प्रचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में सैन्य संगठन
भूमिका- राज्य के सात अंगों में से ना का महत्वपूर्ण स्थान है देश की बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा राज्य का विस्तार आंतरिक उपद्रवों से बचाव आदि के कार्य सेना ही करती है अतः सेनाओं के संगठित करने के विस्तृत निर्देश प्राचीन भारतीय शास्त्रों में दिए गए हैं
सेना का स्वरूप एवं आवश्यकता- राज्य का सातवां अंग सेना है अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित सुसंगठित मनुष्य आदि के समूह को सेना कहते हैं १ राज्य के सात अंगों में सेना का वही स्थान है जो शरीर में मन का है २ राज्य रूपी वृक्ष के यह पुष्प पल्लव है ३ इससे स्पष्ट है कि जिस प्रकार मन इंद्रियों का संचालन करता है उसी प्रकार राजा सेना के द्वारा राज्य का संचालन करता है जिस प्रकार पुष्प पल्लवन से समृद्ध वृक्ष उन्नति का स्वरूप है इसी प्रकार समृद्ध राज्य में ही सेना सशक्त हो सकती हैं प्राचीन आर्यों का कथन है की सेना के आश्रय से ही धर्म स्थिर रहता है अतः धर्म की रक्षा सेना से ही है जिस प्रकार पृथ्वी पर जीव निवास करते हैं उसी प्रकार बल सेना पर धर्म का निवास है ४ सेना के बिना ना तो राज्य सुरक्षित रहता है न कोष का अधिक संग्रह होता है और ना ही शक्ति का विकास होता है कोष और शक्ति की वृद्धि तथा शत्रुओं का विनाश व्यवस्थित सेना ही कर सकती है ५
सेना का संगठन- देश की सुरक्षा के लिए सेना का संगठित होना अनिवार्य है इतिहास के आदिकाल से ही युद्ध के घटनाएं होती रहती हैं उनके लिए सेना का संगठन भी होता रहा है ऋग्वेद में आर्य और आर्येत्तर तथा आर्य सेनाओं के स्वयं के मध्य युद्ध का वर्णन है उत्तरवर्ती काल में आर्य सेनाओं में परस्पर युद्ध होते रहे हैं यह प्रायः राजाओं के अध्यक्षता में लड़े जाते रहे राज्य की आय का लगभग आधा भाग सेना पर खर्च हो जाता था
सेना के भेद- शुक्र ने सेना के भेद को अग्रलिखित प्रकार बताया है -
१- स्व गया और अन्य गया ६
२- दैवी आसुरी और मानवी ७
३- स्वीय और मैत्र ८
४- मौल और साद्यस्क
५- सार और असार
६-शिक्षित और अशिक्षित
७- गल्मीभूत और अगुल्मक
८- दत्ताशस्त्रादि और स्वशस्त्रास्त्र
९-स्ववाहिनी और दत्त वाहन ९
सेना के अंग- रामायण और महाभारत के द्वारा प्राचीन भारत के सैनिक संगठन के स्वरूप एवं सेना के मुख्य अंगों पर पर्याप्त जानकारी मिलती है भारतीय सेना के चार प्रमुख अंग थे रथ गज अश्व एवं पदाति महाभारत में सेना के आठ अंग बताए गए हैं रथ गज अश्व पदाति नौसेना श्रमिक विशिष्ट सेवा गुप्तचर १० सामान्य चार अंग रथ गज अश्व एवं पदाति का युद्ध में सक्रिय महत्व था तथा इन्हें चतुरंगिणी सेना के नाम से जाना जाता था
सेना की सफलता के सूत्र- युद्ध में सेना को सफलता मिले इसके लिए भारतीय आचार्यों ने गंभीरता से विचार किया था सेना की सफलता के लिए अग्रलिखित तत्वों को महत्वपूर्ण बताया गया
१-मंत्र- युद्ध से पूर्व विश्वसनीय तथा बुद्धिमान सहायकों के साथ राजा को मंत्रणा करनी चाहिए इससे युद्ध में सफलता मिलती है ११ योद्धाओं को युद्ध में वीरता दिखानी अनिवार्य है परंतु मंत्र भी आवश्यक है मंत्र में बुद्धि प्रदान होती है शौर्य नही
कामंदक ने मंत्र के पांच अंग बताएं सहाय साधन उपाय देशकाल विभाग एवं विपत्ति प्रतिकार कौटिल्य ने भी मंत्र के पांच अंग बताएं यह भिन्न है कर्म को प्रारंभ करने के उपाय पुरुष और द्रव्य की संपत्ति देशकाल विभाग विपत्ति प्रतिकार एवं कार्य सिद्धि १२
२-कोष- सेना की व्यवस्था और सफलता कोष पर निर्भर करती है अतः राजा के लिए उचित है कि वह सबसे पहले कोष का प्रबंध करें कालिदास का कथन है कि पराजित राज्य पर अधिकार करने की अपेक्षा धन का अपहरण करना अधिक उचित है १३ शत्रु राज्यों को जीतकर उनको कर दाता राज्य बनाया जाना अधिक अच्छा समझा जाता है
३- विष्टि- सेना के सहायक अंगों में विष्टि पद का प्रयोग किया गया है युद्ध में जीत के लिए यह आवश्यक था की सेना के सहायक अंग युद्ध के समय सेना को आवश्यक सहायता पहुंचातें रहे सेना को समय पर सारा सामान मिलना चाहिए श्रमिक वाहन शिल्पी और चिकित्सक साथ रहने चाहिए सैनिकों का मनोरंजन के साधन भी उपलब्ध होने चाहिए
४- सैन्य बल- राजा का सैन्य बल पूरा होना चाहिए कौटिल्य ने छ: प्रकार के बल बताएं हैं मौलबल भृतबल श्रेणिबल मित्रबल अभिन्न बल आटवीं बल मनु और कामंदक ने भी छः प्रकार के बल बताए हैं रघुवंश में राजा के 6 प्रकार के बलों का उल्लेख पाया जाता है राजा को चाहिए कि युद्ध शुरू करने से पूर्व इन बलों को पूरी तरह सुसज्जित कर ले इन सभी सेनाओं में शिक्षित सार मौल सेना सर्वश्रेष्ठ होती है यह राजा को किसी भी अवस्था में नहीं छोड़ती १४
सेना में भर्ती- सामान्यतया आर्य राजा सैनिकों की भर्ती और जातियों से ही करते थे परंतु आर्येत्तर जातियों में से भी यह भर्ती की जाती थी कालिदास ने दुष्यंत की यवन महिला अंगरक्षिकाओं का वर्णन किया है १५ सैनिकों में यह विशेषताएं होती थी - धन द्वारा उनका विशेष सत्कार किया जाता था विशेष उपाय द्वारा उनकी भक्ति की परीक्षा ली जाती थी एवं .उनका गुप्त रूप से शास्त्रों का अभ्यास कराया जाता था
महिला सेना- प्राचीन काल में महिला सेना भी किसी न किसी रूप में अवश्य रहती थी कालिदास ने योद्धाओं की संगीनियों का उल्लेख किया है १६ राजाओं की महिला अंगरक्षिकाओं का भी वर्णन है १७ कौटिल्य का कथन है कि सेना के साथ महिलाएं भी अवश्य रहे तथा उनको प्रोत्साहित करें १८ महिलाओं द्वारा सैनिकों का मनोरंजन करने का उल्लेख शिशुपाल वध में भी किया गया है
सेना के गुण- प्राचीन ग्रंथो में सेना के गुण दोष का विस्तृत विवेचन है विशाखदत्त ने सेना के निम्नलिखित गुण दोष बताएं हैं १९ सेना को अपने उद्देश्य का विधवक ज्ञान होना चाहिए सेना में समन्वय एवं एकता होनी चाहिए सैनिकों की वंश परंपरा उच्च होनी चाहिए अपने पक्ष के राजा में दृढ़ अनुराग होना चाहिए एवं विपक्ष से उसको दूर रहना चाहिए
सेना के दोष- सेना का स्वयं साध्य होना स्वामी भक्ति का संदिग्ध होना स्वपक्ष और पर पक्ष में समान रूप से अनुरक्त रहना एवं अपने पक्ष के विरुद्ध आचरण करना
सेना के अधिकारी- प्राचीन काल में राजा सर्वोच्च सेनापति होता था वह एक प्रधान सेनापति नियुक्त करता था सामान्यतः सेनापति क्षत्रिय वर्ग का होता था प्रधान सेनापति के अतिरिक्त विभिन्न सैन्य विभागों के अलग-अलग अध्यक्ष नियुक्त किए जाते थे पत्याध्यक पैदल सेना का सेनापति स्थाधिपति रथ सेना का सेनापति अश्वाध्यक्ष अश्व सेना का सेनापति गजाध्यक गज सेना का सेनापति नवाध्यक्ष नौसेना का सेनापति आदि
कौटिल्य ने सेना अधिकारियों के पद के विषय में कुछ महत्वपूर्ण प्रकाश डाला है उसने बताया है की सेना की एक इकाई पादिक है दस पादुको का अधिकारी सेनापति होता है दस सेनापतियों पर एक नायक होता है चंद्रगुप्त मौर्य की विशाल सेना का नियंत्रण 30 सदस्यों की एक समिति करती थी इसकी छः उप समितियां थी पदाति सेना उपसभापति गज सेना उपसमिति रथ सेना उपसमिति अश्व सेना उप समिति नौसेना उपसमिति परिवहन व्यवस्था उपसमिति
सैन्यअनुशासन- प्राचीन भारत में सैन्य अनुशासन पर विशेष ध्यान दिया जाता था रामायण में उल्लेख है कि सुग्रीव का आदेश पाते ही उसके सारे सेनापति अपने सैनिकों के साथ निर्धारित समय पर उपस्थित हो गए शुक्र नीतिकार के चतुर्थ अध्याय के सातवें में प्रकरण में अनुशासन के संबंध में विस्तृत निर्देश दिए गए हैं सैनिकों को कठोर निर्देश दिए जाते थे की प्रयाण के समय मार्ग में पढ़ने वाले नागरिकों पर किसी प्रकार की ज्यादती न करें
सेना के विभाग- महाभारत में सेना के आठ विभाग कहे गए हैं पत्ती सेना मुख गुल्म गण वाहिनी पृतना चमू एवं अनीकिनी एक पत्ति में एक रथ एक गज तीन अश्वरोही एवं पांच पैदल सैनिक होते थे सेना मुख में पत्ति से तिगुनी गण में गुल्म तिगुने वाहिनी में गण से तिगुने पृतना में वाहिनी से तिगुने चमू में प्रतना से तिगुने और अनीकिनी में चमू से तिगुने सैनिक होते थे सेना का पुनः संगठन अक्षौहिणी में होता था एक असौहिणी सेना में तीन अनीकिनी होती थी
महाभारत युद्ध में कौरवों के पक्ष में ग्यारह अक्षौहिणी सेना थी तथा पांडवों के पक्ष में सात अक्षौहिणी सेना थी इस प्रकार महाभारत में
65,610*11=72,1710+65,610*7=4,59,270=11,80,980 सैनिकों ने भाग लिया
सैन्य शिविर- प्राचीन काल में सेना के ठहरने के स्थान को सैन्य शिविर कहते थे रामायण के अनुसार राम ने सुमेल पर्वत पर अपना सैन्य शिविर स्थापित किया था सैन्य शिविरों को ऊंचे स्थानों पर बनाए जाने का निर्देश दिया गया था सैनिक सेवाओं में निवास का प्रबंध पट गृहों में होता था शिविरों की सुरक्षा का समुचित प्रबंध होता था
संदर्भ ग्रंथ
१- सैन्य सप्तम् मुच्यते
सेना शस्त्रास्य सयुक्ता मनुष्यादि प्रणत्यिका
शुक्र नीतिसार 4.7.1
२- बलं मनः शुक्र नीतिसार 1.62
३- सेनाः पल्लवाः कुक्षुमानिच - शुक्र नीतिसार 5.11
४-घोषाल यू एन हिस्ट्री ऑफ इंडियन पॉलीटिकल आईडियाज पृष्ठ 231
५-शुक्र नीतिसार 4.6.7
६- स्वगयाडन्यगया वेति द्विधा -शुक्र नीतिसार 4.7.2
७-शुक्र नीतिसार 4.7.2
८-शुक्र नीतिसार 4.7.8
९-शुक्र नीतिसार 4.7.9
१०-महाभारत 12.59.49
११-भट्टी काव्य 15.107.110 एवं रघुवंश 12.77.78
१२-अर्थशास्त्र 2.8.1.2
१३-शिशुपाल वध 2.9
१४-शुक्र नीतिसार 4.7.174
१५-रघुवंश 4.26 पर मल्लिनाथ की टीका
१६-रघुवंश 2.59
१७-अभिज्ञान शाकुंतलम् द्वितीय अंक का विष्कम्भक
१८-अर्थशास्त्र 10.2
१९-शिशुपाल वध सातवां सर्ग
Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.
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