मनुस्मृति में युद्ध संबंधी विवरण

From enIKSwiki
Revision as of 16:47, 16 July 2024 by Sriram (talk | contribs) (Created page with " '''भूमिका''' मनु ने अपने राष्ट्र की रक्षा एवं वृद्धि के लिए युद्ध के साधन के औचित्य को स्वीकारा है I भारतीय जलवायु को ध्यान में रखते हुए मनु ने मार्गशीर्ष  फाल्गुन एवं चैत्र मास को शत्र...")
(diff) ← Older revision | Latest revision (diff) | Newer revision → (diff)
Jump to navigation Jump to search

भूमिका

मनु ने अपने राष्ट्र की रक्षा एवं वृद्धि के लिए युद्ध के साधन के औचित्य को स्वीकारा है I भारतीय जलवायु को ध्यान में रखते हुए मनु ने मार्गशीर्ष  फाल्गुन एवं चैत्र मास को शत्रु के विरुद्ध युद्ध के लिए उचित काल माना है I किंतु उसके साथ ही बताया है कि युद्ध ऐसे किसी भी समय में किया जाना उचित होता है I जब शत्रु की तुलना में अपनी स्थिति बहुत मजबूत हो और अपनी विजय सुनिश्चित प्रतीत हो उन्होंने युद्ध के दो प्रकार को स्वीकारे हैं - कूट युद्ध ,धर्म युद्ध

कूट युद्ध

कूट युद्ध का सरल अर्थ है कपट युद्ध १ I कुट युद्ध के अंतर्गत शत्रु के विरुद्ध कर्षण एवं उत्पीड़न की युद्ध नीति अपनाई जाती है I मनु के अनुसार शत्रु राजा के राज्य को घेर कर उसके अन्न, घास, जल, ईंधन, आदि को नष्ट करके उसे पीड़ित किया जाना चाहिए और विशेष कर रात्रि में ऐसे कार्य करने चाहिए जो शत्रु पक्ष को भय पैदा करने वाले हो २ I

धर्म युद्ध

एक धर्म शास्त्री के रूप में मनु ने सामान्यतः धर्म युद्ध का ही समर्थन किया है I उन्होंने युद्ध को एक ऐसी नैतिक क्रिया माना है I जिसे केवल नैतिक उद्देश्यों की सिद्धि के लिए ही अपनाया जाना चाहिए  I अतः उन्होंने युद्ध में छल कपट एवं धूर्तता का सहारा लेकर शत्रु पक्ष के सैनिकों के वध को पूर्णतः अनुचित माना है I वस्तुतः उन्होंने युद्ध में क्रुरता व नि श्रंसता का विरोध करते हुए क्षात्र धर्म का पालन पर बल दिया है  I इस दृष्टि से मनु ने युद्ध के अनेक नियमों का प्रतिपादन किया है जिनमें कुछ निम्न है -

१-अपने शत्रु एवं प्रतिद्वन्दी को भली भांति युद्ध के लिए सचेत करके ही युद्ध किया जाना चाहिए I

२-युद्ध के साधनों की दृष्टि से सामान सामर्थ वाले योद्धाओं में ही युद्ध होना चाहिए ३ I

३-ऐसे व्यक्तियों का भी वध नहीं किया जाना चाहिए जिन्होंने युद्ध में पराजय स्वीकार कर ली हो I  अत्यंत भयभीत हो युद्ध के मैदान से भाग रहा हो  I

४-जो व्यक्ति युद्ध में भाग ना ले रहा हो केवल दर्शक हो उसका भी वध नहीं किया जाना चाहिए I

५-युद्ध में ऐसे आयुधों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए जो योद्धाओं को मानवीय पीड़ा देने वाला हो  I

युद्ध में लूट गए माल का वितरण

मनु ने युद्ध में शत्रु पक्ष से जीती गई सामग्री के वितरण संबंधी नियम का संक्षिप्त उल्लेख किया है ४ I जब कोई शत्रु युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो जाता है अथवा युद्ध भूमि से भाग जाता है तो उसके रथ अश्व हाथी छत्र धन-धान्य घृत तेल आदि एवं अन्य सामग्री पर राजा के जिस योद्धा का अधिकार हो जाता हैI  वह सामग्री उसी के हिस्से में मानी जाती है किंतु उनमें से उत्तम धन राजा को ही प्राप्त होने चाहिए किंतु जब अनेक योद्धाओं ने मिलकर शत्रु की सामग्री को प्राप्त किया हो तब राजा को इसमें से विशिष्ट उपयोगी एवं मूल्यवान सामग्री को राजकोष में जमा करा देना चाहिए  I और शेष सामग्री को इन समस्त योद्धाओं में वितरित कर देना चाहिए I

मनु के अनुसार विजेता राजा को सर्वप्रथम पराजित राज्य की प्रजा को अभय दान देने की घोषणा करनी चाहिए I धर्मशील ब्राह्मणों का सत्कार करके उनका आशीर्वाद लेना चाहिए तथा युद्ध में जिन प्राजजनों की हानि हुई हो उसकी आर्थिक मदद करनी चाहिए ५ I मनु ने विजेता राजा को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह पराजित राजा का वध नहीं करें और ना उसके संपूर्ण राज्य का अपने राज्य में विलय ही करें उन्होंने विजेता राजा को पराजित राजा के प्रति व्यवहार के दो विकल्प प्रस्तुत किए हैं -

    १-विजेता राजा को चाहिए कि वह पराजित राजा को सम्मान पूर्वक पद मुक्त कर दे और यदि जरूरी हो तो उसे राजोचित सत्कार एवं सुविधाओं के साथ बंदी गृह में रखें I इस पराजित राजा की राजगद्दी पर उसी के वंश के ऐसे श्रेष्ठ पुरुषों को बैठा दें जिसे पराजित राज्य की प्रजा भी पसंद करती हो I लिखित समझौते के रूप में इस नए राजा के शासन के अधिकारों व सीमाओं को तय किया जाना चाहिए और सभी ऐसे प्रबंध किए जाने चाहिए कि यह नया राजा कभी भी विजेता राजा का विरोध करने में समर्थ नहीं हो ६ I

     २-यदि पराजित राजा के प्रति उपरोक्त व्यवहार की आवश्यकता नहीं हो तो उसे ही राजगद्दी पर बने रहने देना चाहिए किंतु विजय के लाभ की प्राप्ति के लिए मित्रता स्वर्ण व भूमि के पक्ष पर विचार करके उसे पराजित राजा से सावधानी पूर्वक संधि करनी चाहिए और तब विजेता राजा को उसे राज्य से लौट आना चाहिए I विजेता राजा को पराजित राजा से मैत्री संधि अथवा श्रवण संधि अथवा भूमि संधि करनी चाहिए किंतु सामान्य इनमें सर्वोच्च सन्धि मैत्री संधि होती है क्योंकि जब पराजित राजा मित्र बन जाता है तो भविष्य में अन्य राजाओं से संकट उत्पन्न होने पर उसे सहायता मिलना संभव होता है ७ I

  संदर्भ ग्रंथ

१-ऐसा युद्ध जिसमें युद्ध के नैतिक नियमों का उल्लंघन उचित माना जाता है, और ऐसे सभी उचित अनुचित उपाय अपनाए जाते हैं ,जो शत्रु पर अपनी विजय को सुनिश्चित बनाते हैं I

२-मनुस्मृति- 7.194- 196

३- द्रष्टव्य -मनुस्मृति- 7.90-93

४- द्रष्टतव्य –मनुस्मृति- 7.96-97

५-मनुस्मृति -7.201

६- द्रष्टतव्य -मनुस्मृति -7.202- 204

७-मनुस्मृति -7.206-209

Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.

Published by,