अर्थशास्त्र में राज्य के कार्य
विशेषता-अर्थशास्त्र में उपलब्ध राज्य के कार्य संबंधी विवरण की प्रमुख विशेषताएं निम्न है-
१-कार्यों की दृष्टि से राज्य के संपूर्ण उद्देश्यों को चार भागों में बांटा जा सकता है -अप्राप्त की प्राप्ति ,प्राप्त हुए की रक्षा ,रक्षित की वृद्धि ,वृद्धि हुए का पात्रानुसार वितरण I
२-अर्थशास्त्र में राज्य के समस्त कार्यों का उल्लेख राजा एवं उनके अधिकारियों के कार्यों के रूप में किया गया है Iराज्य के नाम से नहीं I
३-कौटिल्य ने राज्य के कार्य क्षेत्र को अत्यंत विस्तृत स्वीकार है I राज्य सामाजिक , धार्मिक, नैतिक, आर्थिक ,आदि सभी क्षेत्रों में कार्य करता है I
४-अर्थशास्त्र में वर्णित राज्य के कार्यों से प्रकट होता है कि कौटिल्य ने राज तांत्रिक राज व्यवस्था के प्रसंग में प्रजा हितकारी या प्रजा कल्याणकारी राजा की अवधारणा को स्वीकारा है I अर्थशास्त्र के अनुसार राज्य के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं -
१-शांति व्यवस्था बनाए रखना-राज्य का एक प्रमुख कार्य है आंतरिक क्षेत्र में शांति व व्यवस्था की स्थापना करना व रक्षा करना I राज्य सामान्य कष्टों एवं अपराधियों को दंडित करता है I ताकि समाज में किसी प्रकार के हिसा असंतोष व अराजकता नहीं फैले I इस दृष्टि से कौटिल्य द्वारा वर्णित गुप्तचर प्रशासन का विशेष महत्व है I गुप्तचरों का कार्य है प्रजा में छिपे हुए गुप्त अपराधियों व राजद्रोहियों के साथ ही प्रजा पीड़ित भ्रष्ट रजवृत्तियों का पता लगाना और उन्हें दंडित करना १ I
२-समाज व्यवस्था की रक्षा-कौटिल्य की राजव्यवस्था में राज्य समाज का संरक्षक है और उसका एक अति प्रमुख कार्य है वेद स्मृति सदाचार द्वारा स्वीकृत समाज के परंपरागत संगठन एवं उनके नैतिक मूल्यों की रक्षा करना I कौटिल्य के अनुसार राज्य को वन एवं आश्रम के धर्मो को प्रजाजन में लागू करना चाहिए २ I राज्य को ऐसा प्रबंध करना चाहिए की विभिन्न वर्णों एवं आश्रमों में परस्पर द्धेष अथवा विरोध उत्पन्न नहीं हो अपितु उनके बीच सहिष्णुता एवं सहयोग बना रहे I कौटिल्य ने सामाजिक विघटन से राज्य की रक्षा के लिए परिवार की संस्था पर भी विचार किया है I राज्य के परिवार संबंधी कार्य तत्कालीन समाज व्यवस्था की व्यवस्था में सहायक है I उन्होंने विवाह स्त्री पुरुष के आपसी कर्तव्य परिवार में संपत्ति के विभाजन आदि से संबंधित राज्य के कार्य क्षेत्र को स्पष्ट किया है ३ I
३-राज्य के सप्तांग सिद्धांत की रक्षा-कौटिल्य ने प्राचीन भारतीय परंपरानुसार ही राज्य को सात अंगों वाले एक सावयव के समान माना है I राज्य रूपी शरीर की रक्षा तथा वृद्धि के लिए जरूरी है कि सभी अंगों का संतुलित विकास हो और उनमें आवश्यक सहयोग व सामंजस्य भी बना रहे I इस स्थिति में ही राज्य को समृद्धि प्राप्त हो सकती है और वह इतना शक्तिशाली बन सकता है कि आंतरिक एवं बाह्य आपदाओं का मुकाबला कर सके I कौटिल्य का मत है कि राज्य के किसी एक प्रकृति के अत्यधिक बलशाली अथवा शक्तिहीन हो जाने पर शेष प्रकृतियों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है I अर्थशास्त्र में अन्य 6 प्रकृतियों की तुलना में राजा नामक प्रकृति की जो प्रधानता एवं सर्वोच्चता स्वीकारी गई है उसका विशेष महत्व है ४ I
४-राज्य की वाह्य आक्रमण से रक्षा-राज्य का एक प्रमुख कार्य वाह्य आक्रमण से अपनी अखंडता व स्वतंत्रता की तथा प्रजाजन के प्राणों व संपत्ति की रक्षा करना I वाह्य आक्रमण से अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए विभिन्न प्रकार के शास्त्रार्थों एवं युद्ध सामग्री का संग्रह किया जाता हैI कौटिल्य का मत है कि अपनी सुरक्षा की समुचित व्यवस्था के बाद राज्य को अपने बिस्तार पर भी ध्यान देना चाहिए I अर्थशास्त्र की रचना ऐसे बिजिगीषु राजा के लिए की गई है I जिसका राजनीतिक उद्देश्य एक विशाल साम्राज्य की स्थापना एवं रक्षा बताया है I अतः राज्य को अपनी शक्ति की वृद्धि तथा सीमा के विस्तार के लिए सदैव क्रियाशील रहना चाहिए ५ I
५-राज्य के न्याय संबंधी कार्य-राज्य प्रकट अथवा अप्रकट अपराधियों से प्रजनन की रक्षा के लिए न्याय की व्यवस्था करता है I अपने न्यायिक कार्य के द्वारा राज्य समाज में मत्स्य न्याय का अंत करता है तथा दुष्ट प्रकृति के सबल व्यक्तियों से निर्बल व पीड़ित व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करता है I कौटिल्य ने धर्मस्थल तथा कंटक शोधन नामक दो प्रकार के न्यायालयों का उल्लेख किया है और इसके संगठन क्षेत्राधिकार एवं न्यायिक प्रक्रिया को भली भांति प्रकाशित किया है I कौटिल्य ने न्यायिक प्रशासन के प्रसंग में राजा को अपराधियों के विरुद्ध दंड का विवेक संवत प्रयोग करने का स्पष्ट निर्देश दिया है I किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित करने से पूर्व उसके विरुद्ध पर्याप्त प्रमाण होने चाहिए और किसी भी अपराधी के लिए दंड का निर्धारण उसकी प्रवृत्ति एवं अपराध की श्रेणी व मात्रा आदि के अनुपात में किया जाना चाहिए I उससे कम अथवा अधिक नहीं ६ I
६-राज्य के आर्थिक कार्य-राज्य के आर्थिक कार्य निम्नलिखित है-
१-राज्य की समस्त आर्थिक गतिविधियों का आधार एवं केंद्र राजकोष है I राज्य की सैन्य शक्ति रक्षा एवं वृद्धि कोष पर निर्भर होती है I कोष की मदद से ही एकाएक आई विभिन्न आपदाओं का मुकाबला किया जा सकता है और प्रजा कल्याण के कार्य भी किया जा सकते हैं I अतः कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में राज्य का एक प्रमुख कार्य कोष की निरंतर समृद्धि एवं रक्षा बताया है I इस दृष्टि से सान्निधाता, समाहर्ता, एवं अक्षपटलाध्यक्ष नामक तीनों अधिकारियों के कार्यों एवं दायित्वों का अत्यधिक महत्व है ७ I
२-अर्थशास्त्र में कृषि को राज्य की समृद्धि एवं शक्ति का प्रमुख आधार माना है I अतः कौटिल्य ने कृषि एवं किसानों के हितों की वृद्धि के लिए राज्य के अनेक कार्य सौंपें हैं I कृषि उत्पादन में किसी भी प्रकार की बाधा को कौटिल्य ने उचित नहीं माना है I अर्थशास्त्र के अनुसार फसल के दिनों में ऋण नहीं चुकाने के अपराध में किसानों को गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए और उसे अनिवार्य सैनिक सेवा से भी मुक्त रखा जाना चाहिए I राज्य के कृषि विभाग का प्रधान अधिकारी सीताध्यक्ष होता है जिसकी देखरेख में संपूर्ण राज्य में कृषि के उत्थान के कार्य किए जाते हैंI ८ वह अध बटाई ९ के आधार पर किसानों को राजकीय भूमि पर कृषि कार्य करने का अधिकार देता है I इस प्रकार राज्य एवं कृषि कार्य करता है सीताध्यक्ष स्वयं कृषि संबंधित कार्यों का ध्यान रखना है और यह तय करने में समर्थ है कि कब कौन सा तथा कितनी मात्रा में बीज बोया जाए १० I
३-अर्थशास्त्र मूलतः कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था तथा सामंती युग का ग्रंथ है I जिसमें कृषि कार्य एवं सैन्य कार्य हेतु पशुधन का विशेष महत्व स्वीकारा गया हैI अर्थशास्त्र के अनुसार कृषि एवं ग्रामीण जीवन से संबंधित पशुओं की रक्षा एवं वृद्धि की देखरेख गोध्यक्ष करता है और इन पशुओं के लिए चारागाह का प्रबंध विविताध्यक्ष करता है I सैन्य कार्यों के लिए उपयोगी अश्व एवं हाथियों की देखरेख की जिम्मेदारी क्रमशः अश्वाध्यक्ष एवं हस्त्याध्यक्ष को सौंप गई है ११ I
४-व्यापार के कुशल संचालन के लिए राज्य स्थल व जलमार्गों का निर्माण करता है और इसकी रक्षा करता है I राज्य प्रजा के धातु एवं शुल्क लेकर सिक्के बनाने के लिए टकसाल चलता है I राज्य के व्यापार संबंधी कार्यों की दृष्टि से पौतवाध्यक एवं पण्याध्यक्ष नामक अधिकारियों का विशेष महत्व है I पौतवाध्यक्ष बाजार में नापतोल की व्यवस्था पर निगरानी रखने का कार्य करता है १२ I पण्डाध्यक्ष राज्य में वस्तुओं की पूर्ति उनके मूल्य निर्धारण तथा क्रय विक्रय की व्यवस्था का नियंत्रण करता है १३ I वह इस बात का भी निर्धारण करता है कि किन वस्तुओं का निर्यात एवं आयात किया जाना चाहिए १४ I कौटिल्य का निर्देश है कि राजा को ऐसे व्यापार का परित्याग कर देना चाहिए जिससे राजा को तो मोटा लाभ प्राप्त हो किंतु प्रजाजन के कष्टों में वृद्धि होती हो I
७-राज्य के प्रजा कल्याणकारी कार्य-राज्य के उपरोक्त कार्यो में से अनेक कार्य अप्रत्यक्ष रूप से प्रजा कल्याण के कार्य हैं किंतु उनके अतिरिक्त कौटिल्य ने अन्य अनेक ऐसे कार्यों का उल्लेख किया है I जो प्रत्यक्ष रूप से सामान्य प्रजाजन के सामाजिक आर्थिक व नैतिक कल्याण के कार्य कहे जा सकते हैं I राज्य द्वारा किए जाने वाले कुछ कार्य निम्नलिखित हैं-
८-स्वास्थ्य संबंधी कार्य- अग्नि व बाढ़ से रक्षा दुर्भिक्ष से प्रजाजन की रक्षा शिक्षा व नैतिकता संबंधी कार्य हानिकारक जंतुओं से कृषि की रक्षा हिंसक पशुओं से रक्षा प्रजा के धर्म एवं संस्कृति की रक्षा असहयों की रक्षा तथा निर्धनों की मदद संबंधी कार्य I
निष्कर्ष-अर्थशास्त्र में वर्णित राज्य के उपरोक्त कार्य क्षेत्र से यह स्पष्ट है कि कौटिल्य का राज्य केवल शांति व्यवस्था बाह्य आक्रमण से रक्षा न्याय आदि से संबंधित अनिवार्य कार्यों को ही नहीं करता है I अपितु या प्रजा के सामाजिक आध्यात्मिक नैतिक व आर्थिक उत्थान के भी अनेक कार्य करता है I यह प्रजा के लिए विस्तृत सामाजिक सेवाओं की व्यवस्था करता है और इस रूप में इसे तत्कालीन योग्यता प्रचारितकारी राज्य कहा जा सकता है I
संदर्भ ग्रंथ
१-कौटिल्य ने गुप्तचर का एक अन्य कार्य बताया है I राजा के आचरण नीतियों एवं कार्यों के बारे में प्रजा के मत अर्थात प्रजा के संतोष या असंतोष की जानकारी प्राप्त करना और राजा को सूचित करना I
२-इन धर्म का पालन करने वालों या इनके विपरीत आचरण करने वालों को राज्य द्वारा दंडित किया जाना चाहिए I
३-कौटिल्य ने ऐसे व्यक्तियों को दंडनीय माना है I जो समर्थ होकर भी अपने आश्रित परिवारजनों का भरण पोषण नहीं करते I
४-राज्य की सर्वोच्च प्रकृति के रूप में राजा का यह प्रमुख कार्य है कि वह राज्य की अन्य 6 प्रकृतियों में उचित तालमेल स्थापित करें और उन पर आने वाले विपदाओं के अंत का प्रयत्न करें I
५-कौटिल्य ने अपने युग के अनुभव के आधार पर राज्य की सैनिक नीति एवं युद्ध नीति पर अत्यधिक बल दिया है I
६-अर्थशास्त्र में उपलब्ध राज्य के न्याय संबंधी कार्यों को सुधारात्मक न्याय भी कहा जाता है I
७-सान्निधाता कोषागार एवं अन्य विभिन्न भंडार गृहों में जमा होने वाली आय का निरीक्षण करता है और विवरण रखता है I
८-अर्थशास्त्र- 2.24
९-अर्थशास्त्र -2.24-20
१०-अर्थशास्त्र -2.24.6 -19
११-कौटिल्य के अनुसार राज्य को पशुधन की बीमारियों से रक्षा करने के लिए उनके चिकित्सा का प्रबंध करना चाहिए I
१२-अर्थशास्त्र- 2.1 9-1.52
१३-अर्थशास्त्र -2.16
१४-अर्थशास्त्र- 2.16- 5.6- 15 .28
Authored by . Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.
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