शुक्र नीति में राज्य एवं राजा की उत्पत्ति का सिद्धांत

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भूमिका     

प्राचीन भारतीय विचारक राजनीति को नीतिशास्त्र के अंग के रूप में स्वीकार करते हैं I यही कारण है कि प्राचीन भारतीय नीति ग्रन्थो में जहां मानव जीवन से संबंधित अनेक तत्वों व सिद्धांतों का विवेचन किया गया वहीं पर राज्य ,उसकी उत्पत्ति , प्रकृति तथा मानव जीवन में उसकी आवश्यकता आदि का भी विवेचन किया गया I सैन्धव सभ्यता काल में राज्य की क्या स्थिति थी यह तथ्य स्पष्ट नहीं है १ I लेकिन इतना अवश्य है कि वैदिक काल में राज्य एक महत्वपूर्ण संस्था के रूप में विद्यमान था २  I

राजा की उत्पत्ति के सिद्धांत  

प्राचीन भारतीय विचारों ने राज्य एवं राजा की उत्पत्ति ३के विभिन्न सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है I

वैदिक साहित्य

में राजा की उत्पत्ति से संबंधित शक्ति सिद्धांत ४ देवी सिद्धांत ५और सामाजिक समझौते का सिद्धांत ६ आदि के संकेत मिलते हैं ७ I

रामायण  

वैदिक साहित्य के अतिरिक्त रामायण में भी राज्य की उत्पत्ति के दैवी सिद्धांत का वर्णन दृष्टिगोचर होता है ८ I यद्यपि रामायण में कहीं पर भी शक्ति सिद्धांत एवं सामाजिक समझौते के सिद्धांत का स्पष्ट उल्लेख तो प्राप्त नहीं होता लेकिन प्राप्त विवरणों से स्पष्ट है कि राजा और प्रजा के बीच एक प्रकार का अप्रत्यक्ष समझौता जैसा अवश्य था ९  I

महाभारत     

इसी प्रकार महाभारत में भी मुख्य रूप से दैवी १०और समाज अनुबंधवाद ११ के सिद्धांतों का वर्णन दृष्टिगोचर होता है I मनुस्मृति में भी राजा के दैवी उत्पत्ति के संबंधित सामग्री उपलब्ध होती है १३ I

शुक्रनीति में राजा की उत्पत्ति

प्राचीन परंपरा के अनुसार शुक्रनीति में भी राज्य एवं राजा की उत्पत्ति से संबंधित वर्णन दृष्टिगोचर होता है I आचार्य शुक्र ने प्रतिपादित किया है कि सर्वप्रथम की स्थिति सामाजिक नैतिकता के सिद्धांतों पर आधारित थी I धर्म के चारों पदों में पाप का लेशमात्र भी अंश नहीं था १४ I समस्त प्राणी धर्माचरण में लीन थे  I अतः उस युग में दंड की आवश्यकता नहीं थी १५ I इस भारतीय आचार्य शुक्र के अनुसार कृति युगीन समाज की व्यवस्था दण्डविहीन थी I महर्षि शुक्र के कृति युग की स्थिति संभवत अधिक समय तक नहीं चल सकी I क्रमशः त्रेता , द्वापर ,कलयुग आदि का प्रादुर्भाव हुआ I त्रेता में तीन पदों में धर्म और एक पद में धर्म की प्रवृत्ति प्रजा में दृष्टिगोचर हुई १६ I द्वापर में दो पद धर्म और दो पद धर्म की स्थिति थी I इस प्रकार प्रजा में धर्म और अधर्म समान रूप से विद्यमान था १७ I इसी भांति कलयुग में शक्तिशालियों के द्वारा प्रजा को विभिन्न प्रकार से पीड़ित किया जाने लगा १८ I

    इस विवरण से स्पष्ट है कि शुक्रनीति में शक्तिशालियों के द्वारा निर्बलों को सताए जाने का वर्णन दृष्टिगोचर होता है जो मत्स्य न्याय की स्थिति का द्योतक है I यद्यपि शुक्र नीति में मत्स्य न्याय की स्थिति का कहीं भी स्पष्ट उल्लेख उपलब्ध नहीं होता किंतु उनके कृतियोग त्रेता द्वापर और कलयुग आदि क्रमानुसार धर्म के ह्रास से ऐसा आभास होता है कि धर्म के ह्रास के कारण समाज की स्थिति निरंतर दयनीय होती गई और अधर्म का प्राबल्य हुआ I परिणामतः कलयुग में शक्तिशालियों द्वारा निर्बलों पर अत्याचार किए गए उक्त स्थिति के निवारणार्थ ही शुक्रनीतिकार ने श्रेष्ठ राजा की आवश्यकता महसूस की १९ I

    महर्षि शुक्र ने प्राचीन हिंदू परंपरा को अक्षुण्ण रखते हुए राज्य एवं राजा की उत्पत्ति के समाज अनुबंधवाद और दैवी सिद्धांत का अनुसरण किया है I यद्यपि आचार्य शुक्र ने राज्य की उत्पत्ति के समाज अनुबंधवाद के सिद्धांत का कहीं पर तो स्पष्ट वर्णन नहीं किया किंतु फिर भी जहां एक ओर उन्होंने राजा को प्रजा के पालन का दायित्व सौपा वहीं दूसरी ओर प्रजा से राजा को कर रूप में वेतन ग्रहण करने का अधिकार भी दिया २० I प्रजा और राजा के मध्य इस प्रकार के विभाजित पारस्परिक दायित्व से स्पष्ट है कि महर्षि शुक्र के अनुसार राजा और प्रजा पारस्परिक अनुबंध के बंधन से आबद्ध थे

दैवी उत्पत्ति का सिद्धान्त  

शुक्रनीतिकार ने प्रतिपादित किया है कि ब्रह्मा द्वारा राजा का निर्माण २१ इंद्र, वायु एवं सूर्य, अग्नि वरुण ,चंद्र, और कुबेर आदि आठ देवताओं के अंश के सहयोग से किया गया है २२I इसलिए उन्होंने राजा को विष्णु के समान माना है २३ I राजा के उक्त आठ देवताओं के अंश के सहयोग से निर्मित किए जाने की कल्पना यह निर्विवाद रूप से सिद्ध कर देती है कि जहां एक और राजा का निर्माण सृष्टि के रचयिता देवता ब्रह्मा द्वारा किया गया वहां साथ ही साथ उसके निर्माण में अन्य महत्वपूर्ण देवताओं का योगदान भी रहा I इस भाँति स्पष्ट है कि शुक्र नीति कार राजा की दैवी उत्पत्ति में विश्वास करते थे इसी आधार पर उन्होंने इंद्र के अनुरूप प्रजा से राजा को कर ग्रहण करके प्रजा के हित को ध्यान में रखते हुए उसका भोग करने का अधिकार दिया I सूर्य की भांति उसका अधर्म का नाश तथा धर्म की स्थापना करनी है २४ I उसके अनुसार यम की भांति राजा दुष्कर्मों को करने वालों को दंड देने का अधिकार रखता है वरुण के सामान राजा भी अपने धन से सब का पोषण करने वाला होता है I कुबेर की भांति राजा अपने कोष की रक्षा करने का कार्य करता है और इस प्रकार राजा अग्नि की भांति शुद्ध एवं चंद्रमा के समान गुण कर्म के द्वारा प्रजा को आनंद प्रदान करता है २५ Iकिंतु महर्षि शुक्र प्रत्येक राजा को वह सभी अधिकार आदि प्रदान करने के पक्ष में नहीं है जो इंद्र आदि देवताओं के अंश से संयुक्त होने के कारण उसे प्राप्त होने चाहिए I

राजा के प्रकार

आचार्य शुक्र ने सात्विक  राजस तामस आदि तीन प्रकार के राजा बताएं हैं उनके अनुसार सात्विक राजा अपने धर्म निरत प्रजापालक संपूर्ण यज्ञों का कर्ता २६शत्रु विजेता दानवीर क्षमावान शूर और इंद्रिय निग्रही वैराग्य आदि गुणो से युक्त होता है२७ I राजस राजा दंभी लोभी, विषयी, ठग, शठ ,मन, से अन्य बाहर से अन्य व्यवहार करने वाला ,वाणी और कर्म से कलह ,प्रिय ,नीचों से प्रेम करने वाला ,स्वतंत्र नीति से हीन, भीतर छल रखने वाला, होता है I इसके अतिरिक्त महर्षि ने तामस राजा को सात्विक गुणों से विपरीत दया रहित मदोन्मत हिंसक सत्य रहित आदि दोषों से युक्त माना है, किंतु दैविक सिद्धांत में आस्था रखते हुए भी ऐसा प्रतीक होता है कि आचार्य शुक्र यह मानते थे कि राजा उक्त गुणों का अर्जन स्वयं अपने प्रयत्नों या तप के द्वारा करता है I

      इस भाँति स्पष्ट है कि आचार्य ने प्रत्येक राजा में देवांसी का होना स्वीकार नहीं किया अपितु केवल मात्र सात्विक राजा में ही देवांशों को मना है I महर्षि शुक्र ने अन्य विद्वानों की परंपरा का अनुसरण करते हुए राज्य के स्वरूपों को सप्तांग माना है  I उन्होंने राज्य के स्वामी ,अमात्य ,मित्र ,कोष, राष्ट्र ,दुर्ग ,और बल ,आदि सात अंग स्वीकार किए हैंI          

निष्कर्ष  

परवर्ती वैदिक परंपरा के अनुरूप ही महर्षि शुक्र ने राज्य के सात अंगों की सामान्य मानवागों से की है I जिसके अंतर्गत उन्होंने राजा को राज्य रूपी व्यक्ति का सिर तथा अमात्य राज्य रूपी व्यक्ति में नेत्र, मित्र के कान कोष, में मुख बल में मन दुर्ग में दोनों हाथों एवं राष्ट्र में दोनों पैरों की कल्पना की है I एक अन्य स्थान पर शुक्राचार्य ने राज्य की सामानता वृक्ष से भी की है जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है कि राज्य रूपी वृक्ष का मूल राजा मोटी डालें मंत्री लोग शाखाएं सेनापति पल्लव सेनाएं फूल, प्रजाएँ फल, भूमि से प्राप्त होने वाला कर एवं बीज, राज्य की भूमि आदि होते हैं I इस प्रकार स्पष्ट की शुक्र नीति में राज्य की प्रकृति के सावयव सिद्धांत का वर्णन उपलब्ध है I

संदर्भ ग्रंथ

१-प्रेम कुमारी दीक्षित- महाभारत में राज्य व्यवस्था- प्रथम संस्करण- लखनऊ- अर्चना प्रकाशन लालबाग- सन -1970 –पृष्ठ- 11

२-ऋग्वेद -1.28.2

३-प्राचीन भारतीय विचारकों ने राज्य की उत्पत्ति को ही उसका आधार मान लिया है उन्होंने राज्य एवं राजा की उत्पत्ति में कोई अंतर नहीं किया है

४-ऋग्वेद- 1.9- 1.3

५-ऋग्वेद -10.28 -10.30 -8.37

६-यजुर्वेद- 20,3-10

७-श्याम लाल पांडे- वेदकालीन राज्य व्यवस्था- प्रथम संस्करण -लखनऊ -हिंदी समिति सूचना विभाग उत्तर प्रदेश -सन -1971 -अध्याय 3

८-रामायण उत्तरकांड -76-38

९-प्रभाकर दीक्षित -अदभुत भारत –पृष्ठ- 106

१०-महाभारत -शांति पर्व -59, 128, 135,144

११-वही- 67,19-29

१२-श्याम लाल पांडे -भीष्म का राज दर्शन -लखनऊ प्रकाशन -डॉक्टर श्याम लाल पांडे -आर्य नगर संवत 2012- वि० अध्याय- प्रथम

१३-मनुस्मृति -9.303

१४-शुक्र नीति- 4.1.56

१५-शुक्र नीति -4.1.56

१६-वही- 4.1.57

१७-वही

१८-वही

१९-शुक्र नीति -1.65 -रामायण अयोध्या कांड- 6 7.8 -एवं मनुस्मृति 7.3 तथा महाभारत शांति पर्व 67,13,20 -21

२१-शुक्र नीति- 1.188

२२-वही -1.71 -तुलनीय मनुस्मृति- 9.303

२२-शुक्र नीति- 2.214

२३-वही


Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.

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