भारतीय चिंतन में धर्म की सर्वोच्चता
धर्म-
प्राचीन भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में धर्म को एक सर्वोच्च संस्था माना गया था I राजा का कार्य था धर्म की रक्षा करना I धर्म का पालन करना धर्म विरोधियों को दंड देना I स्वयं धर्म के अनुसार शासन चलाना धर्म विषयक कार्यों को प्रोत्साहन देना आदि I इसी प्रकार समस्त प्रजा का कर्तव्य था धर्म का पालन करना धर्म को पवित्र मानना धर्म के आधार पर जीवन का लक्ष्य बनाना I धर्मानुयायी राजा की आज्ञा का पालन करना धर्मच्युत राजा को उसके पद से अलग कर देना आदि I जो भी कानून बनता था वह धर्म के अनुसार बनता था उस कानून की व्याख्या धर्म ग्रंथो के अनुकूल ही की जाती थी और उसका प्रशासन भी धर्म शास्त्रों द्वारा वर्णित रीति के अनुसार ही किया जाता था I इस प्रकार सरकार के तीनों अंगों अर्थात व्यवस्थापिका न्यायपालिका कार्यपालिका पर धर्म का पूरी तरह से प्रभाव था I राजा धर्म के विपरीत या धर्म की आज्ञा के बिना कुछ भी नहीं कर सकता था धर्म को राज्य में सर्वोच्चता प्राप्त थी १ I
इतना होने पर भी प्राचीन भारतीय राज्यों को धार्मिक राज्य नहीं कहा जा सकता I यह सत्य है कि इन राजाओं का भी व्यक्तिगत धर्म होता था I यह वैष्णव शाक्य शैव आदि किसी भी धर्म को अपना सकते थे तथा उसी के अनुसार अपने जीवन को ढ़ालते थे किंतु धर्म के पालन में कट्टरता का अभाव था I धार्मिक विश्वास को बहुत कुछ व्यक्तिगत विषय माना गया था और प्रत्येक को यह स्वतंत्रता थी कि वह मनमानी मनचाहे धर्म को अपनाए पर किसी के धर्म के विरुद्ध राज्य द्वारा कार्यवाही नहीं की जाती थी I राजा द्वारा मान्य धर्म के प्रोत्साहन के लिए कुछ अधिक कार्य किया जाना तो स्वाभाविक था किंतु इसका यह अर्थ नहीं था कि अन्य धर्म का विरोध किया जाएगा या उनको पनपने नहीं दिया जाएगा किसी भी धर्म की समाज विरोधी कार्यवाहियों का बहिष्कार किया जाता था किंतु ऐसा करते समय किसी भी धर्म के साथ प्रायः भेदभाव नहीं किया जाता था २ I
वास्तव में भारतीय विचारक एक धर्मराज्य की स्थापना करना चाहते थे I धार्मिक राज्य की नहीं उनका कहना था कि राजा को धर्म में होना चाहिए तथा उसे धर्म का पालन करना चाहिए I उनकी मान्यता थी कि राज्य कार्य को सामाजिक जीवन के हित संचालक को ध्येय मानकर संपन्न किया जाना चाहिएI कौटिल्य का मत था कि जब धर्म की उपेक्षा की जाती है और धर्म के द्वारा उसको समाप्त कर दिया जाता है तो शासनकर्ता भी समाप्त हो जाता है I शुक्र द्वारा यह सुझाया गया कि अधर्मी राजा को धर्मवान एवं बलवान राजा द्वारा इस प्रकार दंड दिया जाए I जिस प्रकार एक चोर को दंड दिया जाता है प्रजा को भी कहा गया है कि वह अपने अधर्मी राजा को सुधारने या नष्ट करने के लिए धर्मशील एवं बलवान शत्रु का आश्रय ले वास्तव में धर्म से बढ़कर मूल्यवान कुछ नहीं था I कामंदक ने धर्म के लिए कोष के समाप्त हो जाने को भी एक शोभनीय बात माना है ३ I महाभारत के शांतिपर्व में उल्लेख है कि राजा का जन्म धर्म पालन के लिए हुआ है कामोंपभोग के लिए नहीं जब मनुष्यों के पाप बढ़ जाते हैं तब लोक और परलोक के लिए खतरा पैदा हो जाता है ४ I ऐसी स्थिति में ऋषियों द्वारा राजा का निर्माण किया जाता है I यह राजा ही धर्म है धर्म की रक्षा करने के कारण ही राजा पृथ्वी का स्वामी बनता है I राजा यदि धर्मशील एवं लक्ष्मीवान है तो उसे धर्म का स्वरूप कहा जाएगा और यदि वह धर्म विरोधी एवं दुराचारी है तो वृषल कहा जाना चाहिए I धर्म की उन्नति में ही समस्त प्राणियों की उन्नति निहित है I धर्म के नष्ट होने पर प्राणी भी नष्ट होने लगते हैं I ब्रह्मा ने धर्म की रचना प्रजा के कल्याण के लिए की थी I अतः प्रजा का हित चाहने वाला राजा को भी धर्म की रक्षा एवं अभिवृद्धि करनी चाहिए I राजा के धर्म में होने पर प्राचीन भारतीय विचारों द्वारा जो इतना बल दिया गया उसके पीछे उसकी कई स्पष्ट धारणाएं एवं मान्यताएं थी ५ I वे धर्मज्ञ राज्य अकारण ही नहीं चाहते थे I राज्य की शांति सुरक्षा सुव्यवस्था प्रगति एवं संपन्नता के लिए उन्होंने राजा को धर्म का आश्रय लेने का परामर्श दिया एक राज्य को धर्ममज्ञ कहने के कई अर्थ होते थे जिनमें से प्रमुख निम्नांकित हैं -
१-राज्य द्वारा सामाजिक परंपराओं का आधार-
धर्ममय राज्य का अर्थ तो यह था कि राज्य के नियम एवं कानून उन सामाजिक परंपराओं एवं नियमों के अनुसार हो जो सामान नित्यताओं द्वारा घोषित किए गए हो उनके अनुसार ही राज्य को शासन संचालित करना चाहिए I प्रायः समस्त धर्मशास्त्रों द्वारा यह घोषणा की गई है कि देश जातियों तथा कालों की परंपराओं को आधार मानकर उसके अनुसार ही व्यवहार किया जाए ६ I राजा को शास्त्र के नियमों का पालन करने तथा करवाने के लिए कहा गया है I समाज में जो नियम प्रचलित है वह चाहे धर्म शास्त्रों में कह गए हो अथवा परंपराओं के आधार पर विकसित हुए हो उनको राजा द्वारा मान्यता प्रदान की जाए I राजा इनके विपरीत सामाजिक जीवन के नियंत्रण के लिए नियम ना बनाएं I शांति पर्व में भीष्म ने युधिष्ठिर को कहा है कि वह वेद वचनों को प्रमाण माने तथा शास्त्र की आज्ञा का उल्लंघन न करें I शुक्रनीति ने श्रुति स्मृति को धर्म मानने का आदेश दिया है शास्त्रों में यह कहा गया है कि न्याय धर्म शास्त्रों के अनुकूल किया जाना चाहिएI शुक्र नीति धर्म या कानून विभाग के मंत्री को पंडित कहती है I पंडित के कर्तव्य का वर्णन करते हुए इसमें कहा गया है कि पंडित को इस बात पर विचार करना चाहिए कि संसार में किन प्राचीन तथा अर्वाचीन धर्म का व्यवहार होता है उनमें से कौन से धर्म समाज तथा न्याय सिद्धांत के विपरीत है I इन सब विचार के बाद पंडित को राजा से ऐसे धर्म या कानून की सिफारिश करनी चाहिए जो इस संसार में तथा परलोक में सुख प्रदान करने वाले हैI वैदिक काल के न्यायाधीश धर्म या कानून के अनुसार अपनी सम्मति देने के लिए बाध्य होते थे जो ज्यूरी या वृद्ध कुछ नहीं बोलता था या धर्म के विरुद्ध सम्मत्ति देता था I वह नीति भ्रष्ट समझा जाता था नारद के कथनानुसार वह कोई सभा नहीं है जहां की वृद्धि नहीं होते हैं और वह वृद्धि नहीं है जो धर्म की बात नहीं करते नारद का मत था कि या तो न्याय संबंधी सभा में बिल्कुल जाना ही नहीं चाहिए और अगर जाएं तो वहां जाकर धर्म से युक्त सम्मत्ति प्रदान करें जो व्यक्ति मौन रहता है या धर्म के विरुद्ध सम्मति देता है वह पाप करता है शुक्र ने राजा से कहा है कि वह न्याय करने से पूर्व स्मृतियों को देखें I
२ -राज्य व्यवस्था को लागू करना-
राज्य इस बात का ध्यान रखें कि सामाजिक व्यवस्था का पालन किया जा रहा है अथवा नहीं I कौटिल्य ने वर्णों और आश्रमों के धर्मो का वर्णन करने के बाद राजा से उसका पालन करने का अनुरोध किया है I वामन पुराण एवं नारद पुराण में जहां कहीं भी अच्छे राज्य का वर्णन आया है I वहां उसकी एक मुख्य विशेषता यह बताई गई है कि उसमें सभी लोग अपने-अपने वर्णो तथा आश्रमों के धर्म में तत्पर रहते हैं I महाभारत के शांतिपर्व में कैकय राज अपने राज्य का वर्णन करते हुए बताते हैं कि इस राज्य में सभी वर्णों एवं धर्म के लोग उनके कर्तव्यों का पालन करते हैं I धर्मज्ञ राज्य इस राज्य को माना गया है जो समाज के नियमों द्वारा निर्दिष्ट समाज व्यवस्था का पालन कराए जिन स्थानों एवं जातियों की कुछ विशेषताएं परंपराएं हो वहां के लिए विशेष नियम बनाए जा सकते हैं ७ I
३-राज्य द्वारा सुख को प्रोत्साहन-
जिस समाज में किसी वर्ग पर अत्याचार होता है या उसका शोषण किया जाता है उसको हम धर्म युक्त नहीं कह सकते I शांतिपर्व में राजा का यह प्रमुख कर्तव्य माना गया है कि समाज के जीवन का ठीक से संचालन करने के लिए प्रजा को धर्म पालन की ओर तत्पर करें तथा समाज में पाप की वृद्धि पर रोक लगाए राजा का यह कर्तव्य है कि वह राज्य के अंतर्गत सद्गुणों की वृद्धि करें जो लोग इस कार्य में बाधाँ डालें उसको राजा दंडित करें I कौटिल्य ने एक अच्छे जनपद के गुणों का निर्देश करते हुए उसे राजा से परिचालित तथा भक्ति एवं पवित्रता पूर्ण व्यक्तियों से युक्त माना है I उनके मनतानुसार राजा को दुष्टों और धर्म विरोधी व्यक्तियों का दामन तथा सज्जनों और धर्मशिलों को संरक्षण देना चाहिए एवं कमजोर की रक्षा करनी चाहिए I राज्य में जब तक शांति व्यवस्था एवं न्याय नहीं होगा तब तक कोई भी भौतिक धार्मिक या सांस्कृतिक प्रगति संभव नहीं हो सकती लोगों का जीवन असुरक्षित हो जाएगा I धर्म से लोगों का विश्वास उठ जाएगा I अतः प्रजा का पालन तथा प्रजा का रक्षण राजा का एक मुख्य कार्य बताया गया है I यह कहा गया है कि राजा को न्याय पूर्वक प्रशासन चलना चाहिए ताकि समाज में पारस्परिक संघर्षों को समाप्त करके शांति व्यवस्था स्थापित की जा सके I ८
४-न्याय पूर्वक शासन-
धर्मयुक्त राज्य में शासन न्यायपूर्वक किया जाता था I Iप्राचीन शास्त्रों की मान्यता थी कि यदि राजा न्याय प्रवृत्त है तो वह अपने लिए तथा प्रजा के लिए धर्म और काम की प्राप्ति करता है I अन्यायीराजा इन तीनों की समाप्ति कर देता है I न्याय पूर्ण राजा ही वर्षों तक धरती पर राज्य करता है अन्यायी का शीघ्र ही पतन हो जाता है ९ I
५-चरित्रवान राजा-
धर्म युक्त राज्यों में शासक चरित्रवान व्यक्ति हो जो अपने व्यवहार को मर्यादाओं में रखकर संचालित करें I राजा के कर्मचारियों को भी मर्यादा में रहने के लिए कहा गया है I प्रत्येक अधिकारी को जो कार्य सौपा गया है वह केवल उसी का पालन करें I वह अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करके जनता के अधिकारों को न छीने शुक्रनीति में चेतावनी दी गई है कि जो राजा नीति के मार्ग को छोड़कर स्वच्छंदतापूर्वक व्यवहार करता है वह दुख पाता है I राजा को सदैव ही अपने धर्म में लगे रहना चाहिए उसके कम या उससे अधिक कुछ भी नहीं करना चाहिए I क्योंकि ऐसा करने पर उसका तेज नष्ट हो जाता हैI किसी भी प्रमुख ग्रंथ में या किसी भी मुख्य आचार्य द्वारा यह बात नहीं कही गई है कि राज्य इस विशेष धर्म का पालन करें तथा अन्य धर्म का अतिक्रमण करें और उनको दबाए या अपना धर्म परिवर्तन करने के लिए मजबूर करें किसी धर्म अथवा संप्रदाय को विशेष अधिकार प्रदान करने की व्यवस्था नहीं की गई है I वस्तुतः कर्मकांड की अपेक्षा मानवीय धर्म पर अधिक जोर दिया गया था ऐसे धर्म की स्थापना को लक्ष्य बनाया गया था I जिसका पालन सभी के द्वारा सामान्य रूप से किया जाना चाहिए I कौटिल्य के अनुसार प्रत्येक वर्ण और प्रत्येक आश्रम का धर्म है कि वह किसी भी प्रकार की हिंसा न करेंI सत्य बोले पवित्र बना रहे किसी से ईर्ष्या न करें दयावान और क्षमाशील बना रहे I धर्म का यह स्वरूप कोई सांप्रदायिक तत्व नहीं रखता था और इसी अर्थ में यह कहा जाता है कि प्राचीन भारतीय राज्य धर्म युक्त तो था किंतु धार्मिक नहीं १० I
निष्कर्ष-
संपूर्ण प्रजा का हित ही प्रशासन का उद्देश्य था ११ I शुक्र नीति राजा को संपूर्ण जनता के साथ एकाकार करने का प्रयास करती है I उसका कथन है कि जिन उत्सवों को प्रजा मानती है राज्य द्वारा भी उसका पालन किया जाए राजा को प्रजा के आनंद में संतुष्ट होना चाहिए तथा उसी के दुख में दुख मानना चाहिए I इसमें राजा के धर्मनिरपेक्ष राज्य की भावना निहित है I इसके अनुसार प्रत्येक संप्रदाय के अनुयायियों द्वारा बनाए जाने वाले प्रत्येक उत्सव को मान्यता देगा तथा उसकी वंचित सहायता प्रदान करेगा I ऐसी स्थिति में यह दोषारोपण गलत है एवं अन्याय पूर्ण होगा कि प्राचीन भारतीय राज धार्मिक राज्य था I भारतीय आचार्य ने कहीं यह आग्रह नहीं किया है कि राज्य द्वारा किस संप्रदाय विशेष को अधिक प्रमुखता प्रदान की जाए तथा उसी को विशेष सहायता दी जाए I उनकी उदारता तो यहां तक है कि वे सभी पाखंडी समुदायों अर्थात विरोधी संप्रदायों को भी मान्यता प्रदान करने के लिए राजा से आग्रह करते हैं I राजा से वर्णाश्रम धर्म की रक्षा करने की बात कही गई है तो इसके पीछे भी कोई सांप्रदायिक भावना नहीं थी वरन इसका कारण केवल यही था कि यह व्यवस्था मनुष्य के जीवन के लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति के लिए उपयुक्त मानी गई थी तथा भारतीय समाज इसे स्वीकार करता था I यहां भी राजा को उदारता बरतने की बात कही गई थी यह कहा गया था I यदि किसी देश कुल जाति परंपराएं इस व्यवस्था से भिन्न हों तो इसको लागू न करके वहां के स्थानीय परंपरा एवं रीति रिवाज को ही लागू किया जाए इस व्यवस्था में कहीं भी सांप्रदायिकता की गंध नहीं आती I आचार्य का कहना है कि राजा विजित देश की प्रथा को अवश्य मान्यता प्रदान करें I वहां वह अपने विश्वासों एवं रीति रिवाज को जबरदस्ती लागू न करें I
संदर्भ ग्रंथ
१-शुक्र नीति 4.1 25
२-शांति पर्व 87.30
३ - कामंदक नीतिसार
४-महाभारत शांतिपर्व
५- जे एच गांगुली फिलोसोफी ऑफ धर्म वॉल्यूम सेकंड पेज 15
६-डॉ के पी जायसवाल हिंदू राज्य तंत्र दूसरा खंड पृष्ठ 305
७-प्रोफेसर अलतेकर प्राचीन भारतीय शासन पद्धति पृष्ठ 45
८-उपरोक्त
९-वही पृष्ठ 48
१०- एन जे शिंदे द रिलिजन एंड फिलासफी ऑफ वेद पृष्ठ 75
११-डॉ सुरेंद्र नाथ मित्तल वही पृष्ठ 261
Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.
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