शुक्र नीति
शुक्र नीति
भारत में राजनीतिक चिंतन का उद्भव अत्यंत प्राचीन है। प्राचीन भारत में राजनीति विज्ञान के विकास के दौरान इसे अनेक नाम जैसे की राजधर्म, राज्यशास्त्र, दंडनीति, नीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र से संबधित किया जाता रहा है। अल्टेकर का मानना है की समय के साथ नीतिशास्त्र शब्द अन्य शब्दों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण बन गया[1] और राजनीति या नैतिकता के विज्ञान के रूप में लोकप्रिय हो गया। शुक्र द्वारा रचित शास्त्र नीति क्रम का ही शास्त्र है जो न केवल सरकार व राज्य के तकनीकी विज्ञान को परिभाषित करता है अपितु समाज के व्यापक और सामान्यीकृत कला को भी दर्शाता है। इसलिए शुक्रनीति विशुद्ध राजनीतिक विज्ञान ग्रंथ होने के साथ-साथ व्यापक रूप से समाजशास्त्र के समतुल्य ग्रंथ भी है जो सामाजिक, आर्थिक और राजनीति की नैतिक प्रणाली को परिभाषित करता है[2]। इसलिए हम कह सकते है कि राजनीति पर विज्ञान होने के साथ-साथ शुक्रनीति का एक अर्थ नैतिकता का विज्ञान भी है।
एक प्रगतिशील और स्थिर समाज की संकल्पना के लिए शुक्र नीतिशास्त्र को महत्वपूर्ण ग्रंथ मानते है क्योंकि इसकी मदद से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी पुरुषार्थ के लक्ष्य हासिल किए जा सकते है। नीतिशास्त्र के लेखकों ने नीति दर्शन के मूल तत्वों को स्थापित करने की कोशिश की है। नीति सिद्धांत शासक वर्ग को वैदिक साहित्य द्वारा स्थापित मूल्य प्रणाली के आधार के अनुरूप व्यवहार में प्रासंगिक कारकों और प्रचलित मानदंडों के प्रति संवेदनशील होने का मार्गदर्शन करता है। शुक्रनीति समाज व राज्य का मार्गदर्शन करती है, इसका स्वरूप शैक्षिक, नैतिक व नियामक है[3]। राजा नीति का स्वामी होता है, इसलिए नीति को राजनीति या राजधर्म भी कहा गया है[4]।
शुक्रनीति राजा के कर्तव्यों, युवराज और राज्य अधिकारियों के कार्यों, मित्रों और सहयोगियों की विशेषताओं, युद्ध, किले, सेना और शासन कला के सामान्य नियमों पर विस्तृत चर्चा देखने को मिलती है। शुक्रनीति सहयोगियों, शत्रुओं और तटस्थों के साथ कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों में एक प्रभावशाली ग्रंथ होने के साथ-साथ लोगों के दिलों को जीतने की कला भी सुझाता है। इसका महत्व सार्वभौमिक है, मुख्य रूप से यहाँ शासकों के लिए एक मैनुअल के रूप में और साथ ही सभी के लिए उपयोगी है[5]।
मेहता का मानना है की प्राचीन भारतीय प्रणाली में हमें शुक्रनीति नाम के दो ग्रंथों का उल्लेख देखने को मिलता है। प्राचीन ग्रंथ लगभग 2 ई० पू० का है व वह ग्रंथ उपलब्ध नहीं है, वहीं जो शुक्रनीति ग्रंथ वर्तमान समय में उपलब्ध है वह 7वीं ई० पू० के आसपास या बाद के काल का है[6]।
संकलन की तिथि के मामलों में शुक्रनीति संस्कृत के सबसे विवादास्पद ग्रंथों में से एक है। इसकी संकलन तिथि के बारे में विचारकों की राय बहुत अधिक मतों में बँटी हुई है। विचारक शुक्रनीति को स्मृति परंपरा (300 ईसा पूर्व से 300 ई० पू०) से लेकर 16वीं शताब्दी तक का ग्रन्थ बताते है। राजेंद्र लाल मित्र, प्रफुल्ल चंद्र राय और पंचानन नूगी शुक्रनीति में मौजूद बंदूकों, तोपों व बारूद का संदर्भ देते हुए इसे 16वीं शताब्दी या उसके बाद का ग्रंथ मानते है[7]। बेनी प्रसाद इसे 12वीं या 13वीं शताब्दी में अंतिम हिंदू राजनीतिक विचार के रूप में मानते हैं। वंदना प्रधान अपनी पुस्तक “किंगशिप इन द शुक्र-नीति” में निष्कर्षित करती है कि शुक्रनीति की रचना 4वीं शताब्दी ई० से पहले हुई होगी[8]। के० पी० जायसवाल 8वीं शताब्दी, प्रधान 4वीं शताब्दी और वहीं वी० एस० अग्रवाल इसमें वर्णित प्रशासनिक समानताओं के आधार पर इस ग्रंथ को गुप्त काल का मानते हैं[9]। शुक्रनीति को अंग्रेजी भाषा में सर्वप्रथम अनुवादित करने वाले जर्मन मूल के अनुवादक गुस्ताव ओपर्ट का तर्क हैं कि यह ग्रन्थ ईसाई युग से पहले का है, उन्होंने वेदों और अशोक के शिलालेखों के संदर्भों का हवाला देते हुए बताया की बारूद के बारे में भारतीय ज्ञान प्राचीन है[10]। वहीं मुखर्जी का मानना है कि शुक्रनीति कौटिल्य के अर्थशास्त्र (321-300 ई० पू०) से भी प्राचीन है[11]।
शुक्रनीति के रचयिता शुक्र महान ऋषि भृगु के शिष्य थे। शुक्र ने शुक्रानीति को नैतिक विज्ञान (नीतिशास्त्र) कहा है जिसका आधार; पुण्य, धन, भोग और मोक्ष है[12]। शुक्रानीति की मदद से एक शासक दुश्मन पर विजय प्राप्त कर सकता है और एक मित्र को जीत सकता है। शुक्रानीति राजनीति विज्ञान को सर्वोच्च या श्रेष्ठ विज्ञान मानती है, क्योंकि अन्य विज्ञान सिर्फ़ अपने-अपने कार्यक्षेत्र से संबंधित हैं (जैसे; व्याकरण: शब्द, मीमांसा: धार्मिक अनुष्ठान, वेदांत: दुर्बलता) जबकि शुक्रानीति अन्य सभी से भी संबंधित है।
शुक्र राजनीति को एक ऐसी कला के रूप में देखते हैं जिसका एक निश्चित उद्देश्य होता है। शुक्र ने वर्ण को जन्म आधारित नहीं अपितु गुण एवं कर्म आधारित माना है[13]। शुक्रनीति यथार्थवादी होने के साथ-साथ नैतिकता को भी साथ लेकर चलती है, एक ओर सत्ता की राजनीति को समर्थन देखने को मिलता है वहीं राजा के कर्तव्यों पर भी बखूबी जोर दिया गया है । शुक्रनीति राजनीति में नैतिक मूल्यों के समर्थन के साथ-साथ राजनीति, कूटनीति, लोक प्रशासन और आर्थिक प्रक्रियाओं के मामलों में समृद्धि और शक्ति के सांसारिक मूल्यों का भी प्रबल समर्थन करती हैं। इस ग्रंथ का व्यावहारिक चरित्र शुक्र के इस कथन से स्पष्ट हो जाता है कि ‘व्याकरण, तर्क और वेदांत के बिना काम चल सकता है, लेकिन नीति के बिना नहीं’[14], राज्य की समग्र समृद्धि के लिए शुक्र नीति व शक्ति दोनों के समन्वय की बात करते हैं।
शुक्रनीति में कहा गया है की यदि कोई राजा नीति को लागू करने में विफल रहता है तो ऐसे में राज्य बिखर जाएगा, सेना अव्यवस्थित हो जाएँगी और प्रशासनिक कर्मचारियों के बीच भ्रम की स्तिथि पैदा हो जायेगी। जब शासक नीति का पालन नहीं करता, तो राज्य कमजोर हो जाता है और चारों ओर बुराई फैल जाती है। शुक्रानीति के अनुसार स्वयं पर पूर्ण नियंत्रण और दूसरों से स्वतंत्रता ही प्रत्येक व्यक्ति और राजा दोनों के लिए सर्वोच्च सुख है अथार्थ स्व-शासन से बढ़कर कोई सुख नहीं है। राजा के मुख्य कार्य प्रजा की रक्षा, दोषियों या दुष्टों को दण्डित करना, दान देना, यज्ञ करना और राजस्व की न्यायसंगत वसूली करना है। नीतिशास्त्र के बिना इन सब की प्राप्ति संभव नहीं है।
शुक्र एक यथार्थवादी थे इसलिए उन्हें शक्ति का महत्व पता था, उन्होंने राज्य की सार्वभौमिक समृद्धि के लिए नीति और शक्ति दोनों के समन्वय की बात की है। शुक्रनीति में शासन के प्रकार, राजा के मंत्री व उनके दस प्रकारों के बारे में विस्तृत रूप से चर्चा देखने को मिलती है। अन्य प्राचीन भारतीय राजनीति ग्रंथों में भी मंत्रियों की चर्चा की गयी है परन्तु मंत्रिपरिषद में मंत्रियों की संख्या, उनके कार्यों की चर्चा शुक्रनीति में ही देखने को मिलती है। इसके साथ ही शुक्रनीति प्रशासनिक व्यवस्था एवं न्यायिक व्यवस्था पर भी सविस्तार रूप से चर्चा करती है। शुक्रनीति में वित्तीय प्रशासन की भी चर्चा की गई है जिसमें ऋण के रूप में धन के आगमन व उसके प्रजा की उन्नति के कार्यों में वितरण पर विस्तार से बताया गया है।
शुक्रानीति में तीन प्रकार के राजाओं का विवरण देखने को मिलता है। सात्विक, राजसिक और तामसिक। सात्विक राजा वे है जो अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं, शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर अपनी प्रजा की रक्षा करते हैं, वे दानशील, सहनशील और वीर होते हैं तथा भोग विलास की वस्तुओं में आसक्ति नहीं रहते अपितु उनसे विरक्त रहते हैं। सात्विक राजाओं में दैवीय गुण प्रधान होता है। तामसिक राजा सात्विक राजा के बिल्कुल विपरीत होते है। जो वासना में लिप्त होते है और नैतिकता का सम्मान नहीं करते है। तामसिक राजाओं में राक्षसी गुण प्रधान होता है। इन दोनों प्रकारों के मध्य में है राजसिक राजा। राजसिक राजा अधिक मानवीय प्रवृत्ति के होते है जिनमें दैवीय व राक्षसी दोनों ही प्रकार के गुण देखने को मिलते है।
शुक्रनीति राजनीति पर लिखे गए सबसे महत्वपूर्ण व व्यापक प्राचीन भारतीय ग्रंथों में से एक है। शुक्रनीति राज्य के साथ-साथ समाज में स्थिरता का भी प्रमुख स्रोत है, यह नागरिकों को सही मार्ग पर चलने के संदेश के साथ उन्हें सुरक्षा व सामाजिक शांति प्रदान करता है। यह राजा के साथ-साथ सभी प्रजा को भी सार्वजनिक जीवन में आदर्श नैतिकता आधारित जीवन जीने का संदेश देती है।
[1] ए० एस० अल्तेकर, स्टेट एंड गवर्नमेंट इन एन्सिएंट इंडिया (दिल्ली: मोतीलाल बनारसीदास पब्लिशर्स & बुकसेलर्स, 1958).
[2] नंद किशोर आचार्य, द पॉलिटी इन शुक्रनीतिसार (बीकानेर: वाग्देवी प्रकाशन, 1987).
[3] बिनॉय कुमार सरकार, द पॉजिटिव बैकग्राउंड ऑफ़ हिंदू सोशिलॉजी: पॉलिटिकल (इलाहाबाद: द पाणिनि ऑफिस, 1921).
[4] स्वामी जगदीश्वरानंद, अनुवादक. शुक्रनीति-सार, (सोनीपत: ऋषिदेवी रूपलाल कपूर धर्मार्थ ट्रस्ट, 1983).
[5] बिनॉय कुमार सरकार, द पॉलिटिकल इंस्टीट्यूशंस एंड थ्योरीज़ ऑफ़ द हिंदूज़: ए स्टडी इन कम्पेरेटिव पॉलिटिक्स, (लेजपज़िग: वेरलाग वॉन मार्केट पेटर्स, 1922).
[6] वी० पी० मेहता, फ़ाउंडेशंस ऑफ़ इंडियन पोलिटिकल थॉट, (दिल्ली: मनोहर, 1992).
[7] सरकार, द पॉजिटिव बैकग्राउंड ऑफ़ हिंदू सोशिलॉजी , 1921.
[8] वंदना नागर, किंगशिप इन द शुक्रनीति, (दिल्ली: परिमल प्रकाशन, 1992).
[9] आचार्य, द पॉलिटी इन शुक्रनीतिसार.
[10] गुस्ताव ओपर्ट, संपादक. शुक्रनीतिसारा खंड १, (मद्रास: मद्रास गवर्नमेंट प्रेस, 1882).
[11] कृष्णा पी० मुखर्जी, “द आर्मी, वारफेयर एंड डिप्लोमेसी अकॉर्डिंग तो द “शुक्रनितसार”, द इंडियन जर्नल ऑफ पॉलिटिकल साइंस 9, संख्या 1, (1948): 31-40.
[12] मेहता, फ़ाउंडेशंस ऑफ़ इंडियन पोलिटिकल थॉट.
[13] बेनी प्रसाद, थ्योरी ऑफ़ गवर्नमेंट इन एन्सिएंट इंडिया (पोस्ट-वैदिक), (इलाहाबाद: द इंडियन प्रेस लिमिटेड, 1927).
[14] विश्वनाथ प्रसाद वर्मा, “सम आसपेक्ट्स ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन इन द शुक्रनीति”, द इंडियन जर्नल ऑफ पॉलिटिकल साइंस 23, संख्या 1/4, (1962): 302-308.
Authored by Prof. Sri Prakash Singh, Director, South Campus, Delhi University, Delhi.
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