प्राचीन भारत में राजदूत
दूत का महत्व
प्राचीन भारत में दूत का कार्य था कि गुप्तचर विभाग का संगठन करें I दूत एक कूटनीतिज्ञ अधिकारी भी था I जो अपने राज्य का अन्य राज्यों के साथ संबंध सुनिश्चित करता था १ I साधारण शब्दों में संदेश ले जाने वाले को दूत कहा जाता है I जिस व्यक्ति को एक राजा या राज्य द्वारा दूसरे राजा के पास कोई संदेश पहुंचाने के लिए नियुक्त किया जाता है उसे राजदूत की संज्ञा दी जाती है I कामंदक आदि आचार्य ने राजदूत के पद को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हुए भी उसे एक विशेष चर कहा है I डॉक्टर चक्रवर्ती ने वार इन असिएंट इंडिया में लिखा है कि- प्राचीन भारत में राजदूत कुछ परंपरागत नियमों से सुरक्षित एवं सम्मानित चर मात्र ही होता था २ I भारत में बहुत प्राचीन समय से ही राजदूतों के प्रयोग की प्रथा थी I वैदिक साहित्य में अनेक संस्थाओं पर दूत का उल्लेख आया है I जो एक सम्मानित व्यक्ति समझा जाता था I प्राचीन भारत के प्रायः सभी राजशास्त्रियों ने राजदूत की आवश्यकता एवं उपयोगिता को स्वीकार किया है I
राजदूत अंतरराष्ट्रीय परिवार के विभिन्न सदस्यों के बीच संबंध जोड़ने का एक सूत्र है I यह अपने देश के हितों को दूसरे देशों के हितों से अग्रिम रखने का माध्यम होते हैं ३ I मनु के अनुसार संधि, विग्रह दोनों कार्य ही दूत के अधीन रहते हैं ४ I वास्तव में राजदूत की महत्ता और आवश्यकता श्री कृष्ण ने महाभारत में वर्णित की है ५ I प्राचीन काल में राज्य के सुसंचालन हेतु राजदूतों और गुप्त चरो के सहयोग की आवश्यकता स्वीकार की गई है I यह दो राज्य कर्मचारी राज्य संचालन में उपयोगी और आवश्यक बतलाए गए हैं I लगभग सभी राज्यशास्त्र प्रणेताओं ने राजा के कर्तव्य पालन के लिए राजदूत और गुप्त चरो की उपयोगिता प्रमाणित की है I
मनु ,भीष्म, शुक्र ,कौटिल्य ने इन दोनों को क्रमशः राजा का मुख ,और नेत्र बताया है I कौटिल्य ने राजदूत को राजा का मुख माना है क्योंकि दूत रूपी मुख द्वारा ही राजा लोग एक दूसरे से बातचीत करते थे ६ I राजा के सो जाने पर भी यह दोनों इंद्रियां निरंतर कार्य करती रहती हैं ७ I कामंदक के मतानुसार दूत के संकेत पर ही राजा को शत्रु पर आक्रमण करना चाहिए I कामंदकीय नीतिसार में एक स्थान पर यहां तक कहा गया है की बुद्धि और गुणों से युक्त चतुर दूतों के द्वारा शत्रुओं के छिद्रो को देखें I यदि राजा ऐसे दूतों से रहित हो तो वह अंधे मनुष्य के समान होता है I
महर्षि वाल्मीकि के अनुसार राजदूत का महत्व
महर्षि वाल्मीकि ने राजाओं में परस्पर बात करने का प्रधान साधन राजदूत ही बताया है इसलिए प्रत्येक काल और राज्य में राजदूत पद उपयोगी एवं आवश्यक समझा जाता रहा है I तत्कालीन संहिताओं में राजदूत पद की उपयोगिता एवं आवश्यकता के भरपूर प्रमाण मिलते हैं I प्राचीन भारतीय ग्रन्थों केअवलोकन से स्पष्ट हो जाता है कि राजदूत की प्रक्रिया एवं व्यवहार के अनेक सिद्धांत भारतीय मनुष्यों द्वारा प्रतिपादित किए गए हैं I राजनीतिक दूतों का उल्लेख प्राचीनतम धर्मशास्त्र मनुस्मृति में भी मिलता है I तदनुसार राजदूत की नियुक्ति राजा द्वारा की जाए I सेना का नियंत्रण सेनापति करें I सेना प्रजा पर नियंत्रण करें I राज्य की सरकार पर राजा नियंत्रित करें तथा युद्ध एवं शांति का निर्णय राजदूत द्वारा किया जाए ८ I रामायण में राजनीतिक दूतों की नियुक्ति के दो उदाहरण मिलते हैं –
नंबर 1 - श्री हनुमान जी सीता की खोज खबर लेने राजदूत बनकर रावण के दरबार में उपस्थित हुए ९
नंबर 2- एक अन्य अवसर पर अंगद को दूत बनाकर रावण के दरबार में भेजा गया ताकि रावण के विरुद्ध अंतिम रूप से युद्ध की घोषणा करने से पूर्व शांति समझौता किया जा सके १० I
प्राचीन भारत में राजदूत की परंपरा
धर्म ग्रंथो के उदाहरण चाहे ऐतिहासिक सत्यता न रखते हो किंतु यह तो सिद्ध करते हैं कि प्राचीन भारत में तदर्थ राजनीतिक दूत भेजने की परंपरा थी I अग्नि पुराण एवं नीति वाक्यामृतम में भी राजनीतिक प्रतिनिधियों का उल्लेख मिलता है I भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जिनमें यह सिद्ध होता है कि बुद्ध काल में राजनीतिक प्रतिनिधि भेजे जाते थे I
शुक्र नीति मे राजदूत
महर्षि शुक्र ने दूत को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना है I इसलिए उन्होंने शुक्र नीति में दूत को मंत्रिपरिषद के 10 सदस्यों में स्थान दिया है I शुक्र की दृष्टि में दूत मात्रा राज कर्मचारी नहीं है वरन् वह पुरोधा, प्रतिनिधि ,प्रधान, सचिव, मंत्री, पंडित, सुमंत्र ,और अमात्य के साथ राज दरबार का महत्वपूर्ण अंग है I वह राजा को अंतरराष्ट्रीय महत्वपूर्ण विषयों पर मंत्रणा देता है I यद्यपि श्रेष्ठतम के क्रम में अमात्य के बाद दूत का स्थान आता है किंतु महत्वपूर्ण यह है कि दूत को शुक्राचार्य ने उच्च स्थान प्राप्त 10 राज्य अधिकारियों में सम्मिलित किया है I वह अन्य राज्य कर्मचारियों से श्रेष्ठ माना गया है I महत्वपूर्ण स्थान देने के बाद भी शुक्र नीति में दूत के संबंध में बहुत कम उल्लेख मिलता है I कौटिल्य अर्थशास्त्र की शासन व्यवस्था में राजदूत का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है I राजदूत को सदैव राज सिंहासन के समीप स्थान दिया जाता था I उसकी बात को अत्यंत ध्यान पूर्वक सुनकर उसका उपयुक्त उत्तर देकर उसे विदा किया जाता था I
अन्य आचार्य की तरह कौटिल्य भी राज्य व्यवस्था में भी राजदूत अबध्य माने जाते थे I यह नियम दूत कर्म संपन्न करने के लिए नितांत आवश्यक था , क्योंकि राजदूत द्वारा दिए जाने वाले संदेश प्रिया और अप्रिय दोनों प्रकार के हो सकते थे, किंतु राजदूत जो कुछ भी कहता था वह अपने राजा का दिया हुआ संदेश होता था I अतः उनमें राजदूत का कोई दोष नहीं माना जाता था I
राजदूतों की योग्यता एवं नियुक्ति प्राचीन विचारकों की दृष्टि में राजदूत का पद महत्वपूर्ण होने के कारण इस पद पर विविध गुणों से संपन्न व्यक्ति की नियुक्ति होनी चाहिए थी I दूत को नीति कुशल बुद्धिमान और राजा के आदेशों का पालन करने वाला होना चाहिए ११ I रामायण के अनुसार दूत को स्वामी के निर्दिष्ट कार्यों के हित के विरुद्ध नहीं होना चाहिए , जो दूत स्वामी की आज्ञा का विरोध करके मनमानी रूप से कार्य करता है वह बध्य होता है १२ I
महाभारत में राजदूत की सात अहर्ताओं पर प्रकाश डाला गया है कुलीनिता ,उच्च कुल उत्पन्न,१३ वाद्मिता ,दक्षता,१४ मधुर वाणी ,निर्देशानुसार संदेशवाहिता ,स्मृति संपन्नता १५ I वाल्मीकि के अनुसार यदि एक अमात्य बुद्धिमान स्थिर विचार कुशल और नीति शास्त्र में अभ्यागत हो तो वह राजा को विजय श्री प्राप्त कर सकता है I उसी प्रकार दूत भी ईमानदार कुल परंपरागत शुद्ध हृदय श्रेष्ठ स्वभाव यथार्थवादी होना चाहिए १६ I
शुक्र नीति में उल्लेख किया गया है कि राजदूत के पद पर उस व्यक्ति की नियुक्ति करनी चाहिए जो लोगों के हृदयगत भावों तथा सिस्टम को समझने की योग्यता रखता हो, प्रखर स्मरण शक्ति वाला हो, देश काल के अनुसार कर्तव्य कर्म को जानने वाला हो, राजनीति के छः उपाय संधि, विग्रह, यान ,आसन, समाश्रय ,और द्वैधीभाव के विषय में उचित विचार करने वाला हो, तथा जो बोलने वाला हो ,तथा बोलने में चतुर, व निर्भीक हो १७ I श्रेष्ठ मंत्री के रूप में राजदूत में अधोलिखित गुणों का समावेश होना चाहिए -सत्य बोलने वाला, उच्च वंश में उत्पन्न ,धनी, निर्दोष, कुल वाला ,सुशील ,अलसी रहित ,स्वामी के प्रति निष्ठावान ,मधुर भाषी, संतोषी ,कार्य में चतुर, और बुद्धिमान I
राजदूत के गुण
आचार्य कौटिल्य ने भी राजदूत के गुण अमात्य के सामान बताएं हैं उनके अनुसार राजदूत को हृदय का पवित्र , चतुर , कूटनीतिज्ञ, साहसी ,निर्भीक, बुद्धिमान, नीति शास्त्र में निपुण, आदि गुणों से परिपूर्ण होना चाहिए १८ I कामंदक ने भी दूत के विषय में कहा है कि जो प्रकल्प या निडर होकर बोल सके, स्मरण शक्ति वाला हो सकता हो, शास्त्र विद्या और नीति सार में निपुण हो, जिसे दैत्य कर्म का अभ्यास हो, वही राजदूत बनने के योग्य होता है I
महाभारत से ज्ञात होता है कि कौरवों की सभा में श्री कृष्ण पांडवों के निः सृष्टार्थ दूत के रूप में ही गए थे ,क्योंकि युधिष्ठिर ने उनसे कह भी दिया था कि हे कृष्ण जो बात हमारे हित की हो वही दुर्योधन से कहना I इसी प्रकार अंगद रावण की सभा में श्री राम का दूत बनकर गए थे I वह केवल शासन हर था क्योंकि इसके द्वारा रावण को अंतिम सूचना दी गई थी I
श्री राम की ओर से अंगद ने रावण से कहा था सीता देहु मिलहुन त आवा काल तुम्हारा II इसी प्रकार मार्कंडेय पुराण में जाना जाता है कि भगवती दुर्गा ने भगवान भूतनाथ को दूत बनाकर शुंभ- निशुंभ नामक बड़े घमंडी दानवों के पास भेजा था और कहलवाया था कि इंद्र को स्वर्ण मिले देवता यज्ञ भाग पावें और तुम जीना चाहते हो तो पाताल चले जाओ
प्राचीन भारतीय इतिहास में दूतों का सत्ता के और अनेक निर्देश विद्यमान है पर ये दूत प्रायः विशेष प्रयोजन और कुछ निश्चित समय के लिए भेजे जाते थे I वर्तमान समय के दूतावासों के समान प्राचीन भारत में भी दूतावासों की सत्ता थी वह भली भांति स्पष्ट नहीं है I यद्यपि कौटिल्य अर्थशास्त्र में दूतों का जिस ढंग से वर्णन है उससे विदित होता है कि वह अपने साथियों के साथ विभिन्न राज्यों में पर्याप्त समय के लिए निवास किया करते थे I
राजदूत के कर्तव्य
राजदूत का प्रमुख कर्तव्य शांतिपूर्ण साधनों द्वारा राष्ट्रीय हित की अभिवृद्धि करना है I यदि किसी राज्य को अपने हितों की रक्षा के लिए युद्ध करना पड़े तो यह उसके राजदूत की असफलता मानी जाएगी I आचार्य कौटिल्य के मतानुसार राजदूत आदर्शों को लक्ष्य मानकर नहीं चलता वरन राज्य के लिए वास्तविक सफलता प्राप्त करना ही उसका लक्ष्य होता है I नीति की सफलता को उसके प्राप्त होने वाले फल की कसौटी पर रखकर परखना चाहिए १९ I के एम पन्नीकर के अनुसार- एक राज नयज्ञ का मुख्य कार्य अपने देश का नाम ऊंचा रखना इसके लिए आदर भाव बनाए बनाना तथा इसके प्रति सद्भावना पैदा करना है २० I इन कार्यों को संपन्न करके वह अपने राष्ट्रीय हितों की उपलब्धि का प्रयास करता है I कार्य सिद्ध हो जाने पर शत्रु राजा यदि राजदूत को रोके रखना चाहता है तो दूत को इस अप्रत्याशित स्थिति और शत्रु राजा की मन: स्थिति पर गंभीरता पूर्वक विचार करना चाहिए I
निष्कर्ष
कौटिल्य ने राजदूत को अवध माना है I रामायण और महाभारत में भी दूत की हत्या को धर्म बताया गया है I राजदूतों को बंदी बनाया जा सकता है पर उनकी हत्या कदापि नहीं की जा सकती I कौटिल्य के शब्दों में कोई चांडाल भी राजदूत के पद पर नियुक्त किया गया हो तो राजधर्म के अनुसार वह भी अवध्य है २१ I कौटिल्य अर्थशास्त्र के अध्ययन से प्रतीत होता है की विशेष अवसरों पर पर राष्ट्रों में दूत भेजे जाते थे I वह प्रयास आजकल की तरह स्थाई रूप से पर राज्यों में नहीं रहते थे २२ I
संदर्भ ग्रंथ
१- कामंदक नीति सार- 12.32
२-सैन्य विज्ञान मंजर ,श्यामलाल ,भाग ,1 ,पृष्ठ- 83
३-द प्रिंसिपल एंड प्रैक्टिस ऑफ़ डिप्लोमेसी के एम पन्निक्कर - पृष्ठ 6
४-दूत एवं हि संधत्ते भितत्येव च संहतान्
दूतस्तत्कुरुते कर्म भिदान्ते येन मानवा II मनुस्मृति -7/66
५-राजनय के सिद्धांत, हरिश्चंद्र शर्मा- पृष्ठ- 5
६- कामंदकीय नीतिसार- 30.12
७-दूतमुखा हि राजानः कौटिल्य अर्थशास्त्रम -डॉक्टर रघुनाथ सिंह- 1.16
८-मनुस्मृति- 7/65
९-रामदूत अतुलित बल धामा
अंजनि पुत्र पवनसुत नामा -रामचरितमानस -तुलसीदास
१०-पूर्ववत
११-भटिट काव्य9.119
१२-महाभारत उद्योग पर्व 37.27
१३-मनुस्मृति 7.63
१४-मनुस्मृति 7.64
१५-महाभारत शांति पर्व 65-28
१६-रामायण कालीन युद्ध कला, डा लल्लन जी सिंह , पृष्ठ संख्या -214
१७-हिंदू राजशास्त्र ,अंबिका प्रसाद वाजपेई ,पृष्ठ संख्या -303
१८-कौटिल्य अर्थशास्त्र -1.7
१९-कौटिल्य अर्थशास्त्र- 1.5
२०- दि प्रिंसिपल्स एंड प्रैक्टिस ऑफ़ डिप्लोमेसी, के एम पन्निकर - पृष्ठ 34
२१-कौटिल्य अर्थशास्त्र, जयकुमार जैन, पृष्ठ संख्या -112
२२-कौटिल्य का राज दर्शन ,डा विप्लव- पृष्ठ संख्या -142
Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.
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