कौटिल्य के पर राष्ट्र संबंध का संस्थागत एवं व्यावहारिक पक्ष
भूमिका
अर्थशास्त्र में वर्णित पर राष्ट्र संबंधों के संस्थागत एवं व्यावहारिक पक्ष का अध्ययन निम्न रूप में किया जा सकता है I दूत व्यवस्था ,गुप्तचर ,युद्ध ,एवं पराजित पक्ष के प्रति व्यवहार I
दूत व्यवस्था
कौटिल्य ने दूत को राजा का मुख कहा है I दूत में विशिष्ट वैयक्तिक गुणों के साथ ही राजाओं के आपसी संदेशों को सत्य रूप में अभिव्यक्त करने की क्षमता होनी चाहिए I उसे संधि एवं विग्रह के गुण का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए I अर्थशास्त्र में दूतों के तीन प्रकार बताए गए हैं -निसृष्टार्थ ,परिमितार्थ ,एवं शासनहर I
कौटिल्य ने दूत के जो कार्य बताए हैं उनसे पर राष्ट्र संबंधों के संचालन में दूत की भूमिका पर प्रकाश पड़ता है I दूत राजाओं के बीच मात्र संदेशों का आदान-प्रदान नहीं करता अपितु वह शत्रु राज्य में रहकर प्रत्येक ऐसे महत्वपूर्ण कार्य को करता है जो उसके राज्य के हितों में वृद्धि करने वाला हो I उसे शत्रु राज्य में रहकर वहां के भूगोल, सैन्य शक्ति ,आर्थिक गतिविधियां ,सामाजिक जीवन आदि के बारे में तथ्यात्मक जानकारी का संग्रह करना चाहिए और शत्रु राजा के प्रमुख राजपुरुषों ,भृत्यों एवं प्रजा के प्रमुख वर्गों में अपना प्रभाव स्थापित करना चाहिए और उन्हें अपने पक्ष में फोड़ लेना चाहिए I यदि जरूरत पड़े तो उसे शत्रु राज्य में तोड़फोड़ एवं षड्यंत्र को प्रोत्साहित करना चाहिए I पर राष्ट्र संबंधों की दृष्टि से दूत काआधारभूत कार्य है I शत्रु राज्य में रहते हुए ऐसे सभी संभव प्रयत्न करना जो अपने राज्य के हितों की रक्षा एवं वृद्धि के लिए आवश्यक हो I इस दृष्टि से वह शत्रु राज्य में छिपे अपने देश के गुप्त चरों का भी प्रयोग कर सकता है II यह उल्लेखनीय है कि कौटिल्य ने आधुनिक युग की तरह ही दूत को अ बध्य माना है I
गुप्तचर व्यवस्था
बिजिगीषु राजा के गुप्तचर शत्रु राज्य में अनेक ऐसी गुप्त कार्रवाइयों को भी करते हैं I जो 'उसकी शक्ति को कमजोर करती हो I जैसे शत्रु राजा एवं उसके मित्र असंतोष व द्रोह भड़काना आदि I कौटिल्य के अनुसार बिजिगीषु राजा के गुप्तचरों को उसके मित्र राज्य में ऐसी गुप्त कार्यवाहियों को करना चाहिए कि वह अपने राज्य से अधिक शक्तिशाली नहीं बन सके और इसी प्रकार मध्यस्थ और उदासीन राज्यों में ऐसी गुप्त योजनाओं को लागू किया जाना चाहिए कि वह कभी अपने राज्य के प्रतिकूल आचरण ना कर पाए I
गुप्तचरों का एक प्रमुख दायित्व अन्य राजाओं एवं राज्यों से अपने राजा एवं राज्य की रक्षा करना भी है I कौटिल्य के अनुसार बिजिगीषु राजा के गुप्तचरों को अपने देश में छिपे विदेशी गुप्त चरों तथा उनके साहसिकअपने पुरुषों का पता लगाकर उन्हें दंडित करना चाहिए तथा देश या विदेश में सक्रिय अपने राजा के शत्रुओं का वध कर देना चाहिएI कौटिल्य ने आंतरिक एवं बाह्य प्रशासन की दृष्टि से गुप्तचर के दो प्रमुख वर्ग बताएं हैं संस्था एवं संचारI
उन्होंने अन्य कुछ ऐसे गुप्तचर का भी उल्लेख किया है I जो प्रत्यक्ष रूप से इन वर्गों में नहीं आते किंतु पर राष्ट्र संबंधों के क्षेत्र में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है I जैसे विषकन्या, उभय ,वेतनभोगी ,गुप्तचर, सीमा प्रदेश के चरवाहे ,गुप्तचर ,मल्लेश ,जाति के गुप्तचर ,आदि कौटिल्य ने सभी गुप्त चरों को राजा का नेत्र कहा है I
युद्ध
यद्यपि कौटिल्य ने विजिगीषु राजा के सामने चक्रवर्ती साम्राज्य की स्थापना का आदर्श रखा है किंतु उन्होंने इस बारे में युद्ध को अंतिम विकल्प के रूप में ही स्वीकारा है I उनका मत है कि जब अपनी रक्षा अथवा विस्तार के उद्देश्य की प्राप्ति अन्य साधनों द्वारा नहीं हो तो ही युद्ध के साधन को अपनाया जाना चाहिए I कौटिल्य का निर्देश है कि युद्ध की नीति अपनाने से पहले राजा को अग्र लिखित बातों का ध्यान देना चाहिए उसके राज्य की सभी प्रकृतियाँ स्वस्थ्य होनी चाहिए I उसे इस बात का भरोसा होना चाहिए कि उसके अनुपस्थिति में उसके राज्य में आंतरिक विद्रोह नहीं होगा I उसे शत्रु की तुलना में उत्साह बल प्रभाव शक्ति तथा मंत्र शक्ति में श्रेष्ठ होना चाहिए तथा उसे अपने मित्र राजाओं का पूर्ण सहयोग मिलने की आशा होनी चाहिए I
युद्ध के लिए उपयुक्त काल के बारे में कौटिल्य का मत है कि युद्ध के कम अवधि तक चलने की संभावना हो तो इसे जेष्ठ मांह में किया जाना चाहिए I यदि युद्ध के मध्य अवधि तक चलने की उम्मीद है तो उसे चैत्र मास में किया जा सकता है और जब युद्ध लंबी अवधि तक चलने की आशा हो तो इसे अग्रहण मास के मध्य में किया जाना चाहिएI किंतु इसके साथ ही कौटिल्य ने कहा है कि जब स्पष्ट रूप से परिस्थितियां अपने अनुकूल हो और शत्रु के प्रतिकूल हो तो युद्ध कभी भी किया जा सकता है I भले ही यह वर्षा ऋतु का ही काल क्यों ना हो I
युद्ध के प्रकार
कौटिल्य ने युद्ध करने की प्रणाली के आधार पर तीन प्रकार के युद्ध बताएं हैं १ I
१-प्रकाश युद्ध - देश एवं काल की पूर्व घोषणा करके जो युद्ध किया जाता है उसे प्रकाश युद्ध कहा जाता है I इस युद्ध में नैतिक नियमों व आचार संहिता का पालन किया जाता है I
२- कूट युद्ध - कूट युद्ध का अर्थ है ऐसे समय और स्थान पर आक्रमण करना जिसके लिए शत्रु तैयार ना हो I I लूटमार करना खेतों व जल स्रोतों को नष्ट करना आग लगाना थके हारे अस्वस्थ व व्यसन करते हुए शत्रु पर आक्रमण करना एक स्थान से युद्ध को रोककर अन्य किसी स्थान पर धावा बोलना आदि की क्रियाएं इस युद्ध में सम्मिलित है I
३- तूष्णी युद्ध - इस युद्ध में गुप्त चरों की मदद से शत्रु को विष औषधि आदि देकर अथवा उसे धोखा देकर उसका वध किया जाता है I कौटिल्य के अनुसार जब बिजिगीषु राजा की शक्ति शत्रु से बहुत अधिक हो तब प्रकाश सिद्ध किया जाना चाहिए I अन्यथा कूट युद्ध ही किया जाना श्रेष्ठ होता हैI कौटिल्य का मत है कि २ युद्ध में घायल सैनिकों पर शास्त्र प्रहार नहीं किया जाना चाहिए I राजा को युद्ध में घायल सैनिकों के इलाज के लिए सेवा के साथ चिकित्सा दल रखना चाहिए I जिससे विभिन्न औषधीय मरहम पट्टियॉ आदि से सुसज्जित होना चाहिए I
अर्थशास्त्र में तीन प्रकार के विजेता राजाओं का उल्लेख किया गया है ३ धर्म विजयी ४, लोग विजयी ५ ,एवं असुर विजयी ६ ,कौटिल्य ने धर्म विजई राजा को सर्वोत्तम और असुर विजयी राजा को सर्वाधिक निकृष्ट माना है ऐतिहासिक दृष्टि से कौटिल्य कालीन सम्राट महापद्मनन असुर विजेता जिसके विनाश का श्रेय कौटिल्य को जाता है I वास्तव में कौटिल्य द्वारा तीन प्रकार के विजेता राजा युद्ध के उद्देश्य पर भी प्रकाश डालते हैं I
पराजित पक्ष के प्रति व्यवहार - इस संबंध में कौटिल्य के प्रमुख विचार निम्नलिखित हैं -
१-युद्ध में विजयी राजा को पराजित राज्य की भूमि कोष स्त्री पुत्र आदि पर अत्यधिक अधिकार नहीं करना चाहिए I पराजित राजा से संधि करके उसी के पास राज्य अधिकार रहने देना चाहिए I यदि युद्ध के दौरान पराजित राजा मर जाए तो उसके योग्य पुत्र को शर्त सहित राज्याधिकार सौंप देना चाहिए और उसके वंश के अन्य पुरुषों को भी उसके योग्य स्थान पर नियुक्त करना चाहिए I विजेता राजा की ऐसी नीति से न केवल पराजित राजा अपितु उसके पुत्र व पैत्रादि आदि भी उसके अनुगामी बने रहते हैं I
२-विजेता राजा का पराजित राज्य की प्रजा को सर्वधर्म के पालन की सुविधा देनी चाहिए I उसके देवों रीति रिवाज एवं आचार्य का सम्मान करना चाहिए I प्रजा को प्रतिष्ठित पुरुषों एवं विद्वानों का सम्मान करना चाहिए I दीन व अनाथों की आर्थिक सहायता करनी चाहिए I दान करना चाहिए और करो में छूट देनी चाहिए I उसे पराजित प्रजा के शील वेश भाषा उत्सवों व आचारों को अपनाना चाहिए I ताकि वह प्रजा का विश्वास अर्जित कर सके विजेता राजा का अपनी वाणी व कार्यों के द्वारा यह प्रदर्शित करना चाहिए कि उसमें पराजित राजा के गुण अधिक हैं और दोष कोई नहीं इसमें उसे प्रजा की भक्ति व निष्ठा प्राप्त होगी I इस प्रकार कार्य में विजेता राजा को गूढ़ पुरुषों की मदद लेनी चाहिए I
३-विजेता राजा को शत्रु पक्ष के उन पुरुषों को पूर्व प्रतिज्ञा अनुसार धन आदि से संतुष्ट करना चाहिए जिन्होंने विजय प्राप्त करने में उसकी मदद की हो I
४-पराजित राजा के निष्ठावान मंत्री पुरोहित सेनापति आदि को पद मुक्त कर देना चाहिए और उनके स्थान पर स्वदेश के राजपुरुषों को एवं शत्रु राज्य के ऐसे राजपूत को नियुक्त करना चाहिए जिन्हें उन्हें राजा ने अपमानित किया हो या बंदी बनाया हो I
निष्कर्ष
कौटिल्य के समस्त विवरण में अनेक ऐसी धारणाएं हैं जो उन्हें आधुनिक युग का पूर्वगामी सिद्ध करती हैं I जैसे राज्य मंडल सिद्धांत ,में निहित शक्ति संतुलन का विचार पर राज संबंधों के संचालन में दूत व्यवस्था राज्यों के बीच गुप्तचर की व्यवस्था आदि तथा कौटिल्य ने युद्ध के अमानवीय पक्ष को ध्यान में रखते हुए इसे अंतिम विकल्प के रूप में मान्यता दी है और पराजित पक्ष के प्रति उदार एवं मानवीय व्यवहार का निर्देश दिया है I
संदर्भ ग्रंथ
१-अर्थशास्त्र- 7.6
२-अर्थशास्त्र- 10.3
३-अर्थशास्त्र- 12.1
४- जो राजा गौरव एवं प्रतिष्ठा के लिए विजय प्राप्त करता है और शत्रु के आत्मसमर्पण करने व अधीनता स्वीकार करने से संतुष्ट हो जाता है उसे धर्म विजयी राजा कहा जाता है I
५-ऐसा राजा धन भूमि आदि की प्राप्ति के लिए विजय प्राप्त करता है और उनकी प्राप्ति से संतुष्ट हो जाता है I
६-असुर विजयी ऐसा राजा होता है जो भूमि द्रव्य कोष स्त्री आदि का पूर्ण हरण करता है तथा राजा व उसके पुत्र के वध से ही संतुष्ट होता हैI
Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.
Published by,