न्याय की भारतीय अवधारणा

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न्याय की भारतीय अवधारणा से तात्पर्य है कि न्याय की वो पद्धति जो भारत के औपनिवेशीकरण से पूर्व थी।  लोकतंत्र की जननी भारत अपने लोकतंत्रात्मक व्यवस्था के सुदृढिकरण और सुचारु, सुगम संचालन के लिए लिखित संविधान को माध्यम बनाती है। संविधान के द्वारा ही न्यायव्यवस्था सहित अन्य सभी कार्यों को संचालन किया जाता है। किंतु यह पद्धति भारत के स्वतंत्रता के पश्चात बनी। भारतीय संविधान पर पश्चिम का बहुत ज़्यादा प्रभाव है किंतु तत्कालीन परिदृश्य के मद्दे नज़र यथावत समय की जो माँग थी निहितार्थ राष्ट्र्हीत में निर्णय लिया गया। उस समय यह आवश्यक था कि यथाशीघ्र देश को व्यवस्थित करने के उदेश्य से संविधान को अपनाया जाए । इसमें सभी नागरिकों के कल्याण का हर सम्भव ध्यान रखा गया किंतु जब हम न्याय की भारतीय अवधारणा के लिए अन्य ग्रंथों और स्मृतियों का रुख़ करते हैं तो पाते हैं कि उस समय न्याय के मुख्य आधार मानवता, नैतिकता ,सामाजिक कल्याण थे। राजतंत्रिक निकायों के साथ राजा के विमर्श से के पश्चात न्यायिक निर्णय लिए जाते थे। इस परम्परा से भी पूर्व देखा जाए तो महाभारत में वर्णित है कि

न राज्यं न च राजासीत् न दण्ड्यो न च दाण्डिकः।

धर्मेणैव प्रजा: सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ।।

आर्थत; जब यहाँ न राजा था न राज्य, न दंड की संकल्पना थी और ना ही दंड के लिए नियामक निकाय बल्कि धर्म के नैतिक तर्ज़ पर सभी एक दूसरे की परस्पर रक्षा करते थे। धर्म को न्याय के सदृश्य माना जाता था। किंतु समय के साथ व्यवस्थाएँ बदली और मानव आखेटक तथा घुमंतू जीवन से कृषि प्रधान जीवन और क्रमागत प्रगति के साथ उत्पादक वर्ग में तब्दील हो गये । इस विकास के साथ नैसर्गिक मानव भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाने लगा। समाज में मात्स्य न्याय व्याप्त हो गया। जिससे अन्य लोगों का जीवन प्रभावित होने लगा तथा सामाजिक संतुलन बिगड़ने लगा। इस नकारात्मक प्रभाव को प्रतिबंधित करने के लिए राजा का अस्तित्व राज्य/जनपद की संकल्पना के साथ उभर कर सामने आया और राजा ने लोगों के सुरक्षा के बदले में कर आरोपित किए। दोषियों के लिए दंड निश्चित किए गए साथ ही कौन से दोष के लिए क्या दंड सुनिश्चहित किया जाएगा इसके लिए निकायों की स्थापना की गई । कुलमिलाकर छोटे – छोटे जनपदों में राजतांत्रिक  व्यवस्था स्थापित हो गई । जिससे सामाजिक व्यवस्थाएँ सुचारु रूप से चलने लगी। इसी व्यवस्था में न्याय भी एक भाग था, जिसमें दोषियों के लिए दंड के भी प्रावधान थे।

    सप्त प्रकृतियों के निरूपण में राज्यगत व्यवस्था और अनुशासन के स्थापना के लिए वर्णचतुष्टय में नियम भंग करने पर दंड दिए जाने का प्रावधान था। इसकी मर्यादा स्थापित करने के लिए सर्वप्रथम दंड और उसकी भेदादि का क्रमप्राप्त विवेचन का आरम्भ किया जाता है। अतः दंडव्यवस्था से ही राज्य में शांति, सौराज्य की स्थापना एवं अधर्म और अन्याय का उन्मूलन हो सकता है। इस लक्ष्य से दंड, न्याय की व्यवस्था और न्यायोपयुक्त  स्मृतियुक्त लिखित आदि प्रमाण चतुष्टय का स्वरूप प्रदर्शित किया जाएगा। मनुस्मृति के अनुसार – राजा की सहायतार्थ भगवान ने सम्पूर्ण जीवों का रक्षक धर्मपुत्र , ब्रह्म के तेजोमय दंड के पहले ही आर्थत राजा के जन्म से पूर्व ही रचना की। इस दंड के भय से स्थावर तथा जंगम सभी प्राणी अपने – अपने भोग को भोगने के लिए सक्षम होते हैं तथा अपने धर्म से विचलित नहीं होते । स्मृतियों के अवलोकक विद्वानों के अनुसार राजा देश, काल और दंड शक्ति तथा विद्या के ठीक विचार कर अन्याय करने वाले व्यक्तियों पर दंड का प्रयोग करे। वह दंड ही वास्तविक राजा होता हैं वही मनुष्यों के चारों आश्रमों को ठीक रखने वाला धर्म का प्रतिभू हैं। दंड ही प्रजाओं पर शासन करता है । वही सबका रक्षक है। सम्पूर्ण प्रकृति के सो जाने पर धर्म ही जागता है। विद्वानों द्वारा दंड को ही धर्म बताया गया है जो न्याय के सदृश्य है।    राजा को निर्णय स्मृतियों के आधार पर ही देना होता था। परंतु इसके साथ वर्ण आदि की ओर भी ध्यान देना आवश्यक था। मनु ने राजा को आदेश दिया कि धर्मज्ञ राजा, जाति, देश, श्रेणी व कुल धर्म देखकर उसके अनुसार ही अपने धर्म की व्यवस्था दे।

    यदि प्राचीन न्याय पद्धति का अवलोकन विभिन्न स्मृतियों के अनुसार करे तो पाते हैं कि अपने राज्य में सदैव शांति रखने के लिए राजा को न्याय व्यवस्था की ओर ध्यान देना आवश्यक है क्योंकि मनुस्मृति में जिस मात्स्य न्याय की चर्चा की गयी है उसे दूर करने के लिए राजा को न्याय का आदेश दिया गया है। परंतु स्मृतिकारों ने एक ऐसे युग की ओर संकेत किया है जब न्याय की आवश्यकता ही नहीं थी और फिर भी एक स्वस्थ्य समाज सुखी सम्पन्न था। वृहस्पति स्मृति में कहा गया है कि सभी मनुष्य पहले धर्म प्रधान और अहिंसक थे। मनुष्य के व्यवहार में लोभ एवं द्वेष के संक्रमण से विकृतियों का समावेशन हुआ। नारद स्मृति में भी प्रायः इस प्रकार का उल्लेख मिलता है कि मनु प्रजापति ने जिस समय राज्य का भार ग्रहण किया उस समय मनुष्य धार्मिक और सत्यवादी हुआ करते थे और तब न्याय व्यवहार की आवश्यकता नहीं थी। परंतु मनुष्यों में जब धर्म कि ह्रास होने लगा तब व्यवहार परिवर्तन हुआ और राजा को समस्याओं के समाधान के लिए दंडधर घोषित किया गया। सभी मनुष्य धर्म का पालन करने वाले थे। इस धर्म पालन से ही वे परस्पर एक दूसरे की रक्षा किया करते थे।

  कुलमिलाकर देखा जाए तो न्याय की भारतीय अवधारणा में प्राचीन समय से ही न्याय पद्धति, न्यायाधीश, न्यायकर्ता आदि विभिन्न प्रावधानों और निकायों का ज़िक्र स्मृतियों में मिलता है। न्याय कार्य को विशेष रूप से राजा के अधीन बताया गया है परंतु स्मृतियों  में यह भी कहा गया है कि न्याय कार्य अकेला राजा नहीं कर सकता है इसके लिए उसे सहायकों की आवश्यकता होती है। तर्कपूर्ण विचार-विमर्श से न्यायसंगत निर्णय लिया जा सकता है। याज्ञवल्क्य और वृहस्पति स्मृति में कहा गया कि यदि कोई मनुष्य के द्वारा किसी को स्मृतियों के विरोध में जा कर दुखी करता है जिसकी सूचना राजा को दी जाती है तो यह व्यवहार पद कहलाता है। व्यवहार पद को स्पष्ट करते हुए आचर्य विज्ञानेश्वर ने कहा

व्यवहार: तस्य पद्म विषयस्तस्य चेदम्

आर्थत झगड़े या विवाद का विषय, जिसके कारण जनता न्याय के लिए राजा के आती थी। हालाँकि व्यवहार पदों के संदर्भ में सभी स्मृतिकारों के मत एक से नहीं हैं। मनु ने १८ व्यवहार पद माने हैं किंतु इसके अलावा भी व्यवहार पद हैं। मनु, नारद, एवं वृहस्पति स्मृतियों ने ये सभी व्यवहार पद एक स्थान पर दिए हैं जबकि विष्णु और यज्ञावलक्य स्मृति में इनका वर्णन एक सठन पर नहीं बल्कि अलग – अलग है। याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार राजा के प्रति विवाद विषय के निर्णयार्थ दिए गए आवेदन कहा गया है। जिससे पता चलता है कि व्यवहार पदो के अंतर्गत वो विवाद आते हैं जिसमें वादी- प्रतिवादी की ओर से न्यायलय में विवाद के निपटारे  के लिए  न्यायालय में आवेदन डाला गया है।

   राजा और उनका परामर्श मंडल विवाद को सुलझाते ही थे किंतु स्मृति के विधान में उन्हें यह भी आदेश था कि वे किसी विवाद को न्यायालय के समक्ष लाने के लिए उत्साहित नहीं करेंगे। मनु ने कहा है कि ‘राजा और राजपुरुष स्वयं विवाद उत्पन्न न करे और सामने आए भी विवादों को दबाने का प्रयास ना करें बल्कि उनको न्याय करना चाहिए और यदि वादी – प्रतिवादी न्यायालय नहीं आना चाहे तो राजा को अपने प्रभाव व धन लोभ से स्वयं न्यायालय जाने के कर्तव्य से प्रवृत नहीं करना चाहिए। ठीक यही बात मंवर्थ मुक्तावली ने कात्यायन में कही है। मनु ने कहा कि राजा को बहुत से कंटकों (चोर, डाकू) को दूर करना चाहिए, सदाचारियों की रक्षा करनी चाहिए। प्रजापालन में तत्पर राजा मरणोपरांत स्वर्ग जाता है।नारद और वृहस्पति ने भी राजा द्वारा किए गए अभियोगों को प्रकीर्णन प्रकरण में रखा है।

     न्याय की भारतीय अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए न्यायिक प्रक्रिया को क्रमागत समझते हुए न्यायालय  शुल्क को देखे तो स्मृति ग्रंथो के विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में वादी के आवेदन देने के समय पर उनसे कोई शुल्क नहीं लिया जाता था  और निर्धन लोगों को न्याय प्राप्ति के लिए न्यायालय के द्वार खुले थे उनको धन की कोई चिंता नहीं करनी होती थी। हिंसामूलक विवादों में किसी शुल्क की आवश्यकता नहीं होती थी किंतु अर्थमूलक विवादों में आवेदन जमा करने पर कोई शुल्क नहीं था बल्कि सुनवाई के पश्चात शुल्क देना होता था। इस प्रकार से विभिन्न विवादों के निपटारे के लिए विविध प्रक्रिया और पद्धति थे। अभियोग के आरम्भ के लिए शीघ्रता की जाती थी क्योंकि स्मृतियों के अनुसार साहस ( विष, शस्त्र आदि से प्राण लेना),स्तेय (चोरी), पारुष्य ( कठोर भाषण), गोहत्या, महापातक  का दोष लगना, स्त्रियों के हरण आदि में तत्काल समस्यों के निराकरण के लिए न्यायालय तत्पर होता था। न्यायालयों के प्रकार होते थे, न्यायालय स्थापना के प्रकार थे , न्याय दशांक का वर्णन मिलता है।

राजा और न्याय कर्ता को क्रोधपूर्ण भाव तथा किसी प्रकार के लोभ नहीं रखने चाहिए। राजा को न्यायधिश, अमात्य, ब्राह्मण और सभ्य लोगों के बीच में न्याय करना चाहिए। वृहस्पति स्मृति में कहा गया है कि जहां लेख, साक्ष्य और प्रमाणों की उपलब्धता नहीं हो वहाँ  राजा ही प्रमाण है क्योंकि वह सबका है। मुख्य न्यायधिश और सभ्यों को भी दंडित करने का प्रावधान था यदि वो पक्षोंपातपूर्ण व्यवहार से न्याय प्रभावित हो।

  कुलमिलाकर  न्याय की भारतीय अवधारणा काफ़ी सोची - समझी हुई किंतु एक जटिल और स्पष्ट संकल्पना थी जो उस समय के राजतंत्रिक व्यवस्था के लिए उचित थी। आज भी स्मृतियों, पुराणों, रामायण और महभारत आदि ग्रंथों में सारे समयस्याओं का समाधान समाहित है । आज भी अधिकांश विषय समान रूप से प्रासंगिक भी है । देखा जाए तो शासन के तंत्र बादल गए किंतु देश में रहने वाले निवासी तो आम जनता ही हैं जो अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं इसलिए न्याय के भारतीय अवधारणा को समझने के लिए हम सबको अपने पुराने ग्रंथों की ओर रुख़ करना चाहिए।

सहायक संदर्भ ग्रंथ

शास्त्री, रामतेज , मनु स्मृति( 2004) काशी

शर्मा, सुरेश चंद्र, प्रमुख स्मृतियों में राजधर्म का स्वरूप (2006) , निर्मल पब्लिकेशन, दिल्ली

https://happyfestival.in/manu-ke-anusar/

Authored by Asst. Prof. Dr. Abhay Vikram Singh, Dept. Gandhian and Peace studies, Mahatma Gandhi Central University, Motihari (Bihar).

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