शुक्रनीति में शासकीय अधिकारियों की नियुक्ति, अधिकार एवं कर्तव्य
भूमिका
पुरातन काल में शासन पद्धति का संचालित रूप राजतंत्र था किंतु राजा निरंकुश नहीं होते थे I उन्हें शासन के सुचारू संचालन के लिए विविध ज्ञान संपन्न राजपुरुषों का सहयोग लेना आवश्यक होता था I जिनकी नियुक्ति राजा के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती थी I राजा को अपने सहयोगी मंत्रियों व अमात्यों की नियुक्ति में विशेष सावधानी रखनी पड़ती थी I शासन तंत्र में मंत्रियों आदि राज्य अधिकारियों का स्थान बहुत ऊंचा है I अतः इन पदों पर नियुक्त होने वाले व्यक्तियों में असाधारण विशेषताओं का होना अनिवार्य है I सदस्यों की संख्या के साथ महर्षि शुक्र ने मंत्रिपरिषद के सदस्यों की योग्यता कर्तव्य एवं अधिकारों का ही वर्णन किया है-
पुरोहित
शुक्र के मतानुसार पुरोहित प्रवृत्तियों में सर्वश्रेष्ठ है I वह राजा और राष्ट्र दोनों का रक्षक होता है I महर्षि शुक्र के अनुसार पुरोहित की योग्यता निम्नलिखित है - मंत्रानुसार अनुष्ठान कार्य करने में कुशल, वेदलयी का ज्ञाता, यज्ञादि, कर्म पारायण ,जितेंद्रिय, क्रोध को जीतने वाला ,लोभ और मोह से रहित, शिक्षा ,कला ,व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष्ठ ,छन्द को जानने वाला, जिसके क्रोध के भय से राजा भी धर्म और नीति में तत्पर रहता है I ऐसा नीति शास्त्र निपुण शस्त्र चलाने की कला तथा व्यूह रचना में कुशल ब्राह्मण को इस पद पर नियुक्त करना चाहिए I पुरोहित को आचार्य भी कहते हैं यह साफ तथा अनुग्रह दोनों में समर्थ होता है १ I आचार्य शुक्र ने पुरोहित का पद मंत्रिपरिषद में सर्वोच्च माना है I उनके अनुसार पुरोहित का प्रमुख कार्य शास्त्रोक्त विधि से पूजन , एवं अनुष्ठान के द्वारा राजा और राज्य की रक्षा करना है I उनका मानना है कि पुरोधा के कोप के भय से राजा भी धर्म तथा नीतियुक्त आचरण करता है I
प्रतिनिधि
करने योग्य तथा न करने योग्य कार्यों को भली भांति जानने वाला प्रतिनिधि कहलाता है २ I आचार्य शुक्र के अनुसार प्रतिनिधि में इतनी योग्यता अवश्य होनी चाहिए कि वह कार्य का परिणाम पहले से ही सोच ले I कौन सा कार्य राजा के हित में है , कौन सा हित में नहीं है I यह जानना भी प्रतिनिधि की योग्यता के अंतर्गत आता है I प्रतिनिधि का कर्तव्य है कि अहितकर होने पर भी यदि किसी कार्य का करना अनिवार्य है तो उसे राजा से कहकर शीघ्रतापूर्वक करवाये या स्वयं करें इसके विपरीत यदि हितकर कार्य अनुचित है तो उसे ना तो राजा से करने को कहे और ना ही स्वयं करें I
प्रधान
राज्य में होने वाले प्रत्येक कार्य एवं प्रत्येक गतिविधि पर नजर रखने तथा प्रत्येक कार्य के निरीक्षण की योग्यता प्रधान में होनी आवश्यक है ३ Iआचार्य शुक्र ने प्रधान के कार्यों का निरूपण निम्न प्रकार से किया है प्रधान को समस्त राज्य कार्यों का परीक्षण करके उसमें सत्य और असत्य का निर्धारण करना चाहिए तथा उसी के अनुरूप कार्य करने का परामर्श देना चाहिए I निरीक्षण के रूप में कार्य करने का दायित्व आचार्य शुक्र ने प्रधान का ही माना है I
सचिव
जो व्यक्ति सैन्य संचालन तथा अस्त्र-शस्त्र चलाने की कला में निपुण हो सचिव पद के लिए प्रयुक्त होता है I उसे देसी तथा विदेशी सांकेतिक भाषा का ज्ञान होना अनिवार्य है I शुक्रनीतिकार ने सचिव को रक्षा मंत्री माना है तथा रक्षा मंत्री के रूप में उसके कार्यों का निरूपण इस प्रकार किया है कि सचिव को हाथी ,घोड़े ,रथ ,पैदल ,सैनिक, ऊंट, बैल, बाघ, ध्वनि ,के संकेत व व्यूह रचना दूत राजचिन्ह ,शास्त्र, तथा अस्त्र ,अधम, मध्य, और उत्तम कर्म करने वाले परिचायक गण ,आदि के संबंध में लिखकर राजा के समक्ष प्रतिवेदन करना चाहिए ४ I
मंत्री
नीति शास्त्र में निपुण नीति के अनुसार कार्य करने वाला तथा मंत्रणा देने की योग्यता रखने वाला व्यक्ति ही मंत्री बन सकता है I महर्षि शुक्र के अनुसार मंत्री का कर्तव्य है की अच्छी तरह से विचार करें कि शाम दाम दंड और भेद चारों का प्रयोग कब किया जाए और किन विषयों में किया जाए I उनका प्रयोग अधिक या कम करने से क्या परिणाम होंगे I इस संदर्भ में पूर्ण विचार करने के उपरांत थी राजा को कोई परामर्श दे ५ I शुक्रनीति में मंत्री की शक्ति और अधिकार को प्रदर्शित करते हुए कहा गया है कि सेवक भी मंत्री की सहमति से रखे जाने चाहिए I
प्राङ विवाक
लोक व्यवहार तथा शास्त्रोक्त व्यवहार को जानने की योग्यता रखने वाला व्यक्ति प्राङ - विवाक के पद पर नियुक्त किया जाना चाहिए I प्राड- विवाक का कार्य न्यायिक निर्णय करना है I न्यायिक निर्णय करने के उद्देश्य से उसे सभा में बैठकर सभ्यों के साथ साक्षियों एवं लेखो के द्वारा सही और गलत का निर्णय करना चाहिए I जहां साक्षी तथा लेख उपलब्ध न हो वहां दिव्य साधनों के द्वारा प्रत्यक्ष अनुमान दृष्टांत तथा लोक शास्त्र पर विचार करने के उपरांत निर्णय करना चाहिए I इस निर्णय में राजा को भली भांति सूचित करें ६ I इस प्रकार महर्षि शुक्र तथा प्राड- विवाक न्याय मंत्री एवं न्यायाधीश के रूप में कार्य करने वाला था I
पंडित
धर्म के तत्व को जानने वाला पंडित होता है ७ I आचार्य शुक्र के अनुसार पंडित का मुख्य कार्य है कि वह इस बात का अच्छी तरह पता लगाए कि वर्तमान समय में जनता प्राचीन या नवीन में से किस धर्म का पालक है I तथा किस धर्म का शास्त्र में निर्दिष्ट होने पर भी जनता अनादर करती है I ऐसे कौन से प्रचलित धर्म है जो शास्त्र के विरुद्ध है I इस लोक तथा परलोक में कौन सा धर्म सुखप्रद है I
सुमंत्र
आय तथा व्यय के कार्यों को सुचारू रूप से जानने वाला सुमंत कहलाता है I राज्य की कितनी आय है I वह कहां-कहां होती है तथा किस प्रकार खर्च होती है इस सभी बातों की योग्यता सुमंत्र को होनी अनिवार्य है I शुक्र के अनुसार सुमंत्र का पद मंत्री परिषद में वित्त मंत्री का था I उसका कार्य वर्तमान वर्ष के आय व्यय का व्योरा रखने तथा उसे सुचारू रूप से राजा के समक्ष प्रस्तुत करना था ८ I
अमात्य
देश काल का सम्यक ज्ञान रखने वाला अमात्य कहलाता है I किस देश में किस समय कैसा व्यवहार करना चाहिए इन सब बातों की योग्यता अमात्य में अवश्य होनी चाहिए I मृत्यु प्रकृति गंभीर स्वभाव संभ्रांत काल उत्तम वाणी आदि गुण भी अमात्य की योग्यता के अंतर्गत आते हैं ९ I अमात्य के कार्यों का निरूपण आचार्य शुक्र ने इस प्रकार किया है - राज्य में कितने नगर ग्राम तथा जंगल हैं, ? किसके द्वारा कितनी भूमि जोति गई है? ,उससे कितना धन मे मिला?, किस क्षेत्र का कितना भाग बचा है? ,कितनी भूमि बिना जुती है? ,देश में प्रति वर्ष शुल्क एवं अपराधियों के दंड से मिला ,द्रव्य कितना है? ,जंगल में मिलने वाला तथा खान से निकलने वाला द्रव्य कितना है? ,अज्ञात स्वामी वाली वस्तु स्वामी रहित द्रव्य हरण किया हुआ ,द्रव्य एवं चोरों से दंड रूप में प्राप्त किया हुआ द्रव्य कितना है?, समग्र विवरण भली भांति प्राप्त कर तथा उस पर भली भांति विचार कर राजा के समक्ष प्रस्तुत करें I इससे स्पष्ट होता है कि अमात्य मूल रूप से कृषि मंत्री के रूप में कार्यरत था लेकिन उसके पास वित्त मंत्रालय से संबंधित कुछ उप विभाग भी होंगे I संभवतः महर्षि शुक्र ने ऐसा इसलिए किया है कि वह वित्त जैसे महत्वपूर्ण विषय का अधिकारी किसी एक व्यक्ति को बनाने के पक्ष में नहीं थे I
दूत
शुक्र के अनुसार हृदय गण भाव तथा चेष्टा को समझने वाला, उत्तम स्मरण शक्ति वाला, देश काल अनुरूप कर्तव्य को जानने वाला ,संधि ,विग्रह, यान, आसन ,द्वैदीभाव ,समाश्रय ,आदि का ज्ञाता एवं बोलने में चतुर व्यक्ति ही दूत बन सकता है १० I विदेश में अपने देश का नाम ऊंचा करना ही दूत का प्रमुख कार्य है I महर्षि शुक्र ने अन्य आचार्य के मत के आधार पर लिखा है कि सुमंत्र ,पंडित, मंत्री, प्रधान, सचिव, अमात्य ,प्राड - विवाक ,और प्रतिनिधि इन आठ प्रकृतियों का वेतन सदैव समान होना चाहिए ११ I
निष्कर्ष
अतः हम यह कह सकते हैं कि राज्य की समस्त शासन व्यवस्था का दायित्व राजा के महत्वपूर्ण कार्यों का संचालन एवं संपादन राज्य के केंद्रीय प्रशासन के महत्वपूर्ण अंग मंत्रिपरिषद पर आधारित है I मंत्रिपरिषद के प्रत्येक सदस्य का अपना एक अलग विभाग है I जिसके संपूर्ण कार्य संचालन से संबंधित अधिकार एवं कर्तव्य उसके अधीन स्थापित किए गए हैं I उनका कार्य क्षेत्र निश्चित है तथा वह अपने कार्य क्षेत्र में स्व विवेक के अनुसार कार्य करने के अधिकारी हैं I मंत्रिपरिषद के समस्त सदस्य अपने-अपने विभाग के विशेषज्ञ विभाग के मंत्री होते हैं I
संदर्भ ग्रंथ
१-शुक्रनीति- 2.77-79
२-शुक्रनीति- 2.83
३-पूर्ववत -2.94
४-शुक्रनीति- 2.93
५-पूर्ववत -2.84
६-पूर्ववत- 2.94
७-शुक्रनीति -295/ 297
८-पूर्ववत- 2/85
९-पूर्ववत -2/11
१०-शुक्रनीति -2,101,104
११-शुक्रनीति -2/73
Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.
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