प्राचीन भारत में शासन प्रणालिया

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प्राचीन भारत में शासन प्रणालियों का परिचय

  प्राचीन भारत में प्रचलित विभिन्न प्रकार के शासन प्रणालियों का परिचय अवदान शतक ,आचारांग सूत्र, और वर्तमान शोध ग्रन्थों में मिलता है I इससे स्पष्ट है कि प्राचीन भारत में निर्मित तंत्र गणतंत्र, प्रजातंत्र आदि शासन प्रणालियां प्रचलित थी और साथ ही नृपतंत्र प्रजातंत्र में परिणित हो सकता था I प्राचीन भारतीय शासन प्रणालियों के विभिन्न रूपों का वर्णन प्रोफेसर जायसवाल द्वारा समीचीन ढंग से किया गया है I

भोज्य शासन प्रणाली

प्रोफेसर जायसवाल के अनुसार प्राचीन भारत में एक भोज्य शासन प्रणाली प्रचलित थी I यह वह शासन प्रणाली थी जिसमें भोजक या भोज शासन व्यवस्था का संचालन करते हैं I यह भोज वंश परंपरागत रूप से अपने पद ग्रहण नहीं करते थे वरन इन शासन व्यवस्था का नेतृत्व एक से अधिक व्यक्तियों के हाथ में रहता था I महाभारत में तथा अनेक शिलालेखों में भोज अथवा भोजक का नाम आया है I प्राचीन भारत में जिस भाग के लोगों में यह शासन व्यवस्था प्रचलित थी उसको बाद में भोज की संज्ञा प्रदान कर दी गई I अपनी विशिष्ट शासन प्रणाली के कारण ही पश्चिमी भारत की एक जाति के लोग भोज कहलाते हैं १ I

स्वराज शासन प्रणाली  

शासन प्रणाली का दूसरा रूप स्वराज शासन प्रणाली का था जो अधिकतम पश्चिमी भारत में प्रचलित थी I इसमें शासन को स्वराट् कहा जाता था I जिसका शाब्दिक अर्थ होता था . शासन करने वाला I यह स्वराट् समान लोगों में ही निर्वाचित होकर उनका नेतृत्व करता था  I

वैराज्य शासन प्रणाली

शासन प्रणाली का तीसरा रूप वैराज्य राज्य शासन प्रणाली था I जिसमें बिना राजा के ही शासन व्यवस्था को संचालित करने का प्रयास किया जाता था I इस प्रणाली में शासन की सारी प्रजा को राजपद के लिए राजतिलक कर दिया जाता था I कौटिल्य ने अपने ग्रंथ अर्थशास्त्र में इस शासन प्रणाली का उल्लेख किया है किंतु वह इसे एक उपयुक्त शासन व्यवस्था न मानकर इसको अस्वीकार करता है  

राष्ट्रीय शासन प्रणाली 

शासन प्रणाली का चौथा रूप राष्ट्रीय शासन प्रणाली का था I पश्चिमी भारत में बसे हुए राष्ट्रीय लोगों की अपनी शासन प्रणाली थी जिसमें राजपद ना तो वंश परंपरागत होता था और ना ही इस पद पर किसी एक व्यक्ति का आधिपत्य होता था I भोज्य शासन प्रणाली की तरह इस शासन व्यवस्था के आधार पर भी संबंधित लोगों का नामकरण किया गया  I

द्वैराज्य शासन प्रणाली

शासन प्रणाली का पांचवा रूप द्वैराज्य शासन था इसे भारत के राजनीतिक जीवन की एक विशेषता माना जाता है क्योंकि अन्यत्र कहीं भी इसका उदाहरण नहीं मिलता है इस प्रणाली में एक राज्य का शासन संचालित करने के लिए एक साथ दो राजा या शासक नियुक्त किए जाते थे I  यह व्यवस्था एक तंत्र से भी भिन्न है और गणराज्यों से भी अनेक शिलालेखों से इस शासन प्रणाली के अस्तित्व का ज्ञान होता है I शासन प्रणाली का एक अन्य रूप अराजक राज्य था जिसमें बिना शासन के शासन प्रणाली को संचालित करने का प्रयास किया जाता था I इसमें किसी भी व्यक्ति विशेष को शासन मानने की अपेक्षा केवल धर्मशास्त्र या कानून को ही शासन मान लिया जाता था I नागरिक परस्पर निश्चय कर लेते थे तथा अपने आप को इस रूप में प्रकाशित करते थे I कई एक धर्मशास्त्र इस प्रकार की शासन प्रणाली के अस्तित्व को प्रमाणित करते हैं जबकि महाभारत आदि कुछ ग्रन्थों में इस व्यवस्था का प्रयास किया गया है I

भारत के राजनीतिक सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास का प्रभाव काल

भारत के साहित्य में सबसे प्राचीन २ ग्रंथ ऋग्वेद ३ सामवेद ४  यजुर्वेद ५और अथर्ववेद ६ है तथा उनकी रचना वैदिक काल में मानते हैं ७ I इतिहासकार इस बात पर एकमत है कि भारत के राजनीतिक सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास का प्रभाव वैदिक काल से ही होता है  I

वैदिक काल

के प्रारंभिक खंड को ऋगवैदिक काल और बात के कालखंड को उत्तर वैदिककाल कहा जाता है I इसकी कालावधि आज भी विवाद ग्रस्त है I अनेक महत्वपूर्ण स्रोतों से यह माना जा सका है कि ऋग्वेद काल संभवत 3000 ईसा पूर्व से 2000 ईसा पूर्व तक और उत्तर वैदिक काल 2000 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व तक रहा था I  दोनों कॉल खण्डों में समायान्तर के साथ आर्यों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संगठन में न्यूनाधिक परिवर्तन हुए थे I अर्थशास्त्र, नीतिशास्त्र , पाणिनी के अष्टाध्याई , आदि में प्राचीन भारतीय राजव्यवस्था का व्यापक वर्णन है I कौटिल्य के अर्थशास्त्र तथा पुराण साहित्य अत्यंत व्यापक हैं I इनका रचना काल ईसा के बाद पांचवी तथा दसवीं शताब्दी का माना जाता है I

वायु पुराण

पुराणों की संख्या 18 है पुराणों में राजनीतिक विचारों का उल्लेख मिलता है I वायु पुराण ,अग्नि पुराण ,मार्कंडेय पुराण ,विष्णु पुराण ,तथा मत्स्य पुराण में राजधर्म का वर्णन अपेक्षाकृत अधिक आया है Iवायु पुराण में सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था की उत्पत्ति का उल्लेख है I

अग्नि पुराण

के अनुसार राज्य एक नैतिक संघ है जिसमें राजा अथवा शासन जनकल्याण का सर्वोच्च साधन है ८ I अग्नि पुराण में राजा के गुणों कर्तव्य और अभिषेक का विस्तार से वर्णन किया गया है  I इसमें राजपूत्रो राज्य अधिकारियों दूतों आदि के संबंध में भी व्यापक वर्णन किया गया है I  इसके अतिरिक्त कर तथा न्याय संबंधी सिद्धांत भी उल्लेखित हैं I

मार्कंडेय पुराण

में शासन का कर्तव्य प्रजा को संतुष्ट रखने बताया गया है I उप पुराणों में भी राजनीति का वर्णन आता है I    जिसकी सामग्री मुख्यतः पुराणों पर ही आधारित है  I

कामंदकीय नीतिसार  

राज्यशास्त्र प्रणेताओं ९ मैं कामंदक का स्थान महत्वपूर्ण है  I कामंदकीय नीतिसार काव्य रूप में राजधर्म पर लिखा गया प्रथम ग्रंथ है  I यद्यपि नीति सार की गणना नीति पर लिखे गए गन्थ्रों में होती है I  किंतु अलतेकर के मतानुसार व्यवहारतः तक यह कौटिल्य के अर्थशास्त्र का सारांश मात्र है ११ I कमंदक ने राज्य में राजा का स्थान सबसे ऊंचा माना है १२  I कामंदक ने युवराज पद के लिए ज्येष्ठता के सिद्धांत को मान्यता दी है साथ ही यह भी कहा है की बुरी वृत्ति वाले राजपुत्र का त्याग नहीं करना चाहिए, उसे दुष्ट हाथी की तरह सुख बंधन में रहना चाहिए अन्यथा वह शत्रु का आश्रय लेकर राजा को मारेगा १३  I

कामंदक के अनुसार राजा का उद्देश्य प्रजा को धर्म अर्थ और काम की प्राप्ति में सहायता देकर सब प्रकार हित करना है I कामन्दकीय नीति सार में सभा अथवा परिषद का उल्लेख नहीं है किंतु मंत्रणा के लिए दुर्ग का उल्लेख आया है I कामंदक ने कहा है कि राजा को विचार करते हुए मंत्र को सदा गुप्त रखना चाहिए I इसके गुप्त रहने से रक्षा होती है १४ I  कामंदक के अनुसार राजा का पुरोहित त्रयी विद्या और दंड नीति में कुशल होना चाहिए    I कामंदक ने राज्य कर्मचारियों की योग्यताओं कोष की स्थिति आदि के विषय पर विस्तार से लिखा है I कामंदक का मत है कि दंड नीति के आश्रित थी जगत की स्थित है दंड के सम्यक प्रयोग की नीति को दंडनीति कहते हैं १५ I दंड नीति के नियमों एवं सिद्धांतों का सम्यक प्रयोग प्रजा के कल्याण के लिए नितांत आवश्यक है I

भर्तृहरि के नीतिशतक

में राजनीतिक सिद्धांतों व संस्थाओं का कोई महत्वपूर्ण उल्लेख नहीं है I जबकि इसी श्रेणी के अन्य ग्रन्थों यथा सोमेश्वर के अभिलाषीतार्थ  ,चिंतामणि भोज के युक्ति कल्पतरु, लक्ष्मीधर्म के राजनीतिक कल्पतरु ,देवन भट्ट के राजनीति काण्ड ,चंदेश्वर के राजनीतिक प्रकाश, में राजव्यवस्था से संबंधित वर्णन मिलता है I इसके अतिरिक्त विषाखदक्त के मुद्राराक्षस, कालिदास के रघुवंश, बाणभट्ट की कादंबरी ,और हर्षचरित शूद्रक के मृच्छकटिक, सुबन्धु के वासवदत्ता, विष्णु शर्मा के पंचतंत्र ,सोमदेव के क धारित सागर, डंडी के दसकुमार चरित्र ,में भी कहीं-कहीं राजनीतिक विचारों व संस्थाओं का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उल्लेख है I

कालिदास

रघुवंश में रघुवंश के 17 राजाओं के चरित्र और राजधर्म का चित्रण किया गया है  I कालिदास के अनुसार धर्म ही राजनीति और काम को निर्धारित करता है  I राज्य धर्म में निहित सामाजिक व्यवस्था की देखरेख का साधन है १६  इसी प्रकार अन्य ग्रन्थों में भी स्थान स्थान पर राजधर्म का वर्णन आया है   I

निष्कर्ष  

साहित्य के अतिरिक्त प्राचीन भारतीय शासन पद्धति के अध्ययन के लिए शिलालेख तामपत्र तथा मुद्रा पर अंकित अभिलेख भी महत्वपूर्ण स्रोत है I शिलालेख मौर्य सम्राट अशोक के शासनकाल में मिलते हैं I प्राचीन शिलालेखों का अभाव है फिर भी जो शिलालेख मिलते हैं I उनमें तत्काल में भारत की राजनीतिक सामाजिक व धार्मिक स्थिति की जानकारी मिलती है I ताम्र पत्रों पर प्राप्त अंकित लेखो के विषय में अलतेकर का मत है कि यह लेखराज कवियों या शासकीय अधिकारियों द्वारा लिखे जाते थे I  इसलिए राजा के संबंध में अतिशयोक्ति दृष्टिगोचर होती है  I

प्राचीन भारतीय राजव्यवस्था के अध्ययन में मुद्रा शास्त्र भी उपयोगी है I  मुद्राओं पर अंकित जो अभिलेख मिले हैं उनमें राज्यों की जानकारी मिलती है I  शिवि ,मालवा ,अर्जुनायन, कुणिदे ,योधेय आदि गणतंत्र का अस्तित्व मुद्रा लेखों से स्पष्ट होता है १७ I

संदर्भ ग्रंथ

१-एच पी जायसवाल -हिंदू पालिटी –पेज- 80

२-वेद संसार के प्राचीनतम ग्रंथ हैं  I वेद शब्द ज्ञांनार्थक विद धातु में धञ प्रत्यय के योग से निष्पन हुआ है I

३- ऋच का अर्थ है पद अथवा मंत्र व्युत्पत्ति के आधार पर ऋच स्तवन का माननीकरण है आधार है  I

४- साम सुंदर और सुखकर वचन का नाम है साम के माध्यम से देवताओं को प्रसन्न किया जाता है तथा विघ्नों का विनाश किया जाता है  I

५-वैदिक साहित्य में यजुर्वेद अपना विशिष्ट स्थान रखता है मनुष्य जीवन के विकास की ज्ञान कर्म और उपासना यह तीन सीढ़ियां हैं इसमें कर्म की सीढ़ी या कर्मकांड का प्रतिपादन विशेषता यजुर्वेद ही करता है

६-वेद की चौथी संहिता अथर्ववेद है मंत्र दृष्ट ब्रह्मा के शिष्यों अथवा पुत्रों ने ही अथर्ववेद की रचना की है चारों वैदिक संहिताओं में अंतिम स्थान अथर्ववेद का है

७-भारतीय मत के आधार पर वेद ईश्वरीय कृति हैं  I ईश्वर की कृति है  I  ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में भी इसी मत की पुष्टि की गई है  I मनुस्मृति में ईश्वर द्वारा वेदों का ज्ञान अग्नि वायु सूर्य तथा अंगिरा को दिए जाने का वर्णन है  I महर्षि दयानंद ने वेदों को ईश्वरकृत मानकर उन्हें उतना ही प्राचीन सिद्ध किया है जितना कि यह सृष्टि प्राचीन है  I

८-प्राचीन भारत में राजनीतिक विचार और संस्थाएं -परमात्मा शरण -पृष्ठ -15

९-बोधायन -धर्म सूत्र -1,10,1

१०-ए हिस्ट्री ऑफ इंडियन पॉलीटिकल आईडियाज -यू एन घोषाल -पृष्ठ -370

११-स्टेट एंड गवर्नमेंट इन एनसिएंट इंडिया -ए एन घोषाल -पृष्ठ 37

१२- कामंदकीय नीति सार -1.1

१३-पूर्ववत- 7.67

१४- कामंदकीय नीतिसार में राजनीतिक विचार एवं संस्थाएं -वीरेंद्र कुमार सिंह -पृष्ठ 75

१५-शुक्र नीति में राजनीतिक विचार -डा विप्लव -पृष्ठ -38

१६-रघुवंश -कालिदास

१७-प्राचीन भारत शासन पद्धति -ए एस अलतेकर -पृष्ठ 19-20

Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.

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