राजधर्म (भारतीय राज धर्म)
प्राचीन भारत में शासन की कला को विभिन्न संज्ञाओं से संबोधित किया गया है उनमे से राजधर्म एक है। अनेकों ग्रंथों में शासन कला के लिए दंडनिति, नीतिशास्त्र एवं अर्थशास्त्र शब्दों का भी प्रयोग देखने को मिलता है। ‘राजधर्म’ संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका प्रयोग राजा या सम्राट के धर्म अथवा कर्तव्यों के लिए जाता है। ब्रह्मा द्वारा राजनीति के विज्ञान को लेकर एक लाख अध्याय की पुस्तक की रचना की गई, जिससे राजधर्म की उत्पत्ति को माना गया है। राजधर्म का तात्पर्य प्रजा में सुख-समृद्धि और शांति सुनिश्चित करने के लिए राजा के दायित्वों से है। प्राचीन भारतीय राजनीतिक दर्शन में राजधर्म पर विशेष बल दिया गया है। प्रजा की सुरक्षा करना, अपराधियों को दंडित करना एवं राज्य की आक्रमणकारियों से रक्षा करना राजा के प्रमुख कर्तव्य है। राजधर्म प्राचीन अवधारणा है इसके केंद्र में जन कल्याण का भाव है। सभी राज्यवासियों के भौतिक, नैतिक व आध्यात्मिक कल्याण को सुनिश्चित करना राजा का कर्तव्य माना गया है।
धर्मशास्त्र ग्रंथ सामाजिक सिद्धांतों की रूपरेखा प्रदान करते हुए राजा के कर्तव्यों तथा सामाजिक और आपराधिक कानूनों का वर्णन करते है। विभिन्न धर्मसूत्रों, महाभारत और स्मृतियों में राजधर्म के बारे विस्तृत चर्चा देखने को मिलती है। ये सभी ग्रंथ भी राजधर्म का प्रयोग राजा के कर्तव्य के रूप में करते है[1]। सभी प्राचीन भारतीय शास्त्रों में इस बात पर सहमति है कि राजा द्वारा राजधर्म का पालन करना आवश्यक है। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो राजा भी नियमों की पालना के लिए बाध्यकारी है। राजधर्म को धर्म का आधार माना गया है, क्योंकि समाज में स्थिर और सुव्यवस्थित विकास एवं राज्य में व्यक्तियों के सुख के लिए यह आवश्यक है की राजा अपने कर्तव्यों और दायित्वों का निष्ठा और ईमानदारी से निर्वहन करे[2]। शांतिपर्व में कहा गया है कि, “जैसे हाथी के पदचिह्नों में सभी प्राणियों के पदचिह्न समाहित हो जाते हैं, वैसे ही सभी अवस्थाओं में राजधर्म के अंतर्गत सभी धर्मों को समाहित समझो”[3]। राजा को “सभी लोगों की एकता, कल्याण, अच्छी वर्षा, रोग, मृत्यु और भय का मूल कारण” माना गया है[4]। राजा सभी वर्णों का पालन करता है, त्याग जिसे ऋषियों ने सर्वश्रेष्ठ बताया है, राजधर्म में सभी प्रकार के त्याग भी शामिल हैं। राजधर्म समस्त ज्ञान का एक संयोजन है, जिसमें समस्त जगत समाहित है। इसका अर्थ है कि राजधर्म सभी धर्मों का शीर्ष है और सभी धर्म राजधर्म में समाहित हैं।
काणे का विचार है की हमारे प्राचीन लेखकों और विद्वानों ने धर्म का प्रयोग एक सर्वव्यापी संस्था के रूप कुछ इस तरह किया की समाज और राज्य के साथ-साथ राजा भी इससे अछूते नहीं रहे होंगे, राजा पर भी इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव अवश्य पड़ा होगा[5]। धर्म और कर्तव्य के प्रभाव के कारण मूल्यों का निर्माण हुआ और समाज तथा राज्य इन मूल्यों से प्रभावित हुए। धर्मशास्त्रों के अनुसार यह सुनिश्चित करना राजा का कर्तव्य है कि उसका प्रत्येक कार्य उसकी प्रजा की भलाई के लिए हो। धर्मशास्त्रों के अनुसार राजा अपनी निजी इच्छा या व्यक्तिगत लोभ के लिए कोई भी कार्य नहीं कर सकता, राजा का धर्म है अपने कर्तव्यों का पालन करना, शासन करने की उसकी शक्ति सीमित होती है और यदि वह धर्म के नियमों के अनुसार कार्य नहीं करता तो उसे पदच्युत किया जा सकता है, उसकी अवज्ञा की जा सकती है या उसे मार भी दिया जा सकता है[6]।
राजधर्म एवं राजा के आचरण को लेकर महाकाव्य महाभारत में भी विस्तृत रूप से चर्चा की गई है। महाभारत में राजधर्म को सम्पूर्ण विश्व का सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है, जिसमें आचार, व्यवहार (न्याय का प्रशासन) और प्रायश्चित (तपस्या) के सभी नियम शामिल थे।[7] भीष्म राजा द्वारा कोई निर्णय लेने के लिए केवल शास्त्रों को ही आधार नहीं मानते है, वे तार्किक एवं ज्ञानी लोगों द्वारा दिखाये गये मार्ग को प्राथमिकता देते है[8]। भीष्म राजा के आचरण के लिए दोनों ही सीधे व टेढ़े मार्ग की बात करते है, सीधा आचरण प्रजा के लिए व टेढ़े आचरण की अनुसंशा सिर्फ़ टेढ़े आचरण वाले शत्रुओं के लिए करते है। भीष्म राजधर्म को किसी एक स्रोत या ग्रंथ आधारित नहीं मानते है, नीतियों की पालना सिर्फ़ पवित्र स्रोतों के आधार पर नहीं की जानी चाहिए बल्कि उसके लिए तर्क का भी सहारा लिया जाना चाहिए, वे कहते है कि यह नियम स्वयं इंद्र द्वारा घोषित है जिसे उन्होंने बृहस्पति से प्राप्त किया था[9]। महाभारत में चर्चित राजा के कर्तव्यों में एक लचीलापन भी देखने को मिलता है जो धर्मशास्त्र के कठोर नियमों को दरकिनार करते हुए नैतिकता से परे कुटिल तरीकों का पालन करके आवश्यक परिस्थितियों में कार्य करने की अनुमति देता है। मनु राजा और राज्य में भेद को अस्वीकारते है, वे राजा की दिव्य उत्पत्ति पर जोर देते है। उनके अनुसार पृथ्वी से अराजकता को ख़त्म करने और लोगो की सुरक्षा हेतु भगवान ने राजा का सृजन किया है।
एक आदर्श राजा से अपेक्षा की जाती है की वह अपनी स्थिति से कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ न उठाए, यहां तक की वह प्रजा के लिए अपने सुखों तक का त्याग कर दे क्योंकि राजा का शरीर सुख भोगने के लिए नहीं है। राजा को प्रजा की रक्षा और अपने राजधर्म के निर्वहन के लिए बहुत सारे कष्ट और चिंताएँ उठानी पड़ती हैं। राजा के कर्तव्य भारी और कठोर होते हैं। कौटिल्य तो राजा की तुलना एक वेतन भोगी कर्मचारी से करते है और राजकीय संपत्ति को राजा की निजी या व्यक्तिगत संपत्ति नहीं मानते है। यदि कोई राजा राजकीय संपत्ति को अपने निजी कार्यों के लिए प्रयोग करता है तो वह पाप का दोषी होगा। कौटिल्य की नज़रों में एक राजा सिर्फ़ तब ही खुश रह सकता है जब उसकी प्रजा खुश होगी और प्रजा की ख़ुशी उसकी संतुष्टि और समृद्धि में है। राजा को केवल बुरे लोगों के साथ ही कठोर रवैया अपनाना चाहिए। आदर्श राजा वहीं है जो एक अभिभावक की भाँति अपनी प्रजा को प्यार और उनका कल्याण करने का प्रयास करता है। कौटिल्य अपने अर्थशास्त्र में योगक्षेम के सिद्धांत को प्रतिपादित करते है, यह शब्द ‘योग’ और ‘क्षेम’ शब्दों से मिलकर बना है जिसमें योग का अर्थ है ‘किसी वस्तु की सफल सिद्धि’ वहीं क्षेम का अर्थ है ‘उस वस्तु का शांतिपूर्ण व निर्बाध आनंद’। योगक्षेम के सिद्धांत में कल्याण, खुशहाली, समृद्धि, खुशी आदि का विचार शामिल है। प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में योगक्षेम में जो प्रतिपादित किया गया है, उससे बढ़कर राज्य का कोई उच्चतर लक्ष्य और कर्तव्य नहीं हो सकता।
राजा के कर्तव्य अथार्थ राजधर्म प्राचीन भारतीय राजा की कल्याणकारी छवि प्रस्तुत करते है। मनुस्मृति की टीका मेधातिथि सभी वर्णों के बेरोजगार लोगों की सहायता करना राजा का कर्तव्य बताती है[10], जिससे धर्मशास्त्रीय राज्य इक्कीसवीं सदी के राज्यों के समकक्ष खड़े हो जाते है, जहाँ पर बेरोजगारी भत्ते के रूप राज्य बेरोजगार लोगों की सहायता करते है। प्राचीन भारत में राजनीतिक व्यवस्था मुख्य रूप से राजतंत्रात्मक थी, लेकिन राजा धर्म के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य था[11]। पी.वी. काणे कहते है कि राजधर्म ही संपूर्ण जगत का सर्वोच्च लक्ष्य है, इसमें आचार, व्यवहार और प्रायश्चित्त के सभी नियम शामिल हैं[12]। राजधर्म के विरुद्ध कार्य करने वाला राजा अपनी वैधत खो देता है एवं विद्रोह का मार्ग प्रशस्त कर देता है। राजधर्म के विरुद्ध नीतियों को अधर्मी माना जाता है।
राजधर्म की अवधारणा वर्तमान समय में भी प्रासंगिक है। राजधर्म का विवरण यह स्पष्ट करता हैं कि राजधर्म की भावना लोगों की शांति और समृद्धि को लक्ष्य मानना रहीं होगी। वर्तमान समय में भी राज्य का लक्ष्य उसके नागरिकों की समृद्धि ही है। राजधर्म की अवधारणा वर्तमान समय के लोकतंत्र में मौजूद विभिन्न संस्थाओं की भाँति चेक-बैलेंस का भी कार्य करती है।
[1] विश्वनाथ प्रसाद वर्मा, स्टडीज़ इन हिंदू पोलिटिकल थॉट एंड इट्स मेटाफिसिकल फ़ाउंडेशंस (दिल्ली: मोतीलाल बनारसीदास, 1974), 113.
[2] पांडुरंग वामन काणे, हिस्ट्री ऑफ़ धर्मशास्त्र: अन्सिएंट एंड मेडेविल रिलीजियस एंड सिविल लॉ खंड 3 (पूना: भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट,1946), 3.
[3] “शांति-पर्व”, महाभारत खंड 5, (गोरखपुर, गीता प्रेस) 4585-4586.
[4] वही 4793.
[5] काणे, हिस्ट्री ऑफ़ धर्मशास्त्र, (1946), 60.
[6] जितेन्द्र नारायण, “रिलीवेंस ऑफ़ राजधर्म ऑफ़ अन्सिएंट इंडिया,” इंडियन जर्नल ऑफ पॉलिटिकल साइंस, जनवरी-मार्च, 2004, खंड 65, संख्या 1 (जनवरी-मार्च, 2004), पृष्ठ 22.
[7] वही.
[8] पांडुरंग वामन काणे, हिस्ट्री ऑफ़ धर्मशास्त्र: अन्सिएंट एंड मेडेविल रिलीजियस एंड सिविल लॉ, खंड 2 (पूना: भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट, 1941), 11.
[9] वही.
[10] पांडुरंग वामन काणे, हिस्ट्री ऑफ़ धर्मशास्त्र, (1946), 59.
[11] वर्मा, स्टडीज़ इन हिंदू पोलिटिकल थॉट एंड इट्स मेटाफिसिकल फ़ाउंडेशंस, 151.
[12] काणे, हिस्ट्री ऑफ़ धर्मशास्त्र, (1946), 3.
Authored by Prof. Sri Prakash Singh Director South Campus, Delhi University, Delhi.
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