प्राचीन भारत में संप्रभुता संबंधी अवधारणा

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संप्रभुता-

संप्रभुता का निवास राजा में माना गया था I राजा की संप्रभुता शक्ति ही राज्य का प्रतीक मानी जाती थी I वैदिक साहित्य में संप्रभुता के लिए समानार्थक शब्द क्षत्र अथवा क्षत्रसारी है I अर्थशास्त्र कानूनी संहिता एवं अन्य शिलालेखों में इसके लिए स्वामित्व शब्द का प्रयोग किया गया है I कौटिल्य ने राज्य के सप्तांगों का वर्णन किया है I स्वामी को उसने राज्य का ही एक अंग माना है  कौटिल्य के अनुसार स्वामी को वे सारे अधिकार प्राप्त थे जो आधुनिक अर्थ में एक संप्रभु के पास होना चाहिए स्वामी राज्य का मालिक होता था या अपने मंत्रियों मित्रों खजाने सेना कानून एवं किलेबंदी आदि साधनों की सहायता से राज्य पर अधिकार रखता था I इन साधनों की स्थिति द्वारा उसकी स्वयं की स्थिति निर्धारण होती थी १  I

जो राजा राज्य का अध्यक्ष था उसे धीरे-धीरे नए अधिकार प्राप्त हो गए उसे शासन करने का दैवी अधिकार प्रदान किया गया I इससे संप्रभुता का क्षेत्र व्यापक हो गया I गुप्त काल में राजा एक दूसरे के प्रति धर्म के दृष्टिकोण को विनियमित करता था  I राजा द्वारा यह निर्देश दिया जाता था कि लोगों के बीच किसी प्रकार की कटुता नहीं होनी चाहिए तथा सभी धर्म के प्रति सहिष्णुता की भावना रखनी चाहिए I इस कार्य में उसे कानून की बदलती हुई I  प्रकृति में भी पर्याप्त सहयोग दिया कानून निरंतर धर्मनिरपेक्ष होता जा रहा था I ऐसी स्थिति में राजा की संप्रभुता का क्षेत्र बढ़ गया और वह अधिकाधिक प्रभावशाली बनता गया I वैसे संप्रभुता के क्षेत्र को राज्य की प्रकृति के संदर्भ में ही समझा जा सकता है I प्राचीन भारत के साम्राज्यों की प्रकृति आज के साम्राज्यों से भिन्न होती थी I उस समय की शब्दावली में उसे चक्र या अर्थशास्त्र की भाषा में मंडल कहा जाता था I मंडल का अर्थ है एक घेरा या प्रभाव का क्षेत्र इसके शीर्ष पर एक उच्च राजा राज्य करता था  I ऐसे साम्राज्य में संप्रभुता का अर्थ केवल सर्वोच्चता से था I एक सर्वोच्च राजा अपने क्षेत्र के प्रदेश एवं जल का सर्वोच्च स्वामी था वह पवित्र कानून को लागू करने वाला धर्म संचालक युगों का निर्माता मानवीय रूप में एक देवता न्याय का अध्यक्ष होता था I राजा की सर्वोच्चता उसकी स्वयं की राजधानी में अधिक वास्तविक होती थी I जहां वह प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण रख सकता था I प्राचीन भारत में संप्रभुता की प्रकृति कुछ इसी प्रकार की थी इसे चक्रवर्ती राजा की सर्वोच्च शक्ति के समरूप माना जाता था I  वह चक्रवर्ती इसलिए था क्योंकि वह चक्र या मंडल का स्वामी था I यह चक्र उसे राजा का प्रभाव क्षेत्र अथवा कौटिल्य के शब्दों में मंडल था २ I

वैदिक काल में संप्रभुता- 

वैदिक काल में राजा को जो कार्य सौंप गए थे I उसको देखने से स्पष्ट होता है कि उस समय तक संप्रभुता का विचार विकसित हो चुका था I राजा युद्ध के समय नेतृत्व करता थाI  वह संकट के समय जनता की रक्षा करता था I शांति काल में वह अपने सम्मान का प्रयोग करता था और लोगों की आज्ञाकारिता की अपेक्षा करता था I जो लोग स्वेच्छा से ही राजा को कर एवं अपनी सेवाएं प्रदान नहीं करते थे उनको राजा द्वारा ऐसा करने के लिए मजबूर किया जा सकता था I वह एक न्यायाधीश के कार्यों को संपन्न करता था I वह राज्य में शांति एवं सुव्यवस्था की स्थापना के लिए गुप्त चरो की नियुक्ति करता था I अपराधों के बढ़ने से या राजा की सुरक्षा को खतरा पैदा होने के कारण इन गुप्त चरो को नियुक्त किया जाता था I इनका मुख्य लक्ष्य जनकल्याण की साधना होता था ३  I

इस प्रकार वैदिक काल का राजा क्षत्रसारी के रूप में संप्रभुता संपन्न हो चुका था I यह हमेशा एक क्षत्रिय अथवा रक्षक था I शांति व्यवस्था एवं जन जीवन की रक्षा को सही संप्रभुता के औचित्य का कारण बताया गया था I संप्रभुता का अर्थ था शक्ति -वह शक्ति जिसके आधार पर की शासन कानून का पालन कर सके I राजा को आर्य संस्कृति की रक्षा का काम सौपा गया था ताकि वह विरोधियों की संस्कृति को प्रभावित होने से रोक सके ४ I राजा अपने शासन की रक्षा करता था I वह शत्रुओं के विरुद्ध जनता को सुरक्षा प्रदान करता था I राष्ट्र की रक्षा करता तथा उसके बीच शांति स्थापित करता था I इसलिए लोग उसे प्रेम करते थे वैदिक काल के राजा को निरंतर ही आर्य एवं अनार्य राज्यों से लड़ाई लड़नी पड़ती थी I ऐसी स्थिति में राजा के पास शक्ति का होना परम आवश्यक था राजा का आधार इस सीमा तक किया जाता था जिस सीमा तक वह अपनी शक्ति को प्रभावशाली बना पाता था I ५

संप्रभुता का जन्म- 

प्राचीन विचारको ने यह माना था कि राज्य का अस्तित्व ऐश्वर्या अथवा स्वामित्व संप्रभुता के वातावरण में ही रह सकता है I प्राचीन आचार्य ने राज्य के स्वरूप को समझने के लिए राज्य से पूर्व के समाज की कल्पना की I इस प्रकार भारतीयों द्वारा तार्किक एवं ऐतिहासिक दोनों ही पद्धतियों को अपनाया गया I पहले तो उन्होंने इस बात की जांच का प्रयास किया कि राज्य किन अर्थों में अराज्य से भिन्न होता है तथा दूसरा उन्होंने यह बताने का प्रयास किया कि अराजक पूर्ण स्थिति किस प्रकार एक राज्य पूर्ण स्थिति बन गई I इन दोनों ही पहलुओं का संतोषजनक उत्तर उन आचार्य को मत्स्य न्याय की धारणा में मिलता है  I महाभारत के शांतिपर्व में भीष्म तथा युधिष्ठिर के बीच जो संवाद हुआ उसे संप्रभुता की उत्पत्ति का प्राचीन भारतीय मत ज्ञात होता है ६  I युधिष्ठिर ने यह पूछा कि राजा का पद किस प्रकार अस्तित्व में आया तथा एक व्यक्ति अधिक बुद्धिमान एवं साहस संपन्न लोगों पर शासन क्यों करता है यद्यपि वह व्यक्ति भी अन्य की भांति सामान शारीरिक एवं मानसिक विशेषताओं से पूर्ण है वह जन्म एवं मरण के परिवर्तनों से प्रभावित होता है तथा सभी दृष्टियों से वह दूसरे के समान है इन प्रश्नों का उत्तर यह बताता है कि राजपद की स्थापना का क्या आधार है तथा वह जनता पर कैसे शासन करता हैI  ७ भीष्म ने जवाब दिया कि पहले ना तो संप्रभुता थी और ना कोई संप्रभु था ना कोई दंड था और ना ही कोई दंड देने वाला था उस समय लोग न्याय एवं औचित्य की भावना से ही अपने आपको स्वयं प्रकाशित करते थे ८ I  यह एक प्रकार से स्वर्ण युग था जिसका वर्णन किया गया है इI स युग में केवल धर्म था अधर्म नहीं था I मनुष्य अपने स्वभाव के कारण ही धर्म का पालन करते थे किंतु यह युग अधिक समय तक नहीं चला I माया मोह काम लोभ क्रोध आदि मानव स्वभाव को भ्रष्ट एवं पतित कर दिया I वह ईश्वर से विमुख हो गया अपने जैसे अन्य लोगों से घृणा करने लगा तथा हर प्रकार के भ्रम एवं अव्यवस्था से घिर गया मनुष्य की आत्मा स्वभावत: शुद्ध होती है I उसमें कोई विकार नहीं रहता जब अन्य तत्वों का प्रभाव होने लगता है तो वह आत्मा भी विकासशील बन जाती है दोष और अदोष शुद्धता अशुद्धता आदि का भेद प्रारंभ हो जाता है I इस विकृति की क्रिया में सबसे पहले लोगों पर मोह छा गया और वे पारस्परिक संरक्षण के कार्य में कठिनाई का अनुभव करने लगे मोह के प्रभाव से लोगों को यह ज्ञान ना रहा की कर्तव्य क्या है तथा अकर्तव्य क्या है I फलतः धर्म का नाश हो गया मोह के प्रभाव तथा कर्तव्य के अज्ञान ने मिलकर मनुष्य को लोभ के अधीन कर दिया अतः लोग उन वस्तुओं को पाने का प्रयत्न करने लगे जो उन्हें प्राप्त नहीं थाI  क्रमशः उन पर काम तथा राग का भी प्रभाव हो गया इन सब दोषों के परिणाम स्वरुप वे लोग अगम्यागमन वाच्य अवाच्य भक्ष्य तथा अभक्ष्य दोष अदोष आदि के बीच भेद न करके सभी कुछ व्यवहार करने लगे ९ I

महाभारत की मान्यता के अनुसार जब धरती पर दंड की व्यवस्था करने वाला कोई प्रशासक नहीं रहा तो शक्तिशाली लोग कमजोरों को इस प्रकार समाप्त करने लगे जिस प्रकार बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है I मनु के अनुसार यदि हम राज्य विहीन अवस्था में लौट जाए तो शक्तिशाली लोग मछलियों की तरह कमजोर लोगों को समाप्त कर देंगे I यदि राजा उन लोगों को दंड देने के लिए सजक नहीं है जिसको की दंड दिया जाना है तो मत्स्य न्याय स्थापित हो जाएगा रामायण तथा मत्स्य पुराण में भी राज्य विहीन अवस्था का कुछ ऐसा ही चित्रण प्राप्त होता हैI  यदि राजा अपराधियों को उचित समय पर दंड देने में सजग नहीं है तो बालक वृद्ध बीमार साधु संत स्त्रियां तथा विधवाएं आदि को या तो मार दिया जाएगा या लूट लिया जाएगा I इनको शक्तिशाली लोगों द्वारा दबाया जाएगा इनका शोषण किया जाएगा तथा इनका पतन हो जाएगा १०  I

कौटिल्य ने प्राकृतिक अवस्था का वर्णन किया है I मनुष्य की आत्मा की पवित्रता में विश्वास न करके कौटिल्य मनुष्य की दुराचारी भावना में विश्वास करते हैं तथा उसकी दंड के माध्यम से सुधारने पर जोर देते हैं I राज्य अपने साधन दंड के माध्यम से व्यक्ति की इन दुराचारी प्रवृत्तियों पर प्रतिबंध लगाता है तथा सामान्य कल्याण के लक्ष्य की प्राप्ति का प्रयास करता है I कौटिल्य के अनुसार दंड के अभाव में जो मत्स्य न्याय कायम होता है वह संसार को विनाश की ओर ले जाता है  I कामंदक के अनुसार भी दंड के न रहने पर लोगों के पारस्परिक संबंधों में उनकी स्वाभाविक विध्वंसात्मक प्रवृत्ति प्रभावशाली बनती है और यह संसार को विनाश की ओर अग्रसर करती है ११ I

राज्य से पूर्व की स्थिति का यह सिद्धांत केवल आचार्यों तक ही सीमित नहीं था वरन यह व्यावहारिक राजनीतिज्ञ के बीच भी प्रचलित था I बंगाल के सम्राट के धर्म घोषणा पत्र में यह सूचना प्राप्त होती है कि उसने राजवंश का जन्म जनता द्वारा निर्वाचन के माध्यम से हुआ है I राजा के अभाव की स्थिति अराजकता की स्थिति थी I इस स्थिति में डाकुओं की स्वेच्छाचारिता का प्रभाव था I न्याय नहीं था लोग एक दूसरे को समाप्त करने में रहते थे I महाभारत के भीष्म के अनुसार बिना राजा का राष्ट्र निर्बल होता है I उसे डाकू और लुटेरे लूटते रहते हैं I राज्य विहीन देश में धर्म की स्थिति नहीं होती लोग एक दूसरे को हड़पने लगते हैं I यह स्थिति अराजकता की स्थिति होती है I इस स्थिति में लोग अपने धन तथा स्त्रियों का उपयोग नहीं कर पाते केवल लुटेरे ही इन अराजकता की स्थिति से प्रसन्न रहते हैं I उनकी यह प्रसन्नता भी सामाजिक होती है क्योंकि कुछ लोग मिलकर जब उसका भी धन हड़प लेते हैं तो उसे भी राज्य की आवश्यकता का अनुभव होने लगता है I अराजकता की स्थिति में जो दास नहीं है उसे दास बना लिया जाता है तथा स्त्रियों का बलपूर्वक अपहरण कर लिया जाता है I यह मत्स्य न्याय का सिद्धांत समस्त भारतीय राजनीतिक चिंतन में प्राप्त होता हैI  इसके लिए ही राज्य की स्थापना की गई अराजकता की स्थिति से छुटकारा पाने के लिए संप्रभुता की स्थापना की गई और इसके परिणाम स्वरुप जनता ने यह सौदा किया कि वह सुरक्षा के बदले राजा की आज्ञा का पालन करेगी तथा संप्रभु के लिए कारों का भुगतान करेगी I अराजकता के स्थान पर राज्य की स्थापना की गई तथा व्यक्ति विशेष को संप्रभु बनाया गया जो सुरक्षा के उद्देश्य को अभिव्यक्त कर सके १२ I

निष्कर्ष- 

भारतीय विचारक यह नहीं मानते हैं कि सामाजिक समझौते के पूर्व व्यक्ति किसी प्रकार की स्वतंत्रता का उपभोग करता था I उनका मत है कि जब तक सुरक्षा के हेतु कोई केंद्रीय सत्ता नहीं होगी तब तक कोई व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं रहेगी अराजकता की स्थिति रहेगी I जिसमें मत्स्य न्याय की नीति का प्रभाव रहेगा I

संदर्भ ग्रंथ

१-कौटिल्य अर्थशास्त्र

२-कौटिल्य अर्थशास्त्र

३-उपरोक्त

४-सत्यकेतु विद्याअलंकार प्राचीन भारत में राजनीतिक विचार एवं संस्थाएं

६-महाभारत शांतिपर्व

७-महाभारत शांतिपर्व

८-भट्टाचार्य सुख महाभारत कालीन समाज

९-राव विजय बहादुर उत्तरवैदिक समाज एवं संस्कृति

१०-हरिहरनाथ त्रिपाठी प्राचीन भारत में राज्य एवं न्यायपालिका

११- कामंदक नीतिसार

१२-उपरोक्त

Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.

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