प्राचीन भारत में मंत्रिपरिषद

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प्रशासन मे परामर्शदाताओ की अवस्यकता

प्राचीन भारत में सर्वतंत्र - स्वतंत्र और निरंकुश राजतंत्र के स्थापित हो जाने पर भी राजा को परामर्श देने और नियंत्रण में रखने के लिए परामर्शदाताओं और सहायकों की आवश्यकता का अनुभव किया गया था I राजशास्त्र के सभी आचार्यों ने मंत्रणा की आवश्यकता का प्रतिपादन किया है I अथर्ववेद में कहा गया है कि राज्य को सुस्थिर करने प्रगति की ओर ले जाने और प्रजा के कल्याण के हेतु राजा को ज्ञानी जनों का परामर्श निश्चित रूप से मिलना चाहिए I महर्षि व्यास का कथन है कि मंत्रियों के परामर्श के अनुसार कार्य करते रहने से ही राजा को विजय प्राप्त हो सकती है I मनु का विचार है कि ऐसा राजा मूर्ख व अयोग्य है जो प्रशासन का संचालन केवल अपनी बुद्धि से करता है और मंत्रियों के परामर्श को नहीं मानता I महाभारत, मनुस्मृति, कौटिल्य अर्थशास्त्र ,कामंदकीय नीतिसार, शुक्रनीतिसार ,आदि सभी ग्रन्थो में मंत्रियों की अनिवार्यता को प्रतिपादित किया गया है I

कौटिल्य का कथन

   कौटिल्य का कथन है कि राजा अकेला शासन नहीं कर सकता अतः उसको चाहिए कि मंत्रियों को नियुक्त करें १ I राज्य रूपी रथ एक पहिए से नहीं चल सकता, यदि एक पहिया राजा है तो दूसरा पहिया मंत्री है, मंत्री तो राजा के नेत्र हैं I इंद्र को हजार आंखों वाला इसलिए कहा गया है क्योंकि उसकी मंत्रिपरिषद में हजार ऋषि हैं I राजकार्य सहाय साध्य है ये कार्य तीन प्रकार के हैं प्रत्यक्ष, परोक्ष ,अनुमेयI प्रत्यक्ष कार्य तो राजा स्वयं देख सकता है, परंतु परोक्ष और अनुमेंय कार्यों के लिए उसको सहायकों की आवश्यकता है I यह कार्य अमात्यों द्वारा ही संपन्न किया जा सकते हैं २ I

मनु  का कथन

   मनु ने भी राजकीय कार्यों के संचालन के लिए मंत्रियों की स्थिति को अनिवार्य बताया है ३ I मंत्रियों की नियुक्ति गुणों के आधार पर होनी चाहिए I मंत्री के लिए अनिवार्य गुण है- वंशपरंपरागत होना, शास्त्रों का ज्ञान, प्रतिभा ,वीरता, लक्ष्य को प्राप्त करने की क्षमता ,और उत्तम कुल में जन्म लेना ४ I

शुक्र और वृहस्पति का कथन

   शुक्र और वृहस्पति मंत्रियों की आवश्यकता का प्रतिपादन करते हैं I राजा को स्वयं अकेले ही राज्य और शासन की नीति का संचालन नहीं करना चाहिए I वह मंत्रिपरिषद के मत को स्वीकार करके कार्य करें I अच्छे कार्यों को भी ज्ञानी जनों के मत के अनुसार ही करना उचित होता है Iअग्निपुराण और मत्स्यपुराण में भी कहा गया है कि राजा को नीति संबंधी निर्णय अकेले नहीं लेने चाहिए जो राजा हितेषी और ज्ञानी मंत्रियों के परामर्श को स्वीकार नहीं करता I वह बहुत समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता उसका पितृ परंपरागत राज्य भी सुरक्षित नहीं रहता ५ I

मंत्रिपरिषद के अधिकार और सामर्थ

    मंत्री परिषद के अधिकार और सामर्थ शास्त्रकारों द्वारा सुनिश्चित किए गए थे I इस संबंध में डॉक्टर के पी जायसवाल लिखते हैं - हिंदू संविधान का यह कानून और सिद्धांत है कि मंत्री परिषद की स्वीकृति और सहयोग के बिना राजा कोई कार्य नहीं कर सकता ६ I प्राचीन भारत की शासन पद्धति पर विचार करते हुए अल्तेकर महोदय लिखते हैं -सुशासन के लिए मंत्रियों का होना इतना आवश्यक समझा गया था कि युवराज और प्रांतीय शासको की नियुक्ति भी मंत्री करते थे I मौर्य शासन काल में तक्षशिला में प्रांत अधिकारी की भी मंत्रिपरिषद थी और वह उसके परामर्श से कार्य करता था I पुष्यमित्र के युवराज तथा मालवा के प्रांतअधिकारी की एक मंत्री परिषद थी I गुप्त साम्राज्य के समय में युवराज के मंत्रियों को युवराजपदीय कुमारामात्य कहते थे ७ I

अर्थशास्त्र मे मंत्रिपरिषद

कौटिल्य यह मानते थे कि राज्य कार्य बहुत होते हैं I वह एक साथ नहीं होते एक स्थान पर नहीं होते ,अतः एक राजा अपने सब कार्य नहीं कर सकता, ऐसे में सब कार्य अमात्यों या मंत्रियों से कराने चाहिए I उसने मंत्रियों के निर्माण का कारण स्पष्ट करते हुए कहा है कि ,राज्य का कार्य दूसरों की सहायता से ही संपन्न हो सकता है I एक पहिए से राज्य की गाड़ी नहीं चल सकतीI I अतः राजा सचिवों की नियुक्ति करें तथा उनकी बातें सुने ८ I

मंत्रिपरिषद में  सदस्य संख्या

मंत्री परिषद में कितने सदस्य रखे जाएं इस विषय में प्राचीन आचार्य में बड़ा मतभेद था I मनु का मत है - मंत्रियों की संख्या 7 से 8 होनी चाहिए ९ ,महाभारत 8 के पक्ष में है १०, अर्थशास्त्र इस विषय में विभिन्न मतों का उल्लेख करता है , जिससे पता चलता है कि मानव संप्रदाय वाले 12 बाहर बार्हस्पत्य पंथ वाले 16 और औशनस पंथ वाले 20 मंत्रियों के पक्ष में थे ११ ,शुक्र नीति 10 मंत्रियों की राय देताहै , १२ नीतिवाक्यामृतम के अनुसार मंत्री संख्या 3,5 या 7 से अधिक नहीं होनी चाहिए, किंतु चाणक्य किसी निश्चित संख्या के पक्ष में नहीं थे I उनका यह मत था कि जितनी सामर्थ तथा आवश्यकता हो उतनी ही मंत्री परिषद में स्थान नियत किए जाएं I यह अंतर इसलिए है कि मंत्रियों की संख्या निर्दिष्ट करते समय विभिन्न राज्यों पर थी ,इसलिए मनु १३ और कौटिल्य १४ इस बात में एकमत है कि हर एक राज्य की आवश्यकता अनुसार उसके मंत्रियों की संख्या निश्चित की जाए I

      भरत को उपदेश करते हुए राम ने उन्हे तीन-चार मंत्रियों के साथ मंत्रणा करने के लिए कहा है I कौटिल्य ने भी चार मंत्रियों के साथ चर्चा करने की आवश्यकता महसूस की है १५ I संभव है कि तीन से चार मंत्री, मंत्रिमंडल के सभासद हों और जिनके उपदेश पर राजा विशेष विचार करता है I ऐसा लगता है कि सात या आठ मंत्रियों के मंत्रिमंडल के अतिरिक्त आजकल की प्रिवी काउंसिल की भांति एक बड़ी परामर्शदात्री संस्था भी होती थी , जिसके सदस्य अमात्य कहे जाते थे १६ I महाभारत में उल्लेखित 36 अमात्यों की परिषद इसी प्रकार की संस्था थी अर्थशास्त्र से ज्ञात होता है कि अमात्य विभागों के अध्यक्ष जैसे उच्च पदस्थ अधिकारी होने पर भी मंत्रियों से सब पद में नीचे थे I इसलिए संख्या में भी अधिक थे १७ I आचार्य कौटिल्य के अनुसार राज्यवृत्ति तीन प्रकार की होती है  I प्रत्यक्ष ,परोक्ष ,और अनुभेय I जो अपने सामने हो वह प्रत्यक्ष है, जो दूसरे बताएं वह परोक्ष है तथा बिना किए हुए कर्म से कि ये का अंदाजा लगाना अनुमेय कहलाता है I सब काम एक साथ नहीं होता I राज कर्म बहुत से होते हैं और बहुत से स्थान पर होते हैं I अतः एक राजा सारे काम एक साथ नहीं कर सकता इसके लिए यह भी आवश्यक है कि मंत्री नियुक्ति किए जाएं I परोक्ष और अनुमेय राज कर्मों के संबंध में राजा को परामर्श देते रहें १८ I

मंत्रिपरिषद का कार्य

मंत्रिपरिषद का कार्य गुप्त हो इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता था I कौटिल्य के अनुसार इसके लिए ऐसा स्थान चुनना चाहिए जहां पंछियों तक की दृष्टि न पड़े I जहां से कोई बात बाहर का आदमी ना सुन सके, सुनते हैं कि शुक्र सारिका, कुत्ते आदि जीव जंतु तक से मंत्र का भेद खुल गया I यदि कोई मंत्र का भेद खोले तो उसे जान से मार दिया जाए I अत्यधिक गुप्त बातों पर राजा मंत्रिपरिषद में सलाह नहीं करते थे  I वह एक-एक मंत्री से अलग-अलग परामर्श करते थे और इस संबंध में कौटिल्य का यह आदेश था कि जिस बात पर सलाह लेनी हो उससे उल्टी बात इशारे से हो कि वह वस्तुतः किस बात पर सलाह लेना चाहता है I

        बड़ी मंत्रिपरिषद के अतिरिक्त एक छोटी उप समिति भी होती थी , जिसमें तीन या चार खास मंत्री रहते थे I इसे मंत्रिण कहा जाता था I जरूरी मामलों पर इसकी सलाह ली जाती थी I राजा प्रायः अपने मंत्रिण तथा मंत्रिपरिषद के परामर्श से ही राज्य कार्य का संचालन करता था I वह भली भांति समझता था कि मंत्री सिद्ध अकेले कभी नहीं हो सकती जो बात मालूम नहीं हो उसे मालूम करना जो मालूम हो उसका निश्चय करना I जिस बात में दुविधा है उसके संशय को नष्ट करना, और जो बात केवल आंशिक रूप से मालूम है उसे पुराण में जानना I यह सब कुछ मंत्रिपरिषद के द्वारा ही हो सकता है I अतः जो लोग बुद्धि, वृद्धि हो उन्हें सचिव या मंत्री बनाकर उनसे सलाह लेनी चाहिए  I मंत्रिपरिषद में जो बात भूपिष्ट अधिक संख्या के कहें उसी के अनुसार कार्य करना उचित है कि वह उसी सलाह को माने जो उसकी दृष्टि से कार्य सिद्ध कर सकती हो १९ I जो मंत्री उपस्थित ना हो उसकी संपत्ति पत्र द्वारा मांग की जाए I मंत्रिपरिषद में केवल ऐसे ही व्यक्तियों को नियुक्त किया जाए जो सर्वोपाद्याशुद्ध हो , अर्थात सब प्रकार से परीक्षा करके जिनके विषय में निश्चय हो जाए कि वह सब प्रकार दोषो व निर्बलताओं से विरक्त है I

कौटिल्य अर्थशास्त्र में मंत्रिपरिषद की सदस्यता

कौटिल्य के मातानुसार मंत्रिपरिषद की सदस्यता सर्वसाधारण के लिए सुलभ नहीं है I वह मंत्रिपरिषद की सदस्यता के लिए कतिपय विशेष योग्यताएं निर्धारित करते हैं I इन योग्यताओं का समुच्चय अमात्य संपादक के नाम से संबोधित किया गया है I वह योग्यताएं इस प्रकार बताई गई हैं ,अपने ही जनपद और उत्तम कुल में उत्पन्न,उत्तम बंधु बंधावों से संपन्न, शिल्प विद्या में कुशल ,तीव्र दृष्टि युक्त, विद्वान, स्मृतिवान, चतुरवक्ता, प्रगल्भ ,कुशल प्रबंधक ,उत्साही, प्रभावशाली, कलेश सहन करने में समर्थ ,पवित्र स्नेही, दृढ़ भक्ति युक्त, सील ,बल ,आरोग्य, तथा सत्वसंपन्न जड़ता तथा चपलता रहित ,सर्वप्रिय होना, और व्यर्थ वैर ना करना ,अमात्य की संपदा है २०, अर्थात मंत्री परिषद की सदस्यता हेतु यह गुण और योग्यताएं वांछनीय मानी गई है I कौटिल्य ने मंत्रिपरिषद के सदस्यों को उनके गुण एवं योग्यताओं के आधार पर तीन श्रेणियां में विभक्त किया है वे क्षुद्र, अमात्य कोटि में समझे जाने चाहिए २१ I

निष्कर्ष

    कौटिल्य अर्थशास्त्र में मंत्रिपरिषद के विषय में जो वर्णन उपलब्ध है उसे ज्ञात होता है कि मंत्रिपरिषद में एक अध्यक्ष होता है I मंत्रिपरिषद की बैठकें इसी अध्यक्ष की देखरेख में होती है या अध्यक्ष कार्य उपस्थित होने पर राजा मंत्रिपरिषद को बुलाता है २२I  सामान्यतः मंत्रीपरिषद की बैठकें स्वतंत्र रूप में मंत्रिपरिषद के अध्यक्ष के अधीन होती थी I कौटिल्य ने मंत्रिपरिषद के अध्यक्ष का पद बड़े महत्व का माना है I राज्य के 18 तीर्थ में मंत्रिपरिषद के अध्यक्ष को भी स्थान दिया गया है २३ I मंत्रिपरिषद के निर्णय बहुमत से होते थे I इस विषय में कौटिल्य ने अपना मत इस प्रकार व्यक्त किया है अति आवश्यक कार्य के उपस्थित होने पर राजा को मंत्रिपरिषद बुलानी चाहिए २४ I मंत्रीपरिषद की बैठक में जिस विषय की पुष्टि बहुमत द्वारा होती हो I इस निर्णय के कार्यान्वित करने वाले उपायों को अपनाना चाहिए २५ I

संदर्भ ग्रंथ

१-कौटिल्य अर्थशास्त्र -तृतीय अधिकरण

२-कौटिल्य अर्थशास्त्र- 1.3

३-मनुस्मृति 7.55

४-मनुस्मृति 7.54

५- यो राजा मंत्रिणा वाक्यं न करोति हितैषिणाम I

      न स तिष्ठेच्चिरं राज्ये पितृपतामहेडपि च II

६-के पी जायसवाल प्राचीन भारतीय राज्यशास्त्र पृष्ठ संख्या 276 -277

७- ए एस अल्तेकर प्राचीन भारतीय शासन पद्धति पृष्ठ संख्या- 137

८-अर्थशास्त्र 1/4

९-सचिवान्सप्त चाष्टौ वा कुर्वित सुपरिक्षितान् * मानसोल्लास 2,2,57 में यही श्लोक उद्धृत किया है

                किंतु सुपारीक्षितान की जगह मतिमाभृपः यह पाठ दिया है

१०- आष्यना मंत्रिणा मध्ये मंत्रं राजो पधारयेत्// 1 2.85

११-भाग एक अध्याय 15

१२-शुक्र ने मंत्रिपरिषद की संख्या 10 निर्धारित की है -शुक्र नीति 2-70-71

१३-मनुस्मृति 7/61

१४-यथासामर्थ्यमिति कौटिल्य 11.15

१५- मंत्रिभिचश्रतु भिर्वा सह मंत्रयेत

१६-12,85,7-8

१७-अर्थशास्त्र 1.8

१८-कौटिल्य अर्थशास्त्र 1/5

१९- कौटिल्य अर्थशास्त्र

२०-कौटिल्य अर्थशास्त्र वार्ता 1, अ09 अ01

२१- कौटिल्य अर्थशास्त्र वार्ता 2 अ0 1

२२-कौटिल्य अर्थशास्त्र वार्ता 63, अ01

२३-कौटिल्य अर्थशास्त्र वार्ता 08, अ12 अ01

२४-कौटिल्य अर्थशास्त्र वार्ता 63, अ15 अ01

२५-कौटिल्य अर्थशास्त्र , अ015 अ1

Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.

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