प्राचीन भारत में दंड व्यवस्था

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प्राचीन नीति ग्रन्थों में दंड के महत्व

 प्राचीन नीति ग्रन्थों में दंड के महत्व का बड़े विशेष रूप में वर्णन किया गया है I महाभारत के अनुसार धर्म की रक्षा दंड द्वारा होती है और धर्म अर्थ और कामरूप जो त्रिवर्ग है उसकी रक्षा दंड के कारण ही संभव है १ I सब प्राणियों की रक्षा के लिए ईश्वर ने ब्रह्मतेजमय  दंड का सृजन किया था I जहां तक श्याम रंग और लाल आंखों वाला दंड प्रयुक्त हो रहा होता है वहां जनता में सम्मोह उत्पन्न नहीं होता २ I यदि राजा दंड का सम्यक प्रकार से प्रयोग करें तो वह स्वर्ग को प्राप्त करता है पर यदि वह स्वेच्छा पूर्वक इसका प्रयोग करने लगे तो दंड द्वारा ही उसका विनाश हो जाता है ३ I

दंड की उत्पत्ति

   दंड द्वारा ही प्रजा का शासन होता है, दंड द्वारा ही सबकी रक्षा होती है  I जब सब सो रहे होते हैं तब दंड ही जगाता है, इसी कारण अनेक लोग दंड को ही धर्म मानते हैं ४ I उनके अनुसार दंड उस मर्यादा का नाम है जिसके द्वारा मनुष्यों के कार्य नियंत्रित होते हैं I जब राज्य संस्था का उदय नहीं हुआ था ,अराजक दशा थी ५ , उस दिशा में किसी का जीवन और धन सुरक्षित नहीं थे ६ , इसीलिए दंड का प्रादुर्भाव किया गया ७ ,और दंड के प्रयोग का अधिकार राजा को दिया गया I   अराजक दशा को दूर करने के लिए ब्रह्मा द्वारा दंड की ही उत्पत्ति की गई और दंड क्या है इसका प्रतिपादन करने के लिए दंड नीति शास्त्र की I राजा को इसी दंड नीति के अनुसार शासन करना है I प्रधानता दंड या दंड नीति की ही है I दंड का तेज समान होता है उसे वह व्यक्ति धारण नहीं कर सकता जो कृतात्मा ना हो धर्म रूपी दंड से जो राजा विचलित होता है, बंधु बान्धवों के साथ उसका विनाश हो जाता है ८ I

दंड का चयन

   दंड का चयन ऐसा व्यक्ति नहीं कर सकता जो मूढ़ हो, असहाय हो, लोभी हो ,बुद्धिमान ना हो ,और विषयों का सेवी हो, केवल सूची सत्य, संध, बुद्धिमान, सुसाहायवान ,और नीति शास्त्र का अनुसरण करने वाला मनुष्य ही दंड का प्रयोग करने में समर्थ हो सकता है ९ I महाभारत के यह संदर्भ सर्वथा स्पष्ट है I वस्तुतः राज्य संस्था में दंड ही प्रधान है I वही वह सर्वोपरि शक्ति है, जिस द्वारा अराजक दशा का अंत होकर राज्य संस्था का प्रादुर्भाव होता है I राजा का महत्व केवल इस कारण है क्योंकि वह दंड का प्रयोक्ता  है, पर सब कोई दंड का प्रयोग नहीं कर सकते, उसे प्रयुक्त करने के लिए मनुष्य में विशेष योग्यता का होना अनिवार्य है I यदि राजा में यह योग्यता और क्षमता ना हो तो वह अपने पद पर कदापि नहीं रह सकता  I क्योंकि कोई व्यक्ति किसी विशेष वश में उत्पन्न हुआ है या किसी राजा का पुत्र है इसी कारण वह दंड के धारण का अधिकारी नहीं हो जाता  I जो कोई राजा इसमें इस धर्म रूप दंड का पालन न करें उसकी हत्या में कोई भी दोष नहीं है I छल ,माया ,और क्षत्रधर्म किसी भी प्रकार से उसका वध दोषयुक्त नहीं माना जा सकता १० I राजा एक पद है इस पद के कतिपय निश्चित कर्तव्य हैं जो उन कर्तव्य को ना करें वह अपने पद पर कैसे रह सकता है I

महाभारत में दंड की उत्पत्ति

  महाभारत में लिखा है कि राजा वेन को ऋषियों ने मंत्रपूतकुशाओ से मार दिया ११ I राजा वेन अपने धर्म का पालन सुचारू रूप से नहीं करता था , अतः वह राजा के पद पर नहीं रह सकता था I प्राचीन राजशास्त्र प्रणेताओं का यही केंद्रीय सिद्धांत है कि मानव समाज में कर्तव्य, अकर्तव्य, गम्य, अगम्य ,धर्म, अधर्म ,की जो मर्यादा है जिस द्वारा मनुष्य की स्वेच्छा चरित्र नियंत्रित होती है उसी को दंड कहते हैं I जिस प्रकार अन्य सब मनुष्य इस दंड के अधीन है वैसे ही राजा और उसके कर्मचारी भी इसकी अधीनता में रहते हुए अपने कार्यों को संपादित करते हैं I सर्वोपरि दंड है राजा नहीं क्योंकि वह भी दंड के अधीन है I कामन्दक और शुक्र ने दंड के लिए मर्यादा के स्थान पर दम शब्द का प्रयोग किया है १२ I जिसका अर्थ दमन या नियंत्रण है दमन रूप या मर्यादा रूप इस दंड की ही समाज और राज्य संस्था में प्रमुखता है I

    यदि राजा दंड का धारण भली भांति सोच समझकर करें तो वह संपूर्ण प्रजा का रंजन करने में समर्थ होता है अन्यथा उसके द्वारा सर्वत्र नाश हो जाता है १३ I जो यह संसार सुख भोग में तत्पर है उसका कारण दंड ही है दंड के अभाव में भी जो मर्यादा से रहे ऐसे शुची मनुष्य कठिनता से ही कहीं होते हैं १४ I यदि दंड का ठीक प्रकार से प्रयोग ना हो तो सारी मर्यादाएं टूट जाए ,सब वर्ण दूषित हो जाए और सब लोक प्रकुपित हो जाएं १५ I यदि संसार में दण्ड न रहे तब सभी प्रजाओं का नाश हो जाए, बलवान दुर्बलों को इस प्रकार खाने लगे जैसे जल में मछलियाँ मछलियों को खाती हैं १६ I यदि साधु असाधु में भेद करने वाला दंड न रहे तो सर्वत्र अंधकार छा जाए I किसी को कुछ भी दिखाई ना दे १७ I

कौटिल्य अर्थशास्त्र में दंड व्यवस्था

    कौटिल्य अर्थशास्त्र में दंड व्यवस्था का विस्तृत वर्णन मिलता है I आचार्य कौटिल्य ने राजा को निष्कंटक बनाने के लिए दंड का प्रभावी विधान किया है I दंड कौटिल्य की न्याय स्थापना का व्यावहारिक पक्ष है  I उसके अनुसार न्याय की अवस्थिति दंड पर निर्भर है  I चारों वर्ण आश्रम के लोग अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करें और सदाचार में प्रवृत्त रहे यही कौटिल्य का दंड नीति का प्रमुख उद्देश्य है १८ Iकौटिल्य ने धर्म और सदाचार की अवरोधक शक्तियों के दामन हेतु दंड की व्यवस्था की है I धर्म रक्षा और लोक कल्याण के लिए कौटिल्य ने दंड को आवश्यक माना है I उनके विचार में दण्ड न होने से मत्स्य न्याय उत्पन्न हो जाता है १९ I

अर्थशास्त्र में दंड का महत्व

    अर्थशास्त्र में दंड के महत्व के बारे में कहा गया है की समुचित दंड प्रजा को धर्म ,अर्थ ,और काम में प्रवृत्त करता है I इसलिए दंड को त्रिवर्ग का रक्षक कहा गया है I अन्वीक्षिकी ,त्रयी और वार्ता इन सब विधाओं की समृद्धि दंड पर निर्भर करती है I लौकिक जीवनचार्य इसी पर निर्भर है  I अतएव लोकजीवन को समुचित रखने के लिए तत्पर रहना चाहिए २० I कौटिल्य का मानना है कि कठोर दंड प्राणियों को उद्धिग्न करता है मृत्यु दंड या दंड में ढ़िलाई से राजा प्रजा से त्रस्त रहता है इसलिए राजा को उचित दंड देना चाहिए I काम, क्रोध, के वशीभूत होकर अज्ञानता के कारण अनुचित रीति से प्रयुक्त किया हुआ दंड वानप्रस्थ और परिव्राजक निः स्पृह लोगों को भी कुपित कर देता है २१ I एक अन्य स्थान पर भी कौटिल्य ने कहा है कि शास्त्रविहिन उचित रीति से प्रयुक्त दंड ही प्रजा के योगक्षेम का साधन है २२ I इस प्रकार कौटिल्य ने समुचित दंड को हर तरह से कल्याणकारी बताया है I

 दंड शक्ति का प्रयोग

  वस्तुत दंड का सिद्धांत ऐसा है जो भारत के सभी प्राचीन राज्यशास्त्र प्रणेताओं को मान्य था I यह सिद्धांत प्राचीन भारतीय राजनीतिक विचारको का आधार है और उसे भली भांति समझ कर ही राजा और राज्य की अन्य प्रकृतियों के स्वरूप और स्थिति को जाना जा सकता है I दंड शक्ति प्रयोग करने की उत्तरदायिता जिस व्यक्ति की हो उसी को राज्य की सात प्रकृतियों में स्वामी कहा जाता है I राज्यों के शासन का स्वरूप प्राचीन काल में भिन्न-भिन्न प्रकार का था I गणतंत्र राज्यों के अधिपति राजा के अतिरिक्त अन्य नामों से भी कहे जाते हैं ,इसलिए दंड के प्रयोक्ता के संबंध में कहा गया है कि वह एक ही राजा भोज विराट सम्राट क्षत्रिय भूपति नृप आदि शब्दों द्वारा कहा जाता है २३ I

निष्कर्ष

 प्राचीन विधिवेत्त्ताओं का मानना है कि दंड का आधार लोक कल्याण और न्याय के अनुकूल होना चाहिए २४ I प्रजा के सुख का भी यही आधार है दंड की चार व्यवस्थाएं निर्धारित थी २५ I प्रतीकात्मक अवरोध निरोधक सुधारात्मक अपराधी के सुधार करने का आचार्य ने एक उपाय प्रायश्चित करने का भी निर्धारित किया है I इसमें अपराधी स्वयं को अपने को सुधरता है अपराधों और पापों से विमुक्त का यह साधन प्राचीन धर्मशास्त्रों में वर्णित है I वैदिक साहित्य २६, स्रोतसूत्रों २७, और धर्मसूत्रों में प्रायश्चित का विधान है और भविष्य में उनकी पुनरावृत्ति न होने देने का निश्चय करता है I प्रायश्चित की महती भूमिका सुधार के लिए रही थी I कात्यायन का कथन है कि पाप से शुद्ध प्रायश्चित और दंड दो प्रकार से होती है I

संदर्भ ग्रंथ

१-महाभारत शांतिपर्व-15/3

२-महाभारत शांतिपर्व -15/ 43

३-महाभारत शांतिपर्व- 14/45

४-महाभारत शांतिपर्व -15/ 2

५-बलवान निर्बलों को मारने लगे थे और किसी भी प्रकार की मर्यादा नहीं थी I

६-जब दंड का अभाव था तो जनता में संकट उत्पन्न हो गया था, क्या कार्य है और क्या अकार्य, क्या भोज्य है और क्या अभोज्य, क्या पेय है और क्या अपेय ,इसका विवेक ही तब तक नहीं आ रहा था क्या अपना है ,किस पर अपना स्वत्तव है, और कौन वस्तु दूसरे की है ,क्या गम्य में है, और क्या अगम्य है, यह भेद भी तब तक नहीं हो रहा था ,उस समय सब लोग एक दूसरे की हिंसा में तत्पर हो गए थे I

७- इस दशा में भगवान ने संसार के धारण और लोक संकट के विनाश के लिए दंड को उत्पन्न किया यह दंड ही धर्म है और यही व्यवहार है I

८-महाभारत शांतिपर्व -14/ 46

९-महाभारत शांतिपर्व -14/49- 49

१०-महाभारत शांतिपर्व -14/55

११-महाभारत शांतिपर्व -59/94

१२- कामन्दक 2/15 ,शुक्र 1/57

१३-महाभारत शांतिपर्व- 14/37

१४-महाभारत शांतिपर्व- 15/34

१५-महाभारत शांतिपर्व-14/42

१६-महाभारत शांतिपर्व -14/38

१७-महाभारत शांतिपर्व -15/32

१८-फिलोसोफी आफ धर्म -जे० एच गांगुली -भाग 2- पृष्ठ 15

१९-कौटिल्य- डॉक्टर चंद्रदेव प्रसाद- पृष्ठ संख्या-128

२०-कौटिल्य अर्थशास्त्र -1/3

२१-पूर्ववत

२२-पूर्ववत

२३-महाभारत शांतिपर्व 67/54

Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.

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