अर्थशास्त्र में मंत्री एवं मंत्रिपरिषद

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              भूमिका-कौटिल्य ने राज्य कार्यों के सफल संचालन के लिए मंत्रियों की आवश्यकता एवं महत्व को स्वीकारा है I उनका मत है कि राज्य की उन्नति के लिए जरूरी है कि राजा मंत्रियों से परामर्श करके ही कोई कार्य प्रारंभ करें १ I

           सदस्य संख्या-कौटिल्य ने अन्य आचार्यों की तरह मंत्रिपरिषद के सदस्यों की कोई एक निश्चित संख्या नहीं बताइ I अपितु उनके मत है कि राजा को अपने आवश्यकता के अनुसार ही मंत्रियों की संख्या चयन करनी चाहिए, किंतु कम से कम पांच मंत्री जरूर नियुक्त करने चाहिए २ I इनके साथ ही उनके निर्देश है कि राजा को तीन अथवा चार मंत्रियों से ही गुप्त मंत्रणा करनी चाहिए ३ I

      मंत्रियों की सदस्य संख्या से संबंधित विवरण से अनुमान लगाया जाता है कि कौटिल्य ने मंत्रियों से संबंधित दो प्रकार की परिषदों को स्वीकारा है I मंत्रिपरिषद तथा  मंत्र परिषद I वस्तुत मंत्रिपरिषद एक बड़ी संस्था है जिसके सदस्य सभी मंत्री होते हैं I इसकी तुलना में मंत्र परिषद एक छोटी संस्था है जिसके सदस्य वे तीन या चार मंत्री होते हैं जिससे राजा गुप्त मंत्रणा करता है I मंत्रिपरिषद की एक अंतरंग समिति के रूप में मंत्र परिषद अधिक पड़ती है किंतु यह मंत्रिपरिषद की तुलना में अधिक शक्तिशाली संस्था है I

         पदोन्नति-मंत्री पद पर अमात्यों को पदोन्नति करके नियुक्त किया जाता है I कौटिल्य के अनुसार केवल उन्हीं अमात्यों को मंत्री पद पर नियुक्त किया जाना चाहिए जो धर्म अर्थ काम एवं भय से संबंधित चारों उपधाओं में शुद्ध प्रमाणित हो अर्थात जो सर्वोपधा शुद्ध हो ४ I

        कौटिल्य ने मंत्रियों के साथ ही मंत्री अमात्य महामात्र पद का भी उल्लेख किया है  I जिसे आधुनिक भाषा में प्रधानमंत्री के समान माना जा सकता है I कौटिल्य के अनुसार प्रधानमंत्री पद पर ऐसे पुरुष को नियुक्त किया जाना चाहिए जो अमात्य सम्मत गुणों से युक्त हो अर्थात उसे अन्य मंत्रियों की तरह सर्वोपधा शुद्ध तो होना ही चाहिए I उनमें अन्य विशिष्ट गुण भी होने चाहिए ५ I कौटिल्य का मत है कि इन समस्त गुणों का मंत्रियों में पाया जाना हितकारी होता है I इस आधार पर कौटिल्य ने तीन प्रकार के मंत्री बताए हैं I उनके अनुसार समस्त गुणों से संपन्न मंत्री उत्तम होता है  I जिसमें मात्र तीन चौथाई गुण हो वह मध्यम होता है I तथा यह गुण आदि मात्रा में होने पर वह शुद्ध श्रेणी में मंत्री होता है  I

       कार्यकाल-प्रधानमंत्री एवं अन्य मंत्रियों के कार्यकाल के बारे में कौटिल्य ने कोई मत प्रकट नहीं किया है I वस्तुतः उनका कार्यकाल राजा की कृपा पर निर्भर करता है I किंतु यह निश्चित है कि इस बारे में राजा सदैव मनमानी करने में समर्थ नहीं होता क्योंकि मंत्री पर्याप्त बुद्धिमान एवं प्रभावशाली वर्ग से होते हैं I

       वेतन-कौटिल्य के अनुसार प्रधानमंत्री को 48000 पण तथा अन्य मंत्रियों को 12000 पण वेतन दिया जाना चाहिए I अधिकांश विद्वानों का मत है कि कौटिल्य ने वेतन की वार्षिक राशि बताई है I

मंत्रिपरिषद के कार्य-१-मंत्रियों को राज्य के आंतरिक व वाह्य विषयों पर विचार करना चाहिए अर्थात राजा को परामर्श देना चाहिए I

२-जिन विषयों के बारे में निर्णय लिया जा चुका है उन्हें कार्य रूप में लागू किया जाना चाहिए I

३-जिन कार्यों की शुरुआत हो चुकी है, उन्हें पूर्ण करने के प्रयत्न किए जाने चाहिए I

४-जो कार्य पूर्ण हो चुके हैं उनकी समीक्षा की जानी चाहिए I यदि जरूरी हो तो और अच्छे परिणाम की प्राप्ति के लिए उसमें संशोधन किया जाना चाहिए I

५-राजा द्वारा दिए गए निर्णय एवं आदेशों का पालन किया जाना चाहिए ६ I

       कौटिल्य का मत है कि मंत्रियों को उपरोक्त कार्य पूर्ण भक्ति निष्ठा एवं समर्पण के साथ करने चाहिए I अर्थशास्त्र में विभिन्न स्थलों पर मंत्रियों के अन्य कार्यों का भी उल्लेख किया है I उन्हें राजा और राज्य के समस्त गुप्त वेदों की रक्षा करनी चाहिए और सदैव ऐसे प्रयत्न करने चाहिए कि राजा राज्य कर्तव्य से विमुख नहीं हो I कौटिल्य का मत है कि राजा हित की रक्षा एवं वृद्धि के लिए मंत्रियों को निर्भय होकर राय देनी चाहिए किंतु उन्हें ऐसी राय भी कभी देनी चाहिए जब राजा अप्रसन्न हो और उनके प्रति अनुरक्त हो I अन्यथा उन्हें धैर्य पूर्वक ऐसे उचित समय का इंतजार करना चाहिए I कौटिल्य ने मंत्रियों का एक प्रमुख कार्य उत्तराधिकार की समस्या के संबंध में बताया है I यदि राजा मरने वाला हो अथवा मर जाए तो इसे गुप्त रखते हुए मंत्रियों को चाहिए कि वह युवराज का तुरंत गद्दी पर इस प्रकार बिठा दें कि अन्य राज्य पुत्रों को गद्दी के लिए संघर्ष करने का मौका ही प्राप्त नहीं हो I

       मंत्रणा की प्रणाली एवं गोपनीयता-इस संबंध में प्रमुख बातें निम्नलिखित है-

१-राजा को गंभीर विषयों पर सभी मंत्रियों से मंत्रणा नहीं करनी चाहिए I अपितु मात्र तीन या चार मंत्रियों से ही मंत्रणा करनी चाहिए ७ I इससे विचाराधीन  विषय के सभी पक्षों पर चर्चा संभव होती है और मंत्रणा की गोपनीयता भी बनी रहती है I यदि मंत्रणा मात्र एक मंत्री से ही की जाएगी तो संभव है विचाराधीन विषय के कुछ पहलुओं पर ध्यान ही नहीं जाए अथवा अकेला मंत्री स्वास्थ्य पूर्ण राय दे ८ I यदि दो मंत्रियों से मंत्रणा की जाए तो संभव है कि वे परस्पर मिलकर राजा को अपने अधीन कर लें I अथवा वे राय देने में एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी भी बन सकते हैं I इन दोनों में ही विचार विमर्श निष्फल हो जाएगा ९ I संक्षेप में यदि तीन या चार से अधिक मंत्रियों से मंत्रणा की जाएगी तो किसी निर्णय पर पहुंचने पर देर नहीं लग सकती है और मंत्र की गोपनीयता भी समाप्त हो सकती है I

२-मंत्रणा का स्थान चारों ओर से इतना घिरा हुआ या सुरक्षित होना चाहिए की मंत्रणा को कोई सुन ना सके मंत्रणा के स्थान पर पशु पक्षी आदि भी नहीं होने चाहिए I मंत्रणा के स्थान पर राजा की आज्ञा के बिना किसी को आने का अधिकार भी नहीं होना चाहिए १० I

३-राजा और मंत्रणा में भाग लेने वाले मंत्रियों को मंत्रणा के बाद अपने आचरण एवं भाव भंगिमा को इतना संयत और मर्यादित रखना चाहिए कि इसकी मदद से कोई यह अंदाजा नहीं लगा सके कि निर्णय क्या लिया गया है ११ I

४-किसी विचाराधीन विषय पर बहुत लंबे समय तक विचार विमर्श नहीं किया जाना चाहिए और जो भी निर्णय हो उसे शीघ्र ही लागू कर देना चाहिए I

५-राजा को उन व्यक्तियों का उच्छेद कर देना चाहिए जो मंत्रणा की गोपनीयता को भंग करते हो  I अर्थात ऐसे व्यक्तियों को देश निकला या वध दंड दिया जाना चाहिए १२ I

  मंत्रिपरिषद की कार्यपद्धति-कौटिल्य के अनुसार कार्य की गुरुता व महत्व को देखते हुए राजा को संपूर्ण मंत्रिपरिषद की बैठक का आयोजन करना चाहिए I जिससे मंत्रिपरिषद के सदस्य भी भाग ले सकें १३ I उपस्थित मंत्रियों से विचार विमर्श किया जाना चाहिए और अनुपस्थित मंत्रियों की राय पत्र व्यवहार द्वारा प्राप्त की जानी चाहिए १४ I यह जरूरी नहीं है कि राजा किसी मौजूद और वास्तविक समस्या पर ही प्रत्यक्ष रूप से मंत्रियों की राय जाने अपितु वह उस जैसी किसी अन्य समस्या पर युक्ति पूर्वक मंत्रियों के भावों को जान सकता है १५ I

     निष्कर्ष-कौटिल्य का मत है कि किसी विषय पर बहुत अधिक समय तक विचार विमर्श नहीं किया जाना चाहिए I इसके अलावा जो भी निर्णय लिया जाए उसे तत्काल लागू किया जाना उचित होता है १६ I  मंत्रिपरिषद में निर्णय किस प्रकार किया जाए इस बारे में कौटिल्य का मत है कि विचार विमर्श के बाद राजा उस निर्णय को स्वीकारे जो बहुमत द्वारा समर्थित हो अथवा जो कार्य सिद्धि की दृष्टि से मंत्रियों के परामर्श के अनुरूप हो १७ I यहां कौटिल्य ने निर्णय लेने में राजा को मनमानी करने का अधिकार नहीं दिया है I अपितु उन्होंने राजा को कार्य सिद्धि के लिए अपने विवेक के आधार पर मंत्रियों के बहुमत की राय की जगह उनके अल्पमत को स्वीकारने का अधिकार दिया है I उन्होंने प्राथमिकता मंत्रियों के बहुमत या अल्पमत को नहीं अपितु कार्य सिद्धि को दी है I


                                                       संदर्भग्रंथ-

१-कौटिल्य ने राज्य को गाड़ी की उपमा देते हुए राजा एवं अमात्य को एक गाड़ी के दो पहिए बताया है I

२-अर्थशास्त्र- 1.11

३-अर्थशास्त्र- 1.15.37

४-अर्थशास्त्र -1.10.24

५-अर्थशास्त्र का ज्ञाता ,स्वदेश में जन्म ,बुद्धिमान ,जड़ता और सफलता रहित, धैर्यवान ,वाकपटुप्रतिकार, व प्रतिवाद करने में समर्थ ,द्धेष ,वृत्ति ,रहित शिल्प ,व युद्ध विद्या में निपुण ,सौम्य आकृति वाला, स्वस्थ ,श्रेष्ठ ,स्मरण शक्ति वाला आदि I

६-अर्थशास्त्र -1.15.57-58

७-अर्थशास्त्र- 1.15.37

८-अर्थशास्त्र -1.15.38-39

९-अर्थशास्त्र- 1.15.40-41

१०-अर्थशास्त्र -1.15.3-5

११-अर्थशास्त्र- 1.15.8 -10

१२-अर्थशास्त्र -1.15.6

१३-अर्थशास्त्र -1.15.63

१४-अर्थशास्त्र -1.15/59

१५-अर्थशास्त्र -1.1 5.49

१६-अर्थशास्त्र 1.15.50-51

१७-अर्थशास्त्र 1.15.64

Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.

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