शुक्रनीति में मंत्रिपरिषद का संगठन

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भूमिका    

संपूर्ण शासन व्यवस्था का सुव्यवस्थित संचालन एवं उसकी कार्य क्षमता सामान्यतः मंत्रियों की योग्यता एवं कुशलता पर आधारित होती है I अतः उनकी आवश्यकता एवं महत्व को दृष्टि में रखते हुए आचार्य शुक्र ने अन्य हिंदू विचारको १ की भाँति ही उनकी नियुक्ति संबंधी योग्यताओं का वर्णन प्रस्तुत किया है I क्योंकि शासन यंत्र में मंत्रियों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है I अतः अनिवार्य योग्यताओं से युक्त व्यक्ति  की ही उक्त पदों पर नियुक्ति हो सकती है I

मंत्रिपरिषद का संगठन 

राजा मंत्रिपरिषद के अभाव में राज्य कार्य संचालन में अपने को असमर्थ पाता है I शुक्रनीति  में युवराज एवं अमात्य वर्ग को राजा के दाहिने तथा बाऍ नेत्र और कर्ण माना गया है २I इसके बिना राजा को बाहु ,कर्ण , एवं नेत्रहीन समझ जाएगा I इसलिए उनका विचार है कि राजा द्वारा योग्य व्यक्ति को ही अपना युवराज और अमात्य नियुक्त करना चाहिए I क्योंकि इनकी सोच समझकर नियुक्ति न करने से घोर अनर्थ की संभावना होती है ३ I

    प्राचीन हिंदू विचारकों ने नियुक्ति में कुल को उच्चता की व्यवस्था की है I रामायण ४, मनु ५ ,कौटिल्य ६ ,अभिजात्य के व्यक्ति को मंत्रिपद प्रदान करने का समर्थन किया है I बृहस्पति के अनुसार भी मंत्री कुलज ही होना चाहिए ७ I शुक्रनीति में भी इस ओर संकेत किया गया है कि मंत्रियों का उच्च कुल उत्पन्न होना आवश्यक है ८ I किंतु महर्षि के अनुसार मंत्रियों का चयन करते समय उसके वर्ण का भी ध्यान रखा जाना चाहिए I ब्राह्मण के अभाव में क्षत्रिय , क्षत्रियों के अभाव में ,वैश्यों की नियुक्ति की जा सकती है , किंतु शूद्र की उच्च पदों को नियुक्ति नहीं करनी चाहिए ९ I इस भाँति स्पष्ट है कि आचार्य शुक्र वर्ण की उच्चता की अनिवार्यता के प्रत्येक स्थिति में कट्टर समर्थक नहीं है I अपितु वर्ण का महत्व राजनीति में ना मानकर विवाह एवं भोजन के समय पर ही मानते हैं १० I अतः महर्षि शुक्र कुल के महत्व को स्वीकार करने के साथ ही साथ गुणों पर विशेष बल देते हुए अपने आप को कट्टर रूढ़िवादी परंपरागत संकीर्ण विचारों से अलग रखते हैं ११ I

मंत्रिपरिषद के सदस्यों की योग्यता  

शुक्रनीति में आयु संबंधी प्रतिबंध का उद्देश्य मंत्री परिषद के सदस्यों को उनके पद की गरिमा और प्रतिष्ठा के अनुकूल ही गंभीर तथा अनुभव गम्य बनाना है चूकि आचार्य शुक्र उस तथ्य से परिचित थे कि अनुभवहीन मंत्री अपने महान कर्तव्यों के पालन में असमर्थ एवं असफल रहते हैं एवं उसके द्वारा शासन रूपी यंत्र को भी नष्ट करने की पूर्ण संभावना बनी रहती है १२ I इसलिए महर्षि शुक्र ने मंत्रिपरिषद के सदस्यों का आयुवान होना उनकी नियुक्ति की शर्तों में अनिवार्य रूप से निश्चित किया है I १३ शुक्र नीति के अनुसार आयुवान होने के साथ-साथ मंत्रिपरिषद की सदस्यता के लिए किसी भी व्यक्ति का उत्तम आचरण युक्त होना भी अनिवार्य है १४ I मंत्रिपरिषद के सदस्यों का गुणवान, शूरवीर, प्रियवादी ,हितोपदेशक,  क्लेश सहन करने में तत्पर, धर्मात्मा, पवित्रता, एवं बुद्धिमत्ता ,आदि गुणों से युक्त होना इसलिए अनिवार्य माना जाता है जिससे कि वह कुमार्गगामी राजा को भी सन्मार्ग पर ला सके १५ I

    महर्षि शुक्र का विश्वास है कि जिन मंत्रियों से राजा को भय नहीं होता उनसे राज्य की उन्नति संभव नहीं होती I अतः मंत्रिपरिषद के सदस्यों के उच्च आचरण की छाप राजा के हृदय में अंकित होना अनिवार्य है १६ Iइस भाँति स्पष्ट है कि शुक्रनीति कार ने मंत्रिपरिषद के सदस्यों की योग्यताओं में चारित्रिक योग्यताओं को अत्यधिक महत्व प्रदान की है तथा इन्हें सर्वोपरि  सा मान लिया है I वर्तमान शासन व्यवस्था की दुर्व्यवस्था एवं दुर्बलता का कारण चारित्रिक पतन है क्योंकि इस योग्यता पर विवेक पूर्वक अनिवार्य रूप से विचार नहीं किया जा सकता I यदि इसके आधार पर विचार किया जाए तो हो सकता है कि वर्तमान समस्या का समाधान हो जाए और नवीन सुव्यवस्था का मार्ग प्रशस्त हो सके I

    महर्षि शुक्र ने जहां एक और कुल एवं जाति की उच्चता एवं चारित्रिक योग्यता की आवश्यकता महसूस की वहीं दूसरी ओर मंत्रिपरिषद के सदस्यों का शिक्षित होना भी निश्चित किया १७ I उनके अनुसार जहां मंत्री के लिए नीति शास्त्र का ज्ञाता होना आवश्यक है वही उसके अनुरूप कार्य करना भी अनिवार्य बना दिया है I धर्म तत्व का जानने वाला पंडित लोक व्यवहार १८ और शास्त्रोक्त व्यवहार जानने वाला प्राङ - विवाक होना चाहिए १९ I इस प्रकार शुक्रनितिकार ने मंत्रियों के पद की गरिमा के अनुरूप विभिन्न प्रकार की शैक्षिक योग्यताओं को अनिवार्य माना है I

    मंत्रिपरिषद के सदस्यों की योग्यताओं का उल्लेख अधिकांश प्राचीन हिंदू विचारको द्वारा किया गया है और २० जिस प्रकार इन योग्यताओं का वर्णन किया गया है उससे प्रतीत होता है कि इन्हीं योग्यताओं में अयोग्यता भी निहित है महर्षि शुक्र ही ऐसे सर्वप्रथम विचारक हैं जिन्होंने मंत्रिपरिषद के सदस्यों की योग्यता के साथ ही कुछ स्पष्ट रूप में ऐसी अयोग्यताएं भी प्रतिपादित की हैं I चूकी महर्षि शुक्र ऐतिहासिक घटनाओं २१ के आधार पर इन परिणामों से परिचित थे कि कुछ सहायकों के कारण राजा अपने धर्म तथा राज्य से च्यूत हो जाता है २२ I राजा को अभिमानी कुत्सित सहायकों की मंत्रिपरिषद के सदस्यों के रूप में नियुक्ति नहीं करनी चाहिए २३ I मत्सरता ,काम, क्रोध, लोभ, से पूर्ण व्यक्ति भी मंत्रिपरिषद में सदस्य के रूप में नियुक्ति को स्वीकारा है जो ,उक्त योग्यताओं से रहित होंगे I

    वस्तुतःमंत्रिपरिषद के लिए आचार्य शुक्र द्वारा निर्दिष्ट योग्यता अयोग्यता की दृष्टि से मानव प्रकृति का अध्ययन राजनीतिक व्यवहार के लिए आवश्यक है I क्योंकि राजनीतिक व्यवहार के मूल मानवीय आचरण को आचार्य शुक्र ने बहुत सूक्ष्मता से देखने व रखने का प्रयास किया है I यद्यपि मंत्रिपरिषद के निर्माण के संबंध में शुक्रनीति कार ने कोई स्पष्ट एवं विस्तृत वर्णन तो नहीं किया है I किंतु यत्र तत्र प्राप्त निर्देशों के आधार पर यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि मंत्रिपरिषद के सदस्यों की नियुक्ति निर्वाचन पद्धति पर आधारित न होकर राजा के द्वारा अपने सहायक के रूप में की जाएगी I

    रामायण की भांति मंत्रिपरिषद के सदस्यों की नियुक्ति करने में शुक्र नीति का राजा पूर्ण स्वतंत्रता नहीं है I अपितु चयन करते समय उसे उपयुक्त योग्यताओं का पूर्ण ध्यान रखना पड़ेगा राजा के द्वारा सम्यक विचार विमर्श के अभाव में की गई नियुक्ति से नाश की संभावना हो सकती है I अतः महर्षि शुक्र ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि राजा को मंत्रिपरिषद के सदस्यों की नियुक्ति बहुत ही सोच समझकर एवं उपयुक्त निर्धारित योग्यताओं के बंधन में आबद्ध होकर करनी चाहिए I

मंत्रिपरिषद के सदस्यों की संख्या

मंत्रिपरिषद के सदस्यों की संख्या के विषय में प्राचीन हिंदू विचारक एक मत नहीं है I अतः प्रत्येक विचार के द्वारा अपने राज्य की स्थिति के अनुसार संख्या का निर्धारण करना चाहिए I मंत्रणा को अनिवार्य मानते हुए महर्षि शुक्र ने इसकी संख्या 10 निर्धारित की है I आचार्य ने 10 सदस्यों के नाम की सूची में पुरोधा, प्रतिनिधि, प्रधान, सचिव, मंत्री, प्राड्विवाक ,पंडित, सुमंत्र ,अमात्य ,और दूत को सम्मिलित किया है I एक अन्य स्थान पर सुमंत ,पंडित, मंत्री, प्रधान ,सचिव, अमात्य, प्राण विवाक, प्रतिनिधि ,आदि आठ सदस्यों का वर्णन भी मिलता है I जहां पर आचार्य ने पुरोहित एवं दूत का वर्णन नहीं किया है I 10 सदस्यों वाले मंत्रिपरिषद के सदस्यों के वेतन की व्यवस्था करते हुए शुक्रनीति कार ने प्रतिपादित किया है कि पुरोहित से लेकर दूत तक वेतन एक दूसरे की अपेक्षा दशमांस अधिक होगा I इस प्रकार सबसे अधिक वेतन पुरोधा का और सबसे कम वेतन दूत का होना चाहिए I

संदर्भ ग्रंथ

१-वाल्मीकि, वेदव्यास ,मनु ,कौटिल्य ,आदि

२-शुक्रनीति 2/12

३-शुक् नीति 2/13

४-रामायण -अयोध्या कांड -100,15

५-मनुस्मृति -7.54

६-कौटिल्य अर्थशास्त्र -1,8.1

७-राघवेंद्र बाजपेई -पूर्वोत्तर -पृष्ठ -91

८-शुक्रनीति- 2.8

९-वही- 4/230

१०-वही- 2/55,5 6,57

११-दृष्टव्य -राघवेंद्र बाजपेई- पूर्वोत्तर -पृष्ठ 92

१२-शुक्रनीति -2/11

१३-वही 2/8 तुलनीय- रामायण, अयोध्या कांड, 14 ,44 एवं मनुस्मृति 7.38

१४-शुक्र नीति -218 तुलनीय- रामायण बालकांड -7,6-8 एवं महाभारत शांति पर्व -83.3 तथा 27 और द्रष्टव्य- मनुस्मृति -7.58 एवं 60

१५-शुक्र नीति- 2.9

१६-वही -2.82

१७- तुलनीय -राघवेंद्र बाजपेई -पूर्वोत्तर –पृष्ठ- 93

१८-शुक्र नीति- 2.85

१९-वही- 2.86

२०- द्रष्टव्य -राघवेंद्र वाजपेई -पूर्व पृष्ठ -91 -एवं महाभारत -शांति पर्व -118, 02

२१-शुक्रनीति- 2.10

२२-शुक्रनीति- 2.10

२३-शुक्रनीति- 2.11

Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.

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