कौटलीयअर्थशास्त्र में राज्य की आय के स्रोत

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भूमिका-  कौटिल्य अर्थशास्त्र एवं शुक्र नीति में राज्य की आय के विभिन्न स्रोतों का वर्णन उपलब्ध है I  जिनमें विविध प्रकार के कर आर्थिक दंड आदि सम्मिलित हैं I इन स्रोतों से प्राप्त आय से ही राज्य का संचालन होता है I कौटिल्य अर्थशास्त्र में राज्य की आय के स्रोतों को 7 वर्गों में विभक्त किया गया है I जिन्हें दुर्ग ,राष्ट्र ,खनि ,सेतु ,वन ,बृज, और वणिक पथ  की संज्ञा दी गई है १ I कौटिल्य ने इन सात प्रकार की आयों के विभिन्न भागों का भी वर्णन किया है -

१-अर्थशास्त्र में दुर्गों या पुरों से प्राप्त होने वाली आय को दुर्ग कहा गया हैI  जिसमें 20 कर सम्मिलित हैंI२

२-जनपद के क्षेत्र से राज्य को जो विविध प्रकार की आय होती थी I उसे अर्थशास्त्र में राष्ट्र कहा गया है राष्ट्र में सम्मिलित आय 12 प्रकार के हैं ३ I

३-कौटिल्य ने खानों पर राज्य का स्वत्व स्वीकार किया है I जिसे राज्य को पर्याप्त आय प्राप्त होती थी I अर्थशास्त्र में सोना ,चांदी ,हीरे, मणि ,मुक्ता ,प्रवाल ,शंख ,लोहा ,लक्षव ,पत्थर, तथा खनिज पदार्थ आदि की खानों का उल्लेख है I

४- अर्थशास्त्र में फूलों फलों के उद्यान साग सब्जी धान्य आदि की खेती से प्राप्त आय को सेतु कहा गया है I

५-कौटिल्य ने हिरन आदि पशु लकड़ी आदि द्रव्य और हाथियों के जंगल से प्राप्त होने वाली आय को वन कहा है I

६-गाय भैंस बकरी भेड़ गधे ऊंट घोड़े और खच्चर आदि से प्राप्त आय को अर्थशास्त्र में ब्रज की संख्या दी गई है I

७-कौटिल्य ने स्थल मार्ग और जल मार्ग से होने वाली आय को वणिकपथ कहा है I

कर-  कौटिल्य के अनुसार राज्य की आय में करों का महत्वपूर्ण भाग था I उन्होंने विविध प्रकार के करो का उल्लेख किया है I

बिक्री व उत्पादन कर-  आचार्य कौटिल्य ने यह नियम प्रतिपादित किया है कि कोई भी पण्य उत्पादन स्थल पर नहीं बेचा जा सकता ४ I इस नियम का उल्लंघन करने पर उन्होंने कठोर दंड का विधान किया है I उत्पादक स्थल से माल बाहर जाने से पूर्व उस पर उत्पादन कर का भुगतान करके अभिज्ञान मुद्रा लगवाई जाती थी I उत्पादित माल को विक्रय के लिए अन्यत्र नगर आदि में ले जाने पर विक्रय कर या चुंगी का भुगतान करना होता था I कौटिल्य के अनुसार नाप कर बेची जाने वाली वस्तु पर मूल्य का 16वां भाग तोलकर बेची जाने वस्तु पर 20 वां भाग और गिनकर बेची जाने वाली वस्तु पर मूल्य का 11वां भाग बिक्री कर लिया जाता था ५ I इस कर की चोरी करने वाले को कौटिल्य भारी आर्थिक दंड देने का निर्देश दिया है I विवाह उपनयन संस्कार यज्ञ प्रसव देव मंदिर मुंडन व्रत दीक्षा या अन्य विशिष्ट कर्मकांड के उद्देश्य से माल उत्पादक स्थल से बाहर लाने पर कौटिल्य ने कर का निषेध किया है ६ I

पथ कर-  सड़क के प्रयोग के लिए अन्तपाल द्वारा पथ कर वसूल किया जाता था जिसे कौटिल्य ने वर्तनी कहा है I इस कर की दर भिन्न-भिन्न पशुओं पर लगे माल के लिए अलग-अलग थी I यह कर व्यापारियों को मार्ग में सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से लिया जाता था ७ I

प्रत्यक्ष कर-  कौटिल्य ने कुछ ऐसे करो का भी उल्लेख किया है जो सीधे व्यवसाईयों से लिए जाते थे I इन कारों का वह स्थानांतरण नहीं कर सकते थे I इसलिए उन्हें प्रत्यक्ष कर कहते हैं  पौतवाध्यक द्वारा बाट मॉप आदि को प्रमाणित करने के लिए व्यापारियों से चार माषक कर लिया जाता था ८ I दूसरा प्रत्यक्ष कर द्युत पर था द्युत में जीते हुए धन का 20 वां भाग राज्य को देना आवश्यक था ९ I रूप से आजीविका चलाने वाली वेश्याओं गणिकाओं आदि से उनकी दो दिन की आय प्रतिमास कर लेने के रूप में ली जाती थी I इसी प्रकार नट नर्तक गायक वादन जादूगर चारण आदि से भी प्रतिमास दो दिन की आय कर के रूप में ली जाती थी १० I कारीगरो एवं शिल्पियों आदि से कर लेने का विधान भी आचार्य कौटिल्य ने बनाया है I आपातकाल या आर्थिक संकट के समय कौटिल्य ने सामान्य करों के अतिरिक्त संपत्ति पर विशेष कर लगाने का प्रावधान किया है I यदि तब भी अर्थ संकट बना रहता है तो समादि आयो से धन प्राप्त करने की छूट कौटिल्य ने राजा को दी है ११ I

तट कर-  अर्थशास्त्र में तीन प्रकार के माल का उल्लेख किया गया है जिन पर राज्य द्वारा शुल्क लिया जाता था I यह है वाह्य अभ्यंतर और आतिथ्य देश के बाहर भेजे जाने वाले और विदेश से स्वदेश में आने वाले दोनों प्रकार के माल पर लिया जाता था I जिन्हें निष्काम और प्रवेश्य शुक्ल कहते थे I सामान्य रूप से आयात शुल्क माल के मूल्य का पांचवा भाग होता था किंतु पुष्प फल शाक मूल कंद बीज सूखी मछली और मांस के आयात पर यह शुल्क मूल्य का छठा भाग था I रेशमी कपड़े सूती कवच लोहा गेरू चंदन मदिरा हाथी दांत मृग चरण बिछौना ओढ़ना उन्हीं कपड़ों आदि पर उनके मूल्य का दसवां या 15वां प्रवेश्य शुल्क लिया जाता था I सूती वस्त्र चौपाया दुपाया सूत कपास दवाई लकड़ी बास द्दाल मिट्टी के बर्तन अनाज घी तेल नमक आदि पर उनके मूल्य का बीसवां या पच्चीसंवा भाग प्रवेश्य से शुल्क लिया जाता था I शंख मणि मुक्ता प्रवाल और हाल आदि पर आयात शुल्क उनकी किस्म आदि को ध्यान में रखकर विशेषज्ञों द्वारा निर्धारित कराया जाता था १२  I

कौटिल्य प्रवेश शुल्क के अतिरिक्त एक अन्य कर का भी उल्लेख किया है जिसे द्वारदेय कहते थे I यह प्रवेश शुल्क का पांचवा भाग होता था I संभवतः यह द्वारदेय कर माल के नगर में प्रवेश के समय लिया जाता था I इस कर में संबंधित देश के व्यवहार के आधार पर छूट दी जाती थी  I जिसे देशोपकार या अनुग्रहित कहते थे १३ I जिन व्यवसायों पर राज्य का एकाधिकार था उनसे संबंधित माल को बाहर से मांगने पर एक अन्य अतिरिक्त कर लिया जाता था I जिसे वैधरण कहते थे इस कर की मात्रा माल मांगने से राजकीय व्यवसाययों को हुई हानि के बराबर होती थी १४ I कौटिल्य ने आयात शुल्क का उद्देश्य राज्य की आय में वृद्धि माना है I इसीलिए उन्होंने विदेशी व्यापारियों को अनेक छूट और सुविधाएं प्रदान की हैं I उन्होंने अर्थशास्त्र में निर्यात कर का उल्लेख तो किया है किंतु उसकी दर के संबंध में कोई वर्णन नहीं किया है I

भूमि कर-  आचार्य के अनुसार राज्य द्वारा भूमि कर के रूप में उपज का एक निश्चित भाग लिया जाता था I जिसका निर्धारण भूमि की उर्वरा शक्ति और सिंचाई साधन की उपलब्धता के आधार पर होता था I जो किसान स्वतंत्र रूप से खेती करते हुए सिंचाई की व्यवस्था भी स्वयं करते थे उनसे भूमि की उर्वरा शक्ति के अनुसार 1/4 या 1/5 भाग भूमि का लिया जाता था १५  I जो किसान हाथ से जल लाकर सिंचाई करते थे I उनसे उपज का 1/5 जो रहट लगाकर सिंचाई करते थे I उनसे उपज का 1/4 भाग जो यंत्र आदि से सिंचाई करते थे उनसे उपज का 1/3 तथा जो नदी नहर तालाब आदि से सिंचाई करते थे  I उनसे उपज का 1/4 भाग भूमि कर के रूप में लिया जाता था १६ I यदि कोई किसान नया तालाब या बंद बनाता था तो उसे 5 साल के लिए यह छूट दी जाती थी  I

अर्थ दंड-  आचार्य कौटिल्य ने अपराधों के लिए अर्थ दंड पर अधिक बल दिया है I अर्थ दंड से जहां प्रभावित व्यक्ति के लिए क्षतिपूर्ति मिलती थी I वहीं राज्य को भी पर्याप्त आय प्राप्त होती थी क्योंकि सब दंडों में से राज्य को 5 से 8% तक भाग प्राप्त होता था  I कौटिल्य ने अपशब्द कहने से लेकर चोरी डाके आदि बड़े अपराधों तक के लिए अर्थ दंड का विधान किया है I उनका मत है कि अपराध के अनुसार दंड दिया जाना चाहिए  I अर्थशास्त्र के अनुसार यदि कोई व्यक्ति काणे को काणा लूले को लूला गंजे को गंजा कह पुकारते हैं तो उसे तीन पण दंड और झूठी निंदा करने पर छह पण दंड दिया जाना चाहिए आचार्य कौटिल्य ने व्यंग्य तथा अपशब्द के लिए दंड का निर्धारण वर्ण आयु और लिंग के आधार पर किया है I उन्होंने उच्च वर्ण और बड़ी आयु वाले व्यक्तियों तथा स्त्रियों पर कटाक्ष करने पर अर्थ दंड की मात्रा अधिक रखी है I कौटिल्य ने किसी को डराने धमकाने पर 12 पण दंड अपने देश या गांव की निंदा करने पर प्रथम साहस दंड अपनी जाति या समाज की निंदा करने पर मध्य साहस दंड और देवालयों की निंदा करने पर उत्तम साहस दंड देने का निर्देश दिया है I

कौटिल्य ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपराधों को रोकने के लिए दंड का विधान किया है I उन्होंने कहा है कि मालिक नौकर के बीच समझौता भंग करने वाले तथा वस्तु खरीद कर लेने से मुकर जाने वाले पर 12 पण दंड दिया जाना चाहिए I उस काल में दास प्रथा प्रचलित थी I किंतु कौटिल्य ने आर्य परिवार से किसी सदस्य को बेचने पर भारी अर्थ दंड का विधान किया है I उन्होंने सिंचाई के लिए पानी के उचित प्रवाह को रोकने मार्गों को अवरुद्ध करने समाज के सामूहिक कार्यों में सम्मिलित न होने आदि के लिए भी अपराध के अनुसार दंड निर्धारित किया है १७ I उन्होंने स्त्री पुरुष संबंधों में अनैतिकता के लिए भी अर्थ दंड का प्रावधान किया है १८  I राजकीय कर्मचारियों के कर्तव्य पालन में कमी के लिए भी आचार्य कौटिल्य ने अर्थ दंड की व्यवस्था की है I इस प्रकार अर्थशास्त्र में अर्थ दंड को व्यापक आधार पर प्रतिपादित किया गया है I  जिससे प्रतीत होता है कि उसे काल में अर्थ दंड राज्य की आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत था  I

राजकीय व्यय-  राजकीय व्ययों के संबंध में प्राचीन साहित्य के शास्त्रीय ग्रन्थों से बहुत कम सूचनाए प्राप्त होती हैं I कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इस विषय में कुछ निर्देश प्राप्त होते हैं कौटिल्य ने राजा के व्यक्तिगत व्यय और अमात्य आदि के वेतन के संबंध में निर्देश दिए हैं I तथापि उसने यह नहीं बताया है कि राजकीय आय का कितना प्रतिशत किस विभाग के लिए व्यय किया जाना चाहिए वैसे संबंधित कुछ विचार शुक्र ने दिए हैं १९ व्यय के लिए उन्होंने छ: मुख्य विभाग बनाए हैं I आय के भी 6 भाग कर लेने चाहिए I इसमें से प्रत्येक विभाग के अनुपातिक व्यय की व्यवस्था शुक्र ने की वैसे राजकीय कोष में मुख्यतः 6 विभाग किए गए थे I राजा की व्यक्तिगत आवश्यकताएं सेना और युद्ध प्रशासन का संचालन प्रजा के हितकारी कार्य दान कोष I

कोष की सुरक्षा-  कोष और उसकी वृद्धि तथा सुरक्षा के लिए विशेष उपायों का निर्देश प्राचीन शास्त्रकारों ने किया था I कोष की गणना राज्य के सप्तांगों में की गई है इसके दो भागों में विभक्त किया जा सकता हैI  कोष की वृद्धि के उपाय कोष की सुरक्षा के उपाय कामंदक ने कोष को शुद्ध रखने पर और व्यसन को दूर करने पर बहुत बल दिया है I उसने कोष के व्यसन इस प्रकार कहे हैं सामर्थ से अधिक व्यय करना कोष के धन का इधर-उधर बिखरा होना धन का अधिक भोग करना धन का चोरी चले जाना स्वामी का अधिक दूर रहना कोष में धन को ठीक प्रकार से संचित ना करना I

निष्कर्ष-  प्राचीन विचारकों का मत है कि कोष की सुरक्षा के लिए उन पर आने वाले व्यसनो का तुरंत ही निराकरण होना चाहिए I इसी से कोष की सुरक्षा है उसके सुरक्षित रहने से ही राज्य में सुख शांति और समृद्धि बढ़ेगी तथा देश आंतरिक और वाह्य आपत्तियों से मुक्त रहेगा I

संदर्भ ग्रंथ

१-शुक्र नीतिसार 2.24

२-दुर्ग से प्राप्त होने वाली आय निम्न थी-शुल्क ,दंड, पौतव, नागरक, लक्षणाध्यक्ष ,मुद्राध्यक्ष ,सुराध्यक्ष, सूनाध्यक्ष, सूत्रध्यक्ष, तेल, घृत ,क्षार, स्वर्ण ,राजकीय पर्ण केंद्र, वेश्या ,जुआघर ,अचल संपत्ति, कारीगर ,और शिल्पी ,देवाध्यक्ष ,अत्यधिक धनी लोगों आदि से प्राप्त आय I

३-राष्ट्र में सम्मिलित आय इस प्रकार है-सीता भाग बली कर वणिक नदीपाल स्तर  नाव का कर पट्टन विवीत वर्तनी रज्जू चोर रज्जू

४- कौटिल्य अर्थशास्त्र 2.21

५-पूर्ववत 2.19

६-पूर्ववत 3.20

७-पूर्ववत 2.27

८-पूर्ववत 5.2

९-प्राचीन भारत की शासन पद्धति अलतेकर पृष्ठ 204

१०-मनुस्मृति 7.130 एवं महाभारत शांतिपर्व 67-24

११-मनुस्मृति 7.130 एवं महाभारत शांतिपर्व 67

१२-कौटिल्य अर्थशास्त्र 2.1

१३-पूर्ववत 2.22

१४-पूर्ववत 2.16

१५-पूर्ववत 3.9

१६-पूर्ववत 2.22

१७-शुक्र नीतिसार 4.1.73-77

१८-पूर्ववत 4.1.79-83

१९-शुक्र नीतिसार 1.31-63-17

Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.

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