भारतीय दर्शन में सामाजिक समझौते का सिद्धांत
भारतीय दर्शन में सामाजिक समझौते का सिद्धांत
भूमिका
प्राचीन भारतीय आचार्यो ने राज्य की उत्पत्ति के संबंध में सामाजिक समझौते की विचारधारा को भी मान्यता प्रदान की है I जब हम एतरेय ब्राह्मण में यह प्रसंग पाते हैं कि इंद्र की संप्रभुता का स्रोत देवताओं एवं प्रजापति द्वारा किया गया निर्वाचन था तो यह स्पष्ट हो जाता है कि, निर्वाचन करने वालों ने अपनी सहमति से ही इंद्र को अपना मुखिया माना I इस उदाहरण में सरकारी समझौते का वर्णन ना होने से इसको पूर्ण सिद्धांत नहीं माना जा सकता I यह कहा जाता है कि प्रत्येक राजा किसी न किसी समझौते का ही परिणाम होता है बिना समझौता किए हुए कोई भी संस्था अस्तित्व में नहीं आ सकती I इतने पर भी राज्य की उत्पत्ति से संबंधित सामाजिक समझौते के सिद्धांत का एक विशेष अर्थ है जिसमें अनेक बातें सम्मिलित हैं –
सिद्धांत की मान्यता
इस सिद्धांत की मान्यता है कि प्रारंभ में प्राकृतिक अवस्था थी उस समय कोई राज्य नहीं था I इस अवस्था में सभी व्यक्ति बराबर थे I राज्य को समझौते का परिणाम मानने वाले सभी विचारक इस प्रकार की अवस्था के अस्तित्व में विश्वास करते थे I उनको यह स्वीकार करना होता है कि समाज कभी बिना राज्य के भी रहता था I उसमें कोई सरकार जैसी संस्था नहीं थी I यदि उस समय सरकार भी रही तो राज्य को समझौते की उपज नहीं माना जा सकता I मनुष्य को इस समय जो भी अधिकार प्राप्त थे वह या तो मनुष्य की प्रकृति में ही नहीं थे अथवा वे उसकी देवी रूप से प्राप्त हुए I
कोई भी समझौता केवल तभी संभव है जब दोनों ही पक्ष समझौता करने की योग्यता भी रखते हो I समझौता करने का अधिकार लोगों को कानून तथा सरकार के अभाव में किस प्रकार प्राप्त हुआ होगा यह एक प्रश्न है I या तो यह अधिकार प्राकृतिक माना जाएगा या देवी I
प्रत्येक समझौते में प्रत्येक पक्ष के द्वारा कुछ शर्ते रखी जाती हैं और दूसरे पक्ष द्वारा उसको स्वीकार किया जाता है I समझौता करने वाले दोनों ही पक्ष इन शर्तों का पालन करने के लिए वचनबद्ध होते हैं I
सामाजिक समझौते के सिद्धांत पर प्रभाव डालने वाले तत्व
समझौते के माध्यम से दोनों पक्ष कुछ कार्य करने की स्वीकृति प्राप्त करते हैं I तथ्यगत शक्तियों को कानूनी मान्यता प्रदान की जाती है और इस प्रकार समझौते की प्रक्रिया पूरी हो जाती है I सामाजिक समझौते के सिद्धांत पर प्रभाव डालने वाले अनेक तत्वों में से कुछ प्रमुख तत्व इनको माना जा सकता है - यहां एक बात ध्यान देने योग्य है कि राज्य की उत्पत्ति के उस सिद्धांत के पीछे कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है I अतः कोई भी उचित रूप से यह घोषणा नहीं कर सकता कि राज्य पद का वास्तविक जन्म समझौते के द्वारा हुआ है I (१) भारतीय ग्रंथो में इस विचारधारा का कही एक पहलू प्राप्त होता है तो कहीं दूसरा और कहीं दो एक साथ भी प्राप्त हो जाते हैं I
डॉक्टर भंडारकर आदि ने यह बताया है कि भारतीय मनीषियों ने अलग-अलग वातावरण तथा दिशाओं में सापेक्ष कार्य किया है I ऋग्वेद के एक मंत्र में कहा गया है कि सभी लोगों को राजा की इच्छा करनी चाहिए I डॉक्टर के पी जायसवाल ने इसे सामाजिक समझौते का प्रतीक माना है I(२)
अथर्ववेद में उल्लेख है कि लोगों ने राजा को राजधानी पर शासन करने के लिए चुना I आगे बताया गया है कि राजा को सज्जनों द्वारा , राज- निर्माताओ द्वारा, सूत्रों व गांव के अध्यक्षों द्वारा, रथ निर्माताओ एवं धातु निर्माताओ द्वारा चुना गया I इनके आधारों पर तो यह माना जा सकता है कि राजपथ का आधार लोगों की इच्छा रही , जो समझौते का ही प्रतीक कहा जा सकता है I
सामाजिक समझौते के सिद्धांत का आधार
सामाजिक समझौते को आधार बनाने योग्य उदाहरण एतरेय ब्राह्मण में पर्याप्त प्राप्त होता है I इसमें यह कहा गया है कि राजा को पुरोहित के सामने यह शपथ ग्रहण करनी होती थी कि अपने जन्म की रात से लेकर मृत्यु की रात तक के मध्यकाल में मेरा यज्ञ, मेरा दान, मेरे अच्छे कार्य , मेरा जीवन, आज सब कुछ ले लिया जाए, यदि मैं इस राजपद का गलत प्रयोग करूंI राजा द्वारा दी गई शपथ में यह स्पष्ट कर दिया जाता था कि राज पद को भी वापस लिया जा सकता है I स्पेलमैन ने इस संबंध में संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए स्वीकार किया है कि इसके आधार पर तो यह माना जा सकता है कि भारत में समझौते की मान्यता अपने बदले हुए रूप में स्थित थी I(३)
शांति पर्व
के 67 वे अध्याय में राजा के जन्म की जिस कथा का वर्णन आया है उसे सामाजिक समझौते की दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है I यह अध्याय प्राकृतिक अवस्था का विस्तार पूर्वक वर्णन करता है I प्राचीन काल में मत्स्य न्याय एवं अराजकता प्राप्त थी इसका अंत करने के लिए कुछ लोग परस्पर मिले और यह कानूनी व्यवस्था दी की ,कटु भाषण ,हिंसात्मक व्यवहार, दूसरों के धन का अपहरण, दूसरों की पत्नियों का अपहरण, डकैती, आदि के आधार पर लोगों को समूह से निकाल दिया जाए I इस व्यवस्था के कारण उसकी स्थिति में थोड़ा परिवर्तन आया , किंतु स्थिति ठीक नहीं रही I हारकर लोग ब्रह्मा के पास गए और प्रार्थना की कि उनको विनाश से बचने के लिए कोई राजा नियुक्त करें I लोगों ने देवता द्वारा नियुक्त राजा की पूजा करने का आश्वासन दिया तथा उसे उसकी रक्षा करने का काम सोपा I इसे कानूनी व्यवस्था तो कहा जा सकता है परंतु समझौता यहां नहीं हुआ I लोगों ने मनु के सामने प्रस्ताव रखा और जैसा की मनु के व्यवहार से प्रकट होता है उसने इसे स्वीकार कर लियाI
बौद्ध धर्म
इस सिद्धांत का अधिक स्पष्ट विवरण बौद्ध धर्म में है I दक्षिणी बौद्धो के दीर्घ निकाय में जहां संसार की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है वहां ,राजतंत्र के जन्म का भी उल्लेख आता है I प्राकृतिक अवस्था एवं राजनीतिक समाज के प्रारंभ का भौगोलिक विवरण दीर्घ निकाय में दिया गया है और इसमें यह बताया गया है की संप्रभुता का जन्म सामाजिक समझौते के परिणाम स्वरुप हुआ I
यह कहा गया है कि स्वर्ण युग में मनुष्य की रचना मन से हुई है I उसका पालन पोषण प्रसन्नता से होता था तथा वह वायु मार्ग से यात्रा करते थे I कुछ समय बाद पृथ्वी पानी से ऊपर आ गई लोगों ने उसे पर काम किया, भोजन पैदा किया और स्वादो की उत्पत्ति हुई, धीरे-धीरे व्यक्ति का आत्म प्रकाश नष्ट हो गया I सूर्य एवं चंद्रमा द्वारा प्रकाश दिया जाने लगा मौसम रात और दिन तथा समय के अन्य सूचनाओं का जन्म हुआ, अनैतिकता एवं बुराइयां पैदा होने लगी और धरती पर पौधों का विकास होने लगा I पहले तो चावल बिना किसी आधार के ही उगता था I खुले प्रदेशों में इसे यथेस्ट पाया जाता था I भोजन के लिए एक बार उखाड़ने के बाद यह स्वत ही पुनः उगता था I बाद में जब अनैतिकता बढी तो परिस्थितिया इतनी श्रेष्ठ नहीं रह गई I अब चावल केवल कुछ स्थानों और केवल शुद्ध रूप में उगने लगा I इस पर लोगों ने चावल के खेतों का विभाजन कर लिया और सीमाएं बना ली I कुछ लालची लोग ऐसे भी होते थे जो स्वयं की धरती में उगने के बाद भी दूसरों की धरती में चोरी कर लेते थे I ऐसे लोगों को पड़कर पीटा जाने लगा I
इस प्रकार चोरी ,झूठ, मारपीट, दबाव, दंड ,आदि व्यवहार विकसित हुए I लोगों में अव्यवस्था फैल गई एवं सोचा गया कि किसी ऐसे व्यक्ति को छाटा जाए जो कि इस सबकी देखभाल करें और गलती करने वाले को दंड प्रदान करें I इस काम के बदले चावलों का कुछ भाग देने का निर्णय किया गया, लोग मिले वह एक सुंदर और समर्थ व्यक्ति के पास गए और उसके सम्मुख यह प्रस्ताव रखा उसे लोगों ने कहा आओ श्रेष्ठ उन लोगों को दंड दो ,निंदा करो ,और बाहर निकाल दो ,जो कि ऐसा किए जाने योग्य हैं I हम तुमको अपने चावल का कुछ भाग सौंप देंगे ,उसने अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी , तथा लोगों ने उसे चावल का भाग दिया I समस्त व्यक्तियों के लिए चुने गए इस व्यक्ति को महासम्मत कहा गया यह व्यक्ति खेतों का स्वामी था और इसलिए उसको क्षत्रिय (खेत नाम पतीनी )कहा गया I उसने लोगों को स्थापित कानून के पालन के लिए प्रेरित करके उसको प्रतिभावान बनाया, अतःवह राजन ( धम्मेन परे राजनीति ) कहा गया I
बौद्ध धर्म की यह कथा राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौते के सिद्धांत का स्पष्ट शब्दों में प्रतिपादन करती है I स्पेलमैन के शब्दों में - यह बौद्ध उपाख्यान स्पष्ट एक सामाजिक समझौते का सिद्धांत है I राजा अपनी सत्ता उन लोगों से प्राप्त करता है जिन्होंने की उसको चुना है I वह समझौते की शर्तों का पालन करने के लिए वेतन प्राप्त करता है I(४)
कौटिल्य के अर्थशास्त्र
में भी राज्य की उत्पत्ति के प्रसंग में सामाजिक समझौते की ओर संकेत किया गया है I प्रजाजन ने राज्य की उत्पत्ति से पूर्व की कष्टकारी अराजक दशा से मुक्ति पाने के लिए मनु को राजा बनाया और उसे दंड की और कर संबंधी अधिकार भी सौंपे I राजा ने भी प्रजा के योगक्षम का दायित्व स्वीकारा I इस प्रकार राज्य की उत्पत्ति हुई और इसकी उत्पत्ति को संपूर्ण प्रक्रिया में प्रजाजन एवं राजा दोनों की भागीदारी दिख पड़ती है I(५)
अर्थशास्त्र में उपलब्ध राज्य की उत्पत्ति के प्रसंग में श्याम शास्त्री का कहना है कि- इससे स्पष्ट है कि कौटिल्य के युग में भी सामाजिक समझौते सिद्धांत अज्ञात नहीं था I डॉक्टर चंद्रदेव प्रसाद के अनुसार- यह कहा जा सकता है कि कौटिल्य राज्य की उत्पत्ति का आधार संविदा में देखता है I यह उल्लेखनीय है कि अनेक विद्वानों ने अर्थशास्त्र में राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धांत के अस्तित्व के बारे में आशंका प्रकट की है I(६)
डॉक्टर डी आर भंडारकर का मत है कि अर्थशास्त्र में राज्य की उत्पत्ति के विवरण में मानवोत्तर तत्व एवं सामाजिक समझौता सिद्धांत का मिश्रण है I सालेटोर का मत है कि अर्थशास्त्र में वर्णित समझौता अपनी प्रकृति से नकारात्मक है I यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि कौटिल्य के अनुसार राजकीय गुप्तचरो को इस समझौते की चर्चा किसी भीड़ भरे स्थान पर सहजवाद- विवाद के रूप में इस प्रकार करनी है कि आम प्रजा जान उनकी बातों को ध्यान से सुनाने लगे I दोनों गुप्त चरों की संपूर्ण वार्ता का निष्कर्ष यही है कि भले ही कभी-कभी राजा की दंड एवं कर संबंधी शक्तियां प्रजाजन को कष्टकारी प्रतीत होती हैं किंतु , अंत में इसे स्वयं प्रजाजन के योगक्षेम में वृद्धि होती है और अतीत में स्वयं प्रजाजन ने ही इस व्यवस्था की स्थापना की है I(७) इस प्रकार संपूर्ण विवरण राजतंत्र की औचित्य पूर्णता का समर्थन करता है और असंतुष्ट प्रजा जन में राजभक्ति व निष्ठा का प्रसार करता है I(८) अर्थशास्त्र के इस उदाहरण के प्रसंग में भगवान दास केला का मत है कि- उपयुक्त उदाहरण से कौटिल्य को राज्य की उत्पत्ति संबंधी सिद्धांत का अनुमान करना युक्ति- युक्त नहीं है I यदि कौटिल्य को इस विषय में कुछ अपनी ओर से करना होता तो वह बातें जासूस के द्वारा और इतने संक्षेप में ना कहलाता
निष्कर्ष
वास्तव में कौटिल्य इस विषय में कुछ प्रकाश नहीं डालता I अतः यह स्पष्ट होता है कि , कौटिल्य ने राज्य की उत्पत्ति के सिद्धांत के रूप में किसी सामाजिक समझौते के सिद्धांत का प्रतिपादन किया है अथवा नहीं, यह एक विवादास्पद प्रश्न है, किंतु यह स्पष्ट है कि इस संपूर्ण विवरण में कौटिल्य का मूल उद्देश्य एक शक्तिशाली केद्रीकृत राजतंत्र के प्रति प्रजाजन में राजभक्ति जागृत करना है I(९) वस्तुतः कौटिल्य एक व्यवहारिक राज शास्त्री हैं और उन्होंने प्रजाजन और राजा के बीच हुए किसी प्राचीन समझौते का उल्लेख उसकी तत्कालीन उपयोगिता के कारण किया है , किसी सैद्धांतिक आस्था के कारण नहीं I यहां यह उल्लेखनीय है कि इसी विवरण में कौटिल्य ने राजा को देवांश भी बताया है क्योंकि इससे भी प्रजाजन मे राजभक्ति की वृद्धि की संभावना अधिक बढ़ती है I(१०) अर्थशास्त्र के इस विवरण में दो तथ्य ऐसे हैं जो सामाजिक समझौते के सिद्धांत का आभास दिलाते हैं- नंबर एक - राज्य मनुष्यों द्वारा निर्मित है I नंबर दो - प्रजाजन ने स्वेच्छा से राजा की नियुक्ति की है और उसके प्रति अपने दायित्व स्वीकारा हैं तथा राजा ने प्रजाजन के प्रति अपनी दायित्व को स्वीकार है I
संदर्भ ग्रन्थ
१- जान० स्पेलमैन, पोलिटिकल थ्योरी ऑफ़ असिएंट इंडिया, पृष्ठ संख्या -19
२-डॉक्टर डी आर भंडारकर, पृष्ठ संख्या -133
३-जान० स्पेलमैन, वही -पृष्ठ संख्या -12
४-वही, पृष्ठ संख्या -22
५-परमात्मा शरण ,प्राचीन भारत में राजनीतिक विचार एवं संस्थाएं -पृष्ठ संख्या- 65
६- अलतेकर, प्राचीन भारतीय शासन पद्धति, पृष्ठ संख्या -70
७-भगवान दास किला , कौटिल्य की शासन पद्धति ,पृष्ठ- 34, संवत 2005 विक्रम ,संस्करण, दूसरा हिंदी साहित्य सम्मेलन, मुद्रा को प्रकाशक, श्री राम प्रताप शास्त्री सम्मेलन, प्रयाग
८-हरिहर शास्त्री ,संपादित संस्करण -पृष्ठ 7
९-रमाशंकर भट्टाचार्य, पुराण का अनुशीलन- पृष्ठ 28- इंडोलॉजिकल बुक हाउस वाराणसी- 1963
१०-कौटिल्य कालीन भारत ,अचार्य दीपांकर- पृष्ठ -70
Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.
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