प्राचीन भारत में राज्य की संप्रभुता पर सीमाएं

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भूमिका- 

भारतीय विचारको ने राज्यों को जो अधिकार एवं संप्रभुता सौपी थी वह किसी भी अर्थ में असीमित नहीं कही जा सकती उस पर आंतरिक एवं बाह्य रूप से अनेक प्रकार की सीमाएं लगाई जाती थी I कार्य करने में वह स्वेच्छाचारी नहीं बन सकता था I राजा दण्डधर था अर्थात वह संप्रभुता के साधनों से युक्त था किंतु उसे भी एक पूर्ण इंसान नहीं माना गया उसके द्वारा भी गलतियां की जा सकती थी तथा इस गलतियों के लिए उसको भी दंड का भागीदार बनाना होता था दूसरे शब्दों में राजा संप्रभुता या दंड के ऊपर नहीं था वह इसे केवल लागू करने वाला था आवश्यकता पड़ने पर वह स्वयं भी इसका विषय बन सकता था दंड दो धार वाले यंत्र की भांति है जो दोनों ओर से काटता है एक वह तो  जनता में आतंक फैलाने वाला तथा सामाजिक बुराइयों को दूर करने वाला है और दूसरी ओर दंड स्वयं प्रशासक के लिए भी संभावित खतरे का साधन है यदि वह इसका प्रयोग गलत रूप में करेगा तो स्वयं विनष्ट हो जाएगा ताज पहनने वाला सिर बोझिल बन जाता है कामंदक का कहना था कि दंड का गलत रूप में प्रशासन प्रशासक के पतन का कारण बन जाता है जब प्रशासक इसका प्रयोग पर्याप्त बुद्धि एवं कुशलता के साथ करने लगता है तो इससे जनता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है अपने कर्तव्य से भ्रष्ट होने वाले तथा जीवन के अपने लक्ष्य से प्रमुख होने वाला राजा भी दंड की शक्ति द्वारा क्षमा नहीं किया जाता राजा को केवल व्यक्तिगत रूप से नहीं वरन उसके संबंधियों उसकी संपत्ति भूमि प्राप्तियों आदि को भी समाप्त किया जा सकता है

प्राचीन भारतीय विचारों ने संप्रभुता शब्द का अर्थ स्पष्ट रूप से बताया है प्राचीन भारतीय आचार्य ने संप्रभुता की मान्यता पर पर्याप्त सीमाएं लगाई थी इन सीमाओं में से कतिपय का अध्ययन इस प्रकार किया जा सकता है

१-संप्रभु का न्याय के अनुसार कार्य करना- 

दण्डधर का मुख्य कार्य धर्म कानून एवं न्याय की रक्षा करना था वह अपनी सुरक्षा का प्रयोग करते हुए कोई भी ऐसा निर्णय नहीं ले सकता था जो उसको इस उद्देश्यों से विमुख कर दे न्याय का अर्थ अच्छे और बुरे का भेद करना था न्याय के आधार पर ही प्रशासक एवं प्रशासितों के सद्गुणों का अनुमान लगाया जा सकता था कि वह सामान्य कल्याण की वृद्धि में सहायक हो भी सकते हैं अथवा नहीं अर्थशास्त्र के अनुसार संप्रभुता अपनी आज्ञाओं को व्यापक रूप से प्रचारित करता था यह आज्ञा ही न्याय तथा सत्य के समरूप होती हैं जब भारतीय ग्रंथ संप्रभु को कानून एवं न्याय का रक्षक कहते हैं तो इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि कानून तथा न्याय का स्तर संप्रभु से ऊपर रहेगा संप्रभु को इसके बिना या इनके विरुद्ध कोई भी कार्य करने का अधिकार नहीं होगा राजा स्वयं न्याय का व्याख्याता या निर्धारक भी नहीं है क्योंकि भले और बुरे की भावना का निर्णय उन धर्म शास्त्रों एवं नितिशास्त्रों द्वारा किया जाता है जो राजा या संप्रभु से परे होते हैं और जिनकी रचना में राजा का योगदान नहीं होता समाज में स्थापित न्याय की भावना को संप्रभु भी मान्यता  प्रदान करता है इस संबंध में कौटिल्य ने कुछ उदार नीति अपनाई है वह राज्य में व्याप्त अनेकता के तत्वों को दबाने के लिए संप्रभु को कुछ अधिक शक्तियां सौपता है १

प्राचीन न्यायालय का संगठन साधारण था न्यायिक अधिकारी नागरिक प्रक्रिया संहिता की औपचारिकताओं के बिना ही निर्णय देते थे इस कार्य में न्याय विविधताओं की सहायता प्राप्त नहीं की जा सकती थी किंतु जब राजनीतिक एवं सामाजिक दृष्टि से जटिलतापूर्ण साम्राज्य का जन्म हो गया तो कंटक शोधन न्यायालय का संगठन नए रूप में किए जाने की आवश्यकता महसूस की गई चंद्रगुप्त के साम्राज्य में कानून की एक पृथक व्यवस्था की आवश्यकता हुई जो सरकार के कार्यपालिका एवं प्रशासकीय शाखों के संबंधों को प्रसारित कर सके २

२-सामाजिक प्रथाओं एवं रीति-रिवाज का सम्मान- 

संप्रभु को यह शक्ति प्रदान की गई थी कि वह धर्म के विरुद्ध कार्य करने वालों को दंड दे इस शक्ति में सीमा स्वयमेव में ही अंतरनिहित है इसको निषेधात्मक रूप से इस तरह भी कहा जा सकता है कि वह किसी भी धर्म में व्यक्ति को दंड नहीं दे एक बात यह भी महत्वपूर्ण है कि संप्रभु द्वारा धर्म विषयक निर्णय लेने में किसी स्थान विशेष या वर्ग विशेष के विश्वासों प्रथाओं तथा समाज व्यवस्था की अवहेलना करने का अधिकार नहीं था यहां तक की राजा को भी यह परामर्श दिया गया था कि वह जीते हुए देश के लोगों की स्थानीय परंपराओं को बनाए रखें क्योंकि यदि उसको बदला या दबाया गया तो राज्य का व्यापक विरोध होगा तथा संप्रभु शक्ति समाप्त हो जाएगी इस प्रकार यह परामर्श देकर एक प्रकार से संप्रभुता के व्यवहार पर सीमा लगा दी गई ३

३-धार्मिक सीमाएं- 

संप्रभु के व्यवहार पर धर्म की सीमाए सबसे प्रमुख तथा प्रभावशाली थी यद्यपि संप्रभु को यह शक्ति प्राप्त थी कि वह दंड दे सके किंतु वह केवल अपराधियों एवं दुराचारियों को ही दंड दे सकता था अर्थात इस अधिकार का प्रयोग करते समय उसको धर्म के अनुसार कार्य करना होता था दंड के भारतीय सिद्धांत ने जनता को भी राजा के विरुद्ध कुछ अधिकार प्रदान किए दंड का उपयोग तभी हो सकता था जब इसकी प्रयोग पूरी सावधानी के साथ किया जाता मनु आचार्य अनुशासनविहीन व्यक्ति के हाथ में दंड की शक्ति नहीं सौंपना चाहते इसके अतिरिक्त भी इस कार्य में पर्याप्त बुद्धि की आवश्यकता पर जोर देते हैं और इसलिए वे मंत्रियों या अन्य लोगों का परामर्श प्राप्त करने की सलाह देते हैं ४

४-जाति व्यवस्था की सीमाएं- 

भारत में समाज का संगठन वर्ण व्यवस्था अथवा जाति व्यवस्था के आधार पर हो चुका था इस व्यवस्था में हस्तक्षेप करने का अधिकार किसी भी संप्रभु को नहीं दिया गया इसके विपरीत उसका यह प्रमुख कर्तव्य बताया गया कि वह इस व्यवस्था को कायम रखें तथा इसे तोड़ने वाले को दंड की व्यवस्था करें चार वर्गों के रूप में विभाजन केवल एक वैचारिक कल्पना थी फिर भी लोगों के मस्तिष्क पर वर्ण आश्रम धाम के नाम पर जो आर्थिक कार्यात्मक एवं सामाजिक समूह बन चुका था उसने एक प्रकार के दिमागी साम्राज्य की रचना की तथा इसको कमजोर करने अथवा इसकी अवहेलना करने के लिए किया गया कोई भी प्रयास न केवल क्रांतिकारी समझा गया वरन पूर्णतः एक क्षमा न किया जा सकने वाला पाप माना गया ५

५-लोकहित की सीमाएं- 

प्राचीन ग्रंथो में जनता के अधिकारों से संबंधित सिद्धांत प्रायः प्राप्त नहीं होते फिर भी हम कह सकते हैं कि ये आचार्य मनुष्य के अधिकारों से अनभिज्ञ नहीं थे उन्होंने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि प्रत्येक को स्वधर्म का पालन करना चाहिए केवल तभी सामाजिक व्यवस्था लागू की जा सकती है स्वयं राजा को भी अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए इस अर्थ में हम कह सकते हैं कि राजा के कर्तव्यों का वर्णन करते हुए जनता के अधिकारों पर अप्रत्यक्ष रूप से प्रकाश डाला गया है यहां स्वधर्म पालन में  मृत्यु को दूसरे के श्रेष्ठतम धर्म को अपनाकर जीवित रहने की अपेक्षा श्रेयस्कर माना गया है ६

कौटिल्य जैसे भारतीय आचार्य इस बात पर जोर देते हैं कि राजा या संप्रभु को चाहिए कि वह स्वयं को जनता का सेवक समझे राजशाही के साथ सुरक्षाचारी शक्तियां संयुक्त नहीं की गई है उसे जनहित में कार्य करने के लिए कहा गया है जनहित विरोधी राजा को धर्म विरोधी भ्रष्ट एवं पतित माना गया है जिसका दंड है राजा का विनाश ७

६-संप्रभु संबंधी मिश्रित विचार- 

भारतीय विचारधारा के अनुसार संप्रभुत सुरक्षाचारी बन ही नहीं सकता था क्योंकि वह राजनीतिक संरचना का एक भाग मात्र था संप्रभुता के अनेक अवयव बताए गए हैं तथा इन सभी अवयवों का संयुक्त रूप कभी भी पूर्ण प्रभुत्व संपन्न तानाशाही नहीं बन सकता था क्योंकि उनकी शक्तियां विभिन्न तत्वों के पारस्परिक संबंधों के कारण स्वयं में भी संतुलित हो जाती थी संप्रभु अकेला ही कार्य नहीं कर सकता था क्योंकि राजा रूपी रथ का संचालन इस एकमात्र पहिए की सामर्थ्य के बाहर की बात थी संप्रभुता केवल सहयोग प्राप्त करने पर ही सार्थक  बन सकती थी इसके लिए मंत्री नियुक्त करने होते थे तथा उनका मत सुनना एवं मानना होता था ८ वृद्ध जनों एवं मंत्रियों का सहयोग संप्रभु के दायित्व को संपन्न करने के लिए वांछनीय था राजा या संप्रभु राजा से संबंधित विभिन्न प्रश्नों को वृद्ध एवं अनुभवी मंत्रियों की आंखों से देखता था तथा उनके द्वारा स्वीकृत व्यवहार पर आचरण करता था वृद्ध एवं मंत्रियों के परामर्श को प्रभावशील रूप से आचरण में उतरने की आवश्यकता कौटिल्य के समय विशेष रूप से हुई जबकि भारत छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों में बटाँ हुआ था जो एक दूसरे के साथ युद्ध की स्थिति में थे तथा आक्रमण का विरोध कर सकते में सक्षम नहीं थे ९

निष्कर्ष- 

प्राचीन भारत में धर्म से संबंधित मान्यताओं तथा दंड एवं धर्म के संबंध का वर्णन करने के साथ-साथ हमने यह भी जानने का प्रयास किया है की संप्रभुता के संबंध में प्राचीन भारतीय ग्रंथों एवं आचार्य के क्या विचार थे इस समस्याओं से संबंधित विचार विमर्श के बाद कुछ बातें हमारे सामने स्पष्ट हो जाती हैं राजा का कार्य धर्म की रक्षा करना धर्म के अनुसार शासन चलाना तथा धर्म विरोधियों को दंड देना था यह निर्देश था कि राजा इस शक्ति का उपयोग कभी भी धर्म के विरुद्ध नहीं करेगा धर्म विरोधी होने पर तो यह शक्ति स्वयं राजा के विरुद्ध भी प्रयुक्त की जा सकती थी इस प्रकार राजा की संप्रभु शक्ति असीमित शक्ति नहीं थी उस पर धर्म रीति रिवाज जनहित कानून न्याय भावना मंत्रियों के परामर्श जाति व्यवस्था आदि प्रतिबंध लगे हुए थे इन समस्त प्रतिबंधों एवं सीमाओं में रहते हुए राजा से आशा की जाती थी कि वह समाज की व्यवस्था को बनाए रखेगा तथा धर्म की रक्षा करेगा ऐसा करने में वह दंड को धारण करेगा और धर्म विरोधियों के विरुद्ध उसे प्रयुक्त करते हुए जनकल्याण का प्रयास करेगा और मत्स्य न्याय की स्थिति से लोगों को बचाए रखेगी

संदर्भ ग्रंथ

१-कौटिल्य अर्थशास्त्र

२-डॉ कृष्ण कुमार वैदिक साहित्य का इतिहास

३-बागची वाई एन प्राचीन भारत की दंड नीति

४-कौटिल्य अर्थशास्त्र

५-राव विजय बहादुर उत्तर वैदिक समाज एवं संस्कृति

६-कौटिल्य अर्थशास्त्र

७-उपरोक्त

८- जे एन् शिंदे द रिलिजन एंड फिलासफी का वेद पृष्ठ 78

९-डॉ कृष्ण कुमार वैदिक साहित्य का इतिहास

Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.

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