प्राचीन भारत में न्याय व्यवस्था

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   न्याय की अवधारणा

प्रारंभिक समाजों की न्याय व्यवस्था अलग-अलग थी I सामान्यतया अपराधियों से प्रतिशोध प्रारंभिक न्याय और दंड व्यवस्था का आधारभूत अंग था I पीड़ित व्यक्ति को बल प्रयोग द्वारा या अन्य किसी साधन से क्षतिपूर्ति का अधिकार था १ I इस काल में न्याय करने वाले प्रधान प्रय: मध्यस्थ का कार्य करते थे I आगे चलकर राजा न्यायिक प्रशासन का प्रधान बन गया I प्राचीन आचार्यों ने राजाओं का राज्य में समुचित न्याय व्यवस्था स्थापित करने का निरंतर आदेश दिया राजा के विभिन्न कर्तव्यों में दुष्ट निग्रह का महत्वपूर्ण कर्तव्य था २ I प्राचीन भारत में न्याय प्रशासन का उद्देश्य केवल प्रजा की सद इच्छा प्राप्त करना ही नहीं था वरन स्थापित कानूनों का कार्यान्वित करने पर अधिक जोर दिया जाता था I यह मान्यता थी कि सामाजिक जीवन को कानून के अनुसार चलना चाहिए I न्याय का कार्य राजा के लिए यज्ञ के समान फलदाई माना जाता था I

गौतम स्मृति में न्याय की अवधारणा

गौतम स्मृति में लिखा है कि राजा की न्याय व्यवस्था वेदों उपवेदों धर्म शास्त्रों और पुराणों से विनियमित होनी चाहिए I कानून का उल्लंघन करने पर दंड होना चाहिए I धार्मिक नियमों द्वारा मान्य प्रदेशों वर्णों व कुलों की प्रथाएं भी न्यायित सत्ता रखती हैं I वशिष्ठ ने भी राजा को प्रदेशों उपजातियां एवं कुलों के चलाने के आधार पर चारों वर्णों को स्वधर्म पर चलने का निर्देश दिया है I इससे स्पष्ट है कि राज्य के कानून के दो प्रमुख स्रोत हैं -पवित्र धार्मिक नियम और विभिन्न प्रकार की स्थानीय सामाजिक और आर्थिक समूह की प्रथाएं ३ I

वैदिक युग में न्याय का कार्य

  वैदिक युग में न्याय का कार्य सभा के अधीन था I नारद और बृहस्पति ने राजा की सभा को सर्वोच्च न्यायालय कहा है I रामायण ४ और महाभारत५ मैं भी राजा को सर्वोच्च न्यायपालक के रूप में स्वीकार किया गया है I ऋग्वेद में सभा को किल्विषस्पृत अर्थात पापों या अपराधों को दंड देने वाली कहा गया है ६ I राजा कानून नहीं बनाता था केवल न्यायिक प्रशासन का नेतृत्व करता था I कानून बनाने और उसकी व्याख्या करने का कार्य सामाजिक प्रतिनिधियों के नियंत्रण में रहता था  I न्याय प्रदान करने वालों पर केवल कानून का नियंत्रण था  I

याज्ञ्यवलक्य  स्मृति में न्याय की अवधारणा

 याज्ञ्यवलक्य स्मृति में श्रुति स्मृति शिष्टाचार, विभिन्न समूह के चरित्र और व्यवहार, न्याय मीमांसा और राजकीय आज्ञाओं को कानून के आधार पर प्रतिपादित किया गया है ७ I

शुक्रनीति में  न्याय की अवधारणा

    शुक्रनीति में भी कानून के यह ही आधार माने गए हैं I शुक्र के अनुसार राजा को चाहिए कि वह देश, जाति, जनपद, कुल ,और श्रेणियां को लोकरीति और शास्त्रों में प्रतिपादित युक्तियों के अनुसार निरीक्षण करके अपने धर्म का पालन करें I देश जाति और कुल आदि के पूर्व से चले आ रहे धर्म का पालन करना आवश्यक है I अन्यथा प्रजा में क्षोभ उत्पन्न हो जाता है ८ I इन परंपरागत धर्म को शुक्राचार्य ने देश दृष्टि और वेद शास्त्र द्वारा प्रतिपादित धर्म को शास्त्र दृष्टि कहा है I इन कानून के अतिरिक्त राजा द्वारा लागू किए जाने वाले कानून के संबंध में शुक्र ने लिखा है कि राजा को चाहिए कि अपने शासन को लिखकर चौराहे पर लगवा दे ९ I जिससे उनका पालन करने में प्रजा से चूक ना हो I

कौटिल्य अर्थशास्त्र में न्याय की अवधारणा

आचार्य कौटिल्य समुचित न्याय को राज्य का प्राण मानते हैं , उनका मत है कि जो राज्य अपनी प्रजा को न्याय प्रदान नहीं करता वह शीघ्र नष्ट हो जाता है I उसके अनुसार न्याय का उद्देश्य प्रजा के जीवन और संपत्ति की रक्षा करना तथा सामाजिक तत्वों को दंडित करना है I कौटिल्य अर्थशास्त्र में कानून के चार आधार प्रतिपादित किए गए हैं I धर्म, व्यवहार, चरित्र, और राज्य शासन I कौटिल्य ने कहा है कि धर्म सत्य पर आश्रित होता है, व्यवहार साक्षियों पर, चरित्र मनुष्य के समूह में चली आ रही प्रथाओं पर, निर्भर करता है और राजा की आज्ञाओं को शासन कहते हैं १० I अर्थशास्त्र के अनुसार विवादों का निर्णय धर्म व्यवहार चरित्र और शासन वाले कानून द्वारा होता है  Iइसमें विरोध होने पर पश्चिम को पूर्व का बाधक माना जाता था ११ I इससे स्पष्ट है कि राज शासन का न्यायालय की दृष्टि से सर्वाधिक महत्व था I

न्याय व्यवस्था का सिद्धान्त

     प्राचीन काल में न्याय व्यवस्था को प्रतिपादित करने वाले अनेक ग्रंथ थे १२ I न्याय का मुख्य उद्देश्य है कि राष्ट्र में सुख और समृद्धि का प्रसार हो सबल व्यक्तियों को न सताने पाए I दंडनीय व्यक्ति दंड से मुक्ति ना हो और अदंडनीय व्यक्ति दंडित ना हो १३  Iराजा भी इस न्याय से मुक्त नहीं है  I अपराध सिद्ध होने पर वह भी दंडित होता है I राजा को चाहिए कि वह स्वयं न्याय का विवरण करें और न्याय को वितरित करने के लिए न्यायालय की स्थापना करके उसमें योग्य न्यायाधीशों की नियुक्ति करें I

राजा का विधि के अधीन

वशिष्ठ सूत्र में यह कहा गया है कि यदि दंड के योग्य कोई अपराधी दंड से छूट जाए तो राजा को एक दिन और एक रात भूखा रहना चाहिए I यदि किसी निरपराधी पुरुष को दंड मिल जाए तो राजपुरोहित को कृच्छव्रत करना चाहिए और राजा को तीन दिन और तीन रात उपवास करना चाहिए I चोर का अपराध उस राजा पर भी पड़ता है जो कर के अपराधों को क्षमा करता है I अपराधी के पापों को क्षमा करने वाला राजा पाप का भागी होता है १४ I

वृहदारण्यक उपनिषद

वृहदारण्यक उपनिषद के एक संदर्भ में ब्रह्म क्षत्र और विशः की उत्पत्ति का वर्णन करने के अनन्तर यह लिखा है कि, केवल ब्रह्म, क्षत्र और विशः की उत्पत्ति से काम नहीं चल सकता I अतः उन सब में श्रेष्ठ रूप धर्म की उत्पत्ति की गई या जो धर्म है वह क्षत्र का भी क्षत्र है I धर्म के ऊपर अन्य कोई सत्ता नहीं है  I यह धर्म ही है जिसके कारण बलवान और निर्बल सब एक साथ मिलकर रहते हैं I राजा इसी धर्म के द्वारा राज्य का शासन करता है I धर्म क्या है, सत्य ही धर्म है, इसलिए जो सत्य कहता है ,वह धर्म कहता है ,और जो धर्म कहता है ,वह सत्य कहता है I सत्य और धर्म एक ही बात है १५ I

गौतम सूत्र के अनुसार

जो राजा न्याय पूर्वक दंड देकर अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता उसे अपराधी समझना चाहिए १६ I आपस्तम्ब धर्म सूत्र में लिखा है कि यदि राजा एक दंडनीय अपराध के लिए दंड नहीं देता तो उसे अपराधी समझना चाहिए १७ I धर्म शास्त्रों के लिए निर्देश स्पष्ट रूप में सूचित करते हैं कि कानून के प्रयोग में राजा स्वतंत्र नहीं है अपितु स्वयं अपराध करने पर वह जहां स्वयं दंडनीय था I वहां यदि दंड शक्ति के प्रयोग में वह शिथिलता करता है तो भी उसे प्रेषित आदि के रूप में दंड ग्रहण करना होता था I

न्यायधीशों की योग्यता

   आपस्तम्ब धर्म सूत्र के अनुसार पूर्ण विद्वान, पवित्र कुल में उत्पन्न, वृद्ध, तर्क में निपुण और अपने कर्तव्य में सावधान व्यक्तियों को ही न्यायाधीश बनाना चाहिए १८ I चूकि प्राचीन काल में धर्म सत्य और उचित अनुचित के परिज्ञान के लिए श्रुति स्मृति का ही आसरा लिया जाता था I अतः ऐसा व्यक्ति ही न्यायाधीश हो सकते थे जो वेद शास्त्रों में पारंगत हो I वोधायन धर्म सूत्र में दशावरा परिषद का उल्लेख मिलता है जिसके 10 सदस्यों में से चार वेदों के ज्ञाता एक मीमांसक, वेदांगों का ज्ञाता, एक धर्म शास्त्रों का पंडित ,और तीन अन्य व्यक्ति होते थे १९ I गौतमधर्म सूत्र के अनुसार जिन विवादों में धर्मशास्त्र का ज्ञान आवश्यक नहीं होता था या जो विवाद कृषक व्यापारी में उत्पन्न होते थे उनमें सभासद भी कृषक, व्यापारी आदि वर्गों का होना चाहिए २० I याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार राजा को ऐसे सभासद नियत करने चाहिए जो धर्मज्ञ सत्यवादी बहुश्रुत अध्ययनशील और मित्र और सत्र में समदृष्टि रखने वाले हो I चूँकी राजा राज्य की अधिकता के कारण स्वयं व्यवहारों का अवलोकन नहीं कर सकता I अतः वह एक ऐसे ब्राह्मण को अन्य सभ्यों के साथ इस कार्य के लिए नियुक्त करें जो सब धर्म का वेत्ता हो २१ I

संदर्भ ग्रंथ

१-प्राचीन भारतीय सामाजिक एवं राजनीतिक विचार एवं संस्थाएं- डॉक्टर हरिश्चंद्र शर्मा -पृष्ठ -335 तथा   मनुस्मृति 8.41

२-धर्मशास्त्र का इतिहास - पांडुरंग वामनकाणे -पृष्ठ -700-701

३-ए हिस्ट्री ऑफ़ असिएंट इंडियन पॉलीटिकल आईडियाज- यू० एन० घोषाल- पृष्ठ -48

४-ऋग्वेद- 10.71.10

५- कोटिलीयम अर्थशास्त्रम -3.1

६-रामायण उत्तरकांड- 74.32 एवं 53.24-25

७- याज्ञयवल्क्य स्मृति- 1.3.7

८-शुक्रनीति सार -स्वामी जगदीश्वरानंद -4.5, 45-46

९-पूर्ववत- 1.313

१०-महाभारत- 69.32

११-विषादार्थ -चतुष्पाद पश्चिम पूर्वबाधक- पूर्ववत- 3.1

१२-कौटिल्य -डॉक्टर चंद्रदेव प्रसाद -पृष्ठ -95

१३-कौटिल्य का राज दर्शन- डा विप्लव- पृष्ठ संख्या -186

१४-वशिष्ठ सूत्र -19/ 40- 46

१५- वृहदारण्यक- 1/4/14

१६-गौतम -12/48

१७-आपस्तम्ब -2/11/28/13

१८-आपस्तम्ब धर्मसूत्र- 2/11/29/5

१९-बौधायन धर्मसूत्र -1/1/1/8

२०-गौतम धर्मसूत्र -20/ 23

२१- याज्ञवल्क्य स्मृति -2/2-3

Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.

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