कल्याण ही सिद्ध होती है तथा समाज धन-धान्य से पूर्ण होता है १० I सतयुग की विशेषता यही थी कि उसमें दंड नीति का प्रयोग उचित रूप से किया जाता था I प्राचीन भारतीय राजनीति में दंड नीति को पर्याप्त महत्व प्रदान करते हुए उसे त्रिवर्ग विद्या की संज्ञा प्रदान की थी ११ I

४-सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था का समन्वय- 

प्राचीन भारत में जो सामाजिक व्यवस्था रही उसका उसमें समय-समय पर जो परिवर्तन आए उनके अनुरूप वहां राजनीतिक व्यवस्था भी अपना स्वरूप बदलती रही थी I समाज का चार वर्णों में विभाजन हो जाने के बाद यह समझा जाता था कि राज्य का मुख्य कार्य इस व्यवस्था की रक्षा करना है तथा प्रत्येक व्यक्ति को उसके संबंधित वर्ग में बनाए रखना है I राजनीतिक शक्तियां क्षत्रियों के हाथों में केंद्रित हो गई समाज में जब-जब नए-नए धर्म के उदय से अथवा विदेशी आक्रमणकारियों के आगमन से वर्ग भेद बढ़ गया तो राज्य शक्ति पर क्षत्रियों का एकाधिकार समाप्त हुआ और राज्य का मुख्य कार्य इन वर्गों के बीच समन्वय स्थापित करना बन गया I अनेक धर्म कार्यों में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करना पड़ा और इस परिस्थिति में उनके महत्व और गौरव को बढ़ा दिया I

५-राजनीतिक संस्थाओं का महत्व- 

हिंदू ग्रंथ कारों ने अपने अध्ययन का केंद्र बिंदु राजनीतिक संस्थाओं को बनाया है I इन संस्थाओं का महत्व संगठन कार्य आदि का विशद रूप से वर्णन किया गया है I इसमें राजनीतिक मान्यताओं तथा सिद्धांतों का वर्णन केवल प्रासंगिक रूप से किया गया है I राज्य का सैद्धांतिक आधार ,व्यक्ति और राज्य के पारस्परिक संबंध ,व्यक्तिगत स्वतंत्रता ,एवं राज्य अधिकार के बीच समन्वय ,व्यक्ति के अधिकार ,क्रांतियां ,व्यक्तिगत दायित्व ,विभिन्न राजनीतिक संगठनों का स्वरूप ,आदि बातों का पृथक से विस्तार पूर्वक वर्णन नहीं किया गया है १२ I

सीमाएं- 

हिंदू राजशास्त्र के अध्ययन में पश्चात आलोचकों का पक्षपात पूर्ण दृष्टिकोण एक प्रमुख बाधा है I भारत के प्राचीन इतिहास के अध्ययन से पश्चात विद्वानों ने मुख्यतः दो निष्कर्ष निकाले -

1-भारतीयों ने दार्शनिकों को जन्म दिया किंतु भारतीय विचारों में भारतीय राजनीति अथवा भौतिक चिंतन का अभाव था तथा

2- भारतीयों ने राष्ट्रीय भावना को नहीं जाना

भारत के अतीत के इतिहास और राज्य के बारे में यह मत स्पष्ट साम्राज्यवादी विचारधारा से अधिक प्रभावित रहा है  I 19वीं 20वीं तथा वर्तमान शताब्दी में राष्ट्रवादी भारतीयों ने इसे एक प्रकार की चुनौती के रूप में लिया 1907 में पूर्णत्य चरित्र के बारे में लॉर्ड कर्जन द्वारा स्वेच्छाचारिता का आरोप लगाए जाने के उत्तर में ए सी दास ने इस बात को बलपूर्वक कहा यह सोचना भूल है कि हिंदुओं को स्वेच्छाचारी शासन की आदत है और यह कि देश को कभी भी लोकप्रिय तत्वों का अस्तित्व न था I प्राचीन भारत में निरंकुश नहीं वरन सीमित राजतंत्र का बोलबाला था १३ I चार्ल्स ड्रेकमियर के अनुसार हिंदू राजनीतिक विचारों के अधिकांश निर्वाचन की एक दुर्भाग्यपूर्ण विशेषता यह है कि पश्चात इतिहास में प्रशिक्षित भारतीय विद्वानों ने भारतीय तथा पाश्चात्य राजनीतिक धारणाओं में साम्य देखने का प्रयत्न किया है I बहुधा समानता है भी किंतु पश्चात धारणा से भारतीय स्थिति को विशेष रूप से दिया जाता रहा है ऐसे ही कुछ नवीन भारतीय विद्वान भारत के राजनीतिक इतिहास में प्रजातंत्रत्मक परंपरा पाने की इच्छा से प्रेरित हुए हैं १४ I

२- हिंदू राजनीति का अध्ययन जिन स्रोतों के आधार पर किया जाता है उनमें से अधिकांश की प्रकृति अनिश्चित है I जैसे प्राचीन भारत पैराणिक इतिहास एवं अन्य कथाओं से मिश्रित है १५ I

उपलब्ध स्रोतों में प्रयुक्त कई एक शक्ति इस प्रकार के हैं जिनका जो अर्थ आज समझा जाता है I संभवत : उसका वही अर्थ उस समय नहीं समझा जाता होगा साथ ही अपने अध्ययन शास्त्र में प्रयुक्त अनेक शब्दों से विभिन्न विचारकों ने विभिन्न अर्थ लिया है  I इस प्रकार धर्म दंड नीति आदि आधारभूत शब्दों का सटीक अर्थ निश्चित करना कठिन कार्य है १६ I

अधिकांश स्रोतों के काल का भी कोई भी निश्चित नहीं है I जिसके कारण अनेक बातें अप्रकाशित रह जाती हैं I प्राचीन भारत के महान राजनीतिक विचारों का कार्य कार्यक्रम निश्चित करना इसलिए और भी कठिन है कि उन्ही नाम के विचारक एक से अधिक बार आते हैं १७ I

जब हमें यह तथ्य ज्ञात होता है कि भारतीय राजनीति के संबंध में पहले भी कभी ग्रंथ लिखे गए थे और आज वह प्राप्त नहीं है तो प्रसन्नता कम और दुख अधिक होता है I आज जब इच्छुक जन भारतीय राजनीति के इतिहास की गहराइयों में जाने का प्रयास करते हैं तो पर्याप्त सामग्री के अभाव में उनके हाथ बंध जाते हैं I इस विषय पर जो ग्रंथ प्राप्त होते हैं उनमें विषय को प्रत्यक्ष रूप से नहीं छुआ गया है I उपलब्ध ग्रंथ अनेक प्रश्नों को अछूता छोड़ देते हैं उनकी अधिकांश सामग्री ऐसी विषयों अथवा विचारों के विवेचन में संलग्न है जिनके आधारभूत ग्रंथ उपलब्ध नहीं होते I ऐसी स्थिति में हमारा ज्ञान केवल सहायक स्रोतों पर ही निर्भर रह जाता है और प्राथमिक स्रोतों से उनकी जानकारी के लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता १८ I राजनीति के इन अनुपलब्ध ग्रन्थों की सूचना हमें अनेक शिलालेखों साहित्यिक रचनाओं धार्मिक पुस्तकों पौराणिक वृतांतों आदि से प्राप्त होती है I अनेक बार इन सूचनाओं में विरोधाभास भी दिखाई देता है I परस्पर विरोधी सूचनाओं में सतत एवं तथ्य की जानकारी के लिए जिज्ञासु के पास कोई आधार नहीं रहता I जिनके द्वारा वह अपने संशयो को दूर कर सके यह ग्रंथ इतिहास के गर्त में क्या लुप्त हो गए हैं I इस संबंध में निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता १९ I

अनेक प्राचीन भारतीय ग्रंथों के संबंध में यह प्रमाणिक हो चुका है कि वह अपने द्वारा नहीं लिखे गए जिनका नाम उस ग्रंथ पर है ऐसे में यह तय करना बड़ा कठिन हो जाता है कि कौन सा ग्रंथ किसके द्वारा और किस काल में तैयार किया गया यह गुमनाम रचनाएं हमारे अध्ययन में भ्रम पैदा करती हैं I कारण चाहे कुछ भी रहा हो किंतु यह एक तथ्य है कि प्राचीन भारत में लोग अपने नाम को अधिक महत्व नहीं देते थे I उस समय ग्रंथकर अपनी रचना के साथ किसी देवता का या प्रसिद्ध ऋषि का नाम जोड़ देते थे I इस व्यवहार का परिणाम यह हुआ कि एक ही नाम से ऐसी रचनाएं प्राप्त होती है जो परस्पर विरोधी है अथवा जो एक ही व्यक्ति की सामर्थ्य से बाहर की बात है I रचनाओं की साहित्यिक शैली ने भी अध्ययन की वैज्ञानिकता को कम किया है I

प्राचीन भारत में जहां कहीं भी राज्य का वृतांत आता है I वहां उनमें धर्म का पुट मिला हुआ रहता है  यह वह वर्णन या तो अतिशयोक्तिपूर्ण होता है अथवा विश्वासों पर आधारित होता है I वह वर्णन केवल विश्वासों पर आधारित होता है उसे हम अधिक विश्वसनीय नहीं मान सकते जो कुछ भी इस रूप में कहा जाता है  वह उसी रूप में सत्य नहीं होता वरन सत्य का पता लगाने के लिए विभिन्न अनुमानों के सहारे चलना पड़ता है  I यह अनुमान कई बार भ्रामक भी सिद्ध हो जाते हैं I

निष्कर्ष- 

अंततः हम कह सकते हैं की रामायण महाभारत शुक्र नीति कौटिल्य अर्थशास्त्र आदि प्राचीन ग्रंथो में ऐसी राजनीतिक विचार प्रभूत मात्रा में विद्यमान है I जिनकी तुलना किसी भी श्रेष्ठतम यूरोपीय राजनीतिक चिंतन से की जा सकती है I महाभारत और अर्थशास्त्र इस बात के प्रमाण है कि प्राचीन काल में भारतीय राजनीति चिंतन समृद्धि था और भारतीय राजशास्त्र पर विशाल ग्रन्थ और शास्त्रों का निर्माण किया गया था विपुल अध्ययन सामग्री की नष्ट हो जाने पर भी जो स्रोत उपलब्ध हैं उनमें अब भली भांति सिद्ध हो चुका है कि भारत के राजनीतिक दर्शन पर अति प्राचीन काल से विचार होता रहा है तथा प्राचीन भारतीय राजनीतिक सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों ही दृष्टियों से समृद्धि थी I एक विशेष बात यह रही है कि राज्य तथा राजनीति से संबंधित विचारों एवं संस्थाओं के अध्ययन का नाम समय-समय पर बदलता रहा है फल स्वरुप राजनीति संबंधी विषय सामग्री का निरूपण अलग-अलग ग्रंथकारों ने भिन्न-भिन्न नाम के अंतर्गत किया है I

संदर्भ ग्रंथ

१-अवदान शतक आचरांगसूत्र I

२- नृपतंत्र गणतंत्र प्रजातंत्र I

३-ताकि वह अपने पद के दायित्व को धार्मिक रूप में श्रेष्ठतापूर्वक निर्वाह कर सकें I

४-अधीनस्थ राजा को सम्राट के प्रति या तो सुरक्षा से अथवा बाध्य होकर स्वामी भक्ति रखनी होती थी I

५- ये असुर धार्मिक अनुष्ठान एवं यज्ञ आदि क्रिया में विध्न पहुंचते थे I वे लोगों को संध्या वंदन करने से तथा आत्मा संबंधी चिंतन करने से रोकते थेI

६-यदि किसी राज्य के धर्म का स्तर ऊंचा था तथा वहां के निवासी अपने जीवन के व्यवसायों में धार्मिक अनुष्ठानों को महत्व प्रदान करते हो तो उस राज्य का शासक निश्चय ही प्रशंसा का पात्र होता था I

७-रामायणकालीन मुनि वशिष्ठ एवं विश्वामित्र तथा पुराणकालीन अनेक राज ऋषियों के नाम इस दृष्टि से उल्लेखनीय है जो राजा के जन्म अध्यापन विवाह या यज्ञ अनुष्ठान आदि अवसरों पर परामर्श निर्देश एवं मार्गदर्शन प्रदान करते थे I

८-महाभारत के अनुसार यदि दंड नीति सक्रिय है तो प्रजा निर्भय होकर जीवन व्यतीत करती है दंड नीति का  ठीक-ठाक प्रयोग होने पर ही समस्त प्राणियों के सभी कार्य अच्छी तरह सिद्ध होते हैं I

९-महाभारत में अर्जुन के मतानुसार यदि दंड धर्म और कर्तव्य का पालन न कराये तो सेवक स्वामी की बात ना माने बालक भी कभी मां-बाप की आज्ञा का पालन न करें और युवती स्त्री अपने सती धर्म में स्थिर न रहे I

१०-कौटिल्य के मतानुसार दंड नीति का न्यायोचित रूप में प्रयोग किया जाना आवश्यक है I यदि ऐसा नहीं किया गया तो राज्य में अव्यवस्था एवं अराजकता फैल जाएगी  I

११-धर्म अर्थ और काम I

१२-इसके विषयों के संबंध में प्रसंग वश ही ग्रंथकारों द्वारा कुछ कहा गया है और यह कथन भी पूर्ण अथवा संतोष परत नहीं है I

१३-के पी जायसवाल, वी के सरकार और आर सी मजूमदार और डी आर भंडारकर आदि विद्वानों ने अपने अनुसंधान द्वारा यह सिद्ध किया है कि प्राचीन भारत में गणतंत्र सभा एवं समिति और जनपद जैसी लोकप्रिय संस्थाओं का अस्तित्व था I

१४-प्राचीन राज्य की रचना और सिद्धांतों में आधुनिक आदर्श को खोजने के प्रयत्न में प्रोफेसर नीलकंठ शास्त्री के अनुसार प्राचीन भारतीय अभिलेखों के निर्वचन में प्रजातंत्र से संबंधित बातों को घुसा देना क्योंकि उनमें से कुछ में चुनाव और मतपत्र का उल्लेख मिलता है I प्राचीन भारत की इन तथा अन्य संस्थाओं का पर्यावरण को समझने के मार्ग में नई बाधाएँ खडी करना है  I

१५-पुराणों महाकाव्य आदि ऐसी कथाओं का अंश इतिहास में भी अधिक दिखाई देता है  I अतः उनके आधार पर प्राचीन भारत के विशुद्ध इतिहास का निर्माण कठिन कार्य है  I

१६- बी ए सालेटर असिएंट पॉलीटिकल थॉट एंड इंस्टीट्यूशन पेज 6-10 I

१७-वेदों में मनु का नाम आता है और मनुस्मृति के रचयिता भी मनु है इसी प्रकार शुक्राचार्य का नाम महाभारत में आता है और शुक्र नीति के रचयिता भी शुक्र है  I

१८-अकेले कौटिल्य के अर्थशास्त्र में ही एक दर्जन से अधिक राजनीतिक आचार्य तथा उनके ग्रंथ का उल्लेख है  उनके विचारों एवं विषय सामग्री के संबंध में हमें कल्पना और अनुमान के माध्यम से प्राप्त जानकारी से ही संतोष कर लेना से होता है I

१९-अनुमान है कि कौटिल्य के अर्थशास्त्र का प्रभाव एवं महत्व इतना बड़ा कि उसने अन्य ग्रन्थों को पीछे धकेल दिया और वह धीरे-धीरे अपना महत्व खोते चले गए तथा एक समय में उनकी रक्षा करना भी अनुपयोगी दिखाई देने लगा यह भी हो सकता है कि इन ग्रंथो को विदेशी आक्रांताओं ने नष्ट कर दिया हो I

Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.

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