कौटिल्य के पर राष्ट्र संबंध का नीतिगत एवं सैद्धांतिक पक्ष

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भूमिका

इस संबंध में बी डी केला ने कहा है कि कौटिल्य राज्य के लिए आंतरिक प्रभुता को ही आवश्यक नहीं समझता वह विजय और राज्य विस्तार को भी राज्य का एक प्रधान कार्य मानता है I अर्थशास्त्र के 15 में से कम से कम 9 अधिकरण प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से विजय ,संग्राम ,संधि ,आदि विषयों से संबंधित है I आचार्य ने विदेश नीति का पर्याप्त विवेचन किया है  I अर्थशास्त्र में उपलब्ध पर राष्ट्र संबंधों के समस्त विवरण के पक्षों में नीतिगत और सैद्धांतिक पक्ष आते हैं I इनका अध्ययन निम्न रूप में किया जा सकता है -राज्य मंडल सिद्धांत, षडगुण नीति, नीति के चार उपाय I

राज्य -मंडल सिद्धांत

राज्य मंडल का सरल अर्थ है, राज्यों का वृत्त घेरा या समूह I कौटिल्य ने एक राज्य मंडल में कुल 12 राज्यों की कल्पना की है I इस राज्य मंडल के केंद्र में बिजिगीषु राजा होता है I विजिगीषु राजा जिस  दिशा के पड़ोसी राज्य को जितना चाहता है उसे कौटिल्य ने बिजिगीषु के आगे के राज्य कहा है I और उसके एकदम उलटी दिशा को कौटिल्य ने बिजिगीषु के पीछे के राज्य कहा हैI कौटिल्य के अनुसार बि जिगीषु राजा की विजय यात्रा में आगे क्रमशः अरि मित्र अरि मित्र मित्र अरि मित्र मित्र नामक ये पांच राजा होते हैं I और विजिगीषु राजा के पीछे क्रमशः पाष्णिग्राह, आक्रांन्द, पार्ष्णिग्राहासार ,और आक्रन्दासार, नामक चार राजा होते हैं I इसके अलावा बि जिगीषु राजा के बगल की दिशा में मध्यम तथा उदासीन राज्य होते हैंI  इस प्रकार विजिगीषु सहित एक राज्य मंडल में कुल 12 राज्य होते हैं जो निम्न है -

१- बिजिगीषु

जो राजा अपने राज्य के विस्तार करने की कामना एवं प्रयत्न करता है उसे बि जिगीषु राजा और उसके राज्य को बिजिगीषु राज्य कहा जाता है I उसे केंद्र मानकर ही राज्य मंडल के अन्य राज्यों की स्थिति को समझा जाता है I

२- अरि-अरि राज्य

अर्थात शत्रु का राज्य जिस दिशा की ओर विजिगीषु राजा अपने राज्य का विस्तार चाहता है उस दिशा का पड़ोसी राज्य विजिगीषु  राजा  की दृष्टि से अरि राज्य होता है I

३-मित्र

अरि राज्य से आगे का राज्य बिजिगीषु राज्य का मित्र राज्य होता है I यह अरि राज्य के खिलाफ विजिगीषु राज्य का साथ देने के लिए तत्पर रहता है I

४-अरिमित्र

यह मित्र राज्य के आगे का राज्य है और यह अरि राज्य का मित्र होता है I अतः इसे अरी मित्र राज्य कहा जाता हैI यह बीजिगीषु एवं मित्र राज्य के विरुद्ध अरि राज्य का साथ देने के लिए तैयार रहता है I

५-मित्र

मित्र-यह अरि मित्र के आगे का राज्य है I यह मित्र राज्य का मित्र होता है   I अतः बिजिगीषु की दृष्टि में कौटिल्य ने इसे मित्र मित्र राज्य कहा है I युद्ध होने पर यह मित्र मित्र राज्य अरि राज्य एवं अरि मित्र के खिलाफ विजिगीषु राज्य का साथ देता है I

६-अरि- मित्र -मित्र

यह मित्र मित्र राज्य से भी आगे का राज्य है I यह अरि मित्र का मित्र होता है I अतः इसे बि जिगीषु राज्य की दृष्टि से अरी मित्र मित्र राज्य कहा जाता है I युद्ध की स्थिति में यह बिजिगीषु राज्य के विरुद्ध अरि राज्य का साथ देता हैI  

७- पार्ष्णिग्राह राज्य

बिजिगीषु राज्य से लगा हुआ पीछे की दिशा वाला पड़ोसी राज्य भी विजिगीषु राज्य का शत्रु राज्य होता है I और उसे ही कौटिल्य ने परिग्रह राज्य कहा हैI  यह संभव है कि जब बिजिगीषु राजा अपने राज्य का विस्तार के लिए अरी राज्य पर आक्रमण करें तो यह पाणिग्रह राज्य विजिगीषु राज्य पर ही आक्रमण कर दे I इस दृष्टि से अरी राज्य व परिग्रह राज्य दोनों परस्पर मित्र होते हैं और विजिगीषु के शत्रु होते हैं I

८-आक्रन्द

पार्ष्णिग्राह राज्य के पीछे की ओर स्थित उसके पड़ोसी राज्य को आक्रांद राज्य कहा जाता है I यह राज्य पार्ष्णिग्राह राज्य का शत्रु और बिजिगीषु राज्य का मित्र होता हैI

९- पार्ष्णिग्राहसार

आक्रांत राज्य के पीछे की ओर स्थित उसके पड़ोसी राज्य को पार्ष्णिग्राह राज्य कहा जाता है I यह राज्य पार्ष्णिग्राह राज्य का मित्र और बिजिगीषु राज्य का शत्रु होता हैI

१०-आक्रन्दासार

पार्ष्णिग्राह सार राज्य के पीछे की ओर स्थित उसका पड़ोसी राज्य आक्रन्दराज्य कहा जाता है I यह राज्य आ क्रन्दराज्य और विजिगीषु राज्य का मित्र होता है I अर्थात यह राज्य पार्ष्णिग्राह राज्य एवं पार्ष्णिग्राह सार राज्य का शत्रु होता है I

११-मध्यम

भौगोलिक दृष्टि से मध्य राज विजिगीषु राज्य के बगल में कहीं स्थित राज्य है I अपनी शक्ति की श्रेष्ठता के कारण मध्य राज्य बिजिगीषु राज्य तथा अरी राज्य दोनों की सहायता करने में समर्थ होता है और आवश्यकता पड़ने पर इन दोनों का अलग-अलग मुकाबला भी कर सकता है I

१२-उदासीन

इस राज्य में प्रमुख लक्षण अग्र लिखित है भौगोलिक दृष्टि से यह राज्य विजिगीषु हरी एवं मध्यम इन तीनों राज्यों से दूर स्थित होता है I अर्थात मध्य राज्य की सीमाएं इन तीनों राज्यों से लगी हुई नहीं होती I सामान्यत यह राज्य बिजिगीषु राज्य अरि राज्य तथा मध्यम राज्य की आपसी राजनीति के प्रति निष्क्रिय एवं उदासीन होता है I बिजिगीषु राज्य अरि राज्य तथा मध्यम राज्य की तुलना में उदासीन राज्य पर्याप्त शक्तिशाली होता है I जब इन तीनों राज्यों में परस्पर प्रतिकूल संबंध होते हैं तो उदासीन राज्य इनमें से प्रत्येक का मुकाबला करने में समर्थ होता है I

        किसी भी राज्य मंडल के मुख्य अथवा आधारभूत राज्य चार ही होते हैं I बिजिगीषु, अरि राज्य, मध्य राज्य, तथा उदासीन राज्य I अतः कौटिल्य ने संपूर्ण राज्य मंडल का निर्माण अग्र लिखित चार उप मंडलों के सहयोग से स्वीकारा है I बिजिगीषु राज्य मंडल १ अरि राज्य मंडल २ मध्यम राज्य मंडल ३ उदासीन राज्य मंडल ४ I

        चारों मंडलों में कुल मिलाकर 12 राज्य ही होते हैं I कौटिल्य का मत है कि प्रत्येक राज्य में कुल 6 प्रकृति होती है I एक मुख्य प्रकृति तथा पंच द्रव्य प्रकृति यहां मुख्य या राज्य प्रकृति का अर्थ है उस राज्य का राजा तथा द्रव्य प्रकृति में अग्रलिखित प्राकृतिक सम्मिलित हैं - अमात्य ,जनपद ,दुर्ग, कोष ,तथा दंड क्योंकि एक राज्य में 6 प्रकृति होती है I अतः 12 राज्य के संपूर्ण राज्य मंडल में कुल 72 प्रकृति 12 * 6 पाई जाती है I

राज्य मंडल सिद्धांत की विशेषताएं

१-यह सिद्धांत भूगोल एवं राजनीति की आपसी घनिष्ठ की धारणा पर आधारित है I

२-राज्य मंडल सिद्धांत में कौटिल्य ने 12 राज्यों की कल्पना की है जिसकी क्रिया प्रतिक्रिया से पर राष्ट्र संबंधों का संचालन होता है I

३-कौटिल्य ने प्रत्येक राज्य में एक राज्य प्रकृति तथा पंच द्रव्य प्रकृतियां बताइ है द्रव्य प्रकृति की तुलना में राज प्रकृति का अधिक महत्व होता है I

४-राज्य मंडल सिद्धांत पर राष्ट्र संबंधों से शक्ति के यथार्थवादी तत्वों पर आधारित है ५ I

५-राज्य मंडल सिद्धांत में शक्ति संतुलन की धारणा निहित होती है ६ I

६-राजय मंडल सिद्धांत प्राचीन भारत में अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के चित्र को प्रस्तुत करता है  I

           प्राचीन भारतीय राजनीति के प्रसंग में कौटिल्य ने राज्य मंडल सिद्धांत का विशेष महत्व है I यह सिद्धांत पर राष्ट्र संबंधों के क्षेत्र में कौटिल्य की यथार्थवादी दृष्टि को प्रकट करता है I

षाड्गुण्यनीति

कौटिल्य ने प्राचीन भारतीय परंपरा के अनुसार ही षाड्गुण मंत्र के अंतर्गत अग्रलिखित छ नीतियों को स्थान दिया है-

   १-संधि

कौटिल्य ने दो राज्यों के बीच शर्तों के साथ होने वाले समझौते को संधि कहा है I संधि का प्रत्यक्ष उद्देश्य राज्यों के बीच मित्रता पूर्ण संबंध की स्थापना है किंतु इसका अंतिम उद्देश्य अन्य राज्यों की तुलना में अपनी शक्ति का बढ़ना होता है I अपनी आवश्यकता के अनुसार कोई राज्य संधि मित्र राज्य से अथवा शत्रु राज्य से कर सकता है I प्रबल शत्रु से अपनी रक्षा करने के लिए उसे संधि की जा सकती है I इसी प्रकार जब स्वयं की शक्ति में वृद्धि करने के लिए और शत्रु को निर्बल करने के लिए कुछ समय प्राप्त करने की जरूरत हो तब भी शत्रु से संधि की जा सकती हैI  कौटिल्य ने संधियों के दो प्रमुख भेद बताएं हैं I हीन संधि तथा परिपणित संधि हैं I संधि के तीन प्रकार हैं- दण्डोपतन संधि ,कोशोपतन संधि, तथा देशोपतन संधि ,जो क्रमशः सेना धन एवं भूमि से संबंधित हैI  पुनः इन तीनों संधियों के भी अनेक भेद होते हैं जो क्रमशः परिपणित सन्धि के तीन प्रकार हैI  परि पणित देश संधि ,परिपणित कार्य संधि ,तथा परिपणित काल संधि I

   २-विग्रह

कौटिल्य के अनुसार जब दो राज्य एक दूसरे के विरुद्ध उपकार की नीति अपनाते हैं तो उसे विग्रह कहा जाता है I विग्रह एक दूसरे को हानि पहुंचाने की नीति है I अतः कौटिल्य का मत है कि जब राजा पर्याप्त शक्तिशाली हो और शत्रु राज्य को युद्ध में हराने की शक्ति रखता हो तभी विग्रह की नीति अपनानी चाहिए I

    ३-यान

यान का सामान्य अर्थ है सेना का गमन I किंतु इसका विशिष्ट अर्थ है शत्रु पर आक्रमण करना I यान विग्रह के आगे की नीति है अथवा विग्रह का अंत यान में हो सकता हैI  विग्रह द्वारा शत्रु को कमजोर किया जाता है और तब यान के द्वारा उसकी शक्ति का पूर्ण पतन किया जाता है I और उस पर विजय प्राप्त की जाती है I कौटिल्य के अनुसार राजा को यान की नीति तब अपनानी चाहिए जब यह स्पष्ट हो जाए कि शत्रु के कार्यों का नाश उस पर आक्रमण करके ही किया जा सकता है I इस नीति को अपनाने से पूर्व राजा को अपने राज्य की रक्षा का पूरा प्रबंध कर लेना चाहिए I उसे भली भांति यह भी अनुमान लगा लेना चाहिए कि शत्रु की तुलना में उसकी स्वयं की शक्ति बहुत अधिक है और शत्रु विभिन्न व्यसनों एवं आपदाओं से घिरा हुआ हैI अर्थात उसमें ज्ञान का मुकाबला करने की बहुत कम शक्ति हैI  संक्षेप में यान की नीति अति प्रबल राजा द्वारा निर्बल राजा की विरुद्ध ही अपनाई जानी चाहिए I

  ४-आसन

कौटिल्य ने आसन के लिए उपेक्षा शब्द का भी प्रयोग किया है I उनका मत है कि जब राजा यह अनुभव करें कि वह स्वयं इतना शक्तिशाली नहीं है कि शत्रु का नाश कर सके और शत्रु भी इतना शक्तिशाली नहीं है कि उसका नाश कर सके तो उसे शत्रु के प्रति उपेक्षा की नीति अपनाते हुए चुपचाप बैठे रहना चाहिए और अपनी शक्ति में वृद्धि के लिए उचित प्रयत्न करते रहना चाहिएI  कौटिल्य ने आसन के दो प्रकार बताए हैं- विग्रह आसन तथा सन्धाय आसन I

     ५- संश्रय

संश्रय का अर्थ है निर्बल राजा द्वारा अपनी रक्षा के लिए किसी शक्तिशाली राजा की शरण लेना I जब राजा शत्रु को हानि पहुंचाने में समर्थ नहीं हो और उसे अपनी रक्षा करने में भी समर्थ नहीं हो तो ऐसे निर्बल राजा को किसी ऐसे राजा के शरण ले लेनी चाहिए जो शत्रु राजा से अधिक शक्तिशाली होI  और कुलीन सत्य प्रतिज्ञ विश्वसनीय और श्रेष्ठ आचरण वाला भी हो यदि ऐसा शक्तिशाली राजा उपलब्ध नहीं हो तो अमात्य रक्षा के लिए शत्रु की शरण लेना भी उचित होता है  I क्योंकि शरण लेने वाला राजा सदैव शरणागत राजा के दबाव में रहता है और उसके अस्तित्व को खतरा उत्पन्न कर सकता हैI

६- द्वैधी भाव

द्वैधी भाव का अर्थ है दो विपरीत प्रकार के भाव वाली नीति को अपनाना अर्थात दुरंगी नीति अपनाना I कौटिल्य ने द्वैधी भाव को मुख्य रूप से संधि एवं विग्रह की नीतियों को एक साथ अपनाने के रूप में प्रकट किया है I जब राजा किसी एक राज्य के साथ संधि करके अपनी शक्ति में वृद्धि कर ले और तब अपने शत्रु राजा के खिलाफ विग्रह की नीति अपनाई तो उसे द्वैधी भाव कहा जाता है I कौटिल्य ने संश्रय की नीति के प्रसंग में भी द्वैधी भाव की नीति को प्रस्तुत किया हैI

नीति के चार उपाय

कौटिल्य ने विदेश नीति के संचालन के लिए अग्र लिखित नीति के चार उपाय का उल्लेख किया है I साम ,दान ,भेद ,एवं दंड I कौटिल्य का नीति के चार उपाय से संबंधित समस्त विवरण अपनी प्रकृति से व्यावहारिक व यथार्थवादी है यह पर राष्ट्र संबंधों के वास्तविकता के अनुरूप है I  कौटिल्य ने इन चारों उपाय के वरीयता क्रम को भी स्पष्ट किया है I उनका मत है कि दान की तुलना में साम ,भेद की तुलना में साम तथा दण्ड की तुलना में भेद के उपाय को अपनाना अधिक उचित होता है I पहले तीन उपाय के असफल होने पर ही दंड के उपाय को अपनाया जाना चाहिए ७I  दंड के उपाय से स्वयं विजिगीषु राजा को भी हानि हो सकती है I अतः इसको अंत में ही प्रयोग किया जाना चाहिए I कौटिल्य का यह भी मत है कि राजा को आवश्यकतानुसार इसमें से प्रत्येक उपाय का अलग-अलग अथवा मिला-जुला प्रयोग करना चाहिए ८ I

संदर्भ ग्रंथ

१- विजिगीषु राज्य मंडल में विजिगीषु एवं उसके सभी मित्र राज्य सम्मिलित होते हैं I

२-अरि राज्य मंडल में बि जिगीषु का अरि राज्य तथा इस अरि राज्य के मित्र राज्य सम्मिलित होते हैं I

३-मध्यम राज्य मंडल में मध्यम राज्य बिजिगीषु राज्य तथा अरी राज्य होते हैं I इनमें केंद्रीय भूमिका मध्यम राज्य की होती है I

४-उदासीन राज्य मंडल में उदासीन राज्य मध्यम राज्य विजिगीषु राज्य तथा अरी राज्य होते हैं I

५-राज्यों के आपसी संबंध उसकी शक्ति की पारस्परिक स्थिति पर ही निर्भर होता है I

६-इस सिद्धांत के अंतर्गत विजिगीषु राज्य के मित्र गुट तथा अरि राज के मित्र गुट की कल्पना की गई है I इस प्रकार संपूर्ण राज्य मंडल मुख्यतः दो विरोधी शक्ति गुटों में बँटा रहता है और उनके बीच शक्ति संघर्ष की स्थिति रहती हैI 

७-अर्थशास्त्र- 9.8

८-अर्थशास्त्र -9.7

Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.

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