प्राचीन भारत में राजनीतिक दायित्व का आधार

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राज्य के प्रति नागरिकों के कर्तव्य- 

भारतीय आचार्य ने राज्य के प्रति नागरिकों के कर्तव्यों का भी वर्णन किया था I इन कर्तव्यों के पालन के लिए उनके द्वारा विभिन्न आधार बनाए गए I आचार्य की मान्यता थी कि राजा के द्वारा व्यक्ति को अराजकता की स्थिति से बचाए रखा जाता है  I उनका कहना था कि यदि राज्य ना रहा तो व्यक्ति इस प्राकृतिक अवस्था में पहुंच जाएगा I जहां पर वह पहले था मत्स्य न्याय का चारों ओर प्रभाव पड़ जाएगा I शक्ति ही अधिकार बन जाएगी किसी भी व्यक्ति का अपना कहने के लिए कुछ भी ना रहेगा राज्य के दंड का भय न रहने पर सभी व्यक्ति अपने-अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाएंगे I अनेक पापी राजतंत्र के भय से पाप नहीं करते महाभारत का यह कथन राज्य के अस्तित्व का महत्व प्रदर्शित करता है I महाभारत में अर्जुन के मतानुसार यदि दंड मर्यादा की रक्षा न करें तो ब्रह्मचारी वेदों के अध्ययन में न लगे सीधी गौ भी दूध न दुहावे और कन्या विवाह न करें I लोगों को यह ज्ञान नहीं रहे कि कौन सी चीज उसकी है और कौन सी चीज पराई १ I मनु का यहां तक कहना है कि स्वर्ग के देवता भी तभी अपने-अपने कार्य में संलग्न रह पाते हैं जब उन्हें देवराज इंद्र के दंड का भय रहता है २ I

राजाज्ञा पालन का आधार-

राजाज्ञा पालन का एक आधार तो यह हुआ कि ऐसा करके हम अराजकता की भयानक स्थिति से मानवता को बचा सकते हैं I दूसरे इससे धर्म और न्याय की स्थापना होती है I तीसरे इससे समाज में मर्यादा बनी रहती है  I चौथे व्यक्ति को राजा की आज्ञा का पालन I इसलिए भी करना चाहिए कि वह व्यक्ति के जीवन और उसकी धन संपत्ति की रक्षा करता है तथा समाज में व्यवस्था बनाए रखना है I पांचवें राजा के द्वारा समाज विरोधी तत्वों को दबाया जाता है व्यक्ति को कष्ट देने वाले सभी तत्वों अथवा कष्टों का राज्य द्वारा दमन किया जाता है I वे सभी उनकी मर्यादा में ही रखे जाते हैं I छठे राजा के द्वारा प्रजा की आध्यात्मिक एवं भौतिक प्रगति में सहायता प्रदान की जाती है I साथ में राजा के पास शक्ति है जिसके द्वारा वह व्यक्ति के कल्याण में सहयोग भी दे सकता है और उसके जीवन को कष्टप्रद भी बना सकता है I आठवी राजा सामाजिक परंपराओं एवं रीति रिवाजों का रक्षण करने वाली एक संस्था है और यदि उसकी उपेक्षा की गई तो समाज की सारी व्यवस्थाएं ही विच्छृंखल हो जाएगी ३ I इन सभी कारणों से राजा की आज्ञा का पालन आवश्यक बताया गया है ताकि सभी लोग अनुशासित जीवन व्यतीत कर सके I यहां यह बात ध्यान में रखने योग्य है कि प्राचीन भारतीय विचारक ना तो पुराने सिद्धांतों से चिपके रहने की बात करते हैं और ना ही राजा को स्वेच्छाचारी बनाने पर सहमत हैं समाज व्यवस्था को समय की आवश्यकता एवं स्थिति की मांगों के अनुसार परिवर्तित करते रहने की परंपरा थी ,किंतु इस परिवर्तन पर राजा का अधिकार नहीं था I यह समाज के प्रमुख लोगों द्वारा किए जाते थे इसके अतिरिक्त राजा को जनता की प्रत्येक इच्छा का पालन करने की बात नहीं कही गई है राजा यदि अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करता अथवा वह शासन को गलत रूप से संचालित करता हो तो जनता को उसका विरोध करने का अधिकार दिया गया था I जनता राजा को सिंहासन से उतार सकती थी  I वह ऐसे राजा को यदि जान से भी मार दे तो इसमें कोई पाप नहीं था ४ I

जिन ग्रन्थों ने राज्य की उत्पत्ति का आधार पारस्परिक समझौते को मना है वे राज्य की आज्ञाकारिता का एक अलग ही आधार प्रस्तुत करते हैं I उनका कहना है की प्रजा ने राजा से यह समझौता किया है कि वह उसकी रक्षा करें और इसके बदले में वे सभी उसको कर प्रदान करें तथा उसकी आज्ञा का पालन करें I इस समझौते को बनाए रखने के लिए व्यक्ति को समाज की आज्ञा का पालन उस समय तक करते रहना चाहिए जब तक कि वह उसकी रक्षा की पर्याप्त व्यवस्था कर रहा है I समझौते की शर्त का पालन यदि राजा द्वारा ना किया जा सके तो भारतीय आचार्य उसकी आज्ञा के उल्लंघन की अनुमति मात्र नहीं देते वरन वह एक पागल कुत्ते की तरह मार डालने की बात करते हैं I राजा की आज्ञा पालन का आधार बौद्धिक है यह व्यक्ति की स्वार्थ पूर्ण आत्म चेतना से उदित होता है ५  I

नागरिकों के कर्तव्य- 

प्राचीन भारत के ग्रन्थों में राज्य के नागरिकों के कर्तव्य व अधिकार के संबंध में पर्याप्त विरोधी विचार प्रकट किए हैं I एक ही ग्रंथ के विभिन्न भागों में भी कई प्रकार के मतों का विवेचन है I इन विरोधी विचारों के आधार पर कुछ लेखक तो यह निष्कर्ष निकालते हैं कि प्राचीन भारतीय ग्रन्थों ने राजा को पूर्ण शक्तियां सौपी थी तथा जनता को इसकी आज्ञा पालन का कर्तव्य सौंपा था I उनकी मान्यता है की स्वतंत्रता का विचार अनुपस्थित था I सुरक्षा के सिद्धांत पर इतना जोर दिया गया था कि नागरिकों को कोई अधिकार या स्वतंत्रता प्रदान करने की आवश्यकता नहीं समझी गई I नागरिकों को केवल क्रांति का अधिकार सौपा गया था I वह भी उस स्थिति में जबकि राजा अपनी रक्षा के दायित्व को पूरा नहीं कर पाए I शुक्र नीतिसार के द्वितीय अध्याय में कहा गया है कि यदि राजा अनैतिक हो जाए तथा सन्मार्ग का विरोध करने लगे तो सामान्य जनता उसके विरुद्ध क्रांति कर दे I महाभारत में भी आताताई राजा के विरुद्ध क्रांति करने तथा उसके स्थान पर न्याय पूर्ण राजा को नियुक्त करने की बात कही गई है ६ I महाभारत में भीष्म की कथानुसार यदि राजा द्वारा रक्षा नहीं की जाती है तो जनता को स्वयं शस्त्र धारण करने चाहिए और स्वयं राजा की हत्या कर देनी चाहिए I

राजा के व्यवहार पर प्रतिबंध- 

राजा के व्यवहार पर जो प्रतिबंध लगाए गए थे उसकी प्रकृति नैतिक थी I वह धर्म पर आधारित थे उनका आदर व्यक्ति की स्वतंत्रताएं नहीं थी I राजा धर्म के नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकता था किंतु यदि वह ऐसा करें तो भी व्यक्ति अपने अधिकार के रूप में राजा से कोई मांग नहीं कर सकता था I व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मान्यता का उस समय पर्याप्त विकास नहीं हो पाया था I प्राचीन भारत में कोई ऐसी संगठित संस्था नहीं थी जो धर्म के आदेशों का आधिकारी रूप से पालन कर सके I धर्म में भी बहुत कुछ स्वतंत्र व्यवहार पर जोर दिया गया था I  ऐसी स्थिति में राजा के अधिकार और भी अधिक मर्यादित बन गए थे  I यहां शासन से यह आशा की गई कि वह जनता के प्रति दयालु एवं सद्भावना पूर्ण बन जाए तथा वह अपने साथ ऐसा ही व्यवहार करें जैसा एक बालक के प्रति उसके माता-पिता करते हैं I अनेक प्रकार के राजा को ऐसा बनाने का प्रयास किया गया था कि वह जनता के आधिकारिक प्रेम का पात्र बन सके I शुक्र के कथनानुसार सबसे अधिक अभागा राजा वह होता था जिसकी और लोग भय एवं आतंक से देखते हैं I इसी बात के सकारात्मक पक्ष का उल्लेख करते हुए महाभारत में कहा गया है की सर्वश्रेष्ठ राजा वह है जिसके प्रदेश में लोग इस प्रकार निर्भय होकर विचरण करते हैंI  जिस प्रकार की बालक अपने मां-बाप के घर में प्रवेश करते हैं  जहां लोग अपने धन को नहीं छिपाते जहां शासक उचित और अनुचित का भेद करना जानता है ७I

व्याख्याकारों का कहना है कि यह सारी बातें आदर्श रूप में उचित थी किंतु इस आदर्श में वर्णित स्वतंत्रता को लागू करने का साधन क्या था साधारण स्थिति में भी यदि कोई राजा इन आदर्शों का उल्लंघन करता है तो उसे किस प्रकार रोका जाएगा I राजतरंगिणी आदि ग्रन्थों में ऐसे शासको का वृतांत है I जिन्होंने अपनी जनता के प्रति भारी अत्याचार किए सामान्य जन के पास इन अत्याचारों का विरोध करने के लिए कुछ भी नहीं था  I जब राजा का अत्याचार अपनी चरम पर पहुंच गया था केवल तभी जनता उसके विरुद्ध क्रांति के लिए संगठित हो सकती थी ८ Iजाति व्यवस्था के आधार पर संगठित समाज के कारण राजा के लिए यह संभव था कि वह पूर्ण शक्तियों का प्रयोग स्वयं ही करता भारतीय समाज अनेक जातियों में विभाजित था यह जातियां अपने आप को चारों वर्णों में से किसी के भी साथ संबंध करने के प्रयत्न में लगी हुई थी I वर्ण व्यवस्था ने सामाजिक जीवन की दृष्टि से राजा के दावों को ढीला कर दिया तथा शक्ति पर उसका एकाधिकार ना रहने दिया I हिंदू राजशास्त्रियों ने चाहे व्यक्ति के अधिकारों पर जोर डाला हो किंतु यह तो स्पष्ट है कि उन्होंने राजा को एक साध्य नहीं वरन उसके मानव कल्याण का एक साधन माना है I शुक्र के अनुसार संप्रभुता केवल वह रूप एवं सत्ता है जिसके माध्यम से राजा जनता की सेवा कर सके  I यदि राजा जनता की सेवा करता है तो वह उचित है और यदि नहीं करता है तो वह अपने लक्ष्य से बिमुख है I

निष्कर्ष-

राजा की पूर्ण शक्तिशालीनता  के संबंध में एक बात यह है कि राजा अकेला ही शासन के संबंधित समस्त कार्यों को व्यक्तिगत रूप से संपन्न नहीं कर सकता I धर्म शास्त्रों एवं नीति ग्रन्थों में राज्य परिषद का विस्तार पूर्वक उल्लेख है I जहां सार्वजनिक विषयों पर विचार विमर्श तथा वाद विवाद किया जा सकता था  I राजा को अपने साथियों से परामर्श एवं विचार विमर्श करना होता था  I शुक्र नीति का कहना है कि छोटे से छोटा कार्य भी बिना कठिनाइयों केअकेला व्यक्ति संपन्न नहीं कर सकता तो राज्य के महान कार्यों को बिना किसी सहायता से वह कैसे संपन्न कर सकता है I राजा को चाहे शास्त्रों का विशद एवं अद्वितीय ज्ञान प्राप्त हो अथवा वह राजनीति का परम विशेषज्ञ हो किंतु फिर भी उसे बिना मंत्रियों का परामर्श लिए स्वयं ही निर्णय नहीं लेना चाहिए ९ I

मंत्रिमंडल राज्य का एक अविभाज्य अंग था I मनु द्वारा भी उस राजा को अनुपयुक्त माना गया है जो स्वयं ही शासन करने का प्रयास करता है I भारतीय आचार्य का यह सामान्य दृष्टिकोण रहा है कि राजा को मंत्रिमंडल की सलाह माननी चाहिए १० I राजतरंगिणी में ऐसे अनेक उदाहरण आते हैं जहां पर मंत्रिपरिषद ने राजा की राय की अवहेलना की थी I मंत्री एवं राजा के बीच संबंधों का नियमन करने के लिए एक विस्तृत आचार संहिता बनाई गई थी  I

संदर्भ ग्रंथ

१-महाभारत शांति पर्व

२-मनुस्मृति

३-डॉ परमात्मा शरण प्राचीन भारत में राजनीतिक विचार एवं संस्थाएं

४- के एम पाणिकर द आईडिया ऑफ़ सॉवरेन्टी एंड स्टेट इन इंडियन पॉलीटिकल थॉट पेज 75

५-डॉ परमात्मा शरण प्राचीन भारत में राजनीतिक विचार एवं संस्थाएं पृष्ठ 16

६-महाभारत शांतिपर्व

७-बेनी प्रसाद द स्टेट इन असिएंट इंडिया पृष्ठ 253

८- यू एन घोष अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया पेज 7

९-शुक्र नीतिसार

१०-रामचंद्र वर्मा हिंदू पालिटी खंड एक -पृष्ठ - दो

Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.

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